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  • पद्मश्री से सम्मानित हुए दिवंगत सतीश शाह, राष्ट्रपति भवन में गूंजा उनके योगदान का सम्मान; रुपाली गांगुली और देवेन भोजानी हुए भावुक

    पद्मश्री से सम्मानित हुए दिवंगत सतीश शाह, राष्ट्रपति भवन में गूंजा उनके योगदान का सम्मान; रुपाली गांगुली और देवेन भोजानी हुए भावुक


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा और टेलीविजन जगत के प्रतिष्ठित अभिनेता सतीश शाह को मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान प्रदान किए जाने के बाद मनोरंजन जगत में भावनात्मक माहौल देखने को मिला। चार दशक से अधिक समय तक अपने अभिनय, हास्य शैली और विविध किरदारों से दर्शकों का दिल जीतने वाले सतीश शाह को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके भारतीय मनोरंजन उद्योग में लंबे और उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया।

    राष्ट्रपति भवन में आयोजित सम्मान समारोह में सतीश शाह की ओर से यह पुरस्कार उनके परिवार के सदस्य ने स्वीकार किया। समारोह के दौरान अभिनेता को याद करते हुए उनके सहयोगियों और प्रशंसकों ने उनके कार्यों को भारतीय मनोरंजन जगत की अमूल्य धरोहर बताया। सतीश शाह के निधन के बाद मिला यह सम्मान उनके दशकों लंबे रचनात्मक सफर की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति माना जा रहा है।

    सतीश शाह के साथ लंबे समय तक काम कर चुके अभिनेता और निर्देशक देवेन भोजानी ने इस अवसर पर एक भावुक संदेश साझा किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान पूरी तरह से सतीश शाह के व्यक्तित्व और योगदान के अनुरूप है, लेकिन सभी को इस बात का अफसोस रहेगा कि वह स्वयं इस सम्मान को ग्रहण करने के लिए उपस्थित नहीं थे। उन्होंने अभिनेता को याद करते हुए कहा कि उनकी प्रतिभा, विनम्रता और कार्य के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

    अभिनेत्री रुपाली गांगुली ने भी सतीश शाह को याद करते हुए भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था और काश वह स्वयं इस ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बन पाते। रुपाली ने उनके साथ बिताए गए पेशेवर और व्यक्तिगत अनुभवों को याद करते हुए उन्हें भारतीय मनोरंजन जगत का एक असाधारण कलाकार बताया।

    सतीश शाह का अभिनय करियर कई दशकों तक फैला रहा। उन्होंने फिल्मों और टेलीविजन दोनों माध्यमों में अपनी अलग पहचान बनाई। अपने सहज अभिनय, सटीक कॉमिक टाइमिंग और बहुआयामी किरदारों के कारण वह दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे। उन्होंने गंभीर, सामाजिक और हास्य प्रधान भूमिकाओं में समान दक्षता दिखाई और अपने अभिनय से हर वर्ग के दर्शकों को प्रभावित किया।

    फिल्मों में उनकी उपस्थिति जितनी प्रभावशाली रही, उतना ही बड़ा योगदान उन्होंने टेलीविजन जगत में भी दिया। कई लोकप्रिय धारावाहिकों और कॉमेडी कार्यक्रमों में निभाए गए उनके किरदार आज भी दर्शकों के बीच याद किए जाते हैं। विशेष रूप से पारिवारिक और हास्य आधारित कार्यक्रमों में उनकी भूमिका ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई।

    मनोरंजन उद्योग के अनेक कलाकारों का मानना है कि सतीश शाह उन चुनिंदा अभिनेताओं में शामिल थे जिन्होंने अभिनय को केवल पेशा नहीं बल्कि कला के रूप में जिया। उनके संवाद, अभिव्यक्ति और किरदारों की प्रस्तुति ने भारतीय दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। पद्मश्री सम्मान उनके इसी दीर्घकालिक योगदान और सांस्कृतिक प्रभाव की औपचारिक पहचान है।

    मरणोपरांत मिला यह सम्मान न केवल सतीश शाह के परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि उन लाखों दर्शकों के लिए भी विशेष महत्व रखता है जिन्होंने वर्षों तक उनके अभिनय का आनंद लिया। भारतीय मनोरंजन जगत में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा और उनका नाम देश के प्रतिष्ठित कलाकारों की सूची में सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

  • ‘गदर’ के पहले ही दिन घबरा गई थीं अमीषा पटेल, अमरीश पुरी के साथ पहला सीन बना यादगार; दिग्गज अभिनेता की सादगी ने जीता दिल

    ‘गदर’ के पहले ही दिन घबरा गई थीं अमीषा पटेल, अमरीश पुरी के साथ पहला सीन बना यादगार; दिग्गज अभिनेता की सादगी ने जीता दिल


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की चर्चित फिल्म ‘गदर’ को 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अभिनेत्री अमीषा पटेल ने फिल्म से जुड़ी कई यादगार बातें साझा की हैं। उन्होंने बताया कि अपने करियर के शुरुआती दौर में जब उन्हें दिग्गज अभिनेता अमरीश पुरी के साथ काम करने का अवसर मिला, तब वह बेहद घबराई हुई थीं। हालांकि शूटिंग के दौरान अमरीश पुरी के व्यवहार और सहयोगी स्वभाव ने उनकी सारी झिझक दूर कर दी थी।

    अमीषा पटेल ने कहा कि दर्शकों के बीच अमरीश पुरी की पहचान एक सशक्त और प्रभावशाली अभिनेता के रूप में थी। फिल्मों में उनके निभाए गए नकारात्मक किरदारों ने उन्हें एक अलग पहचान दी थी, लेकिन वास्तविक जीवन में उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। वह बेहद सरल, सहज और मजाकिया स्वभाव के इंसान थे। उनके साथ काम करने का अनुभव आज भी उनकी सबसे खास यादों में शामिल है।

    अभिनेत्री ने बताया कि ‘गदर’ उनके करियर की शुरुआती फिल्मों में से एक थी। उस समय वह इंडस्ट्री में नई थीं और बड़े कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव भी सीमित था। ऐसे में फिल्म के पहले दिन ही उनका महत्वपूर्ण दृश्य अमरीश पुरी के साथ रखा गया था। यह एक भावनात्मक दृश्य था, जिसे फिल्म की कहानी में अहम स्थान प्राप्त था। इतने बड़े कलाकार के साथ पहला ही सीन होने के कारण वह अंदर से काफी घबराई हुई थीं।

    उन्होंने कहा कि कैमरे के सामने आने से पहले उनके मन में कई तरह के सवाल और आशंकाएं थीं। उन्हें डर था कि कहीं वह दृश्य ठीक तरह से न कर पाएं या किसी तरह की गलती न हो जाए। लेकिन जैसे ही शूटिंग शुरू हुई, अमरीश पुरी ने अपने व्यवहार से माहौल को सहज बना दिया। उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह एक नई कलाकार हैं और उनके सामने इंडस्ट्री के सबसे अनुभवी अभिनेताओं में से एक मौजूद हैं।

    अमीषा ने बताया कि अमरीश पुरी सेट पर हमेशा सकारात्मक ऊर्जा के साथ मौजूद रहते थे। वह कलाकारों और तकनीकी टीम के साथ घुलमिलकर रहते थे तथा माहौल को हल्का बनाए रखते थे। उनकी यही विशेषता उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी। एक बड़े अभिनेता होने के बावजूद उनके व्यवहार में किसी प्रकार का अहंकार नहीं था। यही कारण था कि उनके साथ काम करना किसी सीखने की प्रक्रिया से कम नहीं था।

    अभिनेत्री ने यह भी याद किया कि उस समय उनकी पहली फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई थी और दर्शक उन्हें पहचानते भी नहीं थे। बावजूद इसके अमरीश पुरी ने उन्हें पूरा सम्मान दिया और हर कदम पर उनका मनोबल बढ़ाया। उनके सहयोग से वह अपने किरदार को बेहतर ढंग से निभाने में सफल रहीं। अमीषा के अनुसार, किसी नए कलाकार के लिए ऐसा समर्थन बेहद महत्वपूर्ण होता है।

    ‘गदर’ भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में सनी देओल, अमीषा पटेल और अमरीश पुरी की भूमिकाओं को दर्शकों ने खूब सराहा था। विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की थी और इसके संवाद व किरदार आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं।

    फिल्म की सफलता के वर्षों बाद भी कलाकारों द्वारा साझा की गई ऐसी यादें दर्शकों को उस दौर से जोड़ती हैं। अमीषा पटेल के ताजा बयान ने एक बार फिर यह दिखाया है कि बड़े कलाकारों की असली पहचान केवल उनके अभिनय से नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और सहयोगी स्वभाव से भी बनती है। अमरीश पुरी की यही विशेषताएं उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित कलाकारों में शामिल करती हैं।

  • ‘खुद को थप्पड़ मारने का मन करता था’, अक्षय कुमार ने सुनाया संघर्ष और बदलाव का किस्सा, बोले- आखिरी सांस तक कैमरे के सामने रहना चाहता हूं

    ‘खुद को थप्पड़ मारने का मन करता था’, अक्षय कुमार ने सुनाया संघर्ष और बदलाव का किस्सा, बोले- आखिरी सांस तक कैमरे के सामने रहना चाहता हूं

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के सबसे सक्रिय और सफल अभिनेताओं में शामिल अक्षय कुमार ने अपने लंबे फिल्मी सफर, करियर के उतार-चढ़ाव और खुद को लगातार बदलते रहने की प्रक्रिया पर खुलकर बात की है। करीब साढ़े तीन दशक से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय अभिनेता ने स्वीकार किया कि एक समय ऐसा भी था जब उन्हें अपनी ही फिल्मों को देखकर निराशा होती थी और महसूस होता था कि यदि उन्होंने अपने अभिनय और किरदारों में बदलाव नहीं किया तो उनका करियर एक सीमित दायरे में सिमट सकता है।

    अक्षय कुमार ने कहा कि फिल्म उद्योग में 35 वर्षों का सफर तय करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में भी वह इसी ऊर्जा और समर्पण के साथ काम करते रहेंगे। अभिनेता ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि जीवन के अंतिम क्षणों तक वह कैमरे के सामने सक्रिय रहें और अभिनय करते रहें। उनके अनुसार काम ही उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है और वही उन्हें आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।

    अपने शुरुआती करियर को याद करते हुए अक्षय ने बताया कि जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा था तब उनका मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से सफल होना था। शुरुआती वर्षों में उन्होंने लगातार एक्शन फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे उनकी पहचान एक एक्शन स्टार के रूप में बन गई। हालांकि समय के साथ उन्हें महसूस हुआ कि एक ही तरह की भूमिकाएं निभाने से उनकी रचनात्मक संभावनाएं सीमित हो रही हैं।

    अभिनेता ने कहा कि करियर के लगभग एक दशक बाद जब उन्होंने अपनी पुरानी फिल्मों को दोबारा देखा तो उन्हें लगा कि वह खुद को दोहराने लगे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उस दौर में उन्हें अपनी छवि बदलने की जरूरत महसूस हुई। यही वह समय था जब उन्होंने नए प्रयोग करने का निर्णय लिया और पारंपरिक एक्शन फिल्मों से आगे बढ़कर अलग-अलग विधाओं में काम शुरू किया।

    अक्षय कुमार के अनुसार यह बदलाव आसान नहीं था क्योंकि इंडस्ट्री और दर्शकों की नजर में उनकी छवि एक्शन हीरो की बन चुकी थी। बावजूद इसके उन्होंने जोखिम उठाया और कॉमेडी, रोमांस, सामाजिक संदेश देने वाली फिल्मों तथा विभिन्न प्रकार के किरदारों को अपनाया। उन्होंने माना कि यही निर्णय उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और इससे उन्हें एक बहुमुखी अभिनेता के रूप में पहचान मिली।

    फिल्मी जानकारों का भी मानना है कि अक्षय कुमार ने समय-समय पर अपने अभिनय और फिल्मों के चयन में बदलाव कर खुद को प्रासंगिक बनाए रखा है। एक्शन फिल्मों से शुरुआत करने वाले अभिनेता ने बाद में कॉमेडी, पारिवारिक, सामाजिक और प्रेरणादायक विषयों पर आधारित फिल्मों में भी सफलता हासिल की। यही कारण है कि वह लंबे समय तक दर्शकों के बीच लोकप्रिय बने रहे।

    वर्तमान में भी अक्षय कुमार कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। उनकी आने वाली फिल्मों को लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता बनी हुई है। अभिनेता का कहना है कि आज भी वह हर नए किरदार को सीखने और बेहतर बनने के अवसर के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार कलाकार के लिए सबसे जरूरी चीज लगातार सीखते रहना और खुद को समय के अनुसार विकसित करना है।

    अक्षय कुमार की यह सोच उनके लंबे करियर की सफलता का महत्वपूर्ण कारण मानी जाती है। उन्होंने यह साबित किया है कि फिल्म उद्योग में केवल लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि निरंतर बदलाव और मेहनत भी लंबे समय तक टिके रहने के लिए जरूरी है। यही वजह है कि तीन दशक से अधिक समय बाद भी वह हिंदी सिनेमा के सबसे व्यस्त और चर्चित अभिनेताओं में शामिल हैं।

  • मुख्यमंत्री विजय के बर्थडे सेलिब्रेशन की तस्वीर आई सामने, तृषा कृष्णन के भावुक संदेश ने अफवाहों के बाजार को किया शांत

    मुख्यमंत्री विजय के बर्थडे सेलिब्रेशन की तस्वीर आई सामने, तृषा कृष्णन के भावुक संदेश ने अफवाहों के बाजार को किया शांत

    नई दिल्ली । तमिल फिल्म उद्योग और राजनीति से जुड़े चर्चित चेहरों में शामिल विजय और अभिनेत्री तृषा कृष्णन एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार चर्चा की वजह कोई नई फिल्म या राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सोशल मीडिया पोस्ट है जिसने बीते कुछ दिनों से चल रही तमाम अटकलों को नया मोड़ दे दिया है। मुख्यमंत्री विजय के जन्मदिन के अवसर पर तृषा कृष्णन द्वारा साझा की गई एक तस्वीर और भावनात्मक संदेश ने सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा छेड़ दी है।

    दरअसल, विजय के जन्मदिन पर तृषा की ओर से शुरुआती घंटों में कोई सार्वजनिक शुभकामना संदेश सामने नहीं आया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई तरह के कयास लगाए जाने लगे। कुछ लोगों ने दोनों के रिश्तों में दूरी आने की संभावना जताई, जबकि कई यूजर्स ने यह अनुमान लगाया कि शायद दोनों के बीच पहले जैसी नजदीकियां नहीं रहीं। इन चर्चाओं के बीच तृषा की ओर से साझा किया गया पोस्ट चर्चा का केंद्र बन गया।

    तस्वीर में विजय और तृषा एक साथ नजर आ रहे हैं। फोटो में विजय के सामने जन्मदिन के कई केक रखे हुए दिखाई देते हैं, जबकि तृषा उनकी ओर देखती हुई नजर आती हैं। तस्वीर का सहज और निजी अंदाज लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसके साथ साझा किए गए संदेश में तृषा ने विजय को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ऐसा व्यक्ति बताया जिसकी वजह से कई चीजें खास महसूस होती हैं। इस भावनात्मक संदेश को सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किया गया और इसे दोनों के बीच अच्छे संबंधों का संकेत माना जाने लगा।

    पोस्ट सामने आने के बाद प्रशंसकों की प्रतिक्रियाएं भी बड़ी संख्या में देखने को मिलीं। कई लोगों ने कहा कि वे इसी पोस्ट का इंतजार कर रहे थे, जबकि कुछ ने इसे उन तमाम अफवाहों का जवाब बताया जो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर चल रही थीं। प्रशंसकों का मानना है कि तस्वीर और संदेश ने रिश्तों को लेकर उठ रहे सवालों को काफी हद तक शांत कर दिया है।

    विजय और तृषा को लेकर लंबे समय से चर्चाएं होती रही हैं। दोनों ने कई सफल फिल्मों में साथ काम किया है और उनकी ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने हमेशा पसंद किया है। समय-समय पर दोनों की तस्वीरें और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी भी सुर्खियां बटोरती रही है। हालांकि दोनों ने निजी संबंधों को लेकर कभी खुलकर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

    इधर, विजय के निजी जीवन को लेकर भी पिछले कुछ समय से चर्चाओं का दौर जारी है। उनकी पारिवारिक स्थिति और निजी रिश्तों को लेकर विभिन्न तरह की खबरें सामने आती रही हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश बातों पर संबंधित पक्षों की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। ऐसे में सोशल मीडिया पर सामने आने वाली तस्वीरें और पोस्ट ही लोगों के बीच चर्चा का प्रमुख आधार बन जाती हैं।

    राजनीति और मनोरंजन जगत के संगम का प्रतीक बन चुके विजय के सार्वजनिक जीवन पर लोगों की लगातार नजर रहती है। वहीं तृषा कृष्णन भी दक्षिण भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। ऐसे में दोनों से जुड़ी छोटी से छोटी गतिविधि भी सुर्खियां बन जाती है। विजय के जन्मदिन पर साझा की गई यह तस्वीर भी इसी वजह से चर्चा का विषय बनी हुई है और प्रशंसकों के बीच लगातार वायरल हो रही है।

  • पद्म पुरस्कार समारोह में चमके सिनेमा और संगीत जगत के सितारे, राष्ट्रपति मुर्मू ने किया सम्मानित, आर माधवन और अल्का याग्निक रहे चर्चा के केंद्र में

    पद्म पुरस्कार समारोह में चमके सिनेमा और संगीत जगत के सितारे, राष्ट्रपति मुर्मू ने किया सम्मानित, आर माधवन और अल्का याग्निक रहे चर्चा के केंद्र में

    नई दिल्ली । देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्म पुरस्कारों के वितरण समारोह में कला, संस्कृति, सिनेमा और संगीत जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियों को सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को पद्म सम्मान प्रदान किए। समारोह के दौरान कई ऐसे क्षण देखने को मिले, जिन्होंने उपस्थित लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा का विषय बने।

    फिल्म अभिनेता आर माधवन को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। सम्मान ग्रहण करने के दौरान उन्होंने विनम्रता और गरिमा का परिचय देते हुए मंच पर पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिवादन किया और सम्मान प्राप्त करने के बाद राष्ट्रपति का आभार व्यक्त किया। समारोह में उनकी सादगी और संयमित व्यवहार की काफी सराहना हुई। लंबे समय से भारतीय सिनेमा में सक्रिय आर माधवन ने हिंदी, तमिल और अन्य भाषाओं की फिल्मों में अपने अभिनय से अलग पहचान बनाई है। मनोरंजन जगत में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया गया।

    प्रसिद्ध पार्श्व गायिका अल्का याग्निक को पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। भारतीय संगीत जगत में कई दशकों से सक्रिय अल्का याग्निक ने हजारों गीतों को अपनी आवाज दी है और उनकी गायकी कई पीढ़ियों की पसंद बनी हुई है। सम्मान समारोह में उनकी उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। राष्ट्रीय स्तर पर संगीत क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक से सम्मानित किया गया।

    समारोह के दौरान कला और संस्कृति से जुड़े कई अन्य प्रतिष्ठित नामों को भी पद्म सम्मान प्रदान किए गए। विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कलाकारों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सांस्कृतिक हस्तियों को सम्मानित कर उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी गई। पद्म पुरस्कारों का उद्देश्य उन व्यक्तियों को सम्मान देना है जिन्होंने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    इस अवसर पर सम्मानित होने वाले कलाकारों और उनके परिवारों के लिए यह एक यादगार पल रहा। समारोह में मौजूद अतिथियों ने सम्मान प्राप्त करने वाले सभी व्यक्तित्वों को बधाई दी और उनके योगदान की सराहना की। कई कलाकारों ने इसे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और भावुक क्षण बताया। उनका कहना था कि यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के स्नेह और समर्थन का परिणाम है जिन्होंने वर्षों तक उनके कार्य को सराहा।

    पद्म पुरस्कारों को देश के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में गिना जाता है। हर वर्ष विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण योगदान देने वाले व्यक्तियों का चयन कर उन्हें सम्मानित किया जाता है। यह सम्मान न केवल उपलब्धियों की पहचान है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उत्कृष्टता और समर्पण के लिए प्रेरित करने का माध्यम भी माना जाता है।

    राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस वर्ष का समारोह भी इसी भावना का प्रतीक बना, जहां देश ने अपने उन प्रतिभाशाली नागरिकों का सम्मान किया जिन्होंने अपने कार्यों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पद्म पुरस्कार समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि समर्पण, प्रतिभा और निरंतर प्रयासों को देश सर्वोच्च सम्मान के साथ स्वीकार करता है।

  • जब एक ही दिन में हाथ से निकल गए तीन बड़े प्रोजेक्ट, संघर्ष के दौर में मनोज बाजपेयी से दोस्त ने पूछा था- कहीं कोई गलत कदम तो नहीं उठाओगे?

    जब एक ही दिन में हाथ से निकल गए तीन बड़े प्रोजेक्ट, संघर्ष के दौर में मनोज बाजपेयी से दोस्त ने पूछा था- कहीं कोई गलत कदम तो नहीं उठाओगे?

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित और प्रतिभाशाली अभिनेताओं में शामिल मनोज बाजपेयी आज अभिनय की दुनिया में एक स्थापित नाम हैं। अपने दमदार अभिनय, अलग किरदारों और गंभीर भूमिकाओं के लिए पहचान बना चुके मनोज बाजपेयी की सफलता की कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उसका संघर्ष उतना ही कठिन रहा है। आज करोड़ों दर्शकों के पसंदीदा अभिनेता बनने से पहले उन्होंने लंबे समय तक असफलताओं, अस्वीकार किए जाने और आर्थिक चुनौतियों का सामना किया था।

    मनोज बाजपेयी ने कई मंचों पर अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया है कि मुंबई में शुरुआती दौर उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। अभिनय के क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए वह लगातार ऑडिशन देते थे और छोटे-बड़े अवसरों की तलाश में रहते थे। हालांकि कई बार उन्हें सफलता के बजाय निराशा ही हाथ लगी। ऐसे ही एक कठिन अनुभव का जिक्र उन्होंने एक बातचीत के दौरान किया था, जिसने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

    अभिनेता के अनुसार एक समय ऐसा आया जब उनके पास एक साथ तीन अलग-अलग प्रोजेक्ट थे। इनमें एक टेलीविजन धारावाहिक में मुख्य भूमिका, एक कॉर्पोरेट फिल्म में प्रमुख किरदार और एक नए सीरियल में महत्वपूर्ण भूमिका शामिल थी। उन्हें लगने लगा था कि अब करियर धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा है। लेकिन परिस्थितियां अचानक इस तरह बदलीं कि एक ही दिन में तीनों अवसर उनके हाथ से निकल गए।

    उन्होंने बताया कि एक प्रोजेक्ट की शूटिंग के दौरान पहला दृश्य फिल्माए जाने के बाद उन्हें अलग बुलाया गया। कुछ देर की चर्चा के बाद यूनिट की ओर से उन्हें सूचित किया गया कि निर्माता और निर्देशक को उनकी भूमिका को लेकर कुछ संदेह है और फिलहाल उन्हें आगे काम नहीं करना होगा। यह सूचना उनके लिए बेहद अप्रत्याशित थी। सेट पर मौजूद अन्य लोगों के बीच इस तरह काम से हटाए जाने से उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा।

    उस समय की स्थिति को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सबसे अधिक कठिनाई इस बात की थी कि उनके सामने भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। जिस काम को लेकर उम्मीदें थीं, वह अचानक समाप्त हो गया था। इसके बाद उन्होंने दूसरे प्रोजेक्ट की जानकारी लेने का प्रयास किया, लेकिन वहां भी उन्हें पता चला कि उनकी जगह किसी अन्य कलाकार को चुन लिया गया है। इससे उनका मनोबल और अधिक प्रभावित हुआ।

    स्थिति तब और गंभीर हो गई जब तीसरे प्रोजेक्ट से भी उनके बाहर होने की सूचना मिली। एक ही दिन में लगातार तीन झटके मिलने के बाद वे मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गए थे। संघर्ष के उन दिनों में आर्थिक असुरक्षा और भविष्य की चिंता भी लगातार उनके साथ थी। ऐसे समय में उनके करीबी मित्रों ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें निराशा से बाहर निकलने की कोशिश की।

    मनोज बाजपेयी ने स्वीकार किया कि कलाकारों के जीवन में असफलता और अस्वीकृति सामान्य बात होती है, लेकिन शुरुआती दौर में इन्हें स्वीकार करना आसान नहीं होता। उन्होंने बताया कि उस दौर ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाया और परिस्थितियों से लड़ना सिखाया। लगातार मिल रही निराशाओं के बावजूद उन्होंने अभिनय का सपना नहीं छोड़ा और अपने लक्ष्य पर डटे रहे।

    समय के साथ उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें ऐसे अवसर मिले जिन्होंने उनके करियर की दिशा बदल दी। बाद में उन्होंने कई यादगार फिल्मों और वेब सीरीज में शानदार अभिनय कर अपनी अलग पहचान बनाई। आज उनका नाम उन कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने प्रतिभा और मेहनत के बल पर फिल्म उद्योग में विशेष स्थान हासिल किया।

    मनोज बाजपेयी की यह कहानी केवल एक अभिनेता के संघर्ष की दास्तान नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा भी है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। उनका सफर यह संदेश देता है कि असफलताएं स्थायी नहीं होतीं और लगातार प्रयास करने वाले लोगों के लिए सफलता का रास्ता अंततः खुल ही जाता है।

  • ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा’ का असली मतलब जानकर चौंक जाएंगे आप, दशकों से गुनगुनाए जा रहे इस सुपरहिट गाने के पीछे छिपा है दिलचस्प अर्थ

    ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा’ का असली मतलब जानकर चौंक जाएंगे आप, दशकों से गुनगुनाए जा रहे इस सुपरहिट गाने के पीछे छिपा है दिलचस्प अर्थ

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों तक लोकप्रिय बने रहते हैं। वर्ष 1977 में रिलीज हुई फिल्म ‘इंकार’ का गीत ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा, मैं गुड़ की डली’ भी ऐसे ही सदाबहार गीतों में शामिल है। यह गाना आज भी शादियों, समारोहों और सांस्कृतिक आयोजनों में उतनी ही ऊर्जा और उत्साह के साथ सुना जाता है, जितना अपने दौर में सुना जाता था। हालांकि इस गीत को गुनगुनाने वाले अधिकांश लोग इसके वास्तविक अर्थ से अनजान रहते हैं।

    यह गीत अपने संगीत, लय और हेलेन के आकर्षक प्रदर्शन के कारण बेहद लोकप्रिय हुआ था। फिल्म में हेलेन ने मराठी लोक संस्कृति से प्रेरित लावणी शैली में प्रस्तुति दी थी, जिसने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। यही वजह है कि कई लोगों ने समय के साथ ‘मुंगड़ा’ शब्द को लावणी नृत्य या किसी विशेष शैली से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

    गीत के बोल प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, जबकि संगीतकार राजेश रोशन थे। इस गीत को स्वर दिया था ऊषा मंगेशकर ने। इन सभी की रचनात्मक प्रतिभा ने मिलकर एक ऐसा गीत तैयार किया, जो लगभग पांच दशकों बाद भी लोकप्रियता बनाए हुए है। लेकिन इसकी सबसे खास बात इसके शब्दों में छिपा सांकेतिक अर्थ माना जाता है।

    भाषाई और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार ‘मुंगड़ा’ शब्द का संबंध मराठी बोलचाल से माना जाता है। स्थानीय प्रयोग में इसका अर्थ बड़े चींटे या नर चींटे से जोड़ा जाता है। मराठी में चींटी के लिए ‘मुंगी’ और कुछ क्षेत्रों में बड़े चींटे के लिए ‘मुंगला’ या ‘मुंगड़ा’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यही संदर्भ इस गीत के अर्थ को समझने की कुंजी माना जाता है।

    गीत के मुखड़े में नायिका स्वयं को ‘गुड़ की डली’ कहती है और सामने वाले को ‘मुंगड़ा’ संबोधित करती है। यदि इस रूपक को समझा जाए तो गीत में एक रोचक तुलना दिखाई देती है। जिस प्रकार गुड़ की मिठास चींटियों को अपनी ओर आकर्षित करती है, उसी प्रकार गीत की नायिका अपने प्रशंसकों या चाहने वालों को संबोधित करते हुए स्वयं को आकर्षण का केंद्र बताती है। वह संकेत देती है कि यदि प्रेम या स्नेह चाहिए तो आगे बढ़ो, अन्यथा अवसर निकल जाएगा।

    यही कारण है कि इस गीत के शब्द पहली नजर में जितने सरल दिखाई देते हैं, उनके भीतर उतनी ही रचनात्मक कल्पना और सांस्कृतिक गहराई छिपी हुई है। गीतकार ने एक सामान्य ग्रामीण और लोक जीवन से जुड़े प्रतीक का उपयोग कर प्रेम और आकर्षण की भावना को बेहद सहज ढंग से व्यक्त किया है। यही विशेषता मजरूह सुल्तानपुरी की लेखनी को अलग पहचान देती है।

    फिल्म ‘इंकार’ में शामिल होने के बाद यह गीत तेजी से लोकप्रिय हुआ और बाद के वर्षों में कई फिल्मों तथा मंचीय प्रस्तुतियों में इसका पुनः उपयोग किया गया। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नई पीढ़ी के दर्शक भी इस गीत को उतनी ही रुचि से सुनते हैं। कई फिल्मों में इसके नए संस्करण बनाए गए, जिससे यह गीत लगातार चर्चा में बना रहा।

    संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि किसी गीत की दीर्घकालिक सफलता केवल उसके संगीत पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके शब्दों की गहराई और सांस्कृतिक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा’ इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। वर्षों से लोगों को झूमने पर मजबूर करने वाला यह गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय लोक अभिव्यक्तियों और रचनात्मक प्रतीकों का भी एक दिलचस्प दस्तावेज है।

  • फर्जी वोटर आईडी मामले में अभिनेता प्रकाश राज की बढ़ीं मुश्किलें, अदालत में पेश नहीं होने पर जारी हुआ गैर-जमानती वारंट

    फर्जी वोटर आईडी मामले में अभिनेता प्रकाश राज की बढ़ीं मुश्किलें, अदालत में पेश नहीं होने पर जारी हुआ गैर-जमानती वारंट

    नई दिल्ली । फिल्म जगत के चर्चित अभिनेता और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए पहचाने जाने वाले प्रकाश राज एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी कोई फिल्म या सार्वजनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक कानूनी मामला है। वोटर पहचान पत्र से जुड़े एक पुराने प्रकरण में अदालत द्वारा उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने के बाद मामला चर्चा का विषय बन गया है। न्यायालय के इस कदम ने अभिनेता की कानूनी चुनौतियों को बढ़ा दिया है और अब आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

    जानकारी के अनुसार मामला कई वर्ष पुरानी शिकायत से जुड़ा हुआ है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अभिनेता के नाम पर विभिन्न राज्यों में मतदाता पहचान पत्र दर्ज हैं। भारतीय चुनावी नियमों के अनुसार किसी भी नागरिक का नाम केवल एक ही निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के नाम पर एक से अधिक स्थानों पर मतदाता पंजीकरण पाया जाता है तो यह चुनावी नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।

    इस मामले में एक शिकायतकर्ता ने संबंधित पुलिस थाने में आवेदन देकर जांच की मांग की थी। शिकायत में दावा किया गया था कि अभिनेता के पास एक से अधिक राज्यों से जुड़े मतदाता पहचान पत्र मौजूद हैं। इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई और संबंधित दस्तावेजों तथा रिकॉर्ड की पड़ताल की गई। प्रारंभिक स्तर पर उठे सवालों ने मामले को कानूनी प्रक्रिया की ओर बढ़ा दिया।

    प्रकरण न्यायालय तक पहुंचने के बाद समय-समय पर सुनवाई होती रही। हालांकि हालिया घटनाक्रम में अदालत ने अभिनेता की अनुपस्थिति को गंभीरता से लेते हुए गैर-जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी मामले में आरोपी को निर्धारित तिथि पर उपस्थित होने के निर्देश दिए जाते हैं और पर्याप्त कारण के बिना वह उपस्थित नहीं होता, तब अदालत इस प्रकार की कार्रवाई कर सकती है। गैर-जमानती वारंट का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति की न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है।

    मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। चुनावी पहचान और मतदाता पंजीकरण से जुड़े मामलों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण ऐसे मामलों में संबंधित एजेंसियां दस्तावेजों की सत्यता और नियमों के अनुपालन की विस्तृत जांच करती हैं। यदि किसी व्यक्ति के नाम पर विभिन्न स्थानों पर पंजीकरण पाया जाता है तो संबंधित रिकॉर्ड को सत्यापित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

    प्रकाश राज लंबे समय से दक्षिण भारतीय और हिंदी फिल्म उद्योग का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उन्होंने कई भाषाओं की फिल्मों में अभिनय किया है और खलनायक से लेकर चरित्र अभिनेता तक विभिन्न भूमिकाओं में अपनी पहचान बनाई है। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता भी उन्हें अक्सर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में रखती है। ऐसे में उनके खिलाफ हुई यह कानूनी कार्रवाई स्वाभाविक रूप से व्यापक ध्यान आकर्षित कर रही है।

    कानूनी जानकारों का कहना है कि गैर-जमानती वारंट जारी होना अंतिम निर्णय नहीं माना जाता, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। संबंधित व्यक्ति अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकता है और कानून के तहत उपलब्ध उपायों का उपयोग कर सकता है। मामले के तथ्यों, दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की न्यायिक प्रक्रिया तय होगी।

    फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत के आदेश के बाद आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और संबंधित पक्ष अपनी प्रतिक्रिया किस प्रकार प्रस्तुत करता है। चुनावी दस्तावेजों से जुड़े इस विवाद ने एक बार फिर मतदाता पंजीकरण प्रणाली की पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में न्यायिक प्रक्रिया के आगे बढ़ने के साथ इस मामले की तस्वीर और स्पष्ट होने की संभावना है।

  • सिनेमाई मर्यादा और सेट अनुशासन पर गंभीर सवाल: जब इंटीमेट सीन्स के दौरान नियंत्रण खो बैठे थे दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना

    सिनेमाई मर्यादा और सेट अनुशासन पर गंभीर सवाल: जब इंटीमेट सीन्स के दौरान नियंत्रण खो बैठे थे दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कलाकारों की कला और उनके किरदारों की हमेशा प्रशंसा की जाती है, लेकिन कई बार सेट पर घटित कुछ अप्रत्याशित और असहज करने वाली घटनाएं वर्षों बाद भी गंभीर चर्चाओं का विषय बन जाती हैं। सत्तर और अस्सी के दशक के शीर्ष अभिनेताओं में शुमार दिवंगत सुपरस्टार विनोद खन्ना से जुड़े कुछ पुराने विवाद इस समय गलियारों में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। एक वरिष्ठ मनोरंजन पत्रकार द्वारा हाल ही में दिए गए साक्षात्कार के अनुसार, फिल्मों में रोमांटिक और संवेदनशील दृश्यों को फिल्माते समय विनोद खन्ना अक्सर अपने अभिनय में इस कदर डूब जाते थे कि वे पूरी तरह से अपना नियंत्रण खो बैठते थे। इसका खामियाजा उनके साथ काम करने वाली समकालीन और नवोदित अभिनेत्रियों को शारीरिक और मानसिक पीड़ा के रूप में भुगतना पड़ा था।

    यह पहली बड़ी घटना फिल्म ‘प्रेम धरम’ के निर्माण के दौरान सामने आई थी, जिसका निर्देशन जाने-माने फिल्म निर्माता महेश भट्ट कर रहे थे। इस फिल्म के एक मुख्य दृश्य में विनोद खन्ना और अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया के बीच एक बेहद संवेदनशील और इंटीमेट दृश्य को फिल्माया जा रहा था। जैसे ही कैमरे ने काम करना शुरू किया, अभिनेता दृश्य के प्रभाव में इस कदर खो गए कि उन्हें आसपास के माहौल का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रहा। दृश्य की समाप्ति पर जब निर्देशक महेश भट्ट ने लाउडस्पीकर के माध्यम से बार-बार ‘कट’ बोला, तब भी विनोद खन्ना नहीं रुके। डिंपल कपाड़िया उस समय फिल्म उद्योग में बहुत नई थीं और वे निर्देशक के निर्देश और अभिनेता के इस व्यवहार के बीच पूरी तरह असमंजस में फंस गईं। आखिरकार, स्थिति को नियंत्रण से बाहर होते देख निर्देशक और सेट पर मौजूद चार-पांच क्रू सदस्यों को खुद आगे आकर दोनों को अलग करना पड़ा था।

    इसके बाद, साल 1988 में रिलीज हुई फिल्म ‘दयावान’ के सेट पर एक और अधिक गंभीर वाकया हुआ, जिसने फिल्म जगत को स्तब्ध कर दिया था। इस फिल्म में विनोद खन्ना के साथ मुख्य भूमिका में अभिनेत्री माधुरी दीक्षित थीं, जो उस समय उम्र और अनुभव में अभिनेता से काफी छोटी थीं। फिल्म के एक गीत के दौरान दोनों के बीच एक बेहद नजदीकी किसिंग सीन फिल्माया जाना तय हुआ था। इस दौरान अभिनेता ने एक बार फिर अपना आपा खो दिया और निर्देशक द्वारा दृश्य समाप्त करने की घोषणा के बाद भी वे नहीं रुके।

    यह स्थिति तब और अधिक दर्दनाक हो गई जब उत्तेजना के प्रवाह में आकर विनोद खन्ना ने सह-अभिनेत्री के होठों को दांतों से काट लिया। घाव इतना गहरा था कि माधुरी दीक्षित के होठों से तत्काल खून बहने लगा, जिसे देखकर सेट पर उपस्थित सभी लोग सन्न रह गए। इसके बाद ही अभिनेता होश में आए और पीछे हटे। इस पूरे वाकये ने युवा अभिनेत्री को गहरे मानसिक आघात में डाल दिया था। अपमान और दर्द से भरी माधुरी दीक्षित तुरंत सेट छोड़कर अपनी वैनिटी वैन में चली गईं और फूट-फूटकर रोने लगीं। इस कटु अनुभव का उनके मन पर इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने भविष्य में कभी भी फिल्मों में इस तरह के अत्यधिक इंटीमेट दृश्यों को न करने की शपथ ले ली थी। सिनेमाई सेटों पर सुरक्षा और गरिमा के लिहाज से यह ऐतिहासिक संदर्भ आज भी प्रासंगिक माना जाता है।

  • इंडस्ट्री की चमक के पीछे का कड़वा सच कैरेक्टर आर्टिस्ट्स के साथ होता है भेदभाव

    इंडस्ट्री की चमक के पीछे का कड़वा सच कैरेक्टर आर्टिस्ट्स के साथ होता है भेदभाव


    नई दिल्ली  । बॉलीवुड और टेलीविजन इंडस्ट्री की चमक दमक दूर से जितनी आकर्षक दिखाई देती है वास्तविकता उतनी ही अलग और कई बार चौंकाने वाली होती है। पर्दे पर अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों का दिल जीतने वाले कई कलाकारों को पर्दे के पीछे सम्मान और सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हाल ही में वेब सीरीज पंचायत में क्रांति देवी का किरदार निभाकर लोकप्रिय हुईं अभिनेत्री सुनीता राजवार और अभिनेता जतिन नेगी ने इंडस्ट्री के इसी कड़वे सच को सामने रखा है।

    एक बातचीत के दौरान दोनों कलाकारों ने बताया कि फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कलाकारों के साथ उनकी भूमिका और लोकप्रियता के आधार पर व्यवहार किया जाता है। जतिन नेगी का कहना है कि कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को तब तक पूरा सम्मान नहीं मिलता जब तक वे परेश रावल या अनुपम खेर जैसे बड़े नाम न बन जाएं। उन्होंने बताया कि बड़े कलाकारों को कई वैनिटी वैन और पूरा स्टाफ उपलब्ध कराया जाता है जबकि कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को सीमित सुविधाएं मिलती हैं। कई बार उन्हें अन्य कलाकारों के साथ वैनिटी वैन साझा करनी पड़ती है।

    जतिन ने कहा कि छोटे और बैकग्राउंड कलाकारों की स्थिति और भी मुश्किल होती है। उन्हें कई कलाकारों के साथ एक ही वैन शेयर करनी पड़ती है और अक्सर बुनियादी सुविधाओं के लिए भी इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार कलाकारों को उनके काम का भुगतान 90 दिनों बाद मिलता है जिससे आर्थिक परेशानियां बढ़ जाती हैं।

    अभिनेत्री सुनीता राजवार ने भी सेट पर होने वाले भेदभाव को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि यदि कोई कलाकार लीड रोल में होता है तो पूरा सेट उसी के इर्द गिर्द घूमता है। उसे बेहतर कमरे बेहतर सुविधाएं और पूरा सहयोग मिलता है। वहीं छोटे किरदार निभाने वाले कलाकारों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई बार स्पॉटबॉय तक उन्हें महत्व नहीं देते।

    जतिन नेगी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक समय ऐसा भी था जब वह बैकग्राउंड रोल कर रहे थे और सेट पर उन्हें खाने तक के लिए संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री में कलाकारों को ए बी और सी कैटेगरी में बांट दिया जाता है। वरिष्ठ और लोकप्रिय कलाकारों के लिए अलग भोजन व्यवस्था होती है जबकि जूनियर और बैकग्राउंड कलाकारों को अलग सेक्शन में खाना दिया जाता है।

    उन्होंने एक पुराना अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक शूटिंग के दौरान उन्हें उनके गेटअप की वजह से खाने के सेक्शन में प्रवेश नहीं दिया गया। काफी देर तक समझाने और प्रोडक्शन टीम से संपर्क करने के बाद उन्हें खाना मिला। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उन्हें समाज से अलग कर दिया गया हो। इतना ही नहीं अलग-अलग कैटेगरी के कलाकारों को दिए जाने वाले खाने की गुणवत्ता में भी बड़ा अंतर होता है।

    दोनों कलाकारों का मानना है कि इंडस्ट्री में यह भेदभाव केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं है बल्कि सम्मान और व्यवहार में भी साफ दिखाई देता है। उनका कहना है कि प्रतिभा और मेहनत के आधार पर सभी कलाकारों को बराबरी का सम्मान मिलना चाहिए क्योंकि किसी भी फिल्म या शो की सफलता में हर कलाकार का योगदान महत्वपूर्ण होता है।

    इन खुलासों ने एक बार फिर मनोरंजन जगत की उस सच्चाई को सामने ला दिया है जिस पर अक्सर चर्चा कम होती है। दर्शकों के लिए पर्दे पर दिखने वाली भव्य दुनिया के पीछे कई ऐसे कलाकार हैं जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष के साथ-साथ असमानता का भी सामना कर रहे हैं।