Category: Entertainment

  • राम गोपाल वर्मा का अजीब बयान, माइकल जैक्सन से नफरत के बावजूद दिल आज भी भारी

    राम गोपाल वर्मा का अजीब बयान, माइकल जैक्सन से नफरत के बावजूद दिल आज भी भारी

    नई दिल्ली । फिल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा एक बार फिर अपने बेबाक और अप्रत्याशित बयानों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने विश्वविख्यात पॉप स्टार माइकल जैक्सन को लेकर ऐसा भावुक और विरोधाभासी बयान दिया है, जिसने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच लिया है। वर्मा ने अपने एक पोस्ट में न केवल माइकल जैक्सन के प्रति अपने गहरे जुड़ाव का जिक्र किया, बल्कि यह भी कहा कि वे उनसे ‘नफरत’ करते हैं, हालांकि यह भावना उनके अत्यंत सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव से जुड़ी हुई है।

    निर्देशक ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि माइकल जैक्सन के काम ने उनके जीवन और सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। उन्होंने कहा कि 1984 में विजयवाड़ा में एक छोटे से अंधेरे वीडियो पार्लर में पहली बार उन्होंने माइकल का प्रसिद्ध म्यूजिक वीडियो देखा था। उस अनुभव को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वह केवल एक गाना या प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि एक असाधारण ऊर्जा और कला का विस्फोट था, जिसने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उनके अनुसार माइकल की स्टेज प्रेजेंस, डांस और संगीत की शक्ति इतनी प्रभावशाली थी कि वह किसी अलौकिक अनुभव जैसी लगती थी।

    राम गोपाल वर्मा ने यह भी कहा कि माइकल जैक्सन के कई गाने और वीडियो उनके लिए प्रेरणा का स्रोत रहे हैं। “बीट इट”, “बिली जीन”, “स्मूथ क्रिमिनल” और “ब्लैक ऑर व्हाइट” जैसे गीत उनके लिए केवल संगीत नहीं बल्कि एक तरह की कला की पाठशाला जैसे थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अपने फिल्मी करियर में उन्होंने कई बार माइकल की शैली और प्रस्तुति से प्रेरणा ली।

    हालांकि, उनके बयान का सबसे भावुक हिस्सा वह था जब उन्होंने माइकल जैक्सन की मृत्यु को याद किया। उन्होंने बताया कि 25 जून 2009 की सुबह जब उन्होंने समाचार देखा कि माइकल अब नहीं रहे, तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। यह खबर उनके लिए बेहद सदमे वाली थी और उन्होंने इसे एक बुरे सपने जैसा महसूस किया। लंबे समय तक यह खबर उनके मन को विचलित करती रही।

    वर्मा ने अपने पोस्ट में यह भी लिखा कि वे माइकल जैक्सन से ‘नफरत’ करते हैं, लेकिन यह नफरत किसी नकारात्मक भावना से नहीं बल्कि उस दर्द से जुड़ी है जो उनकी मृत्यु ने उन्हें दिया। उन्होंने भावुक होकर कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि माइकल भी एक सामान्य इंसान थे, जिनका दिल रुक सकता था और जिन्हें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत थी। यही वास्तविकता उन्हें सबसे ज्यादा आहत करती है।

    उन्होंने आगे यह भी कहा कि माइकल के प्रति उनका सम्मान और प्रेम इतना गहरा है कि उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार माइकल जैक्सन आज भी अपने संगीत और कला के माध्यम से जीवित हैं और शायद किसी अलग आकाशीय दुनिया में अपनी अनोखी “मूनवॉक” जारी रखे हुए हैं।

  • आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जादुई रचना का खुलासा, विशाल ददलानी ने बताया ‘चिंगारी कोई भड़के’ का अनसुना किस्सा

    आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जादुई रचना का खुलासा, विशाल ददलानी ने बताया ‘चिंगारी कोई भड़के’ का अनसुना किस्सा

    नई दिल्ली /मुंबई। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के कई गीत आज भी लोगों की यादों में उतने ही ताज़ा हैं जितने अपने समय में थे। ऐसे ही एक अमर गीत ‘चिंगारी कोई भड़के’ के बनने की कहानी हाल ही में संगीतकार और गायक विशाल ददलानी ने साझा की, जिसने एक बार फिर इस क्लासिक गीत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ा दी है। यह किस्सा न केवल संगीत की रचनात्मकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे एक साधारण जीवन अनुभव कालजयी कला में बदल सकता है।

    विशाल ददलानी ने एक सिंगिंग रियलिटी शो के दौरान इस गीत की पृष्ठभूमि का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस गीत की धुन मशहूर संगीतकार आर. डी. बर्मन ने तैयार की थी, जिन्हें संगीत की दुनिया में पंचम दा के नाम से जाना जाता है। धुन तैयार होने के बाद इसे गीतकार आनंद बख्शी को दिया गया ताकि वह इसके बोल लिख सकें।

    कहानी के अनुसार, उस समय मौसम बेहद सुहावना था और बारिश हो रही थी। आनंद बख्शी देर रात घर लौट रहे थे, और रास्ते में उन्होंने सिगरेट जलाने की कोशिश की। लेकिन लगातार बारिश की वजह से उनका लाइटर बार-बार बुझ जा रहा था। यह बेहद साधारण सा पल था, लेकिन इसी क्षण ने उनके मन में एक गहरी कल्पना को जन्म दिया।

    उन्हीं परिस्थितियों में उनके दिमाग में एक ऐसी पंक्ति आई, जो आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में से एक बन गई—“चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए।” यह पंक्ति केवल एक गीत का हिस्सा नहीं बनी, बल्कि भावनाओं और प्रतीकों का ऐसा संगम बन गई, जिसने सुनने वालों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।

    विशाल ददलानी ने इस अनुभव को साझा करते हुए कहा कि असली कलाकार वही होता है जो जीवन के छोटे-छोटे पलों को भी गहराई से महसूस करता है और उन्हें कला में बदल देता है। उनके अनुसार, सामान्य लोग ऐसे अनुभवों को शायद नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन महान रचनाकार उन्हीं क्षणों को अमर बना देते हैं। उन्होंने आर. डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जोड़ी को भारतीय संगीत का एक अनमोल रत्न बताया।

    यह गीत वर्ष 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमर प्रेम’ का हिस्सा था, जिसमें राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म के साथ-साथ इसके गीतों ने भी दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई थी। ‘चिंगारी कोई भड़के’ को प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार ने अपनी आवाज दी थी, जिसने इस गीत को और भी भावनात्मक और प्रभावशाली बना दिया।

    आज भी यह गीत संगीत प्रेमियों के बीच उतनी ही लोकप्रियता रखता है जितनी इसके रिलीज के समय थी। इसकी गहराई, शब्दों की सादगी और संगीत की भावनात्मक पकड़ इसे समय से परे एक क्लासिक बनाती है। विशाल ददलानी द्वारा साझा किया गया यह किस्सा एक बार फिर याद दिलाता है कि महान कला अक्सर सबसे साधारण क्षणों से जन्म लेती है।

  • स्ट्रे डॉग्स विवाद पर गरमाई बहस, सोनम बाजवा ने उठाई संवेदनशील समाधान की मांग

    स्ट्रे डॉग्स विवाद पर गरमाई बहस, सोनम बाजवा ने उठाई संवेदनशील समाधान की मांग


    नई दिल्ली। देश में स्ट्रे डॉग्स को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है, जहां सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। इसी मुद्दे पर अभिनेत्री सोनम बाजवा ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से अपील करते हुए बेजुबान जानवरों के लिए उचित व्यवस्था और शेल्टर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि समस्या का समाधान केवल हटाने से नहीं बल्कि एक व्यवस्थित और मानवीय दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।

    सोनम बाजवा ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गलत तरीके से समझा जा रहा है। उनके अनुसार अदालत ने स्ट्रे डॉग्स को पूरी तरह हटाने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल, वैक्सीनेशन और शेल्टरिंग जैसे उपायों के जरिए समस्या के समाधान की बात कही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली सवाल यह है कि आखिर इन जानवरों के लिए पर्याप्त शेल्टर और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर कहां है।

    अभिनेत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ दया और जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जाए और ऐसा समाधान निकाला जाए जो मानव और पशु दोनों के हित में हो।

    उन्होंने सुझाव दिया कि इस विषय पर पशु कल्याण से जुड़े विशेषज्ञों, एनजीओ, पशु चिकित्सकों और प्रशासनिक अधिकारियों को एक साथ बैठाकर एक व्यावहारिक योजना तैयार की जानी चाहिए। उनके अनुसार केवल सख्त कदम उठाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता, बल्कि एक व्यवस्थित नीति और मजबूत ढांचे की जरूरत है।

    यह मुद्दा उस समय और अधिक चर्चा में आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने स्ट्रे डॉग्स से जुड़े मामलों में राज्य सरकारों को एबीसी कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि कई क्षेत्रों में इस कार्यक्रम के सही तरीके से लागू न होने के कारण समस्या लगातार बढ़ रही है और इससे सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर चिंता भी बढ़ी है।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कई राज्यों में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है, जहां एक तरफ सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात हो रही है तो दूसरी तरफ पशु अधिकारों और उनके संरक्षण की मांग भी उठ रही है। सोनम बाजवा की यह अपील इसी बहस को एक नया दृष्टिकोण देती है, जिसमें समाधान को केवल नियंत्रण तक सीमित न रखकर एक संवेदनशील और व्यवस्थित नीति की जरूरत पर जोर दिया गया है।

  • कमल हासन की देशवासियों से अपील: संकट के समय राजनीति नहीं, राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए

    कमल हासन की देशवासियों से अपील: संकट के समय राजनीति नहीं, राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अभिनेता और राजनेता कमल हासन ने देशवासियों से एकजुटता और जिम्मेदारी की अपील की है। उन्होंने कहा है कि मौजूदा समय केवल आर्थिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह ऐसा दौर है जब पूरे देश को मिलकर राष्ट्रहित में सोचने और कार्य करने की आवश्यकता है।

    कमल हासन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी एक वीडियो संदेश में कहा कि ईरान क्षेत्र में जारी संघर्षऔर समुद्री व्यापार मार्गों में बाधाओं का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत जैसे देशों पर इसका सीधा प्रभाव देखने को मिल रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं। इसके कारण पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि यह स्थिति केवल सरकारों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी जिम्मेदारी का समय है। कमल हासन ने लोगों से अपील की कि वे ईंधन और बिजली की खपत कम करने जैसे छोटे-छोटे कदम उठाकर देश की आर्थिक स्थिरता में योगदान दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि कई विकसित देश पहले ही ऊर्जा संरक्षण को लेकर सख्त नीतियां अपना चुके हैं और नागरिकों को जागरूक किया जा रहा है।

    अपने संदेश में उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि संकट के समय भारत ने हमेशा एकजुटता दिखाई है। उन्होंने 1962 के युद्ध और 1965 के खाद्य संकट का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय देशवासियों ने त्याग और सहयोग की मिसाल पेश की थी। उन्होंने कहा कि आज भले ही परिस्थितियां उतनी गंभीर न हों, लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी उतनी ही आवश्यक है।

    कमल हासन ने यह भी कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, कोल गैसीफिकेशन और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने इस प्रयास को सकारात्मक बताते हुए कहा कि विदेशी तेल और गैस पर निर्भरता कम करना दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी है।

    उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से भी अपील की कि वे मिलकर ईंधन पर लगने वाले करों में संतुलन लाएं और सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुलभ और किफायती बनाएं। उनका कहना था कि यदि बस, ट्रेन और मेट्रो जैसे साधनों को बढ़ावा दिया जाए तो निजी वाहनों पर निर्भरता कम होगी और ईंधन की बचत संभव होगी।

    कमल हासन ने अपने संदेश में प्रधानमंत्री से सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक संयुक्त बैठक बुलाने का भी आग्रह किया, ताकि ऊर्जा संकट और उससे जुड़ी चुनौतियों पर सामूहिक रणनीति बनाई जा सके। उन्होंने कहा कि देश को इस समय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है, क्योंकि राष्ट्रहित सबसे महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि देशवासी मिलकर ऊर्जा बचत और जिम्मेदारी से खपत की दिशा में कदम उठाते हैं, तो भारत इस वैश्विक संकट से और अधिक मजबूत होकर बाहर निकल सकता है। उनके अनुसार, आज बचाया गया हर यूनिट बिजली और हर लीटर ईंधन भविष्य की पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण निवेश है।

  • जेनजी में बढ़ती लोकप्रियता पर बोले जैकी श्रॉफ, इंसानियत और अपनापन ही मेरी असली पहचान है

    जेनजी में बढ़ती लोकप्रियता पर बोले जैकी श्रॉफ, इंसानियत और अपनापन ही मेरी असली पहचान है

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता जैकी श्रॉफ अपनी अलग शैली, सहज व्यक्तित्व और दमदार अभिनय के लिए लंबे समय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाए हुए हैं। 80 और 90 के दशक में बड़े पर्दे पर अपनी छाप छोड़ने के बाद भी आज वह नई पीढ़ी यानी जेनजी के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया से लेकर युवा दर्शकों तक उनकी बढ़ती लोकप्रियता लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

    इसी बीच अपनी आगामी फिल्म के प्रमोशन के दौरान बातचीत में जैकी श्रॉफ ने अपनी इस लोकप्रियता का कारण बेहद सरल शब्दों में बताया। उन्होंने कहा कि वह हमेशा लोगों को उम्र के आधार पर नहीं देखते, बल्कि इंसानियत और व्यवहार को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी उम्र का हो, हर किसी के साथ समान सम्मान और अपनापन रखना ही उनके स्वभाव की असली पहचान है।

    अभिनेता ने कहा कि उनके लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज इंसानी रिश्ते हैं। वह मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने दिल को खुला रखता है और दूसरों की बातों को ध्यान से सुनता है, तो संबंध अपने आप मजबूत हो जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है, इसलिए खुद को किसी से बड़ा या बेहतर समझना सही नहीं है।

    जैकी श्रॉफ ने यह भी बताया कि वह हमेशा लोगों के साथ सहजता से जुड़ने की कोशिश करते हैं, चाहे वह बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग। उनके अनुसार जब व्यवहार में सादगी और अपनापन होता है, तो पीढ़ियों के बीच की दूरी अपने आप खत्म हो जाती है। यही कारण है कि वह अलग-अलग उम्र के दर्शकों से आसानी से जुड़ पाते हैं और उनकी लोकप्रियता हर पीढ़ी में बनी रहती है।

    नई दिल्ली। अपनी आगामी फिल्म को लेकर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए बेहद खास है क्योंकि इसमें एक अनोखी और अलग सोच को दिखाया गया है। फिल्म में उनका किरदार एक दादा का है, जो अपने पोते के साथ दोस्त जैसा रिश्ता साझा करता है। यह कहानी पारिवारिक संबंधों को एक नए दृष्टिकोण से पेश करती है, जहां उम्र की दीवारें रिश्तों को सीमित नहीं करतीं।

    अभिनेता ने कहा कि इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका नया कॉन्सेप्ट है, जो पारंपरिक सोच से हटकर एक ताजा अनुभव देता है। यह फिल्म यह संदेश देती है कि प्यार, समझ और अपनापन किसी भी पीढ़ी के बीच दूरी को खत्म कर सकता है।

    जैकी श्रॉफ का यह नजरिया न केवल उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे एक कलाकार अपने व्यवहार और सोच के जरिए सभी उम्र के दर्शकों से जुड़ा रह सकता है। उनकी सरलता और मानवीय दृष्टिकोण ही उन्हें आज भी दर्शकों के बीच खास बनाता है।

  • बांसुरी, मोर पंख और देसी अंदाज: कान्स में सान्या ठाकुर ने भारतीय परंपरा को बनाया ग्लोबल आकर्षण

    बांसुरी, मोर पंख और देसी अंदाज: कान्स में सान्या ठाकुर ने भारतीय परंपरा को बनाया ग्लोबल आकर्षण


    नई दिल्ली । दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में शामिल कान्स फिल्म फेस्टिवल में इस बार भारतीय संस्कृति की एक अनोखी और आध्यात्मिक झलक देखने को मिली, जब बिहार की अभिनेत्री सान्या ठाकुर ने ‘राधा रानी’ से प्रेरित अपने विशेष लुक के साथ रेड कार्पेट पर कदम रखा। ग्लैमर और फैशन से भरे इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर सान्या का यह पारंपरिक और सांस्कृतिक अंदाज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचता नजर आया।

    सान्या ठाकुर का यह लुक केवल फैशन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें भारतीय परंपरा, कृष्ण भक्ति और सांस्कृतिक सौंदर्य का गहरा समावेश दिखाई दिया। जैसे ही उन्होंने रेड कार्पेट पर एंट्री ली, उनका देसी अंदाज विदेशी मेहमानों और फैशन प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन गया। बांसुरी, मोर पंख और पारंपरिक श्रृंगार के साथ सान्या ने ऐसा प्रभाव छोड़ा, जिसने उनके लुक को साधारण फैशन से कहीं आगे पहुंचा दिया।

    सान्या ने इस खास मौके के लिए भारी कढ़ाई वाला पारंपरिक लहंगा चुना, जिसमें भारतीय कला और शिल्प की खूबसूरत झलक दिखाई दी। उनके लहंगे में ऑफ-व्हाइट और क्रीम बेस के साथ पेस्टल रंगों की बारीक कढ़ाई की गई थी। फ्लोरल और ट्रेडिशनल मोटिफ्स से सजा यह परिधान बेहद आकर्षक और शाही नजर आ रहा था। सिल्वर थ्रेड, मिरर वर्क और सेक्विन डिटेलिंग ने पूरे आउटफिट को और अधिक भव्य बना दिया।

    लहंगे के साथ उन्होंने मैचिंग ब्लाउज और हल्के डिजाइन वाला नेट दुपट्टा कैरी किया, जिसने उनके लुक में संतुलन और ग्रेस जोड़ दिया। सान्या की स्टाइलिंग में हर छोटी डिटेल पर विशेष ध्यान दिया गया था। माथा पट्टी, बड़े झुमके, रंग-बिरंगी चूड़ियां और हाथों में आलता उनके पारंपरिक रूप को और निखार रहे थे। वहीं नथ और हल्के नेकलेस ने पूरे लुक को एक शास्त्रीय और पौराणिक स्पर्श दिया।

    हालांकि उनके पूरे लुक की सबसे बड़ी खासियत रही बांसुरी और मोर पंख की डिटेलिंग, जिसने ‘राधा रानी’ की थीम को जीवंत कर दिया। बालों को सॉफ्ट कर्ल्स के साथ स्टाइल करते हुए उसमें गजरा लगाया गया था, जबकि हाथ में थामी बांसुरी और उस पर सजा मोर पंख उनके कृष्ण भक्ति वाले रूप को और प्रभावशाली बना रहा था।

    मेकअप को भी बेहद सॉफ्ट और पारंपरिक रखा गया। ग्लॉसी पिंक लिप्स, हल्के रंगों का प्रयोग और माथे पर कुमकुम से बनाई गई फूलों जैसी बिंदी ने उनके चेहरे की सुंदरता को और उभार दिया। यह पूरा अंदाज किसी पौराणिक चित्र या सांस्कृतिक प्रस्तुति जैसा प्रतीत हो रहा था, जिसने रेड कार्पेट पर मौजूद लोगों को खासा प्रभावित किया।

    कुल मिलाकर, सान्या ठाकुर का यह कान्स डेब्यू केवल एक फैशन स्टेटमेंट नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का अंतरराष्ट्रीय मंच पर खूबसूरत प्रदर्शन बन गया। आधुनिक ग्लैमर की भीड़ में उनका यह एथनिक और सांस्कृतिक रूप सबसे अलग और यादगार नजर आया।

  • OTT से बॉलीवुड तक अपनी अदाओं का जादू बिखेर चुकी सपना पब्बी अब ‘बंदर’ में बनेंगी बॉबी देओल की सबसे बड़ी मुसीबत

    OTT से बॉलीवुड तक अपनी अदाओं का जादू बिखेर चुकी सपना पब्बी अब ‘बंदर’ में बनेंगी बॉबी देओल की सबसे बड़ी मुसीबत


    नई दिल्ली ।
    टीवी शो ‘घर आजा परदेसी’ और ’24’ में उन्हें अहम किरदार निभाते देखा गया. एक वक्त पर वो यामी गौतम के साथ ‘फेयर एंड लवली’ के विज्ञापन में भी नजर आई करती थीं. 2015 में फिल्म ‘खामोशियां’ से उन्होंने अपना बॉलीवुड डेब्यू किया था. पिक्चर में अली फजल संग केमिस्ट्री और बोल्ड सीन्स के चलते उनके खूब चर्चे हुए थे.
    हिंदी के साथ-साथ सपना पब्बी ने पंजाबी और तेलुगू सिनेमा में भी काम किया है. उन्हें ‘टोली प्रेमा’, ‘मार गए ओए लोको’, ‘अरदास करां’, ‘ड्राइव’, ‘सार्जेंट’, ‘सरदार जी 3’ जैसी फिल्मों में देखा गया है. जल्द सपना, फिल्म ‘बंदर’ में नजर आएंगी. इस पिक्चर का प्रीमियर 2025 में हुए टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल यानी TIFF में हुआ था.

    टेलीवीजन और फिल्मी दुनिया के साथ-साथ सपना पब्बी का दबदबा ओटीटी की दुनिया में भी खूब है. उन्हें ‘द ट्रिप’, ‘ब्रीद’, ‘बॉम्बर्स’, ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज’, ‘इनसाइड एज’, ‘लंदन फाइल्स’, नेवर किस योर बेस्ट फ्रेंड 2′ समेत यूनाइटेड कच्चे’ जैसी सीरीज में देखा जा चुका है.

    2012 से लेकर अभी तक सपना पब्बी काफी काम कर चुकी हैं. उन्होंने अपने करियर के साथ-साथ ढेरों एक्सपेरिमेंट कर खुद को बेहतर बनाया है और अपने टैलेंट को साबित करके दिखाया है. देखना होगा कि फिल्म ‘बंदर’ में वो क्या कमाल करती हैं. ये फिल्म 5 जून को सिनेमाघरों में हो रही है.
  • 2.30 घंटे का धैर्य टेस्ट! ‘चांद मेरा दिल’ में प्यार तो है, लेकिन कहानी और लेखन ने किया निराश

    2.30 घंटे का धैर्य टेस्ट! ‘चांद मेरा दिल’ में प्यार तो है, लेकिन कहानी और लेखन ने किया निराश

    नई दिल्ली ।  ‘चांद मेरा दिल’ को सबसे खतरनाक यूजलेस फिल्म क्या बनाता है? क्या वो पिक्चर की खराब कहानी है? या उसके क्रिंज डायलॉग या फिर डायरेक्टर विवेक सोनी की ऑडेसिटी जो ये सोच रहे थे कि वो इस जमाने की सबसे बेहतरीन रोमांटिक फिल्म बना रहे हैं? इसका जवाब है- सबकुछ.
    बॉलीवुड में बीते काफी वक्त से रीमेक और सीक्वल बन रहे हैं. ऐसे में कोई नई कहानी ऑडियंस को परोसना मेकर्स के लिए शायद मुश्किल हो गया है, या फिर हमने पूरी तरह से कोशिश करना छोड़ दिया है. जो भी है…
    ओटीटी के जमाने में जनता को फिल्म देखने के लिए थिएटर तक खींचना बड़ी बात हो गई है. ऐसे में आपकी पिक्चर एकदम बेदम हो तो चीजें और खराब हो जाती हैं.कुछ कहानियां आइडिया में बहुत अच्छी लगती हैं. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि वो पर्दे परभी उतनी ही खूबसूरत लगें, जितनी पन्ने पर लग रही थी. ‘चांद मेरा दिल’ भी कुछ ऐसी ही है. किसी नए राइटर की नई-सी किताब में अगर इस कहानी को पढ़ा होता तो 14-15 साल की बच्चियां फिर भी इसे पचा लेतीं. पर हमसे ये न हो पाई, भैया!

    क्या है फिल्म की कहानी?

    कहानी है आरव रावत (लक्ष्य) और चांदनी प्रसाद (अनन्या पांडे) की. 21 साल की उम्र में इंजीनियरिंग कॉलेज में मिले आरव और चांदनी को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. मगर एक दूसरे की आंखों में खोए, मैसेज में एम्बेरेसिंग बातें करने वाले ‘आरु और चांद’ नहीं जानते कि जिंदगी में सिर्फ प्यार काफी नहीं होता. दोनों एकदम अलग परिवारों से आए हैं. चांदनी ऐसे घर में पली-बढ़ी है, जिसमें उसने अपनी मां को घरेलू हिंसा का शिकार होते देखा है. तो वहीं आरव के मां-बाप को हमेशा से अपने बच्चों से ज्यादा इमेज की चिंता रही है. अपने घरों में अनदेखे हुए और कम प्यार पाकर जिए आरव-चांदनी एक दूसरे के लिए ‘दुनिया खूबसूरत’ बना रहे हैं.
    दोनों की जिंदगी में एक क्राइसिस आता है और परिवार उनसे मुंह फेर लेता है. अब आरव और चांदनी दुनिया में एक दूसरे का सहारा हैं. उनके पास बड़ी जिम्मेदारी है, जिसके बोझ तले वो दब रहे हैं. एक दिन वो होता है, जो किसी ने नहीं सोचा और दोनों की जिंदगी बदल जाती है. इमेजिन करने में कहानी प्यारी लग रही है, है न? देखने में नहीं है! देखने में ये बॉलीवुड की बहुत ही पुराने जमाने की कहानी है, जिसमें बच्चे खुद को समझदार समझकर बड़े फैसले ले लेते हैं और फिर उन्हें समझ आता है कि अब हमारे बस की तो ये है नहीं, अब हम फंस गए. ऐसी कहानियां हम बहुत बार बॉलीवुड में बनते देख चुके हैं. अगर ये कोई शॉर्ट फिल्म भी होती तो शायद खूबसूरत लगती. मगर एक पूरी लगभग 2.30 घंटे की पिक्चर के रूप में ‘चांद मेरा दिल’, बोरिंग, प्रेडिक्टेबल और क्रिंज है.
    परफॉरमेंस
    आरव के रोल में लक्ष्य ने बढ़िया काम किया है. वो अच्छे एक्टर हैं, इस बात में कोई दोराय नहीं है. मगर ये फिल्म उनके टैलेंट के हिसाब की है ही नहीं. ‘किल’ और ‘बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ के साथ लक्ष्य ने अपने एक्टिंग टैलेंट को साबित किया है. ‘चांद मेरा दिल’ में उनका किरदार फिर भी समझदार था. अनन्या पांडे ने भी पिक्चर में अच्छा काम किया है. मगर उनका किरदार चांदनी इतना इरिटेटिंग है कि आपका उसपर चिल्लाने का मन करता है. चांदनी इस रिश्ते में टॉक्सिक इंसान है. वो डेलुलु में जीती है और कन्फ्यूज ही रहती है. बेवकूफी भरी हरकत करती है, लेकिन अगर कोई बोल दे दो तो उसे बुरा लग जाता है. फिल्म में मनीष चौधरी और चारु शंकर संग अन्य कलाकारों ने भी काम किया है. उनका काम लिमिटेड था और सही भी रहा.
    सब्र का लेगी इम्तिहान
    डायरेक्टर विवेक सोनी और तुषार परांजपे का स्क्रीनप्ले काफी खराब और बोरिंग है. इसको और खराब बनाते हैं पिक्चर के डायलॉग. आरव और चांदनी, दोनों के ही किरदार आपको शुरुआत से पसंद नहीं आते. दोनों बेहद चीजी हरकतें करते हैं, बचपना दिखाते हैं और फिर आप सोचते हो कि अभी तो ये बच्चे हैं कोई बात नहीं. मगर इस सबका अंत कहीं नहीं होता. पिक्चर की कहानी आप बैठे-बैठे जो सोच रहे हैं वही जाती है.
    आपको ये जानने के लिए इसे देखने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी कि इसमें आखिर क्या हुआ. ‘चांद मेरा दिल’ शुरुआत से ही आपका ध्यान अपनी ओर खींचने में नाकाम होती है. इंटरवल आते-आते आप सोचने लगते हैं कि क्या इसे छोड़कर घर वापस लौट जाना चाहिए. आप खुद को इसे अंत तक देखने के लिए फोर्स करते हैं और फिर आरव और चांदनी के बीच एक बात आपकी हिट करती है. पिक्चर के अंत में आरव, चांदनी से पूछता है, ‘कहीं हम गलती तो नहीं कर रहे?’ वो कहती है, ‘अगर गलत है तो गलत सही.’ यहां थिएटर में बैठे आप सोचते हो, ‘गलती तो मैंने कर दी इस मूवी को देखने आकर.’
    ‘चांद मेरा दिल’ की अच्छी बात सिर्फ उसके गाने हैं. इस फिल्म को देखने के एक्सपीरिएंस की सबसे अच्छी बात थी चांद देखना. नहीं, फिल्म में किसी चांद को नहीं, बल्कि थिएटर से बाहर निकलकर घर आते हुए असली चांद को. वो सुंदर लग रहा था.
  • कम रेटिंग समझकर जिन हॉरर फिल्मों को लोगों ने किया नजरअंदाज, अब वही बन रही हैं डर की सबसे बड़ी वजह, दर्शकों ने कहा- रातभर नहीं आई नींद

    कम रेटिंग समझकर जिन हॉरर फिल्मों को लोगों ने किया नजरअंदाज, अब वही बन रही हैं डर की सबसे बड़ी वजह, दर्शकों ने कहा- रातभर नहीं आई नींद


    नई दिल्ली ।  अक्सर जब हम कोई नई हॉरर फिल्म देखने बैठते हैं, तो सबसे पहले उसकी IMDb रेटिंग चेक करते हैं। अगर रेटिंग 6 या 6.5 के आसपास हो, तो हम मान लेते हैं कि फिल्म ठीक ठाक होगी और उसे स्किप कर देते हैं। लेकिन हॉरर जॉनर के साथ ऐसा करना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है।सिनेमा लवर्स सोशल मीडिया पर ऐसी तीन फिल्में रीकमंड कर रहे हैं जिनकी रेटिंग कम है, लेकिन डर के मामले में बेस्ट है। ये फिल्में लोगों के पसीने छुड़ा दे रही हैं। आइए आपको बताते हैं कि इन तीन फिल्मों की खास बात क्या है।
    द टेकिंग ऑफ डेबोरा लोगान (The Taking of Deborah Logan)
    क्यों देखें ये फिल्म?: अगर आपको लगता है कि आपने सबकुछ देख लिया है और अब आपको डर नहीं लगता, तो ये फिल्म आपका भ्रम तोड़ देगी। ये फिल्म ‘फाउंड फुटेज’ स्टाइल में बनी है, जिससे स्क्रीन पर दिखने वाली हर घटना एकदम असली महसूस होती है।
    कहानी और डर का फैक्टर: कहानी एक मेडिकल टीम की है जो अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित एक बुजुर्ग महिला पर डॉक्यूमेंट्री बना रही है। शुरुआत में ये एक इमोशनल लगती है, लेकिन धीरे-धीरे अल्जाइमर पेशेंट की हरकतें इतनी अजीब और खौफनाक होने लगती हैं कि पूरी टीम की जान पर बन आती है।
    लोग क्या बोल रहे: सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि फिल्म का आखिरी का 20 मिनट का एक सीन इतना भयानक और डिस्टर्बिंग है कि कमजोर दिल वाले उसे झेल नहीं पाएंगे।
    2. द डार्क एंड द विक्ड (The Dark and The Wicked)

    क्यों देखें ये फिल्म?: यह कोई आम भूतिया फिल्म नहीं है जहां अचानक कोई सामने आकर आपको डराए, बल्कि ये एक ऐसी साइकोलॉजिकल हॉरर फिल्म है जो आपके दिमाग से खेलती है।
    कहानी और डर का फैक्टर: इस फिल्म में दो भाई-बहन की कहानी दिखाई गई है जो अपने बीमार पिता की देखभाल करने के लिए एक बेहद सुनसान फार्महाउस पर जाते हैं। वहां पहुंचते ही उन्हें महसूस होता है कि कोई बेहद खतरनाक ताकत उनके पूरे परिवार को खत्म करना चाहती है।
    लोग क्या बोल रहे: लोग कह रहे हैं कि ये फिल्म थोड़ी स्लो है, जिसकी वजह से इसकी रेटिंग कम रह गई। हालांकि हॉरर फिल्में देखने वालों के लिए ये मास्टरपीस है।

    यहां देखिए फिल्म का ट्रेलर
    क्यों देखें ये फिल्म?: थाईलैंड के काले जादू, ओझा और अंधविश्वास पर बनी ये फिल्म रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। इसे मॉक्युमेंट्री स्टाइल में शूट किया गया है यानी आपको ऐसा लगेगा जैसे आप कोई असली घटना लाइव देख रहे हैं।
    कहानी और डर का फैक्टर: ये फिल्म थाईलैंड के एक छोटे से गांव की कहानी है, जहां एक लड़की पर किसी प्राचीन और बहुत ही दुष्ट आत्मा का साया आ जाता है। फिल्म का पहला पार्ट धीरे-धीरे सस्पेंस बनाता है, लेकिन सेकेंड हाफ और इसका क्लाइमेक्स इतना ज्यादा खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाला है कि इसे अकेले या अंधेरे में देखने की गलती बिल्कुल न करें।
  • पहली ही फिल्म से मिला ऐसा नाम, जिसने राजीव भाटिया को बना दिया बॉलीवुड का सुपरस्टार अक्षय कुमार

    पहली ही फिल्म से मिला ऐसा नाम, जिसने राजीव भाटिया को बना दिया बॉलीवुड का सुपरस्टार अक्षय कुमार

    अक्षय कुमार ने आखिर क्यों बदला अपना असली नाम?
     नई दिल्ली ।  बॉलीवुड इंडस्ट्री में कई स्टार्स ऐसे हैं, जिन्होंने अपने असली नाम की जगह किसी और नाम से अपनी पहचान बनाई। इस लिस्ट में दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान जैसे सुपरस्टार्स का नाम शामिल है। वहीं, इस लिस्ट में बॉलीवुड खिलाड़ी यानी अक्षय कुमार का नाम भी शामिल है।

    अक्षय कुमार का असली नाम ये है
    अक्षय कुमार का असली नाम राजीव हरिओम भाटिया है। उन्होंने फिल्मों में आने से पहले अपना नाम बदल कर अक्षय कुमार कर लिया।

    जानते हैं क्यों अक्षय कुमार ने बदला नाम
    लेकिन इसके पीछे का मजेदार किस्सा शायद ही आप जानते होंगे। अगर नहीं तो चलिए हम आपको बताते हैं आखिर किस वजह से अक्षय ने अपना नाम चेंज किया।

    इंटरव्यू में बताया दिलचस्प किस्सा
    Galatta Plus के साथ एक इंटरव्यू में, बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार (जिनका जन्म राजीव भाटिया के रूप में हुआ था) ने अपना नाम बदलने के पीछे की दिलचस्प कहानी बताई। आम धारणा के विपरीत, उन्होंने नाम बदलने का ये फैसला किसी पंडित या ज्योतिषीय सलाह से प्रभावित होकर नहीं लिया था।


    महज 8 मिनट का रोल

    Galatta Plus के साथ एक इंटरव्यू में, बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार (जिनका जन्म राजीव भाटिया के रूप में हुआ था) ने अपना नाम बदलने के पीछे की दिलचस्प कहानी बताई। आम धारणा के विपरीत, उन्होंने नाम बदलने का ये फैसला किसी पंडित या ज्योतिषीय सलाह से प्रभावित होकर नहीं लिया था।


    एक्ट्रेस को सिखाते हैं मार्शल आर्ट

    इंटरव्यू में अक्षय ने बताया, ‘उन्होंने महेश भट्ट की फिल्म ‘आज’ में महज 8 सेकंड का एक छोटा सा रोल किया था। इस फिल्म में वो 8 सेकंड के लिए आते हैं और एक्ट्रेस को मार्शल आर्ट सिखाते हैं और चले जाते हैं।’


    कुमार गौरव की वजह से बदला नाम

    अक्षय ने आगे कहा, ‘उस फिल्म में शायद ही किसी ने मुझे नोटिस किया हो। इस फिल्म में मेन लीड एक्टर कुमार गौरव थे और फिल्म में उनका नाम ‘अक्षय’ था। तो ये मुझे बहुत अच्छा लगा कि यार ये मेरी पहली फिल्म है और कुमार गौरव का नाम अक्षय है तो मैंने सोचा कि मैं अपना नाम बदल लेता हूं।’

    ऐसे राजीव से अक्षय बने एक्टर
    बस फिर क्या था ये राजीव भाटिया से वो बॉलीवुड के चमकते सितारे अक्षय कुमार बन गए। आज पूरी दुनिया उन्हें इसी नाम से जानती है।

    भूत बंगला के बाद इस फिल्म में आएंगे नजर
    अक्षय कुमार ने अपने करियर में कई सुपरहिट फिल्में दी हैं। हाल ही में अक्षय कुमार की फिल्म ‘भूत बंगला’ रिलीज हुई थी। वहीं, इन दिनों अक्षय कुमार अपनी अपकमिंग मूवी ‘वेलकम टू द जंगल’ को लेकर सुर्खियों में हैं। ‘वेलकम टू द जंगल’ 26 जून, 2026 को सिनेमाघरों में आएगी