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  • PoK में थम नहीं रही हिंसा, 53 दिन से प्रदर्शन जारी…. अब तक 109 लोगों की मौत

    PoK में थम नहीं रही हिंसा, 53 दिन से प्रदर्शन जारी…. अब तक 109 लोगों की मौत


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (Pakistan-occupied Jammu and Kashmir- PoK) में पिछले कई हफ्तों से जारी तनाव अब और बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और प्रतिबंधित जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के सदस्यों-कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें फिर से तेज हो गई हैं। क्षेत्रीय चुनावों के साथ शुरू हुई यह अशांति अब 53वें दिन में पहुंच चुकी है और हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। जेएएसी के अनुसार, आंदोलन शुरू होने के बाद से अब तक कुल 109 प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। संगठन का कहना है कि इनमें हाल के दिनों की हिंसा में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। वहीं पाकिस्तानी सरकार इन आंकड़ों को पूरी तरह खारिज कर रही है। इस्लामाबाद का दावा है कि कोई आम नागरिक नहीं मारा गया है।

    दावे-प्रतिदावे के बीच ताजा मामला कोटली से सामने आया है। जेएएसी के नेता उमर नजीर कश्मीरी ने दावा किया है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर कथित तौर पर गोलीबारी की, जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फायरिंग के दौरान महिलाओं को भी निशाना बनाया गया। हालांकि यह दावा आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हो सका है।


    दो महीने से विरोध प्रदर्शन

    बता दें कि जेएएसी विभिन्न एक्टिविस्ट ग्रुप्स का गठबंधन है, जो पीओके विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर करीब दो महीने से विरोध-प्रदर्शन कर रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार इन आरक्षित सीटों में हेरफेर करके अपनी पसंद का प्रधानमंत्री बनवाती है। इन सीटों पर विवाद लंबे समय से चला आ रहा है और जेएएसी इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला बता रही है। सोमवार से सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें और बढ़ गई हैं। सबसे ज्यादा हिंसा रावलकोट और मीरपुर क्षेत्रों में हुई है, जहां स्थिति सबसे अधिक तनावपूर्ण बताई जा रही है।

    इससे पहले जेएएसी ने दावा किया था कि हाल के दिनों में हुई हिंसा में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 37 लोग मारे गए हैं। घायलों की सही संख्या अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। संगठन ने एक बयान जारी कर कहा कि भारी गोलीबारी के बीच हमारे लोग शांतिपूर्वक और बिना किसी हथियार के खड़े रहे हैं। खुदा चाहेंगे तो जुल्म और अन्याय के खिलाफ हमारी शांतिपूर्ण लड़ाई जारी रहेगी। जेएएसी अपने आंदोलन को पूरी तरह अहिंसक बता रही है और सुरक्षा बलों पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगा रही है।


    क्या कह रही पाकिस्तान सरकार?

    पाकिस्तान सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि कोई भी आम नागरिक नहीं मारा गया है। सरकार का दावा है कि प्रतिबंधित तेहरिक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के बीच घुसपैठ कर चुके हैं। इस्लामाबाद ने साफ कहा है कि वह अपनी कार्रवाई जारी रखेगा। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि हम प्रदर्शनकारियों से कोई बात नहीं करेंगे। कानून अपना काम करेगा।

  • देश में पांच साल में गड्ढों में गिरने से 9 हजार 109 लोगों की मौत… रोजाना 6 लोगों ने गंवाई जान

    देश में पांच साल में गड्ढों में गिरने से 9 हजार 109 लोगों की मौत… रोजाना 6 लोगों ने गंवाई जान


    नई दिल्ली।
    सड़क परिवहन मंत्रालय (Ministry of Road Transport) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 से 2023 के बीच देश में सड़कों पर बने गड्ढों (Potholes Roads) के कारण हुए सड़क हादसों (Road Accidents) में 9,109 लोगों की मौत हुई थी.यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है.वर्ष 2022 में जहां ऐसे हादसों में 1,856 लोगों की मौत हुई, वहीं 2023 में यह आंकड़ा बढ़ कर 2,161 तक पहुंच गया.यानी उस साल रोजाना औसतन छह लोगों की मौत हुई थी.उसके बाद का आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

    यह गड्ढे दोपहिया वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए सड़क हादसे की सबसे प्रमुख वजह बन गए हैं.मानसून में यह समस्या बेहद गंभीर हो जाती है.बीते सप्ताह दिल्ली के जनकपुरी इलाके में जल बोर्ड की ओर से खोदे गए गड्ढे में गिरकर कमल नामक 25 वर्ष के एक युवक की मौत हो गई थी।

    अदालतों की फटकार भी बेअसर

    बंबई हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने बीते साल अक्तूबर में इन मौतों से संबंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद ऐसे मामलों में मृतकों के परिजनों को कम से कम छह लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया था.इससे पहले जुलाई 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी कि सड़कों पर बने गड्ढों के कारण होने वाले हादसों से साफ है कि इनके लिए जिम्मेदार अधिकारी सही तरीके से अपनी ड्यूटी नहीं निभा रहे हैं. शीर्ष अदालतों की टिप्पणी और फटकार के बावजूद यह समस्या कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है।

    परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि सड़कों पर बने गड्ढे दोपहिया वाहनों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.सड़कों की मरम्मत के लिए जिम्मेदार नगर निगम, लोक निर्माण विभाग या नगरपालिकाएं अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाती.क्यों बनते हैं सड़कों पर गड्ढे?लेकिन आखिर सड़कों पर ऐसे गड्ढे क्यों हो जाते हैं और समय पर इनकी मरम्मत के उपाय क्यों नहीं किए जाते?

    इस सवाल पर लोक निर्माण विभाग के एक पूर्व इंजीनियर समरेश भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, “मानसून के सीजन में सड़कों पर पानी भरना और रिसना इसका एक प्रमुख कारण है.ज्यादातर मामलों में सड़कों पर भरे पानी को निकालने के लिए ड्रेनेज सिस्टम ठीक नहीं होता. उस दौरान भारी वाहनों के गुजरने के कारण सड़कों पर गड्ढे बन जाते हैं.इसके अलावा सड़क निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल भी दूसरी बड़ी वजह है”समरेश का कहना है कि कई बार बिजली और जल निगम जैसे विभाग भी सड़कों पर गड्ढे खोदकर उनको जस का तस छोड़ देते हैं.विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती है.उनके मुताबिक, कोई बड़ा हादसा होने के बाद राजनीतिक तौर पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है और तमाम विभाग अपना पल्ला झाड़ने लगते हैं.

    मुआवजे की कोई गारंटी नहीं

    एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक मोहम्मद तस्लीम डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गड्ढों के कारण रोजाना 19 सड़क हादसे होते हैं और इनमें औसतन छह लोगों की मौत हो जाती है.इसके अलावा कई लोग गंभीर रूप से घायल होकर जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं.ऐसे लोगों का कोई आंकड़ा नहीं है” उनके मुताबिक, ऐसे हादसों में वाहनों को होने वाले नुकसान का भी कोई आंकड़ा कहीं नहीं मिलता. क्या ऐसे हादसों से प्रभावित लोगों को कानूनी तौर पर मुआवजा मिल सकता है?

    कलकत्ता हाईकोर्ट के एक एडवोकेट दीपक कुमार डीडब्ल्यू से कहते हैं, “सैद्धांतिक तौर पर प्रभावित लोग या उनके परिजन मुआवजे के हकदार हैं.लेकिन न्याय का रास्ता लंबा और जटिल है और उसके बाद भी जीत की कोई गारंटी नहीं है.कानूनी खामियों का फायदा उठा कर अक्सर तमाम विभाग एक-दूसरे पर अंगुली उठा कर बच निकलते हैं”हादसों को कैसे रोका जाएपरिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ जगह एआई तकनीक वाले कैमरे से सड़कों पर बने गड्ढों का पता लगा कर उनकी मरम्मत का काम जरूर किया जा रहा है लेकिन यह नाकाफी है.समरेश कहते हैं कि ऐसे हादसों पर अंकुश लगाने के लिए विभागों की जवाबदेही तय करनी होगी और तय समय सीमा के भीतर गड्ढों की मरम्मत नहीं करने की स्थिति में उन पर भारी जुर्माना लगाना होगा.वहीं मोहम्मद तस्लीम का कहना है कि समस्या तकनीक या पैसों की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति और सोच की है.जब तक संबंधित विभागों का रवैया लापरवाह रहेगा, ऐसे हादसे बढ़ते ही रहेंगे.सड़क जैसे आधारभूत ढांचे के प्रबंधन पर गंभीरता से ध्यान दिया जाने की जरूरत है।