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  • 2027 जनगणना में जाति जानकारी का सत्यापन सुनिश्चित किया जाए- SC ने केंद्र को दिया निर्देश

    2027 जनगणना में जाति जानकारी का सत्यापन सुनिश्चित किया जाए- SC ने केंद्र को दिया निर्देश


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को केंद्र सरकार (Central Government) और भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त को 2027 में होने वाली जनगणना (Census 2027) में जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने की प्रक्रिया पर पुनः विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह सुझाव दिया कि जाति की गणना केवल स्व-घोषणा के बजाय सत्यापन प्रणाली के आधार पर की जाए, ताकि अधिक सटीक और पारदर्शी आंकड़े मिल सकें।

    सुप्रीम कोर्ट ने जनगणना में नागरिकों की जाति संबंधी जानकारी को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के तरीकों पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह निर्देश दिया कि इस विषय पर जनगणना अधिनियम 1958 के तहत संबंधित प्राधिकारियों को विचार करना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता आकाश गोयल से कहा कि इस मामले में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन न्यायालय की तरफ से इसमें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि जनगणना की प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1958 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार संचालित होती है। इसके तहत महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय को जनगणना के विवरण और तरीके तय करने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिवेदन में उठाए गए मुद्दों को विचार के लिए प्रासंगिक माना और सुझाव दिए कि इन पर महापंजीयक द्वारा गंभीरता से विचार किया जाए।

    CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता और उनके जैसे अन्य व्यक्तियों द्वारा जताई गई चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय ने क्षेत्रीय विशेषज्ञों की सहायता से एक मजबूत और सुरक्षित प्रणाली विकसित की होगी, ताकि कोई गलती न हो सके। अदालत ने इस मामले में महापंजीयक को दिए गए सुझावों पर विचार करने का आदेश दिया और याचिका का निपटारा कर दिया।

    इससे पहले, याचिकाकर्ता आकाश गोयल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने अदालत से आग्रह किया था कि नागरिकों के जाति संबंधी विवरण को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए एक पारदर्शी और सार्वजनिक प्रश्नपत्र तैयार किया जाए।

    वर्ष 2027 की जनगणना, 1931 के बाद पहली बार जातिगत गणना को शामिल करने वाली जनगणना होगी और यह भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना भी होगी, जो अपने आंकड़ों और प्रक्रिया में पूरी तरह से डिजिटल रूप से संचालित होगी। इस संस्करण में मैंने मूल खबर का सार और जानकारी समान रखते हुए शब्दों की संख्या में समानता बनाए रखी है। साथ ही, हेडिंग को आकर्षक और संक्षिप्त रखा है।

  • मोदी सरकार का बड़ा फैसला: 2027 जनगणना के लिए 11,718 करोड़ का बजट मंजूर, किसानों को भी राहत

    मोदी सरकार का बड़ा फैसला: 2027 जनगणना के लिए 11,718 करोड़ का बजट मंजूर, किसानों को भी राहत


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में शुक्रवार (12 दिसंबर 2025) को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में तीन अहम फैसले लिए गए हैं। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इन फैसलों का ऐलान करते हुए कहा कि सरकार ने 2027 की जनगणना के लिए 11,718 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया है। इसके साथ ही कोल (कोयला) सेक्टर में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक बड़ा रिफॉर्म किया गया और किसानों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले का भी ऐलान किया गया।

    डिजिटल जनगणना का ऐतिहासिक फैसला

    अश्विनी वैष्णव ने बताया कि 2027 की जनगणना पहली बार डिजिटल रूप में आयोजित की जाएगी, जिसमें डेटा सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाएगा। यह जनगणना दो चरणों में की जाएगी। पहले चरण में 1 अप्रैल से सितंबर 2026 तक हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस होगा, और दूसरे चरण में फरवरी 2027 में जनसंख्या गणना की जाएगी। इस बार डिजिटल जनगणना में डेटा कलेक्शन के लिए मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया जाएगा, जो हिंदी, इंग्लिश और क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध होगा। इस कदम से जनगणना प्रक्रिया में तेजी आएगी और डेटा संग्रहण को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाएगा।

    कोल सेक्टर में आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम

    मंत्री ने बताया कि कोल सेतु नामक योजना के तहत भारत अब कोयला उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर है। इससे भारत की कोयला आयात पर निर्भरता खत्म हो रही है, जिससे 60 हजार करोड़ रुपये की बचत होगी। 2024-25 में भारत ने 1 बिलियन टन कोल प्रोडक्शन का लक्ष्य हासिल किया है, जो देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा।

    किसानों के लिए राहत: एक और बड़ा फैसला

    सरकार ने किसानों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले का भी ऐलान किया है, हालांकि इसके विवरण का अभी खुलासा नहीं किया गया है। इससे किसानों को फसल उगाने और उनकी आय को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। कृषि क्षेत्र में सुधार और किसानों की बेहतरी के लिए सरकार लगातार कदम उठा रही है।

    प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने 2027 की डिजिटल जनगणना के लिए 11,718 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया है, जो जनगणना प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाएगा। साथ ही कोल सेक्टर में आत्मनिर्भरता के लिए उठाए गए कदम से देश की ऊर्जा सुरक्षा को नया आयाम मिलेगा। किसानों से जुड़े फैसले ने भी उनकी स्थिति में सुधार की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाया है।

  • देश में पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी 2027 की जनगणना, जानें इसके फायदे-नुकसान

    देश में पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी 2027 की जनगणना, जानें इसके फायदे-नुकसान


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में जनगणना 2027 (Census 2027) में आयोजित की जाएगी और यह पहली बार पूरी तरह डिजिटल (First time All digital) रूप से होगी। गृह मंत्रालय ने मंगलवार को लोकसभा में एक लिखित जवाब में इसकी पुष्टि की। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय (Minister of State for Home Nityanand Rai.) ने कहा कि डेटा कलेक्शन मोबाइल ऐप (Data Collection Mobile App) के माध्यम से किया जाएगा। यह कदम भारत को अमेरिका, ब्रिटेन, घाना और केन्या जैसे देशों की श्रेणी में ला खड़ा करता है, जहां डिजिटल या हाइब्रिड जनगणनाएं पहले ही हो चुकी हैं। लेकिन 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले इस विविध देश में यह महत्वाकांक्षी प्रयास उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। आइए जानते हैं कि यह डिजिटल जनगणना क्या है, कैसे काम करेगी, इसके फायदे-नुकसान क्या हैं, और इससे जुड़ी चिंताएं।


    जनगणना में क्यों हुई देरी और अब क्या नया है?

    भारत में जनगणना हर दशक में होती है, जो जनसांख्यिकीय, सामाजिक, आर्थिक और अब जाति-आधारित डेटा एकत्र करती है। 1872 में पहली गैर-समकालीन जनगणना हुई थी। स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में हुई। 2011 की आखिरी पूर्ण जनगणना के बाद 2021 वाली कोविड-19 महामारी के कारण टल गई। उसके बाद चुनाव, प्रशासनिक देरी और सीमाओं को फ्रीज करने की समयसीमा बढ़ने से यह 2027 तक खिसक गई।


    2027 जनगणना भारत की 16वीं जनगणना होगी, जो दो चरणों में होगी:

    चरण 1: घर सूचीकरण और हाउस मैपिंग – अप्रैल से सितंबर 2026 तक।
    चरण 2: जनसंख्या गणना – फरवरी-मार्च 2027 (बर्फीले क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान)।


    नए पहलू:

    पूरी तरह डिजिटल: पारंपरिक कागजी फॉर्म के बजाय गणनाकारक (इनुमरेटर) अपने स्मार्टफोन (एंड्रॉयड/आईओएस) पर ऐप इस्तेमाल करेंगे। नागरिक वेब पोर्टल के जरिए स्व-गणना (सेल्फ-इनुमरेशन) कर सकेंगे।
    जाति गणना: स्वतंत्र भारत में पहली बार एससी/एसटी के अलावा अन्य जातियों का डेटा एकत्र होगा। आखिरी पूर्ण जाति गणना 1931 में हुई थी।

    भाषाई समावेशिता: ऐप 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा।
    हाइब्रिड फॉर्मेट: कनेक्टिविटी की समस्या वाले क्षेत्रों में कागजी फॉर्म का बैकअप भी होगा।
    यह जनगणना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत सीमांकन (डिलिमिटेशन), आरक्षण नीतियों, एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) और महिलाओं के 33% आरक्षण के लिए आधार बनेगी।


    मोबाइल ऐप से डेटा कलेक्शन, वेब पोर्टल से स्वंय गणना

    लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बताया- यह निर्णय लिया गया है कि जनगणना 2027 डिजिटल माध्यम से की जाएगी। डेटा मोबाइल ऐप के जरिए एकत्र किया जाएगा। जनता वेब पोर्टल के माध्यम से भी स्वयं-जनगणना कर सकेंगी।

    उन्होंने कहा कि जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति की जानकारी उस स्थान पर जुटाई जाती है, जहां वे गणना अवधि के दौरान पाए जाते हैं। इसके साथ ही जन्म स्थान, अंतिम निवास, मौजूदा स्थान पर रहने की अवधि और प्रवास के कारण से संबंधित विस्तृत प्रश्न भी शामिल होंगे। सरकार फील्ड वर्क शुरू होने से पहले प्रश्नावली को आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित करेगी।

    डिजिटल जनगणना के फायदेः तेज और अधिक सटीक जनगणना की उम्मीद
    डिजिटल तरीकों से भारत उन बड़ी समस्याओं को दूर कर सकता है, जो वर्षों से कागज आधारित प्रक्रिया को धीमा और त्रुटिपूर्ण बनाती रही हैं।
    प्रारंभिक आंकड़े 10 दिनों में
    अंतिम आंकड़े 6-9 महीनों में
    (2011 की जनगणना के आंकड़े अंतिम रूप पाने में कई साल लगे थे)

    तेज उपलब्ध डेटा का उपयोग 2029 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, योजनाओं, फंड आवंटन, और जनकल्याण कार्यक्रमों की सटीक योजना में सीधे किया जा सकेगा। जियो-टैगिंग, ऐप के अंदर सत्यापन सुविधाएं और स्वयं-जनगणना से ग्रामीण इलाकों, प्रवासी आबादी और कागजी प्रक्रिया में होने वाली अंडर-काउंटिंग में महत्वपूर्ण कमी आने की उम्मीद है।


    लागत में कमी और रोजगार सृजन

    सरकार को लाखों टैबलेट खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि गणनाकर्मी अपने ही स्मार्टफोन का उपयोग करेंगे।
    कुल बजट: 14,618 करोड़ रुपये
    लगभग 2.4 करोड़ मानव-दिवस का अस्थायी रोजगार सृजन।
    नुकसान: जोखिम भी कम नहीं


    1. डिजिटल डिवाइड की चुनौती

    देश में लगभग 65% आबादी ऑनलाइन है, लेकिन पूर्वोत्तर, पहाड़ी राज्यों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की गति और उपलब्धता सीमित है। इससे सबसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छूट जाने का खतरा बढ़ जाता है।


    2. डिजिटल साक्षरता की कमी

    जनगणना के लिए तैनात तीन मिलियन से अधिक शिक्षक-आधारित गणनाकर्मियों को नई तकनीक पर गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।
    बुजुर्गों, महिलाओं और प्रवासी मजदूरों में ऐप-आधारित बातचीत के प्रति संकोच और अनिच्छा देखी जा सकती है।


    3. साइबर सुरक्षा और गोपनीयता

    जाति, प्रवास इतिहास और व्यक्तिगत सूचनाएं यदि निजी स्मार्टफोन पर स्टोर होकर मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से भेजी जाएंगी, तो डेटा लीक और साइबर हमलों का जोखिम बना रहेगा। सरकार को एन्क्रिप्शन और सुरक्षित सर्वर आर्किटेक्चर पर विशेष ध्यान देना होगा।


    4. अफ्रीकी देशों का अनुभव भी चेतावनी

    घाना, नाइजीरिया और केन्या में डिजिटल जनगणनाओं के दौरान नेटवर्क बाधाएं, डेटा अपलोड की समस्याएं, उच्च त्रुटि दर और जनता का प्रतिरोध देखने को मिला। भारत को इन अनुभवों से सीखने की जरूरत होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल जनगणना ‘भविष्य में कदम रखने जैसी’ है, लेकिन ‘जोखिम भरा एक्सपेरिमेंट’ भी है। पहुंच, गोपनीयता और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। ऑफलाइन सिंक और रीयल-टाइम सपोर्ट से चुनौतियां हल हो सकती हैं। सरकार ने राज्यों के साथ अंतर-राज्य परिषद बैठकें बढ़ाने का वादा किया है।