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  • राज्यसभा डिप्टी लीडर बने Ashok Mittal पर ED की कार्रवाई

    राज्यसभा डिप्टी लीडर बने Ashok Mittal पर ED की कार्रवाई


    नई दिल्ली।  आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद Ashok Mittal के घर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने छापेमारी की है। यह कार्रवाई पंजाब के जालंधर स्थित उनके आवास पर की जा रही है, जहां जांच एजेंसी की टीम सुबह से ही मौजूद है।

    दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस खंगाले जा रहे
    सूत्रों के मुताबिक, ED की टीम मित्तल के घर पर दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जांच कर रही है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि यह कार्रवाई किस मामले में की जा रही है। Ashok Mittal हाल ही में चर्चा में आए थे, जब AAP ने Raghav Chadha की जगह उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाया था। ऐसे में उनकी नियुक्ति के तुरंत बाद हुई यह कार्रवाई राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है।

    व्यवसाय से शिक्षा तक का सफर
    अशोक मित्तल का जन्म जालंधर में हुआ था। उनके परिवार ने ‘लवली स्वीट्स’ नाम से मिठाई का कारोबार शुरू किया था, जिसे उन्होंने आगे बढ़ाया। बाद में उन्होंने 2005 में Lovely Professional University की स्थापना की, जो आज देश की बड़ी निजी यूनिवर्सिटीज में शामिल है। इस छापेमारी के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हालांकि AAP की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन पार्टी पहले भी केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही है। फिलहाल ED की कार्रवाई जारी है और आने वाले समय में इस मामले में और जानकारी सामने आने की संभावना है।

  • राघव चड्ढा का संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ पर जोर, बोले- मतदाता को नेता हटाने का अधिकार मिले

    राघव चड्ढा का संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ पर जोर, बोले- मतदाता को नेता हटाने का अधिकार मिले


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बुधवार को संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार पर चर्चा कर सुर्खियां बटोरीं। उन्होंने कहा कि अगर चुने हुए नेता जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तो मतदाताओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले उन्हें हटाने का अधिकार होना चाहिए।

    शून्यकाल के दौरान बोलते हुए चड्ढा ने कहा, “जैसे मतदाता को चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार है, उसी तरह अगर नेता काम नहीं करता तो उसे हटाने का अधिकार भी होना चाहिए। ‘राइट टू रिकॉल’ मतदाताओं को सशक्त बनाएगी और नेताओं को जवाबदेह बनाएगी।”

    ‘राइट टू रिकॉल’ क्या है?
    राघव चड्ढा ने इसे एक ऐसी प्रक्रिया बताया है जिसमें वोटर किसी चुने हुए नेता को उनके कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार रखते हैं। आसान शब्दों में, अगर जनता अपने नेता के काम से संतुष्ट नहीं है, तो वह उसे जल्दी हटाने का विकल्प रख सकती है।

    राष्ट्रपति और जज हैं हटाए जा सकते हैं, नेताओं को क्यों नहीं?
    चड्ढा ने तर्क दिया कि भारत में पहले ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों के लिए महाभियोग की व्यवस्था है। सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। ऐसे में निर्वाचित नेताओं के लिए भी सुरक्षित और कानूनी प्रक्रिया के जरिए हटाने की सुविधा होना चाहिए।

    दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा उपाय
    सांसद ने कहा कि ‘राइट टू रिकॉल’ लोकतंत्र को मजबूत करेगा, इसे नेताओं के खिलाफ हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कम से कम 35-40% मतदाताओं के हस्ताक्षर जरूरी हों। नेता को 18 महीने का ‘परफॉर्मेंस पीरियड’ दिया जाए, ताकि वह सुधार कर सके। इस तरह काम करने वाले नेताओं को पार्टी टिकट देंगी और लोकतंत्र मजबूत होगा।

    किन देशों में लागू है?
    राघव चड्ढा के अनुसार, दुनिया के 20 से अधिक लोकतांत्रिक देशों में यह व्यवस्था मौजूद है। उदाहरण- अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन, वेनेज़ुएला, पेरू, इक्वाडोर, जापान, ताइवान। इसके अलावा भारत में यह व्यवस्था कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की ग्राम पंचायतों में लागू है।