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  • ईरान की राजनीति में बड़ा उलटफेर, विदेश मंत्री पर संकट, राष्ट्रपति कमजोर, सुरक्षा मामलों में IRGC का बढ़ा नियंत्रण

    ईरान की राजनीति में बड़ा उलटफेर, विदेश मंत्री पर संकट, राष्ट्रपति कमजोर, सुरक्षा मामलों में IRGC का बढ़ा नियंत्रण

    ईरान । ईरान में सत्ता का समीकरण बदलता नजर आ रहा है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर महाभियोग की तैयारी और राष्ट्रपति मसूद पजशकियान की शक्तियों में कटौती के दावों ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इसी बीच इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC की भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है। इन घटनाक्रमों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में ईरान की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

    ईरान के वरिष्ठ सांसद होसैनअली हाजीदेलिगानी ने कहा है कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए आवश्यक दस्तावेज और सबूत जुटाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि उचित समय आने पर संसद में यह प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सांसदों का आरोप है कि अमेरिका के साथ युद्धविराम के दौरान हुई बातचीत ने ईरान के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाया और भविष्य में ऐसे समझौते देश की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकते हैं।

    इसी बीच इजराइली मीडिया की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति मसूद पजशकियान की शक्तियां सीमित कर दी गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका से जुड़ी रणनीतिक बातचीत जैसे अहम मामलों में अब अंतिम निर्णय सुप्रीम लीडर के प्रभाव वाली IRGC के हाथों में होगा। सुरक्षा मामलों में कमांडर अहमद वाहिदी की भूमिका भी पहले से अधिक मजबूत बताई जा रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इससे ईरान की आंतरिक राजनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। दोनों देशों के बीच बातचीत की तारीख और स्थान अब तक तय नहीं हो सके हैं। पाकिस्तान और कतर संभावित मेजबान देशों के रूप में सामने आए हैं और दोनों मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने उम्मीद जताई है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दोनों देशों के बीच जल्द कोई सहमति बन सकती है। यदि ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर राहत मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

    इस बीच होर्मुज स्ट्रेट लगातार वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है। ईरान ने दावा किया है कि उसने इस क्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है हालांकि उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि ड्रोन किस देश का था। दूसरी ओर एक लाइबेरियाई मालवाहक जहाज पर हमले की खबर भी सामने आई है जिसमें इंजन रूम में विस्फोट के बाद आग लग गई और एक नाविक लापता बताया गया। समुद्री सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    यमन के हूती विद्रोहियों ने भी सऊदी अरब के नजरीन एयरपोर्ट पर ड्रोन हमला करने का दावा किया है। वहीं लाल सागर में बढ़ते खतरे के कारण कई सऊदी सुपरटैंकरों ने अपना समुद्री मार्ग बदल लिया है। इससे वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान के भीतर सत्ता का संतुलन पूरी तरह सुरक्षा प्रतिष्ठान के पक्ष में जाता है तो विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसका रुख और अधिक कठोर हो सकता है। ऐसे में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। दूसरी ओर यदि वार्ता की कोई सकारात्मक पहल होती है तो इससे पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने का रास्ता भी खुल सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर ईरान के बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और उसके अगले कदम पर टिकी हुई है।

  • जंग के साए में कूटनीति, ट्रंप के दूत से मुलाकात को लेकर ईरानी विदेश मंत्री ने किए चौंकाने वाले दावे

    जंग के साए में कूटनीति, ट्रंप के दूत से मुलाकात को लेकर ईरानी विदेश मंत्री ने किए चौंकाने वाले दावे


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका के साथ हुई बातचीत को लेकर बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ वार्ता ऐसे माहौल में हुई जहां किसी भी समय बमबारी शुरू होने का खतरा बना हुआ था। अराघची के इस बयान ने यह संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद भले जारी रहा हो लेकिन जमीन पर हालात बेहद तनावपूर्ण और अस्थिर बने हुए थे।

    एक साक्षात्कार में अराघची ने कहा कि उन्होंने बातचीत के दौरान विटकॉफ से सवाल किया था कि क्या वह कभी ऐसी वार्ता का हिस्सा बने हैं जहां हर पल हवाई हमले की आशंका बनी रहती हो। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह बातचीत किस स्थान या किस दौर की थी लेकिन उनके बयान से उस समय की गंभीर स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ईरानी विदेश मंत्री का कहना था कि युद्ध जैसे माहौल में भी बातचीत का रास्ता खुला रखना आसान नहीं होता।

    अराघची ने यह भी दोहराया कि ईरान किसी भी तरह के दबाव के सामने झुकने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि तेहरान अपने राष्ट्रीय हितों और परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता केवल दबाव या धमकी के आधार पर नहीं करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की स्थिति की तुलना वेनेजुएला से नहीं की जा सकती और उनका देश बाहरी दबाव में अपने फैसले नहीं बदलेगा।

    रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच पिछले कई महीनों से अलग-अलग स्तर पर बातचीत होती रही है। औपचारिक बैठकों के अलावा दोनों पक्षों के बीच सीधे संदेशों के जरिए भी संपर्क बनाए रखने की कोशिश की गई ताकि तनाव को कम किया जा सके। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और क्षेत्रीय घटनाक्रम ने हालात को और अधिक जटिल बना दिया है।

    इसी बीच क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। अमेरिका ने हाल के दिनों में ईरान से जुड़े कई रणनीतिक ठिकानों पर हवाई कार्रवाई की है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कार्रवाई अपने सैनिकों पर हुए हमलों के जवाब में की गई। दूसरी ओर ईरान ने भी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों और सैन्य हितों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है। कुवैत बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों ने संभावित मिसाइल और ड्रोन हमलों को देखते हुए अपनी वायु रक्षा प्रणाली को हाई अलर्ट पर रखा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती तनातनी अंतरराष्ट्रीय बाजार और तेल आपूर्ति के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है।

    हालांकि कूटनीतिक संपर्क अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि बातचीत और सैन्य टकराव समानांतर रूप से चल रहे हैं। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में दोनों देश तनाव कम करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाते हैं या फिर यह संकट और गहरा होता है।

  • ईरान का सख्त संदेश परमाणु कार्यक्रम पर नहीं होगा समझौता विदेश मंत्री बोले होर्मुज हमारी सबसे बड़ी ताकत

    ईरान का सख्त संदेश परमाणु कार्यक्रम पर नहीं होगा समझौता विदेश मंत्री बोले होर्मुज हमारी सबसे बड़ी ताकत


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक बार फिर बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल ईरान को न तो धमकी देकर झुका सकते हैं और न ही किसी तरह का लालच देकर उसकी नीतियां बदलवा सकते हैं। अराघची ने जोर देकर कहा कि ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया अब समझ चुकी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकतों में से एक है।

    अराघची ने युद्ध के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि हालात इतने गंभीर थे कि सरकार और सेना के शीर्ष अधिकारियों के बीच संपर्क पूरी तरह टूट गया था। संचार व्यवस्था बाधित हो गई थी और कई घंटों तक यह स्पष्ट नहीं था कि कौन सुरक्षित है और कौन नहीं। उनके अनुसार उस समय पूरे नेतृत्व तंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती हालात को समझना और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखना था।

    विदेश मंत्री ने दावा किया कि संघर्ष शुरू होने से पहले कई अंतरराष्ट्रीय माध्यमों से ईरान पर दबाव बनाने और उसे परमाणु कार्यक्रम रोकने के लिए मनाने की कोशिश की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि बातचीत के दौरान विभिन्न प्रस्तावों और प्रलोभनों के जरिए ईरान को अपने रुख से पीछे हटाने का प्रयास हुआ लेकिन तेहरान ने इसे पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। अराघची ने कहा कि ईरान का यूरेनियम संवर्धन किसी सौदे का विषय नहीं है क्योंकि इसके लिए देश ने वर्षों तक आर्थिक प्रतिबंध झेले हैं और कई परमाणु वैज्ञानिकों ने अपनी जान गंवाई है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल एक समुद्री मार्ग नहीं बल्कि ईरान की रणनीतिक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है इसलिए इसकी सुरक्षा और नियंत्रण का वैश्विक ऊर्जा बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अराघची के अनुसार हालिया संघर्ष ने यह दिखा दिया कि इस क्षेत्र में ईरान की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    ईरान के भीतर चल रही राजनीतिक बहस पर भी विदेश मंत्री ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि युद्ध और संघर्ष के बावजूद देश की मूल नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि मित्र और विरोधी दोनों यह स्वीकार कर रहे हैं कि हालिया घटनाओं के बाद ईरान पहले की तुलना में अधिक मजबूत होकर उभरा है। उनके अनुसार कठिन परिस्थितियों ने देश की सैन्य और राजनीतिक क्षमता को और मजबूती दी है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर लंबे समय से चिंता बनी रहती है क्योंकि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर व्यापक असर डाल सकता है। इसी कारण अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस क्षेत्र की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखते हैं।

    अराघची के ताजा बयान से साफ है कि ईरान अपनी रणनीतिक और परमाणु नीतियों पर फिलहाल किसी नरमी के संकेत नहीं दे रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और अमेरिका ईरान संबंधों पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक संवाद और तनाव कम करने के प्रयास पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होंगे।

  • दिल्ली BRICS समिट में ईरान पर फूटा मतभेद, बिना संयुक्त बयान खत्म हुई विदेश मंत्रियों की बैठक

    दिल्ली BRICS समिट में ईरान पर फूटा मतभेद, बिना संयुक्त बयान खत्म हुई विदेश मंत्रियों की बैठक

    नई दिल्ली। BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की दिल्ली में हुई अहम बैठक ईरान मुद्दे पर गहरे मतभेदों के बीच बिना संयुक्त बयान के खत्म हो गई। समिट में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव, पश्चिम एशिया की स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही जैसे मुद्दों पर तीखी चर्चा हुई, लेकिन सदस्य देशों के बीच आम सहमति नहीं बन सकी।

    सूत्रों के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने BRICS देशों से मांग की कि संयुक्त बयान में ईरान पर हुए हमलों की स्पष्ट निंदा की जाए। उन्होंने अमेरिका और इजरायल पर अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने का आरोप लगाया और BRICS से खुला समर्थन मांगा। हालांकि भारत समेत कई सदस्य देशों ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाने की जरूरत बताई।

    बैठक में मौजूद देशों का मानना था कि पश्चिम एशिया के हालात बेहद संवेदनशील हैं और किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से कूटनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसी कारण साझा बयान पर सहमति नहीं बन पाई और अंत में केवल एक “Outcome Statement” जारी किया गया।

    हालांकि ईरान के मुद्दे पर मतभेद सामने आए, लेकिन करीब 60 अहम एजेंडों पर सभी देशों ने एक जैसी राय रखी। इनमें ऊर्जा सहयोग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार, क्लाइमेट एक्शन, वित्तीय कनेक्टिविटी और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे।

    समिट के दौरान S. Jaishankar ने अपने संबोधन में समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों को हर हाल में खुला रखा जाना चाहिए, क्योंकि इन मार्गों पर रुकावट का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

    समिट से इतर जयशंकर और अराघची के बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक भी हुई। दोनों नेताओं ने ईरान-इजरायल तनाव, क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। भारत ने साफ किया कि वह बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव कम करने के पक्ष में है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS मंच पर ईरान मुद्दे पर खुलकर मतभेद सामने आना इस बात का संकेत है कि संगठन के भीतर भी भू-राजनीतिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। इसके बावजूद आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के कई मुद्दों पर सदस्य देशों की एकजुटता कायम दिखाई दी।

  • न्यूक्लियर डील से लेकर सीजफायर बातचीत तक, क्यों माने जाते हैं ईरान के सबसे भरोसेमंद कूटनीतिज्ञ

    न्यूक्लियर डील से लेकर सीजफायर बातचीत तक, क्यों माने जाते हैं ईरान के सबसे भरोसेमंद कूटनीतिज्ञ



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और बातचीत के दौर में एक नाम लगातार सुर्खियों में है अब्बास अराघची। ईरान के विदेश मंत्री अराघची को इस वक्त दोनों देशों के बीच चल रही वार्ताओं का सबसे अहम चेहरा माना जा रहा है। उन्हें एक सख्त लेकिन संतुलित ‘डील मेकर’ के रूप में जाना जाता है, जो जटिल हालात में भी बातचीत को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

    अराघची का कूटनीतिक सफर लंबा और बेहद प्रभावशाली रहा है। उन्होंने 2015 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में हुए ऐतिहासिक ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) की बातचीत में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों और जर्मनी के साथ हुई इस डील में उनका रुख साफ, सख्त और रणनीतिक माना गया था।

    आज के दौर में जब ईरान और अमेरिका के रिश्ते बेहद नाजुक मोड़ पर हैं, अराघची की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। वे न सिर्फ बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि ईरान के हितों को मजबूती से सामने भी रख रहे हैं। जानकार मानते हैं कि उनकी रणनीति ही तय करेगी कि यह वार्ता समझौते तक पहुंचेगी या फिर तनाव और बढ़ेगा।

    अराघची की पहचान एक ऐसे कूटनीतिज्ञ के रूप में है जो बैकडोर डिप्लोमेसी और खुले मंच—दोनों जगह समान दक्षता से काम करते हैं। यही वजह है कि उन्हें ईरान की विदेश नीति का ‘क्राइसिस मैनेजर’ भी कहा जाता है