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  • कुणाल चौधरी ने छात्रों, किसानों और आम जनता के मुद्दों पर सरकार से मांगी जवाबदेही

    कुणाल चौधरी ने छात्रों, किसानों और आम जनता के मुद्दों पर सरकार से मांगी जवाबदेही

    मध्यप्रदेश: कांग्रेस के सचिव कुणाल चौधरी ने इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हुए छात्र-छात्राओं का आभार जताते हुए युवाओं और किसानों से जुड़े कई मुद्दे उठाए। उन्होंने कार्यक्रम की सफलता के लिए राहुल गांधी का भी आभार व्यक्त किया। चौधरी ने कहा कि युवाओं ने अपने भविष्य और अधिकारों से जुड़े सवाल मजबूती से सामने रखे हैं।

    उन्होंने कहा कि इंदौर की अर्थव्यवस्था में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन प्रदेश में पढ़े-लिखे युवा रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और वेतन से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उनका कहना था कि परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी का सीधा असर मेहनत करने वाले विद्यार्थियों और अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ता है।

    चौधरी ने पेपर लीक के मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए बोर्ड बनाने और प्रभावित अभ्यर्थियों को मुआवजा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि युवाओं को बार-बार परीक्षा शुल्क भरकर परीक्षाओं की तैयारी करनी पड़ती है, लेकिन व्यवस्था की गलती सामने आने पर उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।

    उन्होंने कहा कि युवाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने पर कार्रवाई का सामना करने के बजाय उनकी समस्याओं का नीतिगत समाधान मिलना चाहिए। रोजगार और वेतन से जुड़े मामलों में सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

    चौधरी ने भागीरथपुरा मामले और छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत के मुद्दे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने जिम्मेदारी तय करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की। साथ ही ड्रग से जुड़े मामलों में पूरे नेटवर्क की जांच करने तथा किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आने पर जवाबदेही तय करने की बात कही।

    सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि केवल छोटे आरोपियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। प्रशासनिक लापरवाही या सरकारी तंत्र की विफलता सामने आने पर संबंधित अधिकारियों और राजनीतिक स्तर पर भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने सरकारी धन के नुकसान की स्थिति में जिम्मेदार लोगों से उसकी वसूली की मांग की।

    भोपाल के 90 डिग्री ब्रिज से जुड़े मुद्दे पर भी चौधरी ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने कहा कि राजधानी से जुड़े महत्वपूर्ण अधोसंरचना संबंधी सवालों पर जनता को समयबद्ध जानकारी मिलनी चाहिए।

    किसानों के मुद्दे पर उन्होंने सोयाबीन की फसल में मौसम और बीमारी से हुए नुकसान का उल्लेख किया। चौधरी ने पीले मोजेक सहित फसल खराब होने की शिकायतों के बीच तत्काल सर्वे और प्रभावित किसानों को राहत देने की मांग की।

    उन्होंने एक बीघा में 12 क्विंटल सोयाबीन उत्पादन के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति खेतों में जाकर देखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई किसान कम उत्पादन और फसल खराब होने की शिकायत कर रहे हैं।

    सोयाबीन के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर चौधरी ने कहा कि सरकार ने 5,700 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की बात कही है, लेकिन किसानों को इससे कम कीमत पर उपज बेचने की स्थिति क्यों बन रही है। उन्होंने भावांतर योजना के पंजीयन, भुगतान और वास्तविक लाभ को लेकर भी स्पष्टता की मांग की।

    उन्होंने कहा कि सोयाबीन की कटाई शुरू होने से पहले प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे होना जरूरी है। फसल कट जाने के बाद सर्वे होने पर वास्तविक नुकसान का आकलन मुश्किल हो सकता है। चौधरी ने उचित एमएसपी, समय पर सर्वे, फसल नुकसान का मुआवजा और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ सुनिश्चित करने की मांग की।

    चौधरी ने भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा पर भी आरोप लगाए और कहा कि नेताओं को विवाद और विभाजन के बजाय युवाओं, किसानों, रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जवाबदेही और कार्रवाई चाहती है।

  • दिल्ली में भवन गिरने की घटनाओं में कमेंटियां बनी, जांच हुई, पर जवाबदेही अब तक तय नहीं… MCD की व्यवस्था पर उठे सवाल

    दिल्ली में भवन गिरने की घटनाओं में कमेंटियां बनी, जांच हुई, पर जवाबदेही अब तक तय नहीं… MCD की व्यवस्था पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।
    दिल्ली (Delhi) में भवन गिरने के हादसों (Building Collapse Accidents) के बाद जांच समितियां (Inquiry Committees) गठित करने और रिपोर्ट तैयार करने का सिलसिला पुराना है। जांच रिपोर्टों में कई बार एमसीडी की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे और अधिकारियों की लापरवाही सामने आई, लेकिन हर मामले में कार्रवाई का परिणाम एक जैसा नहीं रहा। कहीं अधिकारियों को निलंबित किया गया, कहीं विभागीय कार्रवाई शुरू हुई और कहीं पूरी जिम्मेदारी से ही मुक्त कर दिया गया। इससे हादसों के बाद जवाबदेही तय करने की एमसीडी की व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

    27 सितंबर 2011 को चांदनी महल में इमारत गिरने से सात लोगों की मौत और 23 लोग घायल हुए। एमसीडी की जांच रिपोर्ट में अनधिकृत निर्माण और भवन की उम्र से संरचना कमजोर होने की बात सामने आई। रिपोर्ट में आठ एमसीडी अधिकारियों को अनधिकृत निर्माण की अनुमति देने का दोषी माना गया और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। रिपोर्ट में 30 साल से अधिक पुरानी इमारतों के लिए संरचनात्मक स्थिरता प्रमाणपत्र अनिवार्य करने और खतरनाक भवनों की पहचान के लिए नीति बनाने की सिफारिश भी की गई।

    तीन दिसंबर 2011 को उत्तम नगर में भवन गिरने से चार लोगों की मौत हुई। जांच में सामने आया कि पड़ोसी भूखंड में नींव के पास की गई खोदाई से ढांचे की नींव प्रभावित हुई थी। एमसीडी आयुक्त ने भवन विभाग के सहायक अभियंता और कनिष्ठ अभियंता को निलंबित कर सतर्कता जांच के आदेश दिए। वहीं 30 मार्च 2012 को करोलबाग के प्रसाद नगर में भवन गिरने से चार लोगों की मौत हुई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच में विशेषज्ञों ने हादसे का मुख्य कारण कमजोर संरचनात्मक डिजाइन और कंक्रीट की अपर्याप्त मजबूती बताया। आयोग ने एमसीडी अधिकारियों की लापरवाही, निष्क्रियता और निर्माण रोकने में विफलता को स्पष्ट रूप से दर्ज किया।

    18 जुलाई 2015 को विष्णु गार्डन में भवन गिरने से पांच लोगों की मौत हुई। शुरुआत में एमसीडी ने सीवर लाइन से रिसाव को नींव कमजोर होने का कारण बताया और तीन अभियंताओं को निलंबित किया। बाद की जांच में दो या उससे अधिक अतिरिक्त मंजिलों के निर्माण को लेकर भवन विभाग के जेई, एई और ईई को प्रथमदृष्टया लापरवाही और कर्तव्य में चूक के लिए जिम्मेदार माना गया। हालांकि अतिरिक्त मंजिलें किस अवधि में बनीं, यह निश्चित नहीं हो सका, इसलिए सतर्कता विभाग को आगे जांच की जिम्मेदारी दी गई।

    13 सितंबर 2021 को सब्जी मंडी-मलकागंज में भवन गिरने से दो बच्चों की मौत हुई। एमसीडी की तीन सदस्यीय जांच समिति ने उपायुक्त और तीन अभियंताओं समेत चार अधिकारियों को जिम्मेदार नहीं माना। रिपोर्ट के अनुसार भवन को पहले खतरनाक घोषित नहीं किया गया था। वहीं 30 मई 2026 को सैदुल्लाजाब में भवन गिरने से छह लोगों की मौत हुई और 14 लोग घायल हुए। मजिस्ट्रेट जांच की रिपोर्ट में हादसे को रोके जा सकने योग्य बताया गया। रिपोर्ट में अवैध निर्माण पर कार्रवाई न करने, शिकायतों पर ध्यान न देने और निरीक्षण से जुड़े रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए।

  • रीवा में दिग्विजय सिंह ने संजय गांधी अस्पताल मामले पर किया प्रदर्शन, स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल से इस्तीफे की मांग

    रीवा में दिग्विजय सिंह ने संजय गांधी अस्पताल मामले पर किया प्रदर्शन, स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल से इस्तीफे की मांग


    मध्य प्रदेश:
    के रीवा में कांग्रेस की ओर से आयोजित धरने में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह शामिल हुए। यह प्रदर्शन संजय गांधी अस्पताल में कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत के विरोध में आयोजित किया गया था। धरने के दौरान दिग्विजय सिंह ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए।

    दिग्विजय सिंह देर रात रीवा पहुंचे और जयस्तंभ चौराहे पर चल रहे कांग्रेस के धरने में शामिल हुए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यदि स्वास्थ्य मंत्री को इस मामले के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाएगा तो फिर जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी।

    उन्होंने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री अपने गृह जिले रीवा में भी स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था को बेहतर नहीं कर पा रहे हैं। उनके मुताबिक, जिस अस्पताल को क्षेत्र की प्रमुख स्वास्थ्य संस्था माना जाता है, वहां लगातार गंभीर घटनाएं सामने आना प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।

    संजय गांधी अस्पताल को लेकर उन्होंने कई मुद्दे उठाए। दिग्विजय सिंह ने अस्पताल में कथित तौर पर जीवित व्यक्ति के पोस्टमार्टम की कोशिश के पुराने मामले का उल्लेख करते हुए मौजूदा घटना से इसे जोड़ा। उन्होंने कहा कि एक ओर ऐसी गंभीर लापरवाही के आरोप सामने आते हैं और दूसरी ओर प्रसूता तथा नवजात की मौत जैसी घटनाएं चिंता बढ़ाती हैं।

    दिग्विजय सिंह ने अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सिंग व्यवस्था की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या स्वास्थ्य विभाग में हुई भर्तियों और प्रशिक्षण व्यवस्था में रही खामियों का असर मरीजों को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ रहा है। उन्होंने नर्सिंग भर्तियों में कथित अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए सरकार से व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की मांग की।

    उन्होंने कहा कि वर्ष 2004 से प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और इस दौरान नर्सिंग क्षेत्र में कई विवाद सामने आए हैं। उनके अनुसार, भर्ती प्रक्रिया और स्वास्थ्य संस्थानों की व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा नहीं होने से गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि उनके लगाए आरोपों पर संबंधित पक्ष का जवाब इस घटनाक्रम में सामने नहीं आया है।

    कांग्रेस नेता ने कहा कि पार्टी की लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि मरीजों और आम लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए है। उन्होंने सरकार से स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के साथ जिम्मेदार अधिकारियों और विभागीय स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग की।

    इस बीच कल्पना मिश्रा के पिता भी रीवा के सिरमौर चौराहे पर अलग से धरने पर बैठे हैं। बेटी और नवजात की मौत के मामले में परिवार की ओर से जवाबदेही और न्याय की मांग की जा रही है। दो अलग-अलग स्थानों पर चल रहे धरनों के कारण यह मामला स्थानीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

    रीवा में सामने आए इस घटनाक्रम ने सरकारी अस्पतालों में प्रसूति सेवाओं, चिकित्सकीय निगरानी और नर्सिंग व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। अब मामले में प्रशासनिक स्तर पर होने वाली कार्रवाई और अस्पताल की व्यवस्थाओं की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी। साथ ही, मौत के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी से जुड़े तथ्यों की स्पष्टता जांच और आधिकारिक निष्कर्षों के बाद ही सामने आएगी।

  • संसद परिसर में विपक्षी सांसदों का अनोखा विरोध, पवन खेड़ा के नेतृत्व में सरकार से सदन में जवाब मांगा

    संसद परिसर में विपक्षी सांसदों का अनोखा विरोध, पवन खेड़ा के नेतृत्व में सरकार से सदन में जवाब मांगा

    नई दिल्ली । संसद का मॉनसून सत्र गुरुवार को दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ समाप्त हो गया। सत्र के अंतिम दिन भी विपक्ष और सरकार के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर राजनीतिक टकराव देखने को मिला। कार्यवाही समाप्त होने से पहले विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

    कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने एक खिलौना बंदर को प्रदर्शन का हिस्सा बनाया। इस दौरान सांसदों ने नारे लगाते हुए सरकार पर सदन के भीतर विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं देने का आरोप लगाया। प्रदर्शन के दौरान 56 इंच का छोटा बंदर, जल्दी आओ सदन के अंदर जैसे नारे लगाए गए।

    विपक्षी सांसदों का यह प्रदर्शन संसद के मॉनसून सत्र में लगातार बने रहे राजनीतिक तनाव के बीच हुआ। विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार से चर्चा और जवाब की मांग करता रहा, जबकि सदन की कार्यवाही कई मौकों पर व्यवधान के कारण प्रभावित हुई।

    निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने सत्र के समापन के बाद सरकार पर विपक्ष और जनता से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से बड़ी-बड़ी बातें की गईं, लेकिन छात्रों के मुद्दों, चंदे से जुड़े सवालों और लोगों की आस्था से जुड़े विषयों पर सदन में अपेक्षित चर्चा नहीं हुई।

    पप्पू यादव ने बच्चों से जुड़े मामलों में लाठी और गोली चलने के आरोपों का भी उल्लेख किया और कहा कि सरकार को इन मुद्दों पर जवाब देना चाहिए था। उनके अनुसार, संसद में चर्चा की जिम्मेदारी सरकार की है और विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना तथा जवाब मांगना है।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार चर्चा से बचती रही। विपक्ष की ओर से लगातार मुद्दे उठाए जाने के बावजूद सदन में उन पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उनका जवाब दे।

    राजद सांसद मनोज झा ने भी संसद की कार्यवाही में बार-बार हो रहे व्यवधान को लेकर सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन घटनाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनकी जिम्मेदारी किसकी थी।

    मनोज झा ने पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी जवाबदेही का सवाल उठाया। उनका कहना था कि लोकतंत्र में किसी घटना की जिम्मेदारी तय किए बिना व्यवस्था का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। उन्होंने इस मुद्दे को सीधा और स्पष्ट सवाल बताते हुए सरकार से जवाब की अपेक्षा जताई।

    मॉनसून सत्र के अंतिम दिन लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही समय बाद स्थगित हो गई, जबकि राज्यसभा की कार्यवाही भी बाद में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। इसके साथ ही संसद का यह सत्र समाप्त हो गया।

    सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए। विपक्ष ने जहां विभिन्न मामलों पर तत्काल चर्चा और सरकार की जवाबदेही की मांग की, वहीं सरकार की ओर से भी विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने के आरोप लगाए गए।

    अंतिम दिन संसद परिसर में हुआ खिलौना बंदर वाला प्रदर्शन विपक्ष की सरकार के खिलाफ राजनीतिक रणनीति का एक प्रतीकात्मक हिस्सा रहा। प्रदर्शन के जरिए विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार को सदन के भीतर उठाए गए सवालों का जवाब देना चाहिए और महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा से बचना नहीं चाहिए।

  • अखिलेश यादव ने अमित शाह के संसद में जवाब देने के बयान पर साधा निशाना, कहा देश भाषण सुनने के मूड में नहीं

    अखिलेश यादव ने अमित शाह के संसद में जवाब देने के बयान पर साधा निशाना, कहा देश भाषण सुनने के मूड में नहीं


    नई दिल्ली ।
    समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संसद में विपक्ष के सवालों का जवाब देने संबंधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। बुधवार को सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार की ओर से जवाब देने के लिए समय सीमा तय करना अपने आप में अलोकतांत्रिक है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वास्तविक जवाब देने के बजाय सत्र समाप्त करने की जल्दबाजी में है।

    अमित शाह ने कहा था कि यदि विपक्ष छात्र आंदोलन से जुड़े विषय पर चर्चा के लिए तैयार होता है तो वह संसद में उठाए जाने वाले हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है और चर्चा के दौरान स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

    इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि संसद में जवाब देने के लिए सरकार द्वारा समय-सीमा तय करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना के अनुरूप नहीं है। उनके अनुसार जवाब केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि उसमें सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।

    अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि सरकार जिस समय सीमा में जवाब देने की बात कर रही है, वह वास्तविक उत्तर देने के बजाय एक बयान तक सीमित रह सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती कि विपक्ष के सवालों का विस्तृत जवाब दिया जाए और वह संसद के मौजूदा सत्र को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

    समाजवादी पार्टी प्रमुख ने अपने बयान में जिम्मेदारी और जवाबदेही का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि किसी सरकार की जवाबदेही समय की शर्त से नहीं, बल्कि उसके उत्तरदायित्व और तर्क से तय होती है। उन्होंने छात्र आंदोलन से जुड़े पूरे मामले को गंभीर बताते हुए विस्तृत जवाब की मांग दोहराई।

    दरअसल, 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष लगातार सरकार से सवाल कर रहा है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पैलेट गन और कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता सरकार से स्पष्टीकरण की मांग कर चुके हैं।

    विपक्ष की ओर से इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगा जा रहा है। इसी बीच सरकार की ओर से संसद में चर्चा और जवाब देने की बात कही गई है। अमित शाह ने संकेत दिया है कि यदि विपक्ष छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार होता है तो वह सभी सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं।

    संसद के मौजूदा मानसून सत्र की निर्धारित अवधि 13 अगस्त तक है। ऐसे में विपक्ष के सवालों और सरकार के जवाब को लेकर समय को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि, सदन की कार्यवाही की आवश्यकता होने पर समय सीमा बढ़ाए जाने की संभावना की भी चर्चा है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच अखिलेश यादव का बयान विपक्ष की ओर से सरकार पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है। वहीं, सरकार का कहना है कि वह छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में इस मुद्दे पर चर्चा होती है या नहीं और अमित शाह विपक्ष के आरोपों पर किस तरह जवाब देते हैं।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में आठ राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच पर दिया जोर

    प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में आठ राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच पर दिया जोर

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज और बल प्रयोग के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाओं में तथ्यों की जांच होना आवश्यक है ताकि यह तय किया जा सके कि हिंसा किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार करना भी जरूरी है।

    मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था, लेकिन बाद में हिंसा की स्थिति कैसे बनी, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके पीछे दो संभावनाएं हो सकती हैं। पहली यह कि पुलिस की ओर से आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया हो और दूसरी यह कि प्रदर्शनकारियों के बीच ऐसे तत्व शामिल हो गए हों जिन्होंने जानबूझकर हिंसा भड़काने का प्रयास किया हो। अदालत ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग कानून का उल्लंघन करते हैं तो पुलिस उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन जहां तक संभव हो बल प्रयोग से बचा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे पुलिसकर्मी मौजूद थे जो वर्दी में नहीं थे और उनके पास हथियार भी थे। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इन लोगों ने भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का इस्तेमाल किया।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग भी रखी गई कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रदर्शन में शामिल लोगों की डिजिटल तकनीक के माध्यम से पहचान कर उसे सार्वजनिक करने पर रोक लगाई जानी चाहिए, क्योंकि प्रदर्शन में कई छात्र और नाबालिग भी शामिल थे। अदालत ने इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लेते हुए व्यापक पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता जताई।

    सुनवाई के दौरान बिहार में प्रदर्शन से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया। एक अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वहां कई नाबालिगों, यहां तक कि कम उम्र के बच्चों को भी हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आए हैं। इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जुनैद से जुड़े मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें प्रताड़ित किए जाने की शिकायत है। इस पर केंद्र की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह अलग विषय है और इसे वर्तमान मामले से अलग देखा जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सहित आठ राज्यों को नोटिस जारी किया। इन राज्यों में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, असम, केरल और अन्य संबंधित राज्य शामिल हैं। अदालत ने कहा कि उसके समक्ष विभिन्न राज्यों से ऐसे मामले आए हैं जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन के अधिकार और प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि लाठीचार्ज, पैलेट गन और आंसू गैस के इस्तेमाल से कुछ लोगों, जिनमें मीडिया कर्मी भी शामिल हैं, के घायल होने की बातें सामने आई हैं।

    सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित मामलों की जांच जारी रह सकती है, लेकिन फिलहाल किसी प्रकार की जल्दबाजी में कार्रवाई करने के बजाय पहले तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट मानक और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित करना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

  • दिल्ली छात्र प्रदर्शन पर बॉलीवुड की तीखी प्रतिक्रिया, लाठीचार्ज के बाद सोनू सूद, हुमा कुरैशी और अनुराग कश्यप समेत कई सितारों ने उठाए सवाल

    दिल्ली छात्र प्रदर्शन पर बॉलीवुड की तीखी प्रतिक्रिया, लाठीचार्ज के बाद सोनू सूद, हुमा कुरैशी और अनुराग कश्यप समेत कई सितारों ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली । दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज को लेकर बॉलीवुड के कई कलाकारों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए प्रदर्शन के दौरान हुई झड़पों के बाद अभिनेता, अभिनेत्री और फिल्म निर्माताओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय साझा करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद, संयम और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर बल दिया। कई कलाकारों ने कहा कि युवाओं की आवाज को गंभीरता से सुना जाना चाहिए और किसी भी विवाद का समाधान बातचीत के माध्यम से निकालना अधिक उचित है।

    प्रदर्शन के बाद अभिनेता आयुष शर्मा ने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती केवल चुनावों तक सीमित नहीं होती, बल्कि नागरिकों की बात सुनने और उनकी चिंताओं को समझने में भी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि छात्रों सहित हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है। उनके अनुसार, यदि अंततः छात्रों की मांगों पर विचार किया जाना था तो शुरुआत से ही संवाद का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि अपनी मांग रखने के दौरान छात्रों को आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसी परिस्थितियों का सामना करना दुर्भाग्यपूर्ण है।

    अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने भी इस घटना पर चिंता जताते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान सामने आई तस्वीरें लंबे समय तक लोगों की स्मृति में बनी रहेंगी। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों को धैर्य, बातचीत और परस्पर विश्वास के जरिए सुलझाया जा सकता है। उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने वाले छात्रों और नागरिकों के साहस की सराहना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को सम्मानपूर्वक सुनना आवश्यक है।

    अभिनेता सोनू सूद ने भी इस घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश के छात्रों को कठोर कार्रवाई नहीं, बल्कि सहयोग और विश्वास की आवश्यकता है। वहीं अभिनेत्री भूमि पेडनेकर ने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान हिंसा से नहीं निकल सकता। उन्होंने युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से सुनने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और संवाद की संस्कृति लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। उनके अनुसार, किसी भी आंदोलन का उद्देश्य सकारात्मक बदलाव होना चाहिए और सभी पक्षों को संयम बनाए रखना चाहिए।

    फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने भी पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि कार्रवाई की प्रकृति और उसके प्रभाव पर गंभीरता से विचार किया जाए। उन्होंने अपने संदेश में पुलिस की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक समाज में जवाबदेही और संवेदनशीलता दोनों का समान महत्व है।

    दिल्ली पुलिस के अनुसार प्रदर्शन के दौरान कई बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद कुछ प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार कर संसद की ओर बढ़ने लगे, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई की गई। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई स्थानों पर झड़पें भी हुईं। दूसरी ओर प्रदर्शन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने का प्रयास किया जा रहा था और बल प्रयोग से बचा जा सकता था।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर लोकतांत्रिक विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ फिल्म जगत की ओर से आई टिप्पणियों ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि छात्रों की मांगों और पूरे घटनाक्रम पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

  • जंतर-मंतर से संसद मार्च के बाद गरमाई राजनीति, महुआ मोइत्रा ने धर्मेंद्र प्रधान पर साधा निशाना, NEET विवाद पर विपक्ष ने तेज किए सवाल

    जंतर-मंतर से संसद मार्च के बाद गरमाई राजनीति, महुआ मोइत्रा ने धर्मेंद्र प्रधान पर साधा निशाना, NEET विवाद पर विपक्ष ने तेज किए सवाल

    नई दिल्ली । NEET पेपर लीक विवाद को लेकर देशभर में जारी राजनीतिक और छात्र आंदोलनों के बीच तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और जवाबदेही के मुद्दे को लेकर विपक्ष लगातार केंद्र सरकार को घेर रहा है। इसी क्रम में महुआ मोइत्रा की सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी ने इस विवाद को नई राजनीतिक धार दे दी है। उनके बयान के बाद शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।

    जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए विरोध मार्च के बाद छात्रों और विपक्षी दलों का कहना है कि परीक्षा से जुड़े विवादों ने लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदर्शनकारी लगातार मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी इसी क्रम में प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आई है।

    इसी विवाद के बीच महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को निशाने पर लेते हुए तीखी टिप्पणी की। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा कि शायद शिक्षा मंत्री को इस्तीफा लिखना नहीं आता क्योंकि उन्हें केवल दया याचिका लिखना सिखाया गया है। उनकी इस टिप्पणी के सामने आते ही राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने भी परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग दोहराई।

    विपक्ष का आरोप है कि NEET पेपर लीक विवाद केवल परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ी का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली पर भरोसे से भी जुड़ा हुआ विषय है। उनका कहना है कि लाखों छात्रों ने कठिन मेहनत के साथ परीक्षा की तैयारी की थी और यदि परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो इसका सीधा असर युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है। इसी कारण संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को लगातार उठाया जा रहा है।

    दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होगी। सरकार का दावा है कि परीक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी तथा सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

    इस बीच मानसून सत्र में भी NEET पेपर लीक का मुद्दा प्रमुख राजनीतिक विषय बना हुआ है। विपक्ष सरकार से विस्तृत जवाब और जवाबदेही की मांग कर रहा है, जबकि सरकार जांच प्रक्रिया और कानूनी कार्रवाई का हवाला दे रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना बनी हुई है। वहीं परीक्षा की तैयारी कर रहे लाखों छात्र इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और पारदर्शी जांच के साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की अपेक्षा कर रहे हैं।

  • विदेशी सरजमीं पर लगातार सीरीज गंवाने के बाद बैकफुट पर भारतीय क्रिकेट टीम: 'ऑल इज वेल' के दावे के बीच बोर्ड और मुख्य कोच के फैसलों पर तीखी बहस

    विदेशी सरजमीं पर लगातार सीरीज गंवाने के बाद बैकफुट पर भारतीय क्रिकेट टीम: 'ऑल इज वेल' के दावे के बीच बोर्ड और मुख्य कोच के फैसलों पर तीखी बहस


    नई दिल्ली।
    विदेशी सरजमीं पर भारतीय क्रिकेट टीम के हालिया निराशाजनक प्रदर्शन ने खेल प्रेमियों और खेल विश्लेषकों को चिंता में डाल दिया है। आयरलैंड के खिलाफ मिली झटकों भरी हार के बाद इंग्लैंड दौरे पर भी टी20 और वनडे सीरीज में भारतीय टीम को पराजय का सामना करना पड़ा है। लगातार मिल रही असफलताओं के बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई का रवैया बेहद शांत नजर आ रहा है। बोर्ड की ओर से दिए जा रहे ‘ऑल इज वेल’ के बयानों पर अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर टीम प्रबंधन और मुख्य कोच से इस हार का हिसाब कब मांगा जाएगा।

    भारतीय टीम का हालिया विदेशी दौरा कई मोर्चों पर कमजोरियों को उजागर कर चुका है। आयरलैंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाने वाली टीम के खिलाफ उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाना और फिर इंग्लैंड की मजबूत टीम के सामने पूरी तरह पस्त हो जाना, भारतीय क्रिकेट के गिरते स्तर की ओर इशारा करता है। विशेषकर इंग्लैंड दौरे पर खेली गई टी20 और वनडे सीरीज में न तो भारतीय बल्लेबाजी में गहराई दिखी और न ही गेंदबाजी आक्रमण में वह धार नजर आई, जिसके लिए भारतीय टीम जानी जाती है। महत्वपूर्ण मौकों पर टीम के सीनियर और युवा खिलाड़ियों दोनों ने ही निराश किया है।

    टीम प्रबंधन के फैसलों और रणनीति पर लगातार उंगलियां उठ रही हैं। मुख्य कोच गौतम गंभीर के कार्यकाल में टीम के रणनीतिक बदलावों को लेकर तीखी आलोचना हो रही है। प्लेयिंग इलेवन के चयन में लगातार किए जा रहे प्रयोग, खिलाड़ियों के बल्लेबाजी क्रम में बार-बार बदलाव और फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को नजरअंदाज करने की नीति टीम के संतुलन को बिगाड़ रही है। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि मैदान पर सही समय पर सही फैसले न ले पाने के कारण टीम को बार-बार हार का मुंह देखना पड़ रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात बीसीसीआई का रुख है। अमूमन किसी बड़े दौरे पर हार के बाद बोर्ड सख्त रुख अपनाता है और समीक्षा बैठकें आयोजित करता है, लेकिन इस बार बोर्ड की ओर से सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही है। बोर्ड के अधिकारियों की यह चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। खेल जगत में यह चर्चा तेज है कि जब तक प्रबंधन और कोचिंग स्टाफ की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक प्रदर्शन में सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा।

    भारतीय टीम के इस लचर प्रदर्शन से प्रशंसकों में भारी निराशा व्याप्त है। सोशल मीडिया से लेकर खेल के मंचों तक मुख्य कोच की कार्यप्रणाली और कप्तान के फैसलों की कड़ी समीक्षा की मांग की जा रही है। आगामी बड़ी प्रतियोगिताओं और दौरों को देखते हुए यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो भारतीय क्रिकेट को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या बीसीसीआई वाकई समीक्षा बैठक बुलाकर कड़े कदम उठाता है या फिर ‘ऑल इज वेल’ के आवरण में इन असफलताओं को ढका जाता रहेगा।