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  • बैतूल के मां चंडी दरबार पर बढ़ा विवाद, आदिवासी संगठनों ने मंदिर और जमीन का प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपने की मांग उठाई

    बैतूल के मां चंडी दरबार पर बढ़ा विवाद, आदिवासी संगठनों ने मंदिर और जमीन का प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपने की मांग उठाई


    मध्य प्रदेश ।
    के बैतूल जिले की चिचोली तहसील के गोधना गांव में स्थित मां चंडी दरबार को लेकर विवाद बढ़ गया है। रविवार को जिले के अलग-अलग इलाकों से आदिवासी समुदाय और सामाजिक संगठनों के लोग मंदिर परिसर पहुंचे और प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने गर्भगृह के पास बलि देकर अपना विरोध दर्ज कराया। उनकी प्रमुख मांग है कि मंदिर और उससे जुड़ी जमीन का प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपा जाए, ताकि धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं से जुड़े फैसलों में समुदाय की भागीदारी बनी रहे।

    आदिवासी समाज का कहना है कि मां चंडी दरबार सैकड़ों साल पुराना धार्मिक स्थल है और उसका गहरा संबंध उनकी आस्था तथा परंपराओं से है। समुदाय के लोगों के मुताबिक, मां चंडी को कली कंकाली दाई के नाम से भी जाना जाता है और गोंडवाना शासन के समय से ही उन्हें आदिवासी समाज की आराध्य माना जाता रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मंदिर का संचालन निजी हाथों में जाने के बाद से उनकी नाराजगी बढ़ी है। उनका आरोप है कि नई व्यवस्था के कारण पूजा-पाठ और मंदिर प्रबंधन से जुड़ी पुरानी परंपराओं में बदलाव किए गए हैं।

    मंदिर के संचालन को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के बाद व्यवस्था में बदलाव हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत के आदेश के बाद मंदिर का संचालन स्थानीय यादव परिवार को सौंपा गया। आदिवासी समुदाय का आरोप है कि इसके बाद पहले से चली आ रही पूजा-पाठ की व्यवस्था में परिवर्तन किया गया और पुरानी संचालन समिति को हटा दिया गया। इसके साथ ही पुराने मंदिर के ढांचे को हटाकर नया निर्माण कराया जा रहा है। समुदाय के लोगों का कहना है कि इन बदलावों से उनकी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर असर पड़ रहा है।

    प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि मंदिर और जमीन के प्रबंधन से संबंधित निर्णय ग्राम सभा की भागीदारी से लिए जाएं। उनका कहना है कि स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़े विषयों में समुदाय की राय को महत्व दिया जाना चाहिए। आदिवासी समाज के मुताबिक, हर रविवार और बुधवार को मां चंडी दरबार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में मंदिर की पूजा व्यवस्था और परंपराओं को लेकर होने वाले फैसलों में स्थानीय समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है।

    आदिवासी संगठनों ने अपनी मांग के समर्थन में पेसा कानून और वनाधिकार कानून का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इन कानूनों में आदिवासी परंपराओं और अधिकारों की रक्षा से संबंधित प्रावधान हैं। समुदाय के लोग हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कह रहे हैं, लेकिन उनका आरोप है कि मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की ओर से जरूरी तथ्य अदालत के सामने नहीं रखे गए। यह आरोप आदिवासी समाज की ओर से लगाया गया है।

    दूसरी ओर, मंदिर के संचालन से जुड़े विवाद में यादव परिवार की जमीन होने की बात भी सामने आई है। विवाद बढ़ने के बाद परिवार ने सहयोग करने की बात कही है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में परिवार की ओर से सहयोग के स्वरूप या प्रबंधन को ग्राम सभा को सौंपने की मांग पर किसी विस्तृत निर्णय का उल्लेख नहीं है।

    मां चंडी दरबार को लेकर विवाद का मुख्य केंद्र मंदिर की संचालन व्यवस्था, जमीन के प्रबंधन और पारंपरिक पूजा-पद्धति में बदलाव का मुद्दा है। आदिवासी और सामाजिक संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे मंदिर और जमीन के प्रबंधन में ग्राम सभा की भागीदारी चाहते हैं। फिलहाल, इस मांग और उससे जुड़े आरोपों के बीच मंदिर के संचालन को लेकर विवाद बना हुआ है।

  • बुधनी में आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर कार्रवाई से भड़के शिवराज सिंह चौहान, अफसरों पर बरसे और मुख्यमंत्री मोहन यादव से की बात

    बुधनी में आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर कार्रवाई से भड़के शिवराज सिंह चौहान, अफसरों पर बरसे और मुख्यमंत्री मोहन यादव से की बात

    मध्य प्रदेश। के बुधनी क्षेत्र के कुसमी गांव में आदिवासी परिवारों के घरों पर वन विभाग की बुलडोजर कार्रवाई के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कड़ी नाराजगी जताई है। गांव पहुंचकर उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और उनकी परेशानियां सुनीं। वहां घरों के टूटने और फसलों को नुकसान पहुंचने की स्थिति देखकर शिवराज अधिकारियों पर भड़क गए। उन्होंने कार्रवाई करने वाले अधिकारियों के रवैये पर सवाल उठाते हुए उनके खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की। इस घटना के बाद प्रदेश में प्रशासनिक कार्रवाई और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

    शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उनके क्षेत्र में अन्याय और जुल्म की हद पार कर दी गई है। उन्होंने गांव की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि जिन घरों में सुबह तक परिवार रह रहे थे और बच्चों की आवाजें सुनाई दे रही थीं, वहां अब बच्चों की चीखें गूंज रही हैं। उनके मुताबिक, घरों को गिरा दिया गया और फसलें भी दब गईं। उन्होंने प्रभावित महिलाओं के रोने और परिवारों की पीड़ा का उल्लेख करते हुए कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को संवेदनहीन बताया।

    गुस्से में शिवराज ने संबंधित अधिकारियों के लिए बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया और उन्हें ‘नरपिशाच’ तक कह दिया। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले की जानकारी वह मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने रखेंगे। शिवराज की मांग है कि जिन अधिकारियों ने यह कार्रवाई की, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में इस तरह की घटना दोबारा न हो। उन्होंने इस मामले को केवल प्रशासनिक कार्रवाई का विषय नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के साथ हुए व्यवहार से जुड़ा गंभीर मामला बताया।

    घटना के बाद शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री मोहन यादव और भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से फोन पर बात की। उन्होंने दोनों नेताओं को घटनाक्रम की जानकारी दी। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इस बातचीत के बाद सरकार या प्रशासन की ओर से लिए गए किसी अंतिम निर्णय का उल्लेख नहीं है। फिलहाल शिवराज की नाराजगी और अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग इस मामले के प्रमुख पहलू बने हुए हैं।

    इस घटनाक्रम ने शिवराज सिंह चौहान की वर्तमान राजनीतिक भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2023 से पहले तक वह मध्य प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री के रूप में सक्रिय थे। उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व की पहचान आम लोगों से जुड़ाव, ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच और महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाने वाले नेता के रूप में रही। कभी उन्हें ‘पांव-पांव वाले भैया’ के नाम से जाना गया, तो कभी लाड़ली बहनों के भाई के रूप में उनकी छवि सामने आई। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने आम लोगों के बीच अपनी सहज उपस्थिति बनाए रखने की कोशिश की थी।

    अब बुधनी और विदिशा से जुड़े सांसद के रूप में उनकी भूमिका के बीच कुसमी की घटना पर उनकी तीखी प्रतिक्रिया चर्चा का विषय बनी है। सवाल यह उठ रहा है कि उनकी नाराजगी केवल अधिकारियों की कार्यशैली तक सीमित है या इसके राजनीतिक मायने भी हैं। कांग्रेस इस घटनाक्रम को शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री मोहन यादव के बीच संभावित मतभेदों से जोड़कर देख रही है। हालांकि, दोनों नेताओं के बीच किसी टकराव की पुष्टि करने वाली जानकारी सामने नहीं आई है।

    बुधनी शिवराज सिंह चौहान का लंबे समय तक राजनीतिक आधार रहा है, जहां से वह लगातार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। ऐसे में इसी क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के घरों पर हुई कार्रवाई के बाद उनका खुद गांव पहुंचना और अधिकारियों के खिलाफ खुलकर बोलना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। अब इस मामले में आगे की प्रशासनिक कार्रवाई और प्रभावित परिवारों को लेकर उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रहेगी।