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  • खाद्य सुरक्षा पर सवाल, देश में 1.85 लाख नमूने फेल, राजस्थान में सिर्फ 31 मामलों में दोषियों को सजा

    खाद्य सुरक्षा पर सवाल, देश में 1.85 लाख नमूने फेल, राजस्थान में सिर्फ 31 मामलों में दोषियों को सजा

    नई दिल्ली ।देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट रोकने के लिए की जा रही कार्रवाई के आंकड़े खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती दिखाते हैं। वर्ष 2025-26 में देशभर में 2,23,808 खाद्य नमूनों की जांच की गई। इनमें 40,023 नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके बावजूद दोषियों को सजा मिलने वाले मामलों की संख्या 1,918 रही। यानी जांच में खामियां सामने आने के मुकाबले सजा तक पहुंचने वाले मामले काफी कम हैं।

    पिछले पांच वर्षों के आंकड़े भी इसी स्थिति की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच देशभर में 8.86 लाख खाद्य नमूनों की जांच हुई। इनमें 1,85,780 नमूने फेल पाए गए। इन मामलों में 1,39,507 का निपटारा जुर्माना लगाकर किया गया, जबकि केवल 6,203 मामलों में दोषियों को सजा सुनाई गई। इससे स्पष्ट होता है कि खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के अलग-अलग परिणाम सामने आए हैं।

    सजा की दर में पिछले वर्षों के दौरान कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह अब भी पांच प्रतिशत से कम है। वर्ष 2021-22 में 32,935 नमूने फेल हुए और 671 मामलों में सजा हुई। अगले वर्ष 44,626 नमूनों के फेल होने पर 1,188 मामलों में दोषियों को सजा मिली। वर्ष 2023-24 में सजा की दर 3.4 प्रतिशत और 2024-25 में 3.7 प्रतिशत रही। वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई।

    राजस्थान के आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं। वर्ष 2025-26 में राज्य में 17,325 खाद्य नमूनों की जांच की गई, जिनमें 4,594 नमूने फेल पाए गए। यह कुल जांचे गए नमूनों का 26.5 प्रतिशत है। फेल नमूनों की संख्या के मामले में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि, राज्य में केवल 31 मामलों में दोषियों को सजा मिली। फेल नमूनों की संख्या के मुकाबले यह दर एक प्रतिशत से भी कम है।

    मध्य प्रदेश में भी स्थिति में सुधार की जरूरत दिखाई देती है। वर्ष 2025-26 के दौरान राज्य में फेल हुए खाद्य नमूनों के करीब चार प्रतिशत मामलों में ही सजा हुई। यह राष्ट्रीय औसत 4.8 प्रतिशत से कम है। ऐसे में राज्य में खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच, कानूनी प्रक्रिया और दोषियों को सजा दिलाने की व्यवस्था पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

    छत्तीसगढ़ में इसी अवधि के दौरान 2,065 खाद्य नमूनों की जांच हुई। इनमें 214 नमूने फेल पाए गए, जो कुल नमूनों का लगभग 10.4 प्रतिशत है। हालांकि, नमूनों के फेल होने की दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक बनी रहती है।

    दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में खाद्य नमूनों के फेल होने का आंकड़ा काफी अधिक रहा। वर्ष 2025-26 में वहां 39,519 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 20,427 फेल मिले। यह कुल नमूनों का 51.7 प्रतिशत है। इसके बावजूद राज्य में 342 मामलों में ही सजा हुई। हरियाणा में 31 प्रतिशत और झारखंड में 27.8 प्रतिशत नमूने फेल हुए। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 17.4 प्रतिशत और पंजाब में 13.2 प्रतिशत रहा।

    कुछ राज्यों में दोषियों को सजा मिलने की दर बेहतर दर्ज की गई। तमिलनाडु में 3,984 फेल नमूनों के मुकाबले 857 मामलों में सजा हुई, जबकि केरल में 1,863 फेल नमूनों के मुकाबले 330 मामलों में दोषियों को सजा मिली। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, गोवा, असम, बिहार और पुडुचेरी में दिए गए आंकड़ों के अनुसार किसी मामले में सजा दर्ज नहीं हुई।

    दूध और डेयरी उत्पादों की जांच भी चिंता का विषय है। वर्ष 2025-26 में इनके 39,351 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 14,668 फेल मिले। यानी लगभग 37.3 प्रतिशत नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। दूध रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तु है, इसलिए इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

    खाद्य सुरक्षा कानून, 2006 के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने और जेल का प्रावधान है। असुरक्षित खाद्य पदार्थ से गंभीर नुकसान होने पर छह साल तक की कैद और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि असुरक्षित भोजन से किसी की मौत होती है, तो उम्रकैद और कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।

    हालांकि, हर फेल नमूना मिलावट का मामला नहीं होता। इसमें असुरक्षित खाद्य पदार्थ, निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले उत्पाद और गलत लेबल वाले सामान भी शामिल हो सकते हैं। सरकार के मुताबिक, करीब 98 प्रतिशत खाद्य कारोबारी राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

    खाद्य पदार्थों की निगरानी के लिए वर्ष 2025-26 में देशभर में 5,20,566 निरीक्षण किए गए। वर्ष 2024-25 में 4,01,391 और 2023-24 में 3,57,072 निरीक्षण हुए थे। पिछले पांच वर्षों में 4,461 लाइसेंस निलंबित और 11,493 लाइसेंस रद्द किए गए। इन आंकड़ों के बीच सबसे अहम चुनौती यह है कि जांच में खामी मिलने के बाद मामलों का प्रभावी निपटारा हो और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ समय पर कानूनी कार्रवाई हो।

  • दूध खरीदने से पहले ऐसे पहचानें संभावित मिलावट, बुलबुले और झाग देखकर शुरुआती जांच करने का तरीका जानिए

    दूध खरीदने से पहले ऐसे पहचानें संभावित मिलावट, बुलबुले और झाग देखकर शुरुआती जांच करने का तरीका जानिए

    नई दिल्ली । दूध भारतीय खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक बड़ी संख्या में लोग रोजाना दूध या उससे बने उत्पादों का सेवन करते हैं। दूध को कैल्शियम और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है, लेकिन बाजार में मिलावट की चिंता के कारण इसकी गुणवत्ता को लेकर सावधानी बरतना भी जरूरी है। पानी के अलावा कुछ मामलों में दूध में डिटर्जेंट जैसे पदार्थ मिलाए जाने की आशंका भी सामने आती रही है।

    दूध में मिलावट होने पर उसकी बनावट, स्वाद और झाग बनने के तरीके में अंतर दिखाई दे सकता है। हालांकि केवल देखने या स्वाद से किसी दूध को मिलावटी घोषित करना सही नहीं है। इसी वजह से खाद्य सुरक्षा से जुड़ी संस्था ने दूध में डिटर्जेंट की संभावित मौजूदगी का शुरुआती संकेत पाने के लिए एक आसान घरेलू तरीका बताया है। इस जांच के लिए किसी महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं होती।

    घरेलू स्तर पर जांच करने के लिए सबसे पहले एक साफ छोटे गिलास में करीब 5 से 10 मिलीलीटर दूध लें। इसके बाद गिलास में मौजूद दूध को अच्छी तरह और तेजी से हिलाएं। कुछ देर तक दूध को हिलाने के बाद उसके ऊपर बनने वाले झाग और बुलबुलों को ध्यान से देखें। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि झाग कितनी मात्रा में बन रहा है और कितनी देर तक बना रहता है।

    यदि दूध को हिलाने के बाद थोड़े बुलबुले बनते हैं और वे जल्दी खत्म हो जाते हैं तो इसे सामान्य स्थिति का संकेत माना जा सकता है। दूसरी ओर, यदि दूध को हिलाने पर काफी मात्रा में झाग बनता है और वह लंबे समय तक बना रहता है तो डिटर्जेंट या किसी अन्य सर्फैक्टेंट की मौजूदगी की आशंका हो सकती है। ऐसे पदार्थ दूध में झाग को ज्यादा स्थिर बना सकते हैं।

    इसका कारण दूध और डिटर्जेंट के रासायनिक गुणों में अंतर है। सामान्य दूध को हिलाने पर हवा के छोटे बुलबुले बन सकते हैं, लेकिन वे अपेक्षाकृत जल्दी टूट जाते हैं। डिटर्जेंट में मौजूद सर्फैक्टेंट सतही तनाव को कम कर सकते हैं। इसके कारण बुलबुलों के आसपास एक स्थिर परत बन सकती है और झाग अपेक्षाकृत अधिक समय तक दिखाई दे सकता है।

    फिर भी इस घरेलू तरीके को अंतिम या प्रमाणित मिलावट जांच नहीं माना जाना चाहिए। दूध को हिलाने पर झाग बनने की मात्रा कई अन्य परिस्थितियों से भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए यदि इस परीक्षण के बाद दूध की गुणवत्ता को लेकर संदेह बना रहता है तो उसे प्रयोगशाला जांच के लिए भेजना अधिक भरोसेमंद तरीका है। घरेलू परीक्षण को केवल शुरुआती संकेत के रूप में देखना चाहिए।

    दूध खरीदते समय भी कुछ सावधानियां बरतकर मिलावट या खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद से बचने की कोशिश की जा सकती है। पैकेट वाला दूध खरीदते समय पैकिंग की सील, लेबल, निर्माण और उपयोग की तारीख तथा अन्य जरूरी जानकारी जरूर देखें। पैकेट फटा हुआ हो, सील से छेड़छाड़ दिखाई दे या पैकिंग असामान्य लगे तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है।

    दूध को खरीदने के बाद निर्धारित तापमान पर रखना भी जरूरी है। पैकेट पर दिए गए भंडारण संबंधी निर्देशों का पालन करें और उपयोग से पहले उसकी स्थिति जांच लें। भरोसेमंद विक्रेता या निर्धारित मानकों का पालन करने वाले उत्पाद को प्राथमिकता देना भी सुरक्षित विकल्प हो सकता है। दूध की शुद्धता को लेकर गंभीर संदेह होने पर घरेलू जांच पर निर्भर रहने के बजाय प्रमाणित खाद्य जांच सुविधा से परीक्षण कराना सबसे उचित तरीका है।

  • त्योहारी सीजन में बढ़ी मावे की मांग, खरीदारी से पहले रंग, खुशबू और बनावट देखकर ऐसे करें गुणवत्ता की शुरुआती पहचान

    त्योहारी सीजन में बढ़ी मावे की मांग, खरीदारी से पहले रंग, खुशबू और बनावट देखकर ऐसे करें गुणवत्ता की शुरुआती पहचान

    नई दिल्ली ।त्योहारों का मौसम शुरू होते ही मिठाइयों और उनसे जुड़े खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने लगती है। इस दौरान मावे का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में किया जाता है, क्योंकि कई पारंपरिक मिठाइयों में यह प्रमुख सामग्री होती है। मांग बढ़ने के साथ बाजार में घटिया या मिलावटी मावे की बिक्री की आशंका भी बढ़ सकती है। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए मावा खरीदते समय सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है।

    मावा खरीदते समय सबसे पहले उसके रंग और बनावट पर ध्यान दिया जा सकता है। सामान्य तौर पर अच्छी गुणवत्ता वाला मावा हल्के क्रीम या सफेद रंग का दिखाई देता है और उसकी बनावट अपेक्षाकृत नरम होती है। यदि मावा जरूरत से ज्यादा चमकदार, असामान्य रूप से सफेद या बहुत अलग रंग का नजर आए तो सावधानी बरतनी चाहिए।

    मावे को हल्के हाथ से दबाकर उसकी बनावट का शुरुआती अंदाजा भी लगाया जा सकता है। यदि वह बहुत ज्यादा रबड़ जैसा, असामान्य रूप से सख्त या बनावट में अलग महसूस हो तो उसे खरीदने से पहले अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। हालांकि केवल रंग और बनावट देखकर मावे को पूरी तरह असली या नकली घोषित नहीं किया जा सकता।

    मावे की खुशबू भी शुरुआती जांच में मदद कर सकती है। सामान्य मावे में दूध जैसी हल्की और प्राकृतिक गंध होती है। यदि उसमें तेज रासायनिक, साबुन जैसी या दूसरी असामान्य गंध महसूस हो तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है। हालांकि खुशबू भी गुणवत्ता की अंतिम पुष्टि का आधार नहीं है।

    यदि किसी विश्वसनीय दुकान पर मावा चखने की अनुमति हो तो बहुत थोड़ी मात्रा से स्वाद का अंदाजा लगाया जा सकता है। सामान्य मावे में दूध जैसा स्वाद और हल्की प्राकृतिक मिठास रहती है। कड़वा, साबुन जैसा या किसी अन्य तरह का असामान्य स्वाद मिलने पर उसे नहीं खरीदना चाहिए। बहुत अधिक मीठा स्वाद भी सावधानी का संकेत हो सकता है।

    मावे में स्टार्च जैसी मिलावट की शुरुआती जांच के लिए आयोडीन आधारित घरेलू परीक्षण का इस्तेमाल किया जाता है। थोड़े से मावे को पानी के साथ गर्म करने के बाद ठंडा किया जा सकता है और फिर आयोडीन की कुछ बूंदें डाली जाती हैं। मिश्रण का रंग नीला या नीला-काला होने पर उसमें स्टार्च मौजूद होने की संभावना हो सकती है। यह केवल प्रारंभिक संकेत है, इसे मिलावट का पक्का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

    मावा खरीदते समय उसकी कीमत पर भी ध्यान देना जरूरी है। यदि कोई उत्पाद बाजार की सामान्य कीमत की तुलना में असामान्य रूप से सस्ता मिल रहा है तो उसकी गुणवत्ता को लेकर सतर्क रहना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि मावा भरोसेमंद दुकान या डेयरी से ही खरीदा जाए।

    पैक्ड मावा खरीदते समय पैकेट की पैकिंग, तारीख और उत्पाद से जुड़ी जरूरी जानकारी अवश्य देखनी चाहिए। पैकेट फटा हुआ हो या उत्पाद की स्थिति संदिग्ध लगे तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है। किसी भी तरह का संदेह होने पर मावे का सेवन न करना ही सुरक्षित विकल्प है।

    त्योहारों के दौरान मिठाइयों और मावे की बढ़ती मांग के बीच उपभोक्ताओं की सावधानी सबसे महत्वपूर्ण है। घरेलू तरीकों से केवल शुरुआती संकेत मिल सकते हैं, जबकि किसी खाद्य पदार्थ की वास्तविक मिलावट की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जांच अधिक विश्वसनीय मानी जाती है। इसलिए खरीदारी में गुणवत्ता, स्रोत और पैकेजिंग को प्राथमिकता देना जरूरी है।

  • E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस

    E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस


    नई दिल्ली ।
    देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चल रही चर्चाओं और उपभोक्ताओं की शिकायतों के बीच केंद्र सरकार ने फ्यूल की गुणवत्ता को लेकर सख्त रुख अपनाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पेट्रोल में मिलावट, सप्लाई व्यवस्था में लापरवाही या गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। मंत्रालय ने ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है और स्पष्ट किया है कि सरकार की नीति इस विषय में पूरी तरह जीरो टॉलरेंस की है।

    सरकार का कहना है कि यदि किसी वाहन में ईंधन भरवाने के बाद तकनीकी समस्या सामने आती है तो हर मामले के लिए E20 पेट्रोल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। मंत्रालय के अनुसार, कई बार पेट्रोल की गुणवत्ता में कमी, भंडारण व्यवस्था की खामियां, सप्लाई चेन में गड़बड़ी या ईंधन में मिलावट जैसी वजहों से वाहन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए जांच का केंद्र वास्तविक कारण होना चाहिए, न कि मानकों के अनुरूप तैयार किए गए E20 ईंधन पर सीधे सवाल उठाना।

    केंद्र ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया है कि पेट्रोल पंपों, भंडारण केंद्रों और वितरण व्यवस्था की नियमित निगरानी की जाए। यदि कहीं ईंधन में मिलावट, रखरखाव में लापरवाही या गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए। हालांकि सरकार ने यह जानकारी साझा नहीं की है कि अब तक किन राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं या कितनी कार्रवाई की गई है।

    सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किया गया E20 पेट्रोल सुरक्षित है और इसका उद्देश्य स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना है। मंत्रालय के अनुसार, सही गुणवत्ता वाले E20 पेट्रोल से सामान्य परिस्थितियों में वाहनों को नुकसान नहीं होना चाहिए। यदि कहीं वाहन में खराबी आती है तो उसके पीछे फ्यूल की गुणवत्ता या वितरण प्रक्रिया से जुड़ी अन्य कमियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

    इधर, पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर कई वाहन मालिकों ने E20 पेट्रोल को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। कुछ लोगों ने दावा किया है कि इस ईंधन के उपयोग के बाद उनकी कार या बाइक का माइलेज कम हुआ है, जबकि कुछ ने इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने, ईंधन प्रणाली पर असर पड़ने और वाहन के बीच रास्ते में बंद होने जैसी शिकायतें भी सामने रखी हैं। इन दावों के कारण आम उपभोक्ताओं के बीच E20 पेट्रोल को लेकर भ्रम और आशंकाएं बढ़ी हैं।

    इस मुद्दे ने राजनीतिक स्वरूप भी ले लिया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने E20 पेट्रोल के विरोध में ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। उन्होंने लोगों से इस अभियान से जुड़ने की अपील करते हुए कहा है कि सरकार को वाहन मालिकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए और उन्हें विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। उनका आरोप है कि पर्याप्त तैयारी के बिना E20 पेट्रोल को लागू किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में लोग माइलेज घटने और वाहन संबंधी समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं।

    केंद्र सरकार का कहना है कि स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण ईंधन उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से राज्यों को निगरानी मजबूत करने, मिलावट रोकने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे और ईंधन की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।