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  • पीएम-आशा से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य, डिजिटल खरीद व्यवस्था ने बढ़ाई पारदर्शिता और भुगतान प्रक्रिया की रफ्तार

    पीएम-आशा से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य, डिजिटल खरीद व्यवस्था ने बढ़ाई पारदर्शिता और भुगतान प्रक्रिया की रफ्तार

    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी पीएम-आशा योजना किसानों को उनकी कृषि उपज का बेहतर मूल्य दिलाने और मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री रोकने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है। योजना के तहत खरीद व्यवस्था, मूल्य स्थिरीकरण और बाजार हस्तक्षेप को मजबूत करने के साथ किसानों तक सरकारी समर्थन पहुंचाने पर जोर दिया गया है।

    पीएम-आशा के अंतर्गत दलहन, तिलहन और खोपरा जैसी प्रमुख कृषि उपज की समय पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थाओं का विस्तार किया गया है। किसानों को स्थानीय स्तर पर अपनी उपज बेचने में सुविधा मिले, इसके लिए अतिरिक्त खरीद केंद्र स्थापित किए गए हैं। इससे बाजार तक पहुंच बढ़ाने और बिक्री प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिली है।

    योजना की खरीद व्यवस्था में नाफेड और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों से निर्धारित व्यवस्था के तहत उपज खरीदी जाती है। इसका उद्देश्य बाजार में कीमतों के दबाव के समय किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उपलब्ध कराना और उन्हें तत्काल कम कीमत पर उपज बेचने से बचाना है।

    सरकार ने पीएम-आशा की खरीद प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल को भी बढ़ाया है। आधार आधारित प्रमाणीकरण के साथ ई-एनएएम, ई-समृद्धि और ई-सम्युक्ति जैसे डिजिटल मंचों का उपयोग खरीद और भुगतान व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए किया जा रहा है। डिजिटल प्रणाली से किसानों की पहचान, खरीद संबंधी रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया को व्यवस्थित करने में सहायता मिल रही है।

    कृषि क्षेत्र में भंडारण और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए कृषि अवसंरचना कोष का समर्थन भी योजना की प्रभावशीलता बढ़ाने में उपयोगी माना गया है। खरीद केंद्रों और कृषि ढांचे के विस्तार से किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

    पीएम-आशा के लिए बजटीय प्रावधान में भी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2024-25 में योजना के तहत वास्तविक व्यय 5,437.99 करोड़ रुपये रहा। वर्ष 2025-26 में इसका बजट बढ़ाकर 6,941.36 करोड़ रुपये किया गया, जबकि 2026-27 के लिए 7,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। बढ़ता आवंटन किसानों की आय सुरक्षा और कृषि मूल्य समर्थन व्यवस्था को मजबूत करने की प्राथमिकता को दर्शाता है।

    फसल उत्पादन लागत और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच अंतर भी किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा के महत्व को स्पष्ट करता है। वर्ष 2026-27 में सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि एमएसपी 2,441 रुपये प्रति क्विंटल है। इस तरह दोनों के बीच 814 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है।

    पीली सोयाबीन के मामले में उत्पादन लागत 3,805 रुपये प्रति क्विंटल और एमएसपी 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है। इसके अलावा गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है।

    जूट के लिए उत्पादन लागत 3,662 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है। इस आधार पर दोनों के बीच 2,293 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर बनता है। सरकार की कोशिश है कि खरीद व्यवस्था, डिजिटल निगरानी और बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले तथा कृषि बाजार में पारदर्शिता और स्थिरता को और मजबूत किया जा सके।

  • सिंधु नदी के पानी पर बढ़ी पाकिस्तान की चिंता, विशेषज्ञ बोले- अनिश्चितता बढ़ी तो कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर

    सिंधु नदी के पानी पर बढ़ी पाकिस्तान की चिंता, विशेषज्ञ बोले- अनिश्चितता बढ़ी तो कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर

    नई दिल्ली । सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव का असर अब पाकिस्तान की जल सुरक्षा, कृषि और पर्यावरण को लेकर चिंता में दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान के विशेषज्ञ अली मेहर ने चेतावनी दी है कि सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े प्रबंधन में अनिश्चितता बढ़ने पर देश के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना है कि मामला केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन, पर्यावरण और करोड़ों लोगों की आजीविका से भी जुड़ा हुआ है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। लंबे समय तक दोनों देशों के बीच युद्ध और तनाव के बावजूद यह समझौता जल बंटवारे और नदी प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में काम करता रहा। हालांकि, पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को लेकर कड़ा रुख अपनाया और इसे निलंबित करने का फैसला किया। इसके बाद पाकिस्तान में इस कदम को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही है।

    पाकिस्तानी विशेषज्ञ अली मेहर के अनुसार, संधि से जुड़ी पुरानी व्यवस्था ने दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद पानी से जुड़े मामलों में एक निश्चित प्रक्रिया बनाए रखी थी। उनके मुताबिक, इस व्यवस्था के कमजोर होने से पानी का प्रबंधन केवल तकनीकी और पर्यावरणीय विषय नहीं रहेगा, बल्कि इसे सुरक्षा और रणनीतिक दबाव के नजरिए से भी देखा जाने लगेगा।

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सिंधु नदी प्रणाली की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश के बड़े कृषि क्षेत्रों की सिंचाई इसी नदी प्रणाली पर निर्भर है। किसानों की फसल, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। ऐसे में नदी के बहाव, जलाशयों के संचालन या पानी से जुड़ी जानकारी में लंबे समय तक अनिश्चितता रहने पर कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।

    विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि सिंधु जल व्यवस्था में केवल पानी की मात्रा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उससे संबंधित सूचनाओं का समय पर मिलना भी जरूरी है। नदी के बहाव, बारिश, जलाशयों के जलस्तर और पानी छोड़े जाने से जुड़ी जानकारी समय पर मिलने पर निचले इलाकों में प्रशासन बाढ़ से निपटने की तैयारी कर सकता है। जानकारी में देरी या कमी होने पर अचानक आने वाली बाढ़ से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

    सिंधु जल प्रणाली का प्रभाव पर्यावरण पर भी पड़ता है। नदी के प्रवाह में बदलाव से जल पारिस्थितिकी, कृषि भूमि और उन क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है जहां स्थानीय समुदाय पानी और नदी आधारित संसाधनों पर निर्भर हैं। बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के बीच पानी की मांग पहले ही बढ़ रही है, इसलिए सीमा पार जल प्रबंधन में स्थिरता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस पूरे विवाद का कानूनी पक्ष भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तानी विशेषज्ञ का मानना है कि पाकिस्तान को इस मामले में कानूनी और रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ना चाहिए। उनका कहना है कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष को मजबूती से रखना चाहिए और साथ ही घरेलू स्तर पर जल प्रबंधन की कमियों को दूर करने पर भी ध्यान देना चाहिए।

    पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि देश में पानी के भंडारण, वितरण और उपयोग से जुड़ी कई समस्याएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में बाहरी जल स्रोतों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता घरेलू जल प्रबंधन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक, भविष्य में सिंधु नदी का महत्व केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा विषय बन सकता है।

    बढ़ती आबादी, कृषि की जरूरतों, पर्यावरणीय दबाव और जलवायु परिवर्तन के बीच सिंधु नदी प्रणाली का स्थायी और पारदर्शी प्रबंधन दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। मौजूदा तनाव के बीच पाकिस्तान में उठ रही चिंताएं इसी व्यापक चुनौती की ओर संकेत कर रही हैं।

  • भोपाल में किसानों का शक्ति प्रदर्शन, राजधानी दो दिन रही थमी, सरकार ने मानी बड़ी मांगें, आंदोलन हुआ खत्म

    भोपाल में किसानों का शक्ति प्रदर्शन, राजधानी दो दिन रही थमी, सरकार ने मानी बड़ी मांगें, आंदोलन हुआ खत्म


    भोपाल । भोपाल में किसानों के आंदोलन ने दो दिनों तक राजधानी की रफ्तार लगभग थाम दी। मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीदी और खाद वितरण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर नर्मदापुरम हरदा सीहोर समेत कई जिलों से आए हजारों किसानों ने ऐसा दबाव बनाया कि आखिरकार सरकार को बातचीत की मेज पर आना पड़ा। किसान एक के बाद एक 22 बैरिकेड पार करते हुए मुख्यमंत्री निवास से महज एक किलोमीटर पहले तक पहुंच गए। उनके सामने केवल तीन बैरिकेड शेष थे। इसी दौरान सरकार ने वार्ता का रास्ता अपनाया और देर रात आंदोलन समाप्त हो गया।

    आंदोलन के चलते रोशनपुरा न्यू मार्केट और मुख्यमंत्री निवास के आसपास का पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। कई स्कूलों में छुट्टी घोषित करनी पड़ी जबकि प्रमुख मार्गों पर स्कूल बसों और गिट्टी से भरे डंपरों को बैरिकेड के रूप में खड़ा कर यातायात रोकने की कोशिश की गई। इसके बावजूद किसानों का काफिला लगातार आगे बढ़ता रहा और पुलिस की अधिकांश रणनीतियां नाकाम साबित हुईं।

    सुबह मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कृषक कल्याण वर्ष के तहत किसानों से संवाद कर समस्याओं का समाधान निकालने की बात कही थी। लेकिन जब प्रदर्शनकारी रोशनपुरा तक पहुंच गए तब सरकार ने कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना विश्वास सारंग और कृष्णा गौर सहित चार मंत्रियों की समिति गठित कर किसान नेताओं से बातचीत शुरू कराई। मंत्रालय में करीब दो घंटे चली चर्चा के बाद सरकार ने कई अहम घोषणाएं कीं।

    सरकार ने मूंग खरीदी की सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का फैसला लिया। इसके साथ ही खाद वितरण की ई टोकन व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया। स्लॉट बुकिंग की अंतिम तिथि 10 अगस्त तक और खरीदी की अंतिम तिथि 20 अगस्त तक बढ़ा दी गई। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में खाद वितरण हाईब्रिड व्यवस्था के तहत किया जाएगा जिसमें आधार नंबर मोबाइल नंबर और वितरण का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज रहेगा।

    हालांकि किसान नेताओं ने कहा कि सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है लेकिन उनकी मूल मांग अब भी पूरी नहीं हुई है। किसानों का कहना है कि उनकी पूरी मूंग की फसल समर्थन मूल्य पर खरीदी जानी चाहिए और वे इस मांग से पीछे नहीं हटेंगे। संगठन के नेताओं ने स्पष्ट किया कि यदि आगे भी जरूरत पड़ी तो आंदोलन दोबारा किया जाएगा।

    इस आंदोलन के दौरान पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए। नर्मदापुरम हरदा इटारसी और भैरूंदा सहित कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश हुई। करीब 60 किसान नेताओं को हिरासत में भी लिया गया लेकिन बाद में उन्हें छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद किसान बड़ी संख्या में भोपाल पहुंचने में सफल रहे और सरकार को अंततः वार्ता के लिए मजबूर होना पड़ा।

    इधर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य सरकार को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि केंद्र ने मध्य प्रदेश को देश में सबसे अधिक 4.54 लाख टन मूंग खरीदी की स्वीकृति दी है। उन्होंने कहा कि पहले स्वीकृत कोटे की पूरी खरीदी की जाए उसके बाद अतिरिक्त कोटे पर विचार किया जाएगा।

    करीब दो दिन तक चले इस आंदोलन के बाद देर रात किसानों ने धरना समाप्त कर दिया और वापस लौटना शुरू किया। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि आंदोलन खत्म होने के बाद गुरुवार से स्कूल और सामान्य यातायात पूर्ववत संचालित होंगे।

  • राजधानी भोपाल बना किसान आंदोलन का केंद्र सड़क पर हवन भोजन और अर्धनग्न प्रदर्शन सीएम हाउस की सुरक्षा कड़ी कई रास्ते बंद

    राजधानी भोपाल बना किसान आंदोलन का केंद्र सड़क पर हवन भोजन और अर्धनग्न प्रदर्शन सीएम हाउस की सुरक्षा कड़ी कई रास्ते बंद


    भोपाल  मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल एक बार फिर किसान आंदोलन का केंद्र बन गई है। मूंग की सरकारी खरीदी ई टोकन व्यवस्था में सुधार न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और अन्य कृषि संबंधी मांगों को लेकर हजारों किसान दूसरे दिन भी आंदोलन पर डटे हुए हैं। संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे इस प्रदर्शन ने अब और उग्र रूप ले लिया है। सरकार का ध्यान अपनी मांगों की ओर खींचने के लिए कई किसान अर्धनग्न होकर धरने पर बैठे हैं जबकि प्रदर्शन स्थल पर सद्बुद्धि यज्ञ का आयोजन कर सरकार से किसानों के हित में निर्णय लेने की प्रार्थना भी की गई।

    किसानों का कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई खेती की बढ़ती लागत और फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। मूंग की पूरी सरकारी खरीदी सुनिश्चित करने ई टोकन प्रणाली को पारदर्शी बनाने और सभी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ दिलाने की मांग लंबे समय से की जा रही है लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। इसी वजह से किसानों ने राजधानी में डेरा डालकर आंदोलन को निर्णायक रूप देने का फैसला किया है।

    धरना स्थल पर किसानों का जीवन भी संघर्ष की मिसाल बन गया है। कई किसान पूरी रात खुले आसमान के नीचे रहे और सुबह जहां जगह मिली वहीं आराम करते नजर आए। दोपहर होते ही कई समूहों ने सड़क किनारे चूल्हे जलाए और दाल बाटी बनाकर सामूहिक भोजन किया। किसानों का कहना है कि वे लंबी लड़ाई के लिए तैयार होकर आए हैं और मांगें पूरी होने तक वापस नहीं लौटेंगे। उन्होंने प्रदेश के जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों के नेताओं को भी प्रदर्शन स्थल पर आकर उनके साथ भोजन करने और उनकी समस्याएं सुनने का निमंत्रण दिया।

    आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। बड़ी संख्या में महिलाएं प्रदर्शन स्थल पर पहुंचीं और हाथों में तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारे लिखे। उन्होंने किसानों के संघर्ष को परिवार और समाज की लड़ाई बताते हुए आंदोलन को अपना समर्थन दिया।

    सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किसानों ने सद्बुद्धि यज्ञ भी किया। यज्ञ के माध्यम से उन्होंने प्रार्थना की कि सरकार किसानों की पीड़ा को समझे और उनकी जायज मांगों को जल्द स्वीकार करे। कई किसानों ने अपनी आर्थिक बदहाली का जिक्र करते हुए कहा कि खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है और यदि समय रहते समाधान नहीं निकला तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।

    किसानों के मुख्यमंत्री आवास घेराव के ऐलान को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। एम्स के पास वीर सावरकर सेतु सहित कई संवेदनशील स्थानों पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। राजधानी के कई प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग कर दी गई है और यातायात को दूसरे रास्तों से मोड़ा जा रहा है। इसके कारण होशंगाबाद रोड एम्स बंसल प्लाजा कटारा हिल्स और आसपास के क्षेत्रों में दिनभर जाम जैसी स्थिति बनी रही जिससे आम लोगों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भोपाल कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने नर्मदापुरम रोड क्षेत्र के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में अवकाश घोषित कर दिया ताकि विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और यातायात पर दबाव कम हो।

    फिलहाल राजधानी में आंदोलन और प्रशासन दोनों आमने सामने की स्थिति में हैं। किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाएगा तब तक आंदोलन जारी रहेगा। वहीं प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी कर रहा है। अब प्रदेश की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार किसानों से बातचीत कर कोई समाधान निकालती है या आंदोलन और तेज होता है।

  • मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का किसानों से सीधा संवाद, प्राकृतिक खेती, आधुनिक तकनीक और सिंचाई योजनाओं पर दिया विकास का नया रोड

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का किसानों से सीधा संवाद, प्राकृतिक खेती, आधुनिक तकनीक और सिंचाई योजनाओं पर दिया विकास का नया रोड

    मध्य प्रदेश। झाबुआ में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेशभर के किसानों से ऑनलाइन संवाद करते हुए कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और आधुनिक बनाने की दिशा में सरकार की विभिन्न योजनाओं और प्राथमिकताओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, आधुनिक तकनीकों के विस्तार और कृषि आधारित रोजगार के नए अवसर विकसित करने के लिए लगातार काम कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में “कृषक कल्याण वर्ष” के अंतर्गत बलराम कृषि महोत्सव-2026 का आयोजन किया जा रहा है। इसकी शुरुआत इंदौर से हुई थी और आगामी दिनों में आलीराजपुर, बड़वानी, खरगौन, बुरहानपुर तथा खंडवा सहित कई जिलों में भी महोत्सव आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने इसे किसानों को नई तकनीकों, सरकारी योजनाओं और विशेषज्ञों की सलाह से जोड़ने का महत्वपूर्ण अभियान बताया।

    डॉ. यादव ने मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताए जाने का उल्लेख करते हुए प्रशासन को किसानों की हरसंभव सहायता के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि किसानों को तीन लाख रुपये तक का कृषि ऋण शून्य प्रतिशत ब्याज पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके अलावा मात्र पांच रुपये में बिजली कनेक्शन देने और डेयरी विकास योजनाओं में 40 लाख रुपये तक की परियोजनाओं पर 33 प्रतिशत अनुदान की व्यवस्था भी की गई है।

    मुख्यमंत्री ने किसानों से आधुनिक कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक सलाह, प्राकृतिक खेती और जल संरक्षण के उपाय अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री के प्राकृतिक खेती अभियान के तहत झाबुआ जिले में 50 कृषि सखियों का चयन किया गया है। वर्तमान में जिले में तीन हजार एकड़ से अधिक क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की जा रही है और किसानों की फसलों का प्रमाणीकरण भी कराया जा रहा है, जिससे उन्हें बाजार में बेहतर अवसर मिल सकें।

    उन्होंने कहा कि “एक जिला-एक उत्पाद” योजना के तहत झाबुआ के कड़कनाथ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास जारी हैं। वर्ष 2025 के दौरान कड़कनाथ पालन से एक हजार से अधिक नए हितग्राहियों को जोड़ा गया। साथ ही पशुपालन, बकरी पालन, डेयरी और मुर्गी पालन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देकर किसानों की नियमित आय सुनिश्चित करने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि जिले में मत्स्य पालन को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। 760 से अधिक तालाबों में लगभग तीन हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मत्स्य उत्पादन किया जा रहा है। वहीं खरीफ-2026 सीजन में कपास की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि धार जिले के बदनावर स्थित पीएम मित्रा पार्क के विकसित होने से झाबुआ के कपास उत्पादकों को खेत से उद्योग तक बेहतर बाजार और मूल्य संवर्धन का लाभ मिलेगा।

    झाबुआ के टमाटर उत्पादन का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जिले में हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में टमाटर की खेती हो रही है। यहां स्थापित प्रसंस्करण इकाई में टमाटर सॉस, केचअप और डिहाइड्रेटेड उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी आपूर्ति देश के कई राज्यों में की जा रही है। इससे किसानों को बेहतर बाजार और अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त हो रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि नर्मदा-झाबुआ-पेटलावद-थांदला माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना पूरी होने पर लगभग 32 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और करीब 50 हजार किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। इससे जल संरक्षण के साथ कृषि उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि बलराम कृषि महोत्सव केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, कृषि तकनीक, प्रसंस्करण, विपणन और कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देने का व्यापक अभियान है। प्रदेश के सभी जिलों में 13 नवंबर तक विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से किसानों को आधुनिक खेती, डिजिटल कृषि सेवाओं, स्मार्ट सिंचाई, ड्रोन तकनीक, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इसके साथ ही उत्कृष्ट किसानों का सम्मान, हितग्राहियों को लाभ वितरण और विभिन्न विभागों की प्रदर्शनी के माध्यम से खेती को अधिक समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जाएगा।

  • मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने देश में खरीफ सीजन की तैयारियों पर असर डालना शुरू कर दिया है। अब तक सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश दर्ज होने के कारण कपास और सोयाबीन जैसी प्रमुख नकदी फसलों की बुआई अपेक्षा से काफी पीछे चल रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो इसका असर कृषि उत्पादन के साथ-साथ उद्योगों पर भी दिखाई दे सकता है।

    कृषि मंत्रालय के 19 जून तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की बुआई 17.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 22.82 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार करीब 5.69 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में कपास बोई गई है। कपास के रकबे में आई यह गिरावट संकेत दे रही है कि किसान फिलहाल इस फसल की ओर कम रुझान दिखा रहे हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि अगले कुछ सप्ताह में कपास की बुआई में तेजी नहीं आई तो कच्चे कपास और यार्न की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे वस्त्र उद्योग की लागत बढ़ने की आशंका है।

    सोयाबीन की सुस्ती से तिलहन क्षेत्र भी प्रभावित

    कपास के साथ-साथ तिलहन फसलों की बुआई भी दबाव में है। इसकी प्रमुख वजह सोयाबीन की धीमी बुआई है। पिछले वर्ष इसी अवधि में सोयाबीन का रकबा 2.50 लाख हेक्टेयर था, जो इस बार घटकर 1.30 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी करीब 1.20 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।

    सोयाबीन के कमजोर प्रदर्शन का असर कुल तिलहन क्षेत्र पर भी पड़ा है। पिछले साल जहां तिलहन फसलों का रकबा 8.11 लाख हेक्टेयर था, वहीं इस बार यह घटकर 7.24 लाख हेक्टेयर रह गया है। हालांकि मूंगफली और सूरजमुखी की खेती में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन वह सोयाबीन की कमी की भरपाई नहीं कर पा रही है।

    धान और बाजरा किसानों की पहली पसंद बने

    इसके विपरीत धान और मोटे अनाजों की बुआई में वृद्धि दर्ज की गई है। धान का रकबा 4.26 लाख हेक्टेयर बढ़कर 12.36 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वहीं बाजरा सहित मोटे अनाजों का क्षेत्रफल 2.14 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.05 लाख हेक्टेयर हो गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धान और मोटे अनाजों में सरकारी खरीद की मजबूत व्यवस्था और अपेक्षाकृत कम जोखिम किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। दूसरी ओर कपास और सोयाबीन में वैश्विक बाजार की अनिश्चितता तथा कीट प्रकोप का खतरा किसानों को सतर्क बना रहा है।

    जल प्रबंधन व्यवस्था पर मूडीज की चिंता

    इस बीच, मूडीज रेटिंग्स ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। एजेंसी का कहना है कि पानी के आवंटन, मूल्य निर्धारण और वितरण से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाएं देश के लिए वित्तीय और क्रेडिट जोखिम पैदा कर रही हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार यदि जल प्रबंधन ढांचे में समय रहते सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में राज्यों की वित्तीय स्थिति और उनकी क्रेडिट रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    खेती में खप रहा 80 फीसदी ताजा पानी

    मूडीज के मुताबिक भारत में पानी की कीमतें विशेष रूप से कृषि क्षेत्र के लिए अत्यधिक रियायती हैं। देश के कुल ताजे जल संसाधनों का लगभग 80 फीसदी हिस्सा खेती में उपयोग हो रहा है। सब्सिडी आधारित व्यवस्था के कारण पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

    एआई और डाटा सेंटर भी बढ़ा रहे दबाव

    रिपोर्ट में एक नए उभरते खतरे की ओर भी संकेत किया गया है। देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार के साथ बड़े पैमाने पर डाटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।

    मूडीज का मानना है कि डाटा सेंटरों की बढ़ती जल मांग पहले से दबाव झेल रही जल आपूर्ति व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकती है। आने वाले वर्षों में सरकारों और यूटिलिटी कंपनियों को इस अतिरिक्त दबाव से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति बनानी होगी।

  • किसानों के लिए राहत की खबर: उर्वरकों की कमी का संकट टला, सरकार ने जारी किए बड़े आंकड़े

    किसानों के लिए राहत की खबर: उर्वरकों की कमी का संकट टला, सरकार ने जारी किए बड़े आंकड़े

    नई दिल्ली। खरीफ सीजन से पहले किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। देशभर में उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चल रही आशंकाओं के बीच केंद्र सरकार ने साफ किया है कि देश में खाद की कोई कमी नहीं है और आपूर्ति पूरी तरह स्थिर बनी हुई है। सरकार का कहना है कि मौजूदा समय में उर्वरकों का भंडार सामान्य जरूरत से काफी अधिक है, जिससे आने वाले महीनों में किसानों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार देश में इस वर्ष उर्वरकों की कुल आवश्यकता लगभग 390 लाख मीट्रिक टन से अधिक रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले मौजूदा समय में 200 लाख मीट्रिक टन से अधिक उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है। यह मात्रा सामान्य मानकों से काफी ज्यादा मानी जा रही है। इससे संकेत मिलते हैं कि खेती के महत्वपूर्ण सीजन में मांग बढ़ने के बावजूद सप्लाई चेन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं पड़ेगा।

    अधिकारियों ने बताया कि वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बावजूद भारत ने घरेलू उत्पादन और आयात दोनों मोर्चों पर मजबूत स्थिति बनाए रखी है। हाल के समय में कई देशों में आपूर्ति संबंधी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन भारत ने पहले से रणनीतिक तैयारी करके संभावित संकट को काफी हद तक नियंत्रित रखा। इसी का परिणाम है कि उर्वरकों की उपलब्धता लगातार बनी हुई है।

    देश में यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य मिश्रित उर्वरकों का उत्पादन भी संतोषजनक स्तर पर रहा है। साथ ही आयात के जरिए भी आपूर्ति को मजबूत किया गया है। सरकार ने आगामी खरीफ सीजन को ध्यान में रखते हुए बड़ी मात्रा में आवश्यक उर्वरकों का स्टॉक पहले ही सुरक्षित कर लिया है। इससे किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने में आसानी होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि खेती के मौसम में उर्वरकों की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक होती है। यदि समय पर खाद नहीं मिले तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में पर्याप्त स्टॉक का होना कृषि क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    सरकार का यह भी कहना है कि उर्वरक उत्पादन में उपयोग होने वाले कच्चे माल की उपलब्धता की लगातार समीक्षा की जा रही है। इससे भविष्य में किसी तरह की आपूर्ति बाधा से बचा जा सकेगा। आने वाले महीनों में मांग बढ़ने की संभावना के बीच प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां भी तेज कर दी गई हैं। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि देश में खाद संकट जैसी स्थिति बनने की आशंका बेहद कम है और किसानों को इस बार पर्याप्त आपूर्ति मिलने की उम्मीद है।

  • प्रयागराज के दशहरी-लंगड़ा आम अब यूएई और ओमान को 50 हजार टन आम निर्यात की तैयारी, किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    प्रयागराज के दशहरी-लंगड़ा आम अब यूएई और ओमान को 50 हजार टन आम निर्यात की तैयारी, किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार



    प्रयागराज। प्रयागराज मंडल के मशहूर दशहरी, लंगड़ा और फजली आम की मिठास अब सिर्फ देश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह अब विदेशों तक अपनी पहचान बनाएगी। इस बार प्रयागराज मंडल से करीब 50 हजार टन आम संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ओमान भेजने की तैयारी की जा रही है, जिससे किसानों और निर्यात कारोबार को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।

    प्रयागराज मंडल के प्रयागराज, प्रतापगढ़ और कौशांबी जिलों में लगभग 2400 से 2500 हेक्टेयर क्षेत्र में आम की बागवानी की जाती है। यहां से हर साल करीब डेढ़ लाख मीट्रिक टन आम का उत्पादन होता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा निर्यात के लिए तैयार किया जाता है। खास बात यह है कि प्रयागराज जिले में अकेले ही 600 से 650 हेक्टेयर में आम की खेती होती है और यहां से लगभग 10 हजार टन से अधिक उत्पादन होता है।

    विदेशी बाजारों में यहां के आमों की मांग लगातार बढ़ रही है। दशहरी, लंगड़ा और फजली किस्मों को उनकी मिठास, सुगंध और गुणवत्ता के कारण खाड़ी देशों में काफी पसंद किया जा रहा है। इसी कारण हर साल लगभग 50 हजार टन आम यूएई और ओमान जैसे देशों में निर्यात किया जाता है।

    इसके साथ ही किसानों का रुझान अब नई प्रजातियों की ओर भी बढ़ रहा है। उद्यान विभाग के अनुसार अंबिका, अरुणिका, मल्लिका और बॉम्बे ग्रीन जैसी नई किस्में कम समय में तैयार होने और बेहतर उत्पादन के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। इन किस्मों की मांग न सिर्फ घरेलू बाजार में बल्कि विदेशों में भी बढ़ रही है।

    निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पैकिंग, ग्रेडिंग और कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। किसानों को बेहतर गुणवत्ता बनाए रखने और सुरक्षित पैकिंग के लिए प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जो खुसरो बाग सहित विभिन्न केंद्रों पर आयोजित किया जाता है।

    कुल मिलाकर, प्रयागराज मंडल के आम अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान मजबूत कर रहे हैं, जिससे किसानों की आय बढ़ने और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद है।

  • कृषि को उत्पादन से प्रॉस्पेरिटी तक ले जाने की दिशा में उत्तर प्रदेश अग्रणी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जोर

    कृषि को उत्पादन से प्रॉस्पेरिटी तक ले जाने की दिशा में उत्तर प्रदेश अग्रणी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जोर


    नई दिल्ली।उत्तर प्रदेश की राजधानी में आयोजित छठी उत्तर प्रदेश कृषि विज्ञान कांग्रेस-2026 के शुभारंभ के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कृषि क्षेत्र के समग्र और दूरदर्शी विकास के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि कृषि को केवल उत्पादन से आगे बढ़ाकर प्रोडक्टिविटी, प्रॉफिटेबिलिटी और अंततः प्रॉस्पेरिटी तक ले जाया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे लाभप्रद, टिकाऊ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संचालित करना आवश्यक है। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश राज्य किसानों के हित और समग्र कृषि विकास में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि तीन दिवसीय इस आयोजन में कृषि के विभिन्न आयामों पर गंभीर विचार-विमर्श होगा, जिसमें जमीनी स्तर के अनुभव, सफल प्रयोग और नवाचार साझा किए जाएंगे। यह मंच केवल चर्चा के लिए नहीं, बल्कि ठोस क्रियान्वयन योजना तैयार करने का माध्यम होना चाहिए, जिससे किसान सीधे लाभान्वित हों। उन्होंने राज्य के कृषि आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश देश की लगभग 16-17 प्रतिशत आबादी का घर है, जबकि यहां केवल 11 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि उपलब्ध है, फिर भी राज्य कुल खाद्यान्न उत्पादन में 21 प्रतिशत का योगदान देता है। योजनाबद्ध प्रयासों और प्रभावी नीतियों के माध्यम से कृषि विकास दर को 8 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग 18 प्रतिशत तक पहुंचाना उल्लेखनीय उपलब्धि है।

    मुख्यमंत्री ने भारत की ऐतिहासिक आर्थिक शक्ति का आधार कृषि बताया और कहा कि एक समय में भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी 44-45 प्रतिशत तक थी, जिसमें सशक्त कृषि तंत्र का योगदान महत्वपूर्ण था। उन्होंने बताया कि पहले किसान सिर्फ उत्पादक नहीं था, बल्कि कारीगर और उद्यमी भी था। समय के साथ यह व्यवस्था कमजोर हुई और किसान केवल कच्चा माल उत्पादक बन गया, जिससे आर्थिक असंतुलन उत्पन्न हुआ।

    उन्होंने आधुनिक तकनीक के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक कृषि को नई दिशा दे सकते हैं। सेंसर आधारित तकनीक से मिट्टी की नमी और पोषण का डेटा प्राप्त कर किसान सटीक निर्णय ले सकते हैं। एआई के माध्यम से फसलों का वास्तविक समय विश्लेषण, रोग पहचान और उत्पादन का पूर्वानुमान संभव है। ड्रोन द्वारा उर्वरक और कीटनाशकों का सटीक छिड़काव तथा सैटेलाइट के माध्यम से मौसम और भूमि की निगरानी कृषि को अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बना रही है। बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग बदलते मौसम के अनुकूल बीज विकसित करने और उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है।

    मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक खेती को दीर्घकालिक समाधान बताते हुए कहा कि यह लागत कम करने के साथ मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण संतुलन भी बनाए रखती है। डिजिटल एग्रीकल्चर प्लेटफॉर्म, वन नेशन-वन मंडी प्रणाली, मंडी शुल्क में कमी और डिजिटल सॉयल हेल्थ कार्ड किसानों को सीधे बाजार, मौसम और मूल्य की जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं।

    उन्होंने पारंपरिक ‘लैब टू लैंड’ मॉडल की जगह ‘लैंड इज लैब’ पर जोर देते हुए कहा कि अब खेतों को ही प्रयोगशाला बनाना होगा, जहां किसान और वैज्ञानिक मिलकर नवाचार स्थापित करें। कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विश्वविद्यालयों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया गया।

    मुख्यमंत्री ने गन्ना क्षेत्र में सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि अब अधिकांश मिलें 6-7 दिनों में भुगतान करती हैं। प्रदेश गन्ना उत्पादन में 55 प्रतिशत का योगदान देता है और एथेनॉल उत्पादन में देश में नंबर वन है। सिंचाई के लिए नलकूप और सोलर पैनल आधारित व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना बीमा योजना और अर्ली वार्निंग सिस्टम जैसे उपाय सुनिश्चित किए गए हैं। 89 कृषि विज्ञान केंद्र किसानों और कृषि विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रहे हैं।

  • मार्कफेड के कायाकल्प की तैयारी 10.80 लाख मीट्रिक टन खाद वितरण का लक्ष्य डिजिटल मैपिंग पर फोकस

    मार्कफेड के कायाकल्प की तैयारी 10.80 लाख मीट्रिक टन खाद वितरण का लक्ष्य डिजिटल मैपिंग पर फोकस

    भोपाल । भोपाल में आयोजित समीक्षा बैठक में सहकारिता मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने मध्यप्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ मार्कफेड की कार्यप्रणाली और गतिविधियों की गहन समीक्षा करते हुए इसे आत्मनिर्भर आधुनिक और व्यावसायिक रूप से सशक्त बनाने पर जोर दिया बैठक में उर्वरक वितरण व्यवस्था वित्तीय प्रबंधन परिसंपत्तियों के उपयोग और संगठनात्मक विस्तार को लेकर विस्तृत चर्चा हुई और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे लक्ष्य आधारित कार्य करते हुए किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें

    मंत्री ने विशेष रूप से कहा कि किसानों को स्थानीय स्तर पर उर्वरक की उपलब्धता में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए इसके लिए भंडारण और वितरण की पूरी व्यवस्था मजबूत की जाए बैठक में जानकारी दी गई कि इस वर्ष 10.80 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों के भंडारण का लक्ष्य रखा गया है जिसमें से 23 मार्च तक 6.70 लाख मीट्रिक टन का भंडारण किया जा चुका है मंत्री ने निर्देश दिए कि शेष लक्ष्य को समय पर पूरा करते हुए किसानों तक खाद की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए

    वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी मंत्री ने गंभीरता दिखाई उन्होंने बैंकों से लिए गए ऋण और लंबित बकाया की शीघ्र वसूली के निर्देश दिए ताकि उर्वरक कंपनियों को भुगतान में कोई बाधा न आए उन्होंने कहा कि संस्था की वित्तीय मजबूती सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और इसके लिए हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है

    परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग के लिए मंत्री ने सभी अचल संपत्तियों की डिजिटल मैपिंग कर उनका विवरण संपदा पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपडेट करने के निर्देश दिए साथ ही इन संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने को कहा गया बैठक में भोपाल जबलपुर ग्वालियर सहित अन्य स्थानों पर बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों को पुनः प्रारंभ करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई उज्जैन स्थित पेट्रोल पंप को तत्काल शुरू करने और प्रमुख स्थानों पर नए व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स तथा पेट्रोल पंप स्थापित करने के निर्देश भी दिए गए

    इसके अलावा ईईसी और एनसीडीसी योजना के अंतर्गत पुराने गोदामों के पुनर्निर्माण को प्राथमिकता देने और संघ के 316 गोदामों जिनकी क्षमता 7.84 लाख मीट्रिक टन है उनका शत प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया मंत्री ने कहा कि इससे न केवल भंडारण क्षमता बढ़ेगी बल्कि वितरण व्यवस्था भी अधिक प्रभावी होगी

    मार्कफेड के समग्र सुधार के लिए गठित विशेष अनुसंधान समिति को 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए साथ ही को ऑपरेशन एमंग को ऑपरेटिव्स के सिद्धांत पर कार्य करते हुए कृषि विपणन आंदोलन को और मजबूत बनाने पर बल दिया गया मंत्री सारंग ने स्पष्ट किया कि मार्कफेड को राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बनाया जाएगा और वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक संस्था की स्थिति का सटीक आकलन भी पूरा कर लिया जाएगा

    यह बैठक इस बात का संकेत है कि सरकार किसानों को बेहतर सुविधाएं देने और सहकारी संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए गंभीरता से प्रयास कर रही है जिससे प्रदेश की कृषि व्यवस्था को नई दिशा मिल सके