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  • मन की बात के 139वें एपिसोड में पीएम मोदी ने गिनाए देशवासियों के प्रयास, खेती से स्वास्थ्य और तकनीक तक की उपलब्धियां

    मन की बात के 139वें एपिसोड में पीएम मोदी ने गिनाए देशवासियों के प्रयास, खेती से स्वास्थ्य और तकनीक तक की उपलब्धियां

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 139वें एपिसोड में देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की ओर से किए जा रहे सामाजिक, पर्यावरणीय और तकनीकी प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 12 साल पहले विजयदशमी के अवसर पर शुरू हुआ यह कार्यक्रम लगातार आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में देशवासियों की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके लिए मन की बात किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है। यह आम लोगों के परिश्रम, साहस, समर्पण और सेवा भावना को समझने के साथ उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है।

    प्रधानमंत्री ने पंजाब में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि खेती विरासत मिशन नाम की संस्था पारंपरिक कृषि पद्धतियों और जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है। पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाने के लिए नव-त्रिन्जन पहल शुरू की गई है। इसके तहत बिना रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के जैविक कपास उगाई जाती है। प्राकृतिक रंगों वाली कपास से धागे और कपड़े तैयार करने में भी मदद मिलती है, जिससे उन्हें रंगने के लिए अलग से रसायनों की जरूरत कम होती है।

    उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में हेवल नदी को पुनर्जीवित करने के लिए स्थानीय लोगों और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों का भी जिक्र किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार, नदी में पानी कम होने लगा था और आसपास के प्राकृतिक जलस्रोत भी सूख रहे थे। इसके बाद नदी को बचाने के लिए अभियान चलाया गया। वर्षा जल को रोकने, जमीन में पानी के पुनर्भरण और बड़े पैमाने पर पौधारोपण जैसे उपाय अपनाए गए। इन प्रयासों से हेवल नदी को फिर से जीवन देने में मदद मिली और कई प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन का रास्ता भी खुला।

    प्रधानमंत्री ने स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की दिशा में हो रहे कामों को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि बिहार के पूर्णिया का मखाना ग्रीस तक पहुंच रहा है, जबकि कर्नाटक के कलबुर्गी की अरहर दाल मालदीव भेजी जा रही है। महाराष्ट्र में आदिवासी समुदायों ने अपने उत्पादों की पैकेजिंग को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया है। शबरी नेचुरल्स के माध्यम से शहद, महुआ, चिरौंजी और बांस से बने उत्पाद बाजार में लाए जा रहे हैं। इनकी पैकेजिंग पर आदिवासी कला की झलक दिखाई देती है, जिसे जापान के प्रतिष्ठित गुड डिजाइन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।

    डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और लक्षद्वीप के उदाहरण दिए। बाराटांग द्वीप में जारवा जनजाति के सात वर्षीय बच्चे ओहो-ताहाने को तेज बुखार और सांस लेने में परेशानी हुई थी। स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों ने ई-संजीवनी के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क किया। बच्चे को निमोनिया होने का पता चला और विशेषज्ञों की निगरानी में उसकी स्थिति में सुधार हुआ।

    इसी तरह, लक्षद्वीप के कल्पेनी में करीब 60 वर्षीय कुन्ही कोया की तबीयत अचानक बिगड़ने पर ई-संजीवनी के जरिए कवरत्ती में मौजूद अनुभवी डॉक्टरों से सलाह ली गई। डॉक्टरों ने स्थानीय चिकित्सा दल को मार्गदर्शन दिया, जिससे मरीज को राहत पहुंचाने में मदद मिली। इन उदाहरणों के जरिए दूरदराज के इलाकों में डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं की उपयोगिता सामने आई।

    प्रधानमंत्री ने आईआईटी मद्रास में स्थापित सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर का भी उल्लेख किया। इस केंद्र ने मस्तिष्क की उच्च रिजॉल्यूशन वाली डिजिटल त्रिआयामी तस्वीरें तैयार करने के लिए एक तकनीकी मंच विकसित किया है। इसका उद्देश्य आने वाले समय में 100 मानव मस्तिष्कों की 3D मैपिंग करना और उनका विस्तृत अध्ययन करना है। इस पहल को मस्तिष्क अनुसंधान और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया।

  • आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, रक्षा और कृषि में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा

    आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, रक्षा और कृषि में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा


    अबिदजान।
    विदेश मंत्री एस जयशंकर (External Affairs Minister S. Jaishankar) ने कहा कि भारत (India) और आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) की साझेदारी आपसी सम्मान पर आधारित है। दोनों देशों की विकास और समृद्धि के लिए साझा प्रतिबद्धता है। जयशंकर ने पश्चिम अफ्रीकी देश की अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति अलासाने औटारा (President Alassane Ouattara) से मुलाकात की। वह तीन अफ्रीकी देशों की यात्रा पर हैं। इसमें घाना, आइवरी कोस्ट और इथियोपिया शामिल हैं।

    जयशंकर बुधवार को घाना से आइवरी कोस्ट पहुंचे थे। यह उनकी तीन देशों की यात्रा का दूसरा पड़ाव है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, आइवरी कोसट के राष्ट्रपति अलासाने औटारा से मुलाकात कर सम्मानित महसूस किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत शुभकामनाएं उन्हें दीं।

    विदेश मंत्री ने कहा, भारत-आइवरी कोस्ट साझेदारी आपसी सम्मान और विकास तथा समृद्धि के लिए साझा प्रतिबद्धता पर आधारित है। उन्होंने राष्ट्रपति औटारा को ‘मजबूत, लंबे समय तक चलने वाली और दोनों के लिए फायदेमंद साझेदारी के अपने दृष्टिकोण को साझा करने’ के लिए धन्यवाद दिया।


    रक्षा सहयोग पर क्या हुई बात?

    बुधवार को जयशंकर ने अबिदजान में आइवरी कोस्ट के उप प्रधानमंत्री तेने बिराहिमा औटारा से भी मुलाकात की। दोनों ने दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर चर्चा की। बैठक के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया पर लिखा, हमने आपसी भरोसे, क्षमता निर्माण और साझा हितों पर आधारित अपने बढ़ते रक्षा सहयोग पर बात की।

    उन्होंने कहा, हमने रक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग को और बढ़ाने के अवसरों पर विचार साझा किए। इसमें प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संस्थागत स्तर पर बढ़े हुए आदान-प्रदान के जरिए सहयोग शामिल है।

    औटारा आइवरी कोस्ट के रक्षा मंत्री भी हैं। उन्होंने कहा कि जयशंकर के साथ बातचीत आइवरी कोस्ट और भारत के बीच सहयोग मजबूत करने पर केंद्रित रही। औटारा ने सोशल मीडिया पर लिखा, यह बैठक शांति, सुरक्षा और विकास के लिए रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की हमारी साझा प्रतिबद्धता को दोहराती है।


    व्यापार और स्वास्थ्य पर भी चर्चा

    जयशंकर ने आइवरी कोस्ट की विदेश मामलों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की राज्य मंत्री नियाले काबा से भी बातचीत की। इसमें दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई। इसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, कृषि और स्वास्थ्य सेवा पर खास ध्यान रहा। जयशंकर ने कहा कि काबा के साथ भारत-आइवरी कोस्ट साझेदारी को आगे बढ़ाने पर ‘व्यापक चर्चा’ हुई। इसमें व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचा, कृषि, स्वास्थ्य सेवा और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध शामिल हैं।

    उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर कहा, मैंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को केंद्र में रखकर होने वाला हमारा सहयोग कोट द’आइवोर की प्राथमिकताओं के अनुसार आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने बहुपक्षीय मंचों पर अपने सहयोग को और गहरा करने पर भी चर्चा की।


    अफ्रीका में क्षमता निर्माण पर जोर

    जयशंकर ने बुधवार को आइवरी कोस्ट में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग यानी आईटीईसी के पूर्व छात्रों से भी बातचीत की। उन्होंने कहा कि भारत की विकास साझेदारी हमेशा से अफ्रीका के साथ उसके संबंधों का अहम हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि भारत का सहयोग उसके अफ्रीकी साझेदारों की जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुसार होना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग यानी आईटीईसी कार्यक्रम 1964 में शुरू हुआ था। यह दूसरे देशों के साथ क्षमता निर्माण और सहयोग के लिए भारत के सबसे महत्वपूर्ण मंचों में से एक बन गया है। जयशंकर ने आइवरी कोस्ट में भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी बातचीत की।

    उनकी यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत अफ्रीकी देशों के साथ अपनी साझेदारी को और मजबूत करना चाहता है। भारत वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। साथ ही व्यापार और निवेश से लेकर क्षमता निर्माण, रक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

  • किसानों को घटिया बीज से बचाने की तैयारी, नए कानून में QR कोड, राष्ट्रीय रजिस्टर और 30 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव

    किसानों को घटिया बीज से बचाने की तैयारी, नए कानून में QR कोड, राष्ट्रीय रजिस्टर और 30 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव


    नई दिल्ली ।
    किसानों को नकली और घटिया गुणवत्ता वाले बीजों से बचाने के लिए केंद्र सरकार नया बीज अधिनियम लाने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित कानून के जरिए करीब 60 साल पुराने मौजूदा कानूनी ढांचे में बदलाव किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, कारोबार में पारदर्शिता बढ़ाने और नकली बीजों के कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार करना है।

    प्रस्तावित कानून में बीज से जुड़े उल्लंघनों को तीन श्रेणियों में बांटने की योजना है। मामूली उल्लंघन करने वालों के लिए पहली बार चेतावनी और दोबारा उल्लंघन पर जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। जानबूझकर किए गए उल्लंघनों में बीज के पैकेट पर QR कोड नहीं लगाना, जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराना और गलत ब्रांडिंग जैसे मामले शामिल किए जाने का प्रस्ताव है।

    ऐसे मामलों में आर्थिक दंड का प्रावधान भी रखा गया है। उपलब्ध प्रस्ताव के अनुसार, कुछ उल्लंघनों के लिए पहली बार 1 लाख रुपये और दूसरी बार 2 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। वहीं गंभीर अपराधों को तीसरी श्रेणी में रखा गया है। इसमें नकली बीज बेचना, बिना पंजीकरण कारोबार करना और जानबूझकर धोखाधड़ी जैसे मामले शामिल हैं। गंभीर उल्लंघनों के लिए 30 लाख रुपये तक का जुर्माना और जेल की सजा का प्रस्ताव है।

    प्रस्तावित कानून के तहत सभी बीज और रोपण सामग्री का राष्ट्रीय रजिस्टर में पंजीकरण अनिवार्य किया जाएगा। बिना पंजीकरण वाले बीजों को अवैध माना जाएगा और उन्हें बाजार में बेचने की अनुमति नहीं होगी। प्रत्येक बीज पैकेट पर QR कोड लगाने का भी प्रस्ताव है। इसके जरिए किसान बीज की उत्पत्ति, निर्माता, प्रयोगशाला से मिली मंजूरी और आपूर्ति श्रृंखला में उसकी आवाजाही से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकेंगे।

    सरकार का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था में लगभग 70 प्रतिशत बीज कानून के दायरे से बाहर हैं। अलग-अलग राज्यों में बीजों से जुड़ी प्रक्रियाएं भी अलग हैं और मौजूदा कानून में दंड के प्रावधान पर्याप्त नहीं माने जा रहे हैं। इसी वजह से नकली और खराब गुणवत्ता वाले बीजों के खिलाफ अधिक प्रभावी कार्रवाई के लिए नए कानून की जरूरत बताई गई है।

    प्रस्तावित कानून में किसानों के पारंपरिक बीज अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही गई है। किसान पारंपरिक और किसान किस्म के बीजों का इस्तेमाल, आदान-प्रदान और बिक्री पहले की तरह कर सकेंगे। ऐसे पारंपरिक बीजों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा। व्यक्तिगत उपयोग, गांव में वितरण या किसी कंपनी के लिए बीज तैयार करने वाले किसानों के लिए डिजिटल पंजीकरण भी जरूरी नहीं होगा।

    नए कानून में ट्रेसबिलिटी को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य बीज फेल होने की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना है। सभी बीज किस्मों को एकीकृत राष्ट्रीय ऑनलाइन रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा। राज्य सरकारों को राज्य स्तरीय समितियों की सिफारिश के आधार पर नई बीज किस्में जारी करने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है।

    किसानों के नुकसान की स्थिति में प्रत्येक राज्य में सीड सिक्योरिटी फंड बनाने का प्रावधान प्रस्तावित है। बीज फेल होने पर सत्यापन समिति जांच करेगी और किसान को 15 दिनों के भीतर मुआवजा देने की व्यवस्था का प्रस्ताव है।

    मौजूदा बीज अधिनियम 1966 में बनाया गया था, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में लागू हुआ था। सरकार ने प्रस्तावित नए कानून पर पिछले साल सुझाव मांगे थे और करीब 18,000 सुझाव प्राप्त हुए। 10 सितंबर को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने 20 किसान संगठनों के साथ परामर्श किया। सरकार के अनुसार, प्रस्तावित सीड बिल संसद के शीतकालीन सत्र में लाया जा सकता है।

  • न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    नई दिल्ली । खेती के लिए आमतौर पर खुली जमीन, धूप, पानी और सही मौसम की जरूरत होती है. लेकिन क्लाइमेट चेंज के दौर में यही चीजें किसानों के लिए चुनौती बनती जा रही हैं. कहीं सूखा फसल खराब कर देता है तो कहीं ज्यादा बारिश पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है.

    चीन के वैज्ञानिक अब इसी समस्या का एक अलग रास्ता खोज रहे हैं. उनका आइडिया है कि खेती को जमीन के ऊपर करने के बजाय जमीन के नीचे ले जाया जाए. इसके लिए बंद हो चुकी कोयला खदानों का इस्तेमाल किया जा सकता है. खदानों में मौजूद बड़ी खाली जगह को एक तरह के हाईटेक फार्म में बदला जाएगा, जहां फसल के लिए जरूरी रोशनी, पानी, तापमान और हवा को इंसान अपने हिसाब से कंट्रोल कर सकेगा. हालांकि, इसका मकसद सिर्फ अनाज उगाना नहीं, बल्कि भविष्य की स्पेस कॉलोनियों के लिए खेती की टेक्नोलॉजी तैयार करना भी है.

    अंधेरी खदान में आएगी नकली धूप

    जमीन के कई मीटर नीचे सूरज की रोशनी पहुंचना संभव नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि पौधे बढ़ेंगे कैसे? वैज्ञानिकों के प्लान में इसका जवाब आर्टिफिशियल लाइटिंग है. इसका मतलब खदान के अंदर ऐसी लाइट लगाई जाएगी, जो पौधों को ग्रो करने के लिए जरूरी रोशनी देगी. इस काम में खदानों का पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर भी मदद कर सकता है. कई खदानों में पहले से पावर सप्लाई और वेंटिलेशन सिस्टम मौजूद हैं. इन्हें खेती की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने की संभावना देखी जा रही है. इसका मतलब बाहर चाहे रात हो या दिन, बारिश हो या तेज धूप, जमीन के नीचे मौजूद पौधों के लिए एक अलग ही मौसम तैयार किया जा सकेगा.

    गर्मी के लिए धरती की एनर्जी

    जमीन के अंदर एक और फायदा है. यहां का तापमान खुले मैदान की तरह लगातार तेजी से ऊपर-नीचे नहीं होता. वैज्ञानिक इस स्थिर वातावरण का फायदा उठाने की योजना बना रहे हैं. इसके लिए जियोथर्मल एनर्जी यानी धरती के अंदर मौजूद गर्मी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे अंडरग्राउंड फार्म में पौधों के लिए जरूरी तापमान बनाए रखने में मदद मिलेगी. साथ ही पारंपरिक फ्यूल पर निर्भरता कम करने और ग्रीनहाउस गैसों के एमिशन को घटाने की कोशिश भी की जा सकती है. इसका मतलब जिस खदान को कभी कोयला निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वही जगह आगे चलकर क्लीन एनर्जी और खेती के एक्सपेरिमेंट का सेंटर बन सकती है.

    जहरीले पानी को भी बनाया जाएगा यूजफुल

    कोयला खदानों में सिर्फ खाली जगह ही नहीं होती. वहां जमा पानी भी एक बड़ी समस्या बन सकता है. कई बार इस पानी में ऐसे केमिकल और हैवी मेटल्स पाए जा सकते हैं, जिन्हें सीधे खेती में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. वैज्ञानिक इस समस्या के लिए पानी को साफ करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं. मेम्ब्रेन सेपरेशन जैसी टेक्नोलॉजी के जरिए पानी से नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को अलग करने की कोशिश होगी. इसके बाद साफ किए गए पानी का इस्तेमाल कुछ फसलों की सिंचाई में किया जा सकता है. चाय और रेपसीड जैसी फसलों का भी जिक्र किया गया है. हालांकि, कौन सी फसल जमीन के नीचे इस सिस्टम में सबसे अच्छी तरह उग सकती है, यह भी रिसर्च का हिस्सा होगा.

    असली मकसद खेती से कहीं बड़ा

    पहली नजर में लग सकता है कि चीन का यह पूरा प्लान सिर्फ जमीन की कमी को दूर करने के लिए बनाया गया है. लेकिन वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इससे कहीं आगे की है. दरअसल, अंडरग्राउंड फार्म को एक तरह की एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग लैब के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है. यहां वैज्ञानिक देखेंगे कि बिना प्राकृतिक वातावरण के पौधों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है. रोशनी कितनी होनी चाहिए, पानी किस तरह इस्तेमाल किया जाए, हवा और तापमान कैसे कंट्रोल हों और कार्बन का पौधों पर क्या असर पड़े, इन सभी चीजों पर एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है.

    धरती के नीचे की खेती जाएगी अंतरिक्ष तक

    इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा स्पेस मिशन से जुड़ा है. भविष्य में अगर इंसान चांद या मंगल जैसे दूसरे ग्रहों पर लंबे समय तक रहना चाहता है तो वहां खुले खेत बनाना बेहद मुश्किल होगा. वहां न धरती जैसा वातावरण है, न आसानी से उपलब्ध पानी और न ही खेती के लिए सामान्य मौसम. ऐसे में जमीन के नीचे या पूरी तरह कंट्रोल किए गए एनवायरनमेंट में खाना उगाने की टेक्नोलॉजी बेहद काम आ सकती है. चीन के वैज्ञानिकों का यह एक्सपेरिमेंट इसी दिशा में एक टेस्टिंग ग्राउंड की तरह काम कर सकता है. आज जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बंद पड़ी कोयला खदान में किया जाएगा, कल उसी के किसी बेहतर वर्जन से दूसरे ग्रहों पर पौधे उगाने की कोशिश की जा सकती है.

    हजारों बंद खदानें बन सकती हैं नया फार्म

    चीन में पिछले कई सालों में बड़ी संख्या में कोयला खदानें बंद हुई हैं. एक दशक में करीब बारह हजार खदानें बंद की जा चुकी हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है. ऐसे में देश के पास जमीन के नीचे ऐसे कई बड़े इलाके मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल नए तरीके से किया जा सकता है. वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, आने वाले समय में बंद खदानों में मौजूद विशाल खाली जगह अंडरग्राउंड एग्रीकल्चर के लिए इस्तेमाल हो सकती है. हालांकि, इसे बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई सवालों के जवाब तलाशने होंगे.

    आसान नहीं होगी जमीन के नीचे खेती

    अंडरग्राउंड फार्म का आइडिया सुनने में जितना शानदार लगता है, इसे असल में लागू करना उतना ही आसान नहीं होगा. आर्टिफिशियल लाइटिंग के लिए बड़ी मात्रा में बिजली चाहिए. तापमान और हवा को कंट्रोल करने के लिए भी लगातार एनर्जी की जरूरत होगी. इसके अलावा खदानों की सेफ्टी, पानी की क्वालिटी और अंदर काम करने वाले लोगों की सुरक्षा भी अहम मुद्दे होंगे. इसलिए फिलहाल इसे बड़े पैमाने की खेती का तैयार मॉडल मानना जल्दबाजी होगी. वैज्ञानिक पहले यह समझना चाहते हैं कि बंद खदानों को किस तरह सुरक्षित और उपयोगी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर में बदला जा सकता है.

    आज खदान, कल अंतरिक्ष का खेत

    चीन का यह प्रयोग खेती की पारंपरिक सोच को जरूर बदलने वाला है. जिस जगह कभी धरती के अंदर से कोयला निकाला जाता था, वहीं अब पौधों को उगाने की कोशिश की जा रही है. फिलहाल इसका सबसे बड़ा मकसद करोड़ों टन अनाज जमीन के नीचे पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम समझना है जिसमें इंसान प्राकृतिक मौसम पर निर्भर हुए बिना खाना उगा सके. अगर यह प्रयोग सफल होता है तो इसका फायदा सिर्फ चीन की बंद खदानों तक सीमित नहीं रहेगा. क्लाइमेट चेंज से जूझती दुनिया से लेकर भविष्य में चांद और मंगल पर बनने वाली इंसानी बस्तियों तक, जमीन के नीचे खेती की यह टेक्नोलॉजी एक दिन बेहद काम की साबित हो सकती है.

  • इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय पर असर का आकलन जरूरी, विशेषज्ञ ने नीति बदलाव सुझाए

    इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय पर असर का आकलन जरूरी, विशेषज्ञ ने नीति बदलाव सुझाए

    नई दिल्ली । कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने भारत की कृषि नीति में व्यापक बदलाव की जरूरत बताते हुए कहा है कि इथेनॉल उत्पादन, उर्वरक सब्सिडी और कृषि व्यापार जैसे मुद्दों पर केवल तत्काल आर्थिक लाभ को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार नीति निर्माण में खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरणीय स्थिरता को समान प्राथमिकता देना जरूरी है।

    शर्मा ने इथेनॉल उत्पादन के तेजी से विस्तार को लेकर विशेष चिंता जताई है। उनका कहना है कि गन्ने के साथ मक्का और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल भी इथेनॉल उत्पादन में बढ़ रहा है। ऐसे में यह आकलन जरूरी है कि कृषि उपज का कितना हिस्सा भोजन से ईंधन की ओर सुरक्षित रूप से मोड़ा जा सकता है। उनके मुताबिक इस बदलाव का असर खाद्य उपलब्धता, पानी की मांग और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में फसल पैटर्न पर पड़ सकता है।

    उनका तर्क है कि चीनी क्षेत्र में मौजूदा परिस्थितियों को केवल मौसम, सूखे या फसल संबंधी बीमारियों से नहीं जोड़ा जा सकता। चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की नीति को भी व्यापक तस्वीर में देखना होगा। भारत में इथेनॉल मिश्रण को ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के उपाय के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन किसानों को इससे मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ पर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

    शर्मा ने मक्का की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी कृषि उत्पाद की मांग इथेनॉल के कारण बढ़ती है, तो उसका लाभ किसानों तक पहुंचना चाहिए। उनका कहना है कि कई मौकों पर किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसलिए इथेनॉल नीति में किसानों की आय और न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए।

    उन्होंने ब्राजील के मॉडल को भारत में बिना परिस्थितियों का आकलन किए लागू करने से सावधान किया है। उनके अनुसार भारत में जमीन, पानी और खाद्य जरूरतों की स्थिति अलग है। इसलिए ऐसी इथेनॉल रणनीति बननी चाहिए जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को बनाए रखे।

    फर्टिलाइजर सब्सिडी को लेकर भी शर्मा ने पुनर्विचार की जरूरत बताई। उनका कहना है कि रासायनिक उर्वरकों पर लंबे समय तक निर्भरता ने पोषक तत्वों के असंतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। उनका सुझाव है कि सब्सिडी व्यवस्था को अचानक समाप्त करने के बजाय धीरे-धीरे टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती की दिशा में बढ़ाया जाए।

    उन्होंने प्रत्यक्ष आय सहायता को कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की वकालत की। हालांकि, इसके लिए किराए पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों की पहचान और उन्हें योजनाओं का लाभ पहुंचाना बड़ी चुनौती है। उनका मानना है कि सरकारी सहायता वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए।

    न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर शर्मा ने किसानों के लिए भरोसेमंद मूल्य सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई। उनके अनुसार केवल बाजार की शक्तियों पर निर्भर रहने से किसानों की आय में स्थिरता नहीं आ सकती। उत्पादन बढ़ने के बावजूद यदि किसान को बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती, तो रिकॉर्ड उत्पादन का लाभ उसकी आमदनी में दिखाई नहीं देता।

    उन्होंने कहा कि भारत की कृषि नीति का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन हासिल करना नहीं होना चाहिए। किसानों की वास्तविक कमाई, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और खाद्य सुरक्षा को केंद्र में रखकर नीतियां तैयार करना जरूरी है। उनके मुताबिक दीर्घकालिक कृषि विकास के लिए इथेनॉल, सब्सिडी और व्यापार नीतियों के बीच बेहतर संतुलन बनाना समय की जरूरत है।

  • पीएम-आशा से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य, डिजिटल खरीद व्यवस्था ने बढ़ाई पारदर्शिता और भुगतान प्रक्रिया की रफ्तार

    पीएम-आशा से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य, डिजिटल खरीद व्यवस्था ने बढ़ाई पारदर्शिता और भुगतान प्रक्रिया की रफ्तार

    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी पीएम-आशा योजना किसानों को उनकी कृषि उपज का बेहतर मूल्य दिलाने और मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री रोकने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है। योजना के तहत खरीद व्यवस्था, मूल्य स्थिरीकरण और बाजार हस्तक्षेप को मजबूत करने के साथ किसानों तक सरकारी समर्थन पहुंचाने पर जोर दिया गया है।

    पीएम-आशा के अंतर्गत दलहन, तिलहन और खोपरा जैसी प्रमुख कृषि उपज की समय पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थाओं का विस्तार किया गया है। किसानों को स्थानीय स्तर पर अपनी उपज बेचने में सुविधा मिले, इसके लिए अतिरिक्त खरीद केंद्र स्थापित किए गए हैं। इससे बाजार तक पहुंच बढ़ाने और बिक्री प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिली है।

    योजना की खरीद व्यवस्था में नाफेड और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों से निर्धारित व्यवस्था के तहत उपज खरीदी जाती है। इसका उद्देश्य बाजार में कीमतों के दबाव के समय किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उपलब्ध कराना और उन्हें तत्काल कम कीमत पर उपज बेचने से बचाना है।

    सरकार ने पीएम-आशा की खरीद प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल को भी बढ़ाया है। आधार आधारित प्रमाणीकरण के साथ ई-एनएएम, ई-समृद्धि और ई-सम्युक्ति जैसे डिजिटल मंचों का उपयोग खरीद और भुगतान व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए किया जा रहा है। डिजिटल प्रणाली से किसानों की पहचान, खरीद संबंधी रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया को व्यवस्थित करने में सहायता मिल रही है।

    कृषि क्षेत्र में भंडारण और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए कृषि अवसंरचना कोष का समर्थन भी योजना की प्रभावशीलता बढ़ाने में उपयोगी माना गया है। खरीद केंद्रों और कृषि ढांचे के विस्तार से किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

    पीएम-आशा के लिए बजटीय प्रावधान में भी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2024-25 में योजना के तहत वास्तविक व्यय 5,437.99 करोड़ रुपये रहा। वर्ष 2025-26 में इसका बजट बढ़ाकर 6,941.36 करोड़ रुपये किया गया, जबकि 2026-27 के लिए 7,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। बढ़ता आवंटन किसानों की आय सुरक्षा और कृषि मूल्य समर्थन व्यवस्था को मजबूत करने की प्राथमिकता को दर्शाता है।

    फसल उत्पादन लागत और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच अंतर भी किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा के महत्व को स्पष्ट करता है। वर्ष 2026-27 में सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि एमएसपी 2,441 रुपये प्रति क्विंटल है। इस तरह दोनों के बीच 814 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है।

    पीली सोयाबीन के मामले में उत्पादन लागत 3,805 रुपये प्रति क्विंटल और एमएसपी 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है। इसके अलावा गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है।

    जूट के लिए उत्पादन लागत 3,662 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है। इस आधार पर दोनों के बीच 2,293 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर बनता है। सरकार की कोशिश है कि खरीद व्यवस्था, डिजिटल निगरानी और बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले तथा कृषि बाजार में पारदर्शिता और स्थिरता को और मजबूत किया जा सके।

  • सिंधु नदी के पानी पर बढ़ी पाकिस्तान की चिंता, विशेषज्ञ बोले- अनिश्चितता बढ़ी तो कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर

    सिंधु नदी के पानी पर बढ़ी पाकिस्तान की चिंता, विशेषज्ञ बोले- अनिश्चितता बढ़ी तो कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर

    नई दिल्ली । सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव का असर अब पाकिस्तान की जल सुरक्षा, कृषि और पर्यावरण को लेकर चिंता में दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान के विशेषज्ञ अली मेहर ने चेतावनी दी है कि सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े प्रबंधन में अनिश्चितता बढ़ने पर देश के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना है कि मामला केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन, पर्यावरण और करोड़ों लोगों की आजीविका से भी जुड़ा हुआ है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। लंबे समय तक दोनों देशों के बीच युद्ध और तनाव के बावजूद यह समझौता जल बंटवारे और नदी प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में काम करता रहा। हालांकि, पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को लेकर कड़ा रुख अपनाया और इसे निलंबित करने का फैसला किया। इसके बाद पाकिस्तान में इस कदम को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही है।

    पाकिस्तानी विशेषज्ञ अली मेहर के अनुसार, संधि से जुड़ी पुरानी व्यवस्था ने दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद पानी से जुड़े मामलों में एक निश्चित प्रक्रिया बनाए रखी थी। उनके मुताबिक, इस व्यवस्था के कमजोर होने से पानी का प्रबंधन केवल तकनीकी और पर्यावरणीय विषय नहीं रहेगा, बल्कि इसे सुरक्षा और रणनीतिक दबाव के नजरिए से भी देखा जाने लगेगा।

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सिंधु नदी प्रणाली की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश के बड़े कृषि क्षेत्रों की सिंचाई इसी नदी प्रणाली पर निर्भर है। किसानों की फसल, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। ऐसे में नदी के बहाव, जलाशयों के संचालन या पानी से जुड़ी जानकारी में लंबे समय तक अनिश्चितता रहने पर कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।

    विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि सिंधु जल व्यवस्था में केवल पानी की मात्रा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उससे संबंधित सूचनाओं का समय पर मिलना भी जरूरी है। नदी के बहाव, बारिश, जलाशयों के जलस्तर और पानी छोड़े जाने से जुड़ी जानकारी समय पर मिलने पर निचले इलाकों में प्रशासन बाढ़ से निपटने की तैयारी कर सकता है। जानकारी में देरी या कमी होने पर अचानक आने वाली बाढ़ से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

    सिंधु जल प्रणाली का प्रभाव पर्यावरण पर भी पड़ता है। नदी के प्रवाह में बदलाव से जल पारिस्थितिकी, कृषि भूमि और उन क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है जहां स्थानीय समुदाय पानी और नदी आधारित संसाधनों पर निर्भर हैं। बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के बीच पानी की मांग पहले ही बढ़ रही है, इसलिए सीमा पार जल प्रबंधन में स्थिरता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस पूरे विवाद का कानूनी पक्ष भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तानी विशेषज्ञ का मानना है कि पाकिस्तान को इस मामले में कानूनी और रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ना चाहिए। उनका कहना है कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष को मजबूती से रखना चाहिए और साथ ही घरेलू स्तर पर जल प्रबंधन की कमियों को दूर करने पर भी ध्यान देना चाहिए।

    पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि देश में पानी के भंडारण, वितरण और उपयोग से जुड़ी कई समस्याएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में बाहरी जल स्रोतों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता घरेलू जल प्रबंधन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक, भविष्य में सिंधु नदी का महत्व केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा विषय बन सकता है।

    बढ़ती आबादी, कृषि की जरूरतों, पर्यावरणीय दबाव और जलवायु परिवर्तन के बीच सिंधु नदी प्रणाली का स्थायी और पारदर्शी प्रबंधन दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। मौजूदा तनाव के बीच पाकिस्तान में उठ रही चिंताएं इसी व्यापक चुनौती की ओर संकेत कर रही हैं।

  • भोपाल में किसानों का शक्ति प्रदर्शन, राजधानी दो दिन रही थमी, सरकार ने मानी बड़ी मांगें, आंदोलन हुआ खत्म

    भोपाल में किसानों का शक्ति प्रदर्शन, राजधानी दो दिन रही थमी, सरकार ने मानी बड़ी मांगें, आंदोलन हुआ खत्म


    भोपाल । भोपाल में किसानों के आंदोलन ने दो दिनों तक राजधानी की रफ्तार लगभग थाम दी। मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीदी और खाद वितरण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर नर्मदापुरम हरदा सीहोर समेत कई जिलों से आए हजारों किसानों ने ऐसा दबाव बनाया कि आखिरकार सरकार को बातचीत की मेज पर आना पड़ा। किसान एक के बाद एक 22 बैरिकेड पार करते हुए मुख्यमंत्री निवास से महज एक किलोमीटर पहले तक पहुंच गए। उनके सामने केवल तीन बैरिकेड शेष थे। इसी दौरान सरकार ने वार्ता का रास्ता अपनाया और देर रात आंदोलन समाप्त हो गया।

    आंदोलन के चलते रोशनपुरा न्यू मार्केट और मुख्यमंत्री निवास के आसपास का पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। कई स्कूलों में छुट्टी घोषित करनी पड़ी जबकि प्रमुख मार्गों पर स्कूल बसों और गिट्टी से भरे डंपरों को बैरिकेड के रूप में खड़ा कर यातायात रोकने की कोशिश की गई। इसके बावजूद किसानों का काफिला लगातार आगे बढ़ता रहा और पुलिस की अधिकांश रणनीतियां नाकाम साबित हुईं।

    सुबह मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कृषक कल्याण वर्ष के तहत किसानों से संवाद कर समस्याओं का समाधान निकालने की बात कही थी। लेकिन जब प्रदर्शनकारी रोशनपुरा तक पहुंच गए तब सरकार ने कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना विश्वास सारंग और कृष्णा गौर सहित चार मंत्रियों की समिति गठित कर किसान नेताओं से बातचीत शुरू कराई। मंत्रालय में करीब दो घंटे चली चर्चा के बाद सरकार ने कई अहम घोषणाएं कीं।

    सरकार ने मूंग खरीदी की सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का फैसला लिया। इसके साथ ही खाद वितरण की ई टोकन व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया। स्लॉट बुकिंग की अंतिम तिथि 10 अगस्त तक और खरीदी की अंतिम तिथि 20 अगस्त तक बढ़ा दी गई। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में खाद वितरण हाईब्रिड व्यवस्था के तहत किया जाएगा जिसमें आधार नंबर मोबाइल नंबर और वितरण का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज रहेगा।

    हालांकि किसान नेताओं ने कहा कि सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है लेकिन उनकी मूल मांग अब भी पूरी नहीं हुई है। किसानों का कहना है कि उनकी पूरी मूंग की फसल समर्थन मूल्य पर खरीदी जानी चाहिए और वे इस मांग से पीछे नहीं हटेंगे। संगठन के नेताओं ने स्पष्ट किया कि यदि आगे भी जरूरत पड़ी तो आंदोलन दोबारा किया जाएगा।

    इस आंदोलन के दौरान पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए। नर्मदापुरम हरदा इटारसी और भैरूंदा सहित कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश हुई। करीब 60 किसान नेताओं को हिरासत में भी लिया गया लेकिन बाद में उन्हें छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद किसान बड़ी संख्या में भोपाल पहुंचने में सफल रहे और सरकार को अंततः वार्ता के लिए मजबूर होना पड़ा।

    इधर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य सरकार को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि केंद्र ने मध्य प्रदेश को देश में सबसे अधिक 4.54 लाख टन मूंग खरीदी की स्वीकृति दी है। उन्होंने कहा कि पहले स्वीकृत कोटे की पूरी खरीदी की जाए उसके बाद अतिरिक्त कोटे पर विचार किया जाएगा।

    करीब दो दिन तक चले इस आंदोलन के बाद देर रात किसानों ने धरना समाप्त कर दिया और वापस लौटना शुरू किया। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि आंदोलन खत्म होने के बाद गुरुवार से स्कूल और सामान्य यातायात पूर्ववत संचालित होंगे।

  • राजधानी भोपाल बना किसान आंदोलन का केंद्र सड़क पर हवन भोजन और अर्धनग्न प्रदर्शन सीएम हाउस की सुरक्षा कड़ी कई रास्ते बंद

    राजधानी भोपाल बना किसान आंदोलन का केंद्र सड़क पर हवन भोजन और अर्धनग्न प्रदर्शन सीएम हाउस की सुरक्षा कड़ी कई रास्ते बंद


    भोपाल । मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल एक बार फिर किसान आंदोलन का केंद्र बन गई है। मूंग की सरकारी खरीदी ई टोकन व्यवस्था में सुधार न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और अन्य कृषि संबंधी मांगों को लेकर हजारों किसान दूसरे दिन भी आंदोलन पर डटे हुए हैं। संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे इस प्रदर्शन ने अब और उग्र रूप ले लिया है। सरकार का ध्यान अपनी मांगों की ओर खींचने के लिए कई किसान अर्धनग्न होकर धरने पर बैठे हैं जबकि प्रदर्शन स्थल पर सद्बुद्धि यज्ञ का आयोजन कर सरकार से किसानों के हित में निर्णय लेने की प्रार्थना भी की गई।

    किसानों का कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई खेती की बढ़ती लागत और फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। मूंग की पूरी सरकारी खरीदी सुनिश्चित करने ई टोकन प्रणाली को पारदर्शी बनाने और सभी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ दिलाने की मांग लंबे समय से की जा रही है लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। इसी वजह से किसानों ने राजधानी में डेरा डालकर आंदोलन को निर्णायक रूप देने का फैसला किया है।

    धरना स्थल पर किसानों का जीवन भी संघर्ष की मिसाल बन गया है। कई किसान पूरी रात खुले आसमान के नीचे रहे और सुबह जहां जगह मिली वहीं आराम करते नजर आए। दोपहर होते ही कई समूहों ने सड़क किनारे चूल्हे जलाए और दाल बाटी बनाकर सामूहिक भोजन किया। किसानों का कहना है कि वे लंबी लड़ाई के लिए तैयार होकर आए हैं और मांगें पूरी होने तक वापस नहीं लौटेंगे। उन्होंने प्रदेश के जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों के नेताओं को भी प्रदर्शन स्थल पर आकर उनके साथ भोजन करने और उनकी समस्याएं सुनने का निमंत्रण दिया।

    आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। बड़ी संख्या में महिलाएं प्रदर्शन स्थल पर पहुंचीं और हाथों में तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारे लिखे। उन्होंने किसानों के संघर्ष को परिवार और समाज की लड़ाई बताते हुए आंदोलन को अपना समर्थन दिया।

    सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किसानों ने सद्बुद्धि यज्ञ भी किया। यज्ञ के माध्यम से उन्होंने प्रार्थना की कि सरकार किसानों की पीड़ा को समझे और उनकी जायज मांगों को जल्द स्वीकार करे। कई किसानों ने अपनी आर्थिक बदहाली का जिक्र करते हुए कहा कि खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है और यदि समय रहते समाधान नहीं निकला तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।

    किसानों के मुख्यमंत्री आवास घेराव के ऐलान को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। एम्स के पास वीर सावरकर सेतु सहित कई संवेदनशील स्थानों पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। राजधानी के कई प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग कर दी गई है और यातायात को दूसरे रास्तों से मोड़ा जा रहा है। इसके कारण होशंगाबाद रोड एम्स बंसल प्लाजा कटारा हिल्स और आसपास के क्षेत्रों में दिनभर जाम जैसी स्थिति बनी रही जिससे आम लोगों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भोपाल कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने नर्मदापुरम रोड क्षेत्र के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में अवकाश घोषित कर दिया ताकि विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और यातायात पर दबाव कम हो।

    फिलहाल राजधानी में आंदोलन और प्रशासन दोनों आमने सामने की स्थिति में हैं। किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाएगा तब तक आंदोलन जारी रहेगा। वहीं प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी कर रहा है। अब प्रदेश की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार किसानों से बातचीत कर कोई समाधान निकालती है या आंदोलन और तेज होता है।

  • मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का किसानों से सीधा संवाद, प्राकृतिक खेती, आधुनिक तकनीक और सिंचाई योजनाओं पर दिया विकास का नया रोड

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का किसानों से सीधा संवाद, प्राकृतिक खेती, आधुनिक तकनीक और सिंचाई योजनाओं पर दिया विकास का नया रोड

    मध्य प्रदेश। झाबुआ में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेशभर के किसानों से ऑनलाइन संवाद करते हुए कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और आधुनिक बनाने की दिशा में सरकार की विभिन्न योजनाओं और प्राथमिकताओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, आधुनिक तकनीकों के विस्तार और कृषि आधारित रोजगार के नए अवसर विकसित करने के लिए लगातार काम कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में “कृषक कल्याण वर्ष” के अंतर्गत बलराम कृषि महोत्सव-2026 का आयोजन किया जा रहा है। इसकी शुरुआत इंदौर से हुई थी और आगामी दिनों में आलीराजपुर, बड़वानी, खरगौन, बुरहानपुर तथा खंडवा सहित कई जिलों में भी महोत्सव आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने इसे किसानों को नई तकनीकों, सरकारी योजनाओं और विशेषज्ञों की सलाह से जोड़ने का महत्वपूर्ण अभियान बताया।

    डॉ. यादव ने मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताए जाने का उल्लेख करते हुए प्रशासन को किसानों की हरसंभव सहायता के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि किसानों को तीन लाख रुपये तक का कृषि ऋण शून्य प्रतिशत ब्याज पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके अलावा मात्र पांच रुपये में बिजली कनेक्शन देने और डेयरी विकास योजनाओं में 40 लाख रुपये तक की परियोजनाओं पर 33 प्रतिशत अनुदान की व्यवस्था भी की गई है।

    मुख्यमंत्री ने किसानों से आधुनिक कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक सलाह, प्राकृतिक खेती और जल संरक्षण के उपाय अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री के प्राकृतिक खेती अभियान के तहत झाबुआ जिले में 50 कृषि सखियों का चयन किया गया है। वर्तमान में जिले में तीन हजार एकड़ से अधिक क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की जा रही है और किसानों की फसलों का प्रमाणीकरण भी कराया जा रहा है, जिससे उन्हें बाजार में बेहतर अवसर मिल सकें।

    उन्होंने कहा कि “एक जिला-एक उत्पाद” योजना के तहत झाबुआ के कड़कनाथ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास जारी हैं। वर्ष 2025 के दौरान कड़कनाथ पालन से एक हजार से अधिक नए हितग्राहियों को जोड़ा गया। साथ ही पशुपालन, बकरी पालन, डेयरी और मुर्गी पालन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देकर किसानों की नियमित आय सुनिश्चित करने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि जिले में मत्स्य पालन को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। 760 से अधिक तालाबों में लगभग तीन हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मत्स्य उत्पादन किया जा रहा है। वहीं खरीफ-2026 सीजन में कपास की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि धार जिले के बदनावर स्थित पीएम मित्रा पार्क के विकसित होने से झाबुआ के कपास उत्पादकों को खेत से उद्योग तक बेहतर बाजार और मूल्य संवर्धन का लाभ मिलेगा।

    झाबुआ के टमाटर उत्पादन का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जिले में हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में टमाटर की खेती हो रही है। यहां स्थापित प्रसंस्करण इकाई में टमाटर सॉस, केचअप और डिहाइड्रेटेड उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी आपूर्ति देश के कई राज्यों में की जा रही है। इससे किसानों को बेहतर बाजार और अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त हो रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि नर्मदा-झाबुआ-पेटलावद-थांदला माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना पूरी होने पर लगभग 32 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और करीब 50 हजार किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। इससे जल संरक्षण के साथ कृषि उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि बलराम कृषि महोत्सव केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, कृषि तकनीक, प्रसंस्करण, विपणन और कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देने का व्यापक अभियान है। प्रदेश के सभी जिलों में 13 नवंबर तक विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से किसानों को आधुनिक खेती, डिजिटल कृषि सेवाओं, स्मार्ट सिंचाई, ड्रोन तकनीक, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इसके साथ ही उत्कृष्ट किसानों का सम्मान, हितग्राहियों को लाभ वितरण और विभिन्न विभागों की प्रदर्शनी के माध्यम से खेती को अधिक समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जाएगा।