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  • किसान सारथी बना किसानों का डिजिटल साथी, 13 भाषाओं में विशेषज्ञ सलाह और 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी

    किसान सारथी बना किसानों का डिजिटल साथी, 13 भाषाओं में विशेषज्ञ सलाह और 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी

    नई दिल्ली। देश में कृषि क्षेत्र को डिजिटल तकनीक से जोड़ने की दिशा में किसान सारथी प्लेटफॉर्म तेजी से किसानों का भरोसेमंद माध्यम बनकर उभरा है। केंद्र सरकार के अनुसार इस मंच से अब तक करीब 2.95 करोड़ किसान जुड़ चुके हैं, जिनमें 56 लाख से अधिक महिला किसान भी शामिल हैं। कृषि विशेषज्ञों से सीधे संवाद, स्थानीय भाषा में सलाह और सरकारी योजनाओं की जानकारी जैसी सुविधाओं के कारण यह प्लेटफॉर्म किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

    सरकार ने बताया कि इस डिजिटल कृषि परामर्श मंच की शुरुआत वर्ष 2021 में किसानों को एकीकृत और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। वर्तमान में इस प्लेटफॉर्म से 4,767 कृषि वैज्ञानिक और 113 कृषि अनुसंधान संस्थान जुड़े हुए हैं। इन विशेषज्ञों के माध्यम से किसानों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है और खेती से जुड़ी नई तकनीकों की जानकारी सीधे खेत तक पहुंचाई जा रही है।

    अब तक इस मंच पर 19 लाख से अधिक कृषि संबंधी सवालों का समाधान किया जा चुका है। इसके अलावा विभिन्न फसलों और कृषि गतिविधियों से जुड़ी 21 हजार से अधिक वैज्ञानिक सलाह भी किसानों तक पहुंचाई गई हैं। इन सलाहों का उद्देश्य किसानों को मौसम, फसल प्रबंधन, कीट नियंत्रण, उर्वरक उपयोग और आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में समय पर जानकारी देना है।

    अधिकांश किसानों ने अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से इस प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कराया है। इसके अलावा कॉल सेंटर, मोबाइल एप, वेब पोर्टल और कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए भी बड़ी संख्या में किसान इससे जुड़े हैं। सरकार का कहना है कि इस बहु-स्तरीय व्यवस्था से दूर-दराज के क्षेत्रों के किसानों को भी डिजिटल सेवाओं का लाभ मिल रहा है।

    किसान सारथी की पहुंच देश के 37 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, 768 जिलों तथा 6.63 लाख से अधिक गांवों तक हो चुकी है। यह प्लेटफॉर्म आधुनिक इंटरैक्टिव सूचना प्रणाली के माध्यम से किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच दो-तरफा संवाद स्थापित करता है। इससे किसानों को अपनी समस्याओं का समाधान सीधे विशेषज्ञों से प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

    इस मंच के जरिए किसानों को केवल कृषि सलाह ही नहीं बल्कि मौसम पूर्वानुमान, सरकारी योजनाओं की जानकारी, कृषि अनुसंधान से जुड़े नवीनतम अपडेट और विशेषज्ञों से लाइव परामर्श जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। प्लेटफॉर्म 13 क्षेत्रीय भाषाओं में संवाद की सुविधा देता है, जिससे अलग-अलग राज्यों के किसान अपनी भाषा में सवाल पूछकर समाधान प्राप्त कर सकते हैं।

    सरकार के अनुसार किसान सारथी को कई राष्ट्रीय सेवाओं के साथ एकीकृत किया गया है। इसके माध्यम से किसानों को 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध होती है, जिनमें केंद्र सरकार की 102 प्रमुख योजनाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा यह मंच अनाज, दलहन, तिलहन, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, पोल्ट्री और अन्य कृषि आधारित गतिविधियों से जुड़ी उपयोगी जानकारी भी प्रदान करता है।

    सरकार का मानना है कि किसान सारथी प्लेटफॉर्म कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच की दूरी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डिजिटल तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक सलाह को सीधे किसानों तक पहुंचाने से खेती अधिक वैज्ञानिक, उत्पादक और लाभकारी बनने की दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।

  • देश का 16 फीसदी केला देता है महाराष्ट्र का यह जिला, आधुनिक खेती और GI टैग ने बनाया ‘बनाना कैपिटल ऑफ इंडिया’

    देश का 16 फीसदी केला देता है महाराष्ट्र का यह जिला, आधुनिक खेती और GI टैग ने बनाया ‘बनाना कैपिटल ऑफ इंडिया’

    नई दिल्ली । भारत दुनिया का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई मानी जाती है। देश में हर वर्ष करोड़ों टन केले का उत्पादन होता है, जिसमें महाराष्ट्र अग्रणी राज्य है। इसी राज्य का जलगांव जिला अपनी असाधारण उत्पादन क्षमता के कारण ‘बनाना कैपिटल ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है। यह जिला अकेले देश के कुल केला उत्पादन में लगभग 16 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि महाराष्ट्र में केले की खेती के कुल क्षेत्रफल का करीब 69 प्रतिशत हिस्सा भी यहीं स्थित है।

    जलगांव की सफलता के पीछे उसकी अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियां सबसे बड़ा कारण मानी जाती हैं। उत्तर में सतपुड़ा और दक्षिण में अजंता पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित यह क्षेत्र उपजाऊ काली मिट्टी, पर्याप्त धूप और गर्म जलवायु के कारण केले की खेती के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है। यहां की मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता अधिक है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बेहतर होते हैं।

    केले की खेती केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि जलगांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव भी है। जिले के हजारों किसान सीधे तौर पर इस फसल पर निर्भर हैं। इसके अलावा परिवहन, पैकेजिंग, भंडारण, प्रसंस्करण और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है। इस कारण केला उत्पादन यहां की आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख आधार बन चुका है।

    जलगांव के किसानों ने समय के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों को तेजी से अपनाया है। टिश्यू कल्चर पौधों का उपयोग, ड्रिप सिंचाई प्रणाली और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन ने उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है। विशेष रूप से ड्रिप सिंचाई तकनीक ने पानी की बचत के साथ पौधों तक आवश्यक मात्रा में सिंचाई सुनिश्चित की है, जिससे लागत कम हुई और गुणवत्ता में सुधार आया।

    इस जिले में कई लोकप्रिय केले की किस्मों की खेती होती है। बसराई किस्म अपनी गुणवत्ता, स्वाद और लंबे समय तक ताजा रहने की क्षमता के कारण देशभर के बाजारों में पसंद की जाती है। वहीं जी-9 (G-9) किस्म अधिक उत्पादन, बड़े आकार, रोग प्रतिरोधक क्षमता और निर्यात की संभावनाओं के कारण किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई है। इन उन्नत किस्मों ने जलगांव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मजबूत पहचान दिलाई है।

    जलगांव की एक और बड़ी ताकत उसका बेहतर परिवहन नेटवर्क है। सड़क और रेल मार्ग से देश के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों से जुड़ा होने के कारण यहां से केले की आपूर्ति तेजी और आसानी से की जाती है। भुसावल जंक्शन देश के महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शनों में शामिल है, जिससे कृषि उत्पादों का परिवहन और भी सुगम हो जाता है।

    जलगांव के केले को वर्ष 2016 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी प्राप्त हो चुका है। यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि यहां उत्पादित केले की गुणवत्ता और विशेषताएं इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ी हुई हैं। आधुनिक कृषि तकनीक, अनुकूल प्राकृतिक संसाधन, मजबूत परिवहन व्यवस्था और किसानों की नवाचार अपनाने की क्षमता ने जलगांव को देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी केले के प्रमुख उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित किया है।

  • प्रधानमंत्री मोदी 20 जून को किसानों के खातों में भेजेंगे 18,880 करोड़ रुपये, पीएम-किसान की 23वीं किस्त के साथ कई कृषि योजनाओं को भी मिलेगी नई रफ्तार

    प्रधानमंत्री मोदी 20 जून को किसानों के खातों में भेजेंगे 18,880 करोड़ रुपये, पीएम-किसान की 23वीं किस्त के साथ कई कृषि योजनाओं को भी मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार किसानों की आय बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 जून को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की 23वीं किस्त जारी करेंगे। इस अवसर पर देशभर के 9.44 करोड़ से अधिक पात्र किसानों के बैंक खातों में लगभग 18,880 करोड़ रुपये सीधे हस्तांतरित किए जाएंगे। यह राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण प्रणाली के माध्यम से किसानों तक पहुंचेगी, जिससे उन्हें बिना किसी बिचौलिए के आर्थिक सहायता उपलब्ध हो सकेगी।

    प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल के हुगली जिले स्थित तारकेश्वर से इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम के दौरान केवल पीएम-किसान योजना की किस्त जारी नहीं की जाएगी, बल्कि कृषि, ग्रामीण विकास, मत्स्य पालन और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उद्घाटन, शिलान्यास और लोकार्पण भी किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य पूर्वी भारत, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, को विकास की नई गति प्रदान करना है।

    पीएम-किसान योजना देश के करोड़ों किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा बन चुकी है। इस योजना के तहत पात्र किसानों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की सहायता तीन समान किस्तों में प्रदान की जाती है। 2019 में शुरू हुई इस योजना के माध्यम से अब तक देशभर के किसानों को 4.46 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है। 23वीं किस्त जारी होने के बाद यह आंकड़ा और अधिक बढ़ जाएगा।

    इस कार्यक्रम के दौरान कृषि क्षेत्र में तकनीकी बदलाव को बढ़ावा देने वाली कई नई पहलों का शुभारंभ भी किया जाएगा। डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत एग्रीटेक आधारित सुविधाओं को विस्तार दिया जाएगा, जिससे किसानों को आधुनिक तकनीक, बेहतर डेटा प्रबंधन और स्मार्ट कृषि समाधान उपलब्ध हो सकेंगे। इसके अलावा राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन और प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना जैसी योजनाओं को भी नई दिशा मिलेगी।

    कृषि सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना का भी विस्तार किया जाएगा। इन योजनाओं की संयुक्त लागत लगभग 12,200 करोड़ रुपये बताई गई है। सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान करीब 1.10 करोड़ किसानों को फसल बीमा सुरक्षा प्रदान करना है। इसके अंतर्गत लगभग 30 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को बीमा कवरेज में शामिल किया जाएगा, जबकि 28,140 करोड़ रुपये मूल्य की फसलों को सुरक्षा प्रदान करने की योजना है।

    पश्चिम बंगाल को भी इस कार्यक्रम से विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। राज्य के 45 लाख से अधिक किसानों को लगभग 907 करोड़ रुपये की सहायता राशि प्राप्त होगी। इससे राज्य में पीएम-किसान योजना के तहत वितरित कुल राशि 15,000 करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता और बीमा सुरक्षा का यह संयोजन किसानों की आर्थिक स्थिरता को मजबूत करेगा तथा कृषि निवेश को बढ़ावा देगा।

    केंद्र सरकार का कहना है कि कृषि, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और तकनीकी नवाचारों को एक साथ आगे बढ़ाकर किसानों की आय बढ़ाने तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। आगामी कार्यक्रम को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र में उत्पादकता, सुरक्षा और आधुनिकता को नई गति मिलने की उम्मीद है।