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  • सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे बोले, विनियमित संस्थाएं एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के उपयोग की खुद होंगी जिम्मेदार

    सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे बोले, विनियमित संस्थाएं एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के उपयोग की खुद होंगी जिम्मेदार

    नई दिल्ली ।भारतीय वित्तीय बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसी बीच भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया है कि सेबी के दायरे में आने वाली सभी विनियमित संस्थाएं अपने द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार रहेंगी।

    मुंबई में आयोजित एक उद्योग सम्मेलन को संबोधित करते हुए सेबी चेयरमैन ने कहा कि किसी संस्था द्वारा इस्तेमाल की जा रही तकनीक चाहे उसके भीतर विकसित की गई हो या किसी बाहरी कंपनी अथवा तीसरे पक्ष से प्राप्त की गई हो, उसकी जिम्मेदारी संबंधित संस्था की ही होगी। इसका उद्देश्य वित्तीय बाजारों में तकनीकी नवाचार के साथ जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना है।

    तुहिन कांत पांडे ने कहा कि वित्तीय बाजारों में तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, तकनीकी बदलाव के बीच निवेशकों के हितों की सुरक्षा और बाजार की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देना जरूरी है। सेबी इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए नियामकीय ढांचे को विकसित करने पर काम कर रहा है।

    सेबी अध्यक्ष के अनुसार नियामकीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नई तकनीकों और नवाचार को बढ़ावा दे, लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता न हो। एआई आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि संस्थाएं अपने तकनीकी फैसलों और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से निभाएं।

    उन्होंने बाजार अवसंरचना संस्थानों की तकनीकी क्षमता और जोखिम से निपटने की तैयारी को मापने के लिए एक सूचना प्रौद्योगिकी सुदृढ़ता सूचकांक की संभावना पर भी जानकारी दी। सेबी इस तरह के ढांचे की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहा है। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण तकनीकी प्रणालियों की मजबूती और जोखिम प्रतिरोधक क्षमता का वस्तुनिष्ठ तरीके से आकलन करना है।

    तुहिन कांत पांडे ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण में तकनीक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी। वित्तपोषण के नए माध्यम विकसित करने, निवेश के अवसरों का विस्तार करने और नियामकीय व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाने में तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। इसके लिए नियामक व्यवस्था को भी बदलते तकनीकी वातावरण के साथ आगे बढ़ना होगा।

    सेबी की रणनीति को उन्होंने संतुलित, अनुपातिक और भविष्य केंद्रित बताया। उनके अनुसार बाजार में नवाचार के लिए पर्याप्त अवसर होने चाहिए, लेकिन साथ ही निवेशकों के हित, निष्पक्षता, सुरक्षा और बाजार की विश्वसनीयता भी कायम रहनी चाहिए।

    सेबी चेयरमैन ने भारतीय पूंजी बाजार में घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड और सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के माध्यम से बड़ी संख्या में परिवार बाजार आधारित निवेश से जुड़े हैं। इससे भारतीय पूंजी बाजार की पहुंच और मजबूती बढ़ी है, हालांकि निवेशकों की भागीदारी को और व्यापक बनाने की गुंजाइश अभी बनी हुई है।

    उन्होंने कहा कि भारतीय पूंजी बाजार अब केवल आर्थिक गतिविधियों का प्रतिबिंब नहीं रह गए हैं, बल्कि आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण माध्यमों में भी शामिल हो चुके हैं। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ निवेश और वित्तपोषण की जरूरतें भी बढ़ेंगी। ऐसे में पूंजी बाजार को अधिक गहरा और नवोन्मेषी बनाने के साथ उन्हें निष्पक्ष, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए रखना भी जरूरी होगा।

  • दक्षिण कोरिया में जनरेटिव एआई का रोजगार पर असर, युवाओं की 2.85 लाख नौकरियां घटीं, वरिष्ठ कर्मचारियों को मिला फायदा

    दक्षिण कोरिया में जनरेटिव एआई का रोजगार पर असर, युवाओं की 2.85 लाख नौकरियां घटीं, वरिष्ठ कर्मचारियों को मिला फायदा


    नई दिल्ली ।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल का असर अब रोजगार बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। दक्षिण कोरिया के केंद्रीय बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जनरेटिव एआई तकनीकों के तेजी से विस्तार के बाद एआई से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं के रोजगार में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि तकनीकी बदलाव का असर अलग-अलग आयु वर्ग के कर्मचारियों पर समान नहीं रहा है।

    जून 2022 से जून 2026 के बीच दक्षिण कोरिया में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लोगों द्वारा किए जा रहे कुल रोजगारों की संख्या में 2.85 लाख की कमी दर्ज की गई। इस गिरावट का सबसे बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों से जुड़ा रहा जिन्हें एआई के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता है। कुल कम हुए रोजगारों में करीब 2.68 लाख यानी लगभग 94 प्रतिशत नौकरियां एआई प्रभावित क्षेत्रों से संबंधित थीं।

    इन क्षेत्रों में आईटी सेवाएं, प्रकाशन, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और प्रोफेशनल सर्विसेज प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों में ऐसे काम बड़ी संख्या में शामिल हैं जिन्हें जनरेटिव एआई, ऑटोमेशन और डिजिटल टूल्स के जरिए तेजी से बदला या आसान किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, आईटी सेवाओं में युवाओं का रोजगार 31.4 प्रतिशत घटा। यह उन क्षेत्रों में सबसे बड़ी गिरावट रही, जहां एआई आधारित तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।

    प्रकाशन क्षेत्र में भी युवा रोजगार में 27.4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस श्रेणी में सॉफ्टवेयर और वेब डिजाइन से जुड़े पेशे भी शामिल हैं। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग क्षेत्र में युवाओं के रोजगार में 16.6 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि प्रोफेशनल सर्विसेज में यह कमी 11.6 प्रतिशत रही। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि एआई का शुरुआती प्रभाव उन नौकरियों पर अधिक पड़ सकता है जिनमें डिजिटल, दोहराए जाने वाले या सामग्री आधारित कार्य बड़ी भूमिका निभाते हैं।

    इसके विपरीत 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के कर्मचारियों के रोजगार में इसी अवधि के दौरान 2.30 लाख की बढ़ोतरी हुई। खास बात यह रही कि इनमें से 1.73 लाख रोजगार एआई प्रभावित क्षेत्रों में ही बढ़े। इससे यह संकेत मिलता है कि अनुभव, विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र की गहरी समझ वाले कर्मचारियों की मांग कई जगहों पर अभी भी मजबूत बनी हुई है।

    रिपोर्ट में 2022 को आधार वर्ष माना गया है। इसी वर्ष के अंत में चैटजीपीटी के लॉन्च के बाद जनरेटिव एआई तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ा। इसके बाद कंपनियों में कंटेंट तैयार करने, कोडिंग, डेटा विश्लेषण और अन्य डिजिटल कार्यों के लिए एआई आधारित उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे कंपनियों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ कुछ पारंपरिक भूमिकाओं की जरूरत पर भी असर पड़ा है।

    शिक्षा के आधार पर रोजगार की स्थिति में भी बदलाव सामने आया है। 2019 से 2022 के बीच स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रीधारकों की औसत बेरोजगारी दर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि माध्यमिक या जूनियर कॉलेज स्तर तक पढ़े युवाओं में यह 8 प्रतिशत थी। 2022 के बाद उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर 7 प्रतिशत रही, जबकि कम शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं में यह 5.4 प्रतिशत दर्ज की गई।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण कोरिया की लगातार घटती आबादी युवाओं के रोजगार में बदलाव का एक कारण हो सकती है। हालांकि एआई ने इस बदलाव को और तेज किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार एआई युवा कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ा सकता है, लेकिन यही तकनीक कुछ भूमिकाओं में उनके काम को प्रतिस्थापित भी कर सकती है। इसलिए चुनौती केवल नौकरियां घटने की नहीं, बल्कि युवाओं के लिए पारंपरिक करियर की शुरुआती सीढ़ियों के कमजोर होने की भी है।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती क्षमताओं के बीच एक नया मामला सामने आया है, जिसने एआई सुरक्षा और परीक्षण प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। मेटा ने खुलासा किया है कि उसके एक एआई मॉडल ने साइबर सिक्योरिटी परीक्षण के दौरान अनजाने में इंटरनेट तक पहुंच बना ली और इसके बाद एक बाहरी सर्विस सिस्टम की सुरक्षा कमजोरी का फायदा उठाकर उसमें अनधिकृत प्रवेश कर लिया। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह घटना परीक्षण के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी का परिणाम थी और इसकी विस्तृत जांच जारी है।

    कंपनी के अनुसार यह घटना उसके हाल ही में जारी किए गए एआई मॉडल ‘म्यूज स्पार्क 1.1’ के परीक्षण के दौरान हुई। परीक्षण के लिए तैयार किए गए विशेष वातावरण में एक गलत कॉन्फिगरेशन के कारण मॉडल इंटरनेट से कनेक्ट हो गया। सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार के परीक्षण पूरी तरह नियंत्रित और सीमित नेटवर्क पर किए जाते हैं, लेकिन तकनीकी त्रुटि के चलते मॉडल बाहरी नेटवर्क तक पहुंच गया। इसके बाद उसने एक थर्ड पार्टी सर्विस में मौजूद सुरक्षा कमजोरी का उपयोग करते हुए अनधिकृत पहुंच प्राप्त कर ली।

    मेटा ने कहा कि परीक्षण प्रक्रिया एक स्वतंत्र साइबर सिक्योरिटी पार्टनर के सहयोग से संचालित की जा रही थी। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि तकनीकी सेटअप में हुई कॉन्फिगरेशन संबंधी गलती के कारण यह स्थिति बनी। कंपनी ने जोर देकर कहा कि यह किसी जानबूझकर किए गए साइबर हमले का मामला नहीं था, बल्कि परीक्षण वातावरण में हुई चूक के कारण उत्पन्न हुई अप्रत्याशित घटना थी। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत समीक्षा की जा रही है और सभी तथ्य सामने आने के बाद विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाएगी।

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया भर की प्रमुख एआई कंपनियां अधिक सक्षम और स्वायत्त मॉडल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान अन्य बड़ी एआई कंपनियों ने भी परीक्षण के दौरान अपने मॉडल्स द्वारा बाहरी सिस्टम तक अनपेक्षित पहुंच बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी साझा की थी। इन घटनाओं ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि अत्यधिक सक्षम एआई मॉडल्स के परीक्षण के लिए वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक एआई एजेंट अब केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे नेटवर्क संरचना, सिस्टम की कमजोरियों और संभावित सुरक्षा खामियों की पहचान करने में भी पहले से अधिक सक्षम हो रहे हैं। यदि परीक्षण वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और अलग-थलग न हो तो इस प्रकार की घटनाएं भविष्य में बड़े जोखिम का कारण बन सकती हैं। यही वजह है कि नियंत्रित परीक्षण ढांचे, मजबूत नेटवर्क आइसोलेशन और बहुस्तरीय सुरक्षा उपायों की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है।

    घटना के बाद एआई सुरक्षा मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा की मांग भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई पीढ़ी के एआई मॉडल्स की बढ़ती क्षमताओं को देखते हुए केवल पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। कंपनियों को अधिक कठोर परीक्षण प्रोटोकॉल, सुरक्षित नेटवर्क संरचना और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट अपनाने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। फिलहाल मेटा पूरे मामले की जांच में जुटा है और अंतिम निष्कर्ष आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

  • एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    नई दिल्ली । कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एंथ्रोपिक ने भारत में अपने कारोबार का रणनीतिक विस्तार करते हुए एक बड़ी योजना की घोषणा की है। कंपनी के क्लाउड एआई मॉडल अब अमेजन बेडरॉक के भारतीय बुनियादी ढांचे के जरिए देश के भीतर ही संचालित होंगे। इस नई व्यवस्था से भारतीय उपयोगकर्ताओं और बड़े संगठनों का संवेदनशील एआई डाटा देश की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रहेगा, जिससे डेटा रेजिडेंसी और कानूनी नियमों का पालन करना अत्यधिक सुगम हो जाएगा।

    स्थानीय स्तर पर डेटा प्रोसेसिंग होने का सबसे बड़ा लाभ बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, सरकारी एजेंसियों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और अन्य विनियमित क्षेत्रों को प्राप्त होगा। इन क्षेत्रों में डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सर्वोपरि होती है। अमेजन वेब सर्विसेज इंडिया के अनुसार, भारतीय सर्वरों पर क्लाउड मॉडलों की उपलब्धता से घरेलू एआई आधारित एप्लीकेशन तैयार करने वाले डेवलपर्स और कंपनियों को कम लेटेंसी और बेहतर प्रदर्शन का लाभ मिलेगा।

    एंथ्रोपिक के अधिकारियों का मानना है कि भारत क्लाउड एआई के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। स्थानीय एआई विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कंपनी अपने पार्टनर नेटवर्क के माध्यम से भारत में 5,000 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित करने जा रही है। इसके साथ ही कंपनी भारत में अपने कार्यबल का विस्तार करने और भारतीय भाषाओं के लिए अपने मॉडल के समर्थन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

    साइबर सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए एंथ्रोपिक ने डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया, एमओएसआईपी और ओपनजीटूपी जैसी संस्थाओं के साथ साझेदारी की है। एआई आधारित सुरक्षा परीक्षण के माध्यम से संगठन अपनी सॉफ्टवेयर कमजोरियों की पहचान कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में एआई के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कंपनी ने कार्या के साथ भी सहयोग किया है, जिससे डिजिटल सेवाओं की पहुंच आम जनता तक आसान होगी।

  • सरकार का स्पैम कॉल और मैसेज पर बड़ा शिकंजा, पहली तिमाही में 1.83 लाख टेलीकॉम संसाधनों पर कार्रवाई

    सरकार का स्पैम कॉल और मैसेज पर बड़ा शिकंजा, पहली तिमाही में 1.83 लाख टेलीकॉम संसाधनों पर कार्रवाई

    नई दिल्ली । अनचाहे व्यावसायिक कॉल और संदेशों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में व्यापक कार्रवाई की है। संचार मंत्रालय के अनुसार अप्रैल से जून के बीच नियमों का उल्लंघन करने वाले 1.83 लाख टेलीकॉम संसाधनों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जबकि 263 प्रेषकों को ब्लैकलिस्ट किया गया। सरकार का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य मोबाइल उपभोक्ताओं को स्पैम कॉल और अवांछित प्रचार संदेशों से राहत दिलाना तथा दूरसंचार सेवाओं को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है।

    मंत्रालय के मुताबिक बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रेषकों के खिलाफ कई स्तरों पर कार्रवाई की गई। इनमें आउटगोइंग सेवाओं पर रोक लगाना, लंबे समय तक कनेक्शन निलंबित करना, सभी टेलीकॉम कंपनियों के स्तर पर ब्लैकलिस्ट करना और एसएमएस हेडर ब्लॉक करना जैसे कदम शामिल हैं। सरकार का मानना है कि ऐसे कड़े उपायों से अनधिकृत प्रचार गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा।

    आंकड़ों के अनुसार पहली तिमाही के दौरान देश के दूरसंचार नेटवर्क से कुल 730.82 अरब कॉल की गईं। इस दौरान अनचाहे व्यावसायिक संचार से संबंधित 10.85 लाख शिकायतें दर्ज हुईं। औसतन प्रत्येक 10 लाख कॉल पर लगभग 1.5 शिकायतें प्राप्त हुईं। मंत्रालय का कहना है कि लगातार निगरानी और कार्रवाई के कारण शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है।

    स्पैम कॉल और संदेशों की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक का भी उपयोग किया जा रहा है। एआई प्रणाली ने पहली तिमाही में 24.43 अरब संदिग्ध स्पैम कॉल और एसएमएस की पहचान की। इससे उपभोक्ताओं को ऐसे कॉल और संदेशों को लेकर सतर्क रहने तथा उन्हें स्वीकार या नजरअंदाज करने का बेहतर विकल्प मिला। मंत्रालय के अनुसार भविष्य में इस तकनीक को और अधिक उन्नत बनाया जाएगा ताकि धोखाधड़ी और स्पैम गतिविधियों पर तेजी से अंकुश लगाया जा सके।

    सरकार ने नियमों के पालन को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर चेतावनी अभियान भी चलाया। नई चेतावनी प्रणाली लागू होने के केवल एक सप्ताह के भीतर 2.43 लाख से अधिक चेतावनी संदेश संदिग्ध प्रेषकों को भेजे गए। इसका उद्देश्य नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उल्लंघन की घटनाओं को शुरुआती स्तर पर ही रोकना है।

    मंत्रालय ने बताया कि स्पैम शिकायत दर्ज कराने के लिए ट्राई का डीएनडी ऐप सबसे अधिक उपयोग किया जा रहा है। कुल शिकायतों में लगभग 89 प्रतिशत शिकायतें इसी ऐप के माध्यम से दर्ज हुईं। इसके अलावा उपभोक्ता अपने टेलीकॉम सेवा प्रदाता की वेबसाइट, मोबाइल ऐप या 1909 पर कॉल अथवा एसएमएस के जरिए भी अपनी डू नॉट डिस्टर्ब प्राथमिकताएं दर्ज और संशोधित कर सकते हैं।

    सरकार के अनुसार देश में अब भी 112 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ताओं ने डीएनडी प्राथमिकताएं दर्ज नहीं कराई हैं। ऐसे उपभोक्ताओं तक पंजीकृत टेलीमार्केटर और कंपनियां व्यावसायिक कॉल तथा संदेश भेज सकती हैं। मंत्रालय ने लोगों से अपनी डीएनडी प्राथमिकताएं दर्ज कराने की अपील की है। सरकार का दावा है कि डीएनडी व्यवस्था के कारण पहली तिमाही में 1.48 अरब प्रमोशनल कॉल और 7.30 अरब प्रमोशनल एसएमएस ब्लॉक किए गए। साथ ही प्रमोशनल कॉल के लिए 140 सीरीज और बैंकिंग तथा सरकारी सेवाओं से जुड़े कॉल के लिए 1600 सीरीज का उपयोग जारी है, जिससे उपभोक्ताओं को आधिकारिक और प्रचार संबंधी कॉल की पहचान करने में आसानी मिल रही है।

  • भारत में डेटा सेंटर का बढ़ता जाल, 2030 तक लाखों नौकरियों और रियल एस्टेट में आएगा बड़ा बदलाव

    भारत में डेटा सेंटर का बढ़ता जाल, 2030 तक लाखों नौकरियों और रियल एस्टेट में आएगा बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । भारत में डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के बीच डेटा सेंटर परियोजनाएं आने वाले वर्षों में रोजगार, बुनियादी ढांचे और रियल एस्टेट क्षेत्र के विकास का बड़ा आधार बन सकती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रस्तावित लगभग 9,030 मेगावाट क्षमता वाली डेटा सेंटर परियोजनाएं वर्ष 2030 तक करीब 4.33 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा इन परियोजनाओं के आसपास आवासीय क्षेत्र में भी बड़ी मांग उत्पन्न होने का अनुमान लगाया गया है।

    डेटा सेंटर आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, क्योंकि इनमें इंटरनेट सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बड़े पैमाने पर डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी तकनीकी ढांचा तैयार किया जाता है। भारत में डिजिटल गतिविधियों के बढ़ने के साथ डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश को गति मिल रही है।

    रिपोर्ट के मुताबिक भारत वर्तमान में दुनिया के कुल डिजिटल डेटा का लगभग 20 प्रतिशत तैयार करता है, लेकिन वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता में देश की हिस्सेदारी करीब 4 प्रतिशत ही है। यह अंतर बताता है कि भारत में डेटा सेंटर अवसंरचना के विस्तार की काफी संभावनाएं मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में डिजिटल सेवाओं की मांग बढ़ने के साथ इस क्षेत्र में बड़े निवेश की उम्मीद जताई जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटर केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनके निर्माण और संचालन से आसपास के क्षेत्रों में कई अन्य गतिविधियां भी विकसित होती हैं। बिजली आपूर्ति व्यवस्था, फाइबर नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा सेवाएं और अन्य व्यावसायिक सुविधाओं का विस्तार होता है, जिससे नए आर्थिक केंद्रों का विकास शुरू हो जाता है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा सेंटर परियोजनाओं का असर लंबे समय तक रहने वाला है। इन परियोजनाओं के आसपास रोजगार बढ़ने के साथ आवासीय मांग भी तेजी से बढ़ सकती है। अनुमान के अनुसार डेटा सेंटर परिसरों के आसपास 5 से 15 किलोमीटर का क्षेत्र सबसे अधिक लाभान्वित हो सकता है। इन क्षेत्रों में सड़क, बिजली और संचार सुविधाओं के विकास के साथ आवासीय टाउनशिप, खुदरा बाजार और अन्य नागरिक सुविधाओं का विस्तार होने की संभावना है।

    डेटा सेंटर आधारित विकास को रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए भी एक नए अवसर के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक इन परियोजनाओं के कारण देश में लगभग 19.5 करोड़ वर्गफुट अतिरिक्त आवासीय मांग पैदा हो सकती है। इससे नए विकास क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    राज्यों के स्तर पर महाराष्ट्र को इसका सबसे अधिक फायदा मिलने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में डेटा सेंटर निवेश के कारण करीब 5.4 करोड़ वर्गफुट से अधिक आवासीय मांग पैदा हो सकती है। इसके बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी बड़े अवसर बनने की संभावना जताई गई है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पहले राजमार्ग, औद्योगिक गलियारे, हवाई अड्डे और आईटी पार्क आर्थिक विकास के प्रमुख केंद्र रहे हैं। अब डेटा सेंटर इस विकास यात्रा का नया आधार बन सकते हैं। इनके लिए जरूरी बिजली, इंटरनेट कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में निवेश बढ़ने से उद्योगों और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड सेवाओं और डिजिटल कारोबार के विस्तार के साथ डेटा सेंटर क्षेत्र आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रोजगार सृजन के साथ-साथ यह क्षेत्र नए शहरी विकास क्षेत्रों को भी आकार देने वाला प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर केंद्र बन सकता है।

  • बाबा वैद्यनाथ धाम में श्रावणी मेले की तैयारियां तेज, सुरक्षा और सुविधाओं के लिए एआई आधारित निगरानी व्यवस्था होगी लागू

    बाबा वैद्यनाथ धाम में श्रावणी मेले की तैयारियां तेज, सुरक्षा और सुविधाओं के लिए एआई आधारित निगरानी व्यवस्था होगी लागू

    नई दिल्ली । झारखंड के विश्व प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथ धाम में आयोजित होने वाले राजकीय श्रावणी मेला 2026 को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। इस वर्ष मेला 30 जुलाई से 28 अगस्त तक आयोजित होगा। श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। सबसे अहम निर्णय यह है कि पूरे मेले के दौरान बाबा वैद्यनाथ मंदिर में वीआईपी और वीवीआईपी दर्शन की व्यवस्था पूरी तरह बंद रहेगी, जिससे सभी श्रद्धालुओं को समान अवसर के साथ दर्शन की सुविधा मिल सके।

    श्रावणी मेले की तैयारियों की समीक्षा के दौरान संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए कि 28 जुलाई तक सभी आवश्यक व्यवस्थाएं हर हाल में पूरी कर ली जाएं। इसके बाद 29 जुलाई को देवघर और दुमका में उपलब्ध सुविधाओं की दोबारा समीक्षा की जाएगी, ताकि मेले के शुभारंभ से पहले किसी भी कमी को दूर किया जा सके। अधिकारियों से समयबद्ध तरीके से सभी कार्य पूरे करने पर विशेष जोर दिया गया।

    श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए इस बार आधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाएगा। मेले में एआई आधारित इंटीग्रेटेड कंट्रोल रूम स्थापित किया जाएगा, जहां से सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और विभिन्न गतिविधियों की निगरानी की जाएगी। इसके अलावा एआई कैमरे, फेस रिकॉग्निशन प्रणाली, ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली, ड्रोन निगरानी, वाहन पहचान कैमरे और हेड काउंटिंग तकनीक का उपयोग भी किया जाएगा। शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए क्यूआर आधारित शिकायत प्रणाली और डिजिटल सूचना व्यवस्था भी विकसित की जाएगी।

    श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए टेंट सिटी की क्षमता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि अधिक संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर आवास उपलब्ध कराया जा सके। इसके साथ ही पेयजल, शौचालय, स्नानगृह, साफ-सफाई, कूड़ेदान और कचरा उठाने की व्यवस्था चौबीसों घंटे सुचारु रखने पर विशेष जोर दिया गया है। गर्मी और उमस से राहत देने के लिए मिस्ट कूलिंग सिस्टम और अन्य शीतलन सुविधाओं का भी विस्तार किया जाएगा।

    सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मेला क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस चौकियां, ट्रैफिक नियंत्रण केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र, सूचना एवं सहायता केंद्र, विद्युत केंद्र और मातृत्व विश्राम गृह जैसी सुविधाओं को बेहतर बनाया जाएगा। इसके अलावा पूरे क्षेत्र में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, आकर्षक प्रवेश द्वार और वैकल्पिक बिजली आपूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि किसी भी आपात स्थिति में श्रद्धालुओं को परेशानी न हो।

    देवघर और बासुकीनाथ के बीच श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए जिला प्रशासन और राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ यातायात व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। उद्देश्य यह है कि श्रद्धालुओं को यात्रा के दौरान जाम या अन्य अव्यवस्थाओं का सामना न करना पड़े।

    प्रशासन का मानना है कि आधुनिक तकनीक, प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था और बेहतर आधारभूत सुविधाओं के समन्वय से इस वर्ष का श्रावणी मेला अधिक सुव्यवस्थित, सुरक्षित और श्रद्धालु-केंद्रित होगा। समान दर्शन व्यवस्था, डिजिटल सेवाओं और एआई आधारित निगरानी प्रणाली के माध्यम से श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव उपलब्ध कराने की तैयारी की गई है।

  • चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की शोध टीम ने रचा नया इतिहास, एआई आधारित पर्सनलाइज्ड लर्निंग डिवाइस को मिला सरकारी पंजीकरण

    चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की शोध टीम ने रचा नया इतिहास, एआई आधारित पर्सनलाइज्ड लर्निंग डिवाइस को मिला सरकारी पंजीकरण

    नई दिल्ली । महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय ने शिक्षा और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा विकसित कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एक अभिनव शैक्षणिक उपकरण के डिज़ाइन को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से पंजीकरण प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि को देश में डिजिटल और व्यक्तिगत शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे विश्वविद्यालय की शोध क्षमता और नवाचार आधारित कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

    विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. देव रस पाण्डेय और उनकी टीम द्वारा विकसित इस तकनीकी डिज़ाइन का नाम “एआई-इनहांस्ड एजुकेशनल डिवाइस फॉर पर्सनलाइज्ड लर्निंग” रखा गया है। यह उपकरण विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता, अध्ययन की गति, रुचि और व्यक्तिगत आवश्यकताओं का कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से विश्लेषण करता है। इसके आधार पर यह प्रत्येक छात्र के लिए उपयुक्त अध्ययन सामग्री और सीखने का मार्ग तैयार करने में सक्षम है, जिससे शिक्षा अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बन सकती है।

    विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस उपलब्धि को संस्थान के लिए गर्व का विषय बताया है। कुलगुरु प्रो. आलोक चौबे ने कहा कि विश्वविद्यालय लगातार नवाचार आधारित अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नई तकनीकों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उनके अनुसार यह उपलब्धि शोध संस्कृति को मजबूत करने के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को भी नई गति देगी।

    डॉ. देव रस पाण्डेय ने बताया कि आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण आधार बनने जा रही है। उनका कहना है कि यह तकनीक स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल शिक्षा, अनुकूली शिक्षण प्रणाली और व्यक्तिगत अध्ययन मॉडल को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगी। यह उपकरण विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति का निरंतर विश्लेषण कर उन्हें उनकी जरूरत के अनुसार अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने में सक्षम होगा, जिससे सीखने की गुणवत्ता में सुधार की संभावना बढ़ेगी।

    डॉ. पाण्डेय लंबे समय से कंप्यूटर साइंस और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान कर रहे हैं। उन्होंने क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल लाइब्रेरी, ऑपरेटिंग सिस्टम आधारित वर्चुअलाइजेशन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, साइबर सुरक्षा, वाहन डेटा संरक्षण, डीप लर्निंग, ऑटोनॉमस रोबोटिक्स, हेल्थकेयर डेटा गुणवत्ता सुधार तथा एआई आधारित तकनीकों जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण शोध कार्य किए हैं। उनके अनुसंधान का उद्देश्य आधुनिक तकनीक को समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए अधिक उपयोगी बनाना रहा है।

    शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह पंजीकृत डिज़ाइन भविष्य की डिजिटल शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण तथा तकनीक-सक्षम शिक्षा पहुंचाने में इस प्रकार की एआई आधारित प्रणालियां उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं। इससे विद्यार्थियों को उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार सीखने का अवसर मिलेगा और शिक्षा अधिक समावेशी एवं प्रभावी बन सकेगी।

    विश्वविद्यालय परिवार ने इस उपलब्धि पर डॉ. देव रस पाण्डेय और उनकी शोध टीम को बधाई दी है। संस्थान ने विश्वास व्यक्त किया है कि यह नवाचार भारत की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, तकनीक-संचालित और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा। साथ ही यह उपलब्धि विश्वविद्यालय की अनुसंधान क्षमता और राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी उत्कृष्टता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी मजबूत आधार प्रदान करती है।

  • Meesho पर संस्थागत निवेशकों का बढ़ा भरोसा, लगातार दो तिमाहियों से FII-DII ने बढ़ाई हिस्सेदारी, मजबूत संकेतों पर बाजार की नजर

    Meesho पर संस्थागत निवेशकों का बढ़ा भरोसा, लगातार दो तिमाहियों से FII-DII ने बढ़ाई हिस्सेदारी, मजबूत संकेतों पर बाजार की नजर

    नई दिल्ली । ई-कॉमर्स क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Meesho लिमिटेड में विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत होता दिखाई दे रहा है। कंपनी के ताजा शेयरहोल्डिंग आंकड़ों के अनुसार पिछले दो तिमाहियों के दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) दोनों ने अपनी हिस्सेदारी में बढ़ोतरी की है। बाजार विशेषज्ञ इसे कंपनी के बेहतर परिचालन प्रदर्शन, मजबूत वित्तीय संकेतकों और भविष्य की विकास संभावनाओं के प्रति बढ़ते विश्वास का संकेत मान रहे हैं।

    जून 2026 तिमाही के आंकड़ों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 5.2 प्रतिशत हो गई है। इससे पहले मार्च 2026 में यह 4.2 प्रतिशत थी। लगातार दूसरी तिमाही में विदेशी निवेशकों द्वारा हिस्सेदारी बढ़ाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कंपनी की दीर्घकालिक संभावनाओं को लेकर वैश्विक निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है। शेयर बाजार में FII की लगातार खरीदारी को अक्सर सकारात्मक निवेश संकेत माना जाता है।

    घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भी कंपनी में अपना निवेश उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है। दिसंबर 2025 में DII की हिस्सेदारी 5.3 प्रतिशत थी, जो मार्च 2026 में बढ़कर 5.6 प्रतिशत हुई और जून 2026 में तेज उछाल के साथ 9.1 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों और अन्य घरेलू संस्थानों ने Meesho में निवेश बढ़ाने का फैसला किया है। इससे कंपनी के प्रति घरेलू निवेशकों का बढ़ता विश्वास भी स्पष्ट होता है।

    संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ कंपनी की प्रमोटर और सार्वजनिक हिस्सेदारी में मामूली कमी दर्ज की गई है। प्रमोटर हिस्सेदारी 16.6 प्रतिशत से घटकर 16.4 प्रतिशत रह गई, जबकि सार्वजनिक हिस्सेदारी 73.7 प्रतिशत से घटकर 69.3 प्रतिशत पर आ गई। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी के शेयरों का बड़ा हिस्सा अब संस्थागत निवेशकों के पास जा रहा है, जिसे बाजार स्थिर निवेश का सकारात्मक संकेत मानता है।

    कंपनी के परिचालन प्रदर्शन में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में योगदान मार्जिन 170 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 4 प्रतिशत तक पहुंच गया। कंपनी का कहना है कि लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी लागत में कमी, प्रीपेड ऑर्डर बढ़ने तथा डिलीवरी विफल होने की घटनाओं में कमी आने से परिचालन खर्च नियंत्रित हुआ है। इससे कंपनी की लाभप्रदता में सुधार हुआ है और भविष्य में बेहतर नकदी प्रवाह की संभावना भी मजबूत हुई है।

    Meesho का विज्ञापन कारोबार भी तेजी से विस्तार कर रहा है। कंपनी के विज्ञापन प्लेटफॉर्म पर सक्रिय विक्रेताओं की संख्या में पिछले एक वर्ष के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही विज्ञापन पर खर्च करने वाले कारोबारियों की संख्या और बजट दोनों में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा कंपनी द्वारा AI आधारित वॉयस शॉपिंग असिस्टेंट का उपयोग ग्रामीण और नए ग्राहकों तक पहुंच बनाने में किया जा रहा है, जिससे ग्राहक अधिग्रहण लागत कम होने और कारोबार के विस्तार में मदद मिल रही है।

    बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मजबूत परिचालन प्रदर्शन, लागत नियंत्रण, विज्ञापन कारोबार का विस्तार और तकनीक आधारित रणनीति Meesho की दीर्घकालिक विकास क्षमता को मजबूत बना रहे हैं। यही कारण है कि संस्थागत निवेशकों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है। आने वाली तिमाहियों में कंपनी के वित्तीय नतीजों और कारोबार की प्रगति पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।