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  • इच्छामृत्यु से अंगदान तक हरीश राणा की जिंदगी की कहानी अब फिल्म बनेगी.

    इच्छामृत्यु से अंगदान तक हरीश राणा की जिंदगी की कहानी अब फिल्म बनेगी.


    नई दिल्ली:कभी-कभी जिंदगी ऐसी कहानी लिखती है, जिसे सुनकर हर कोई भीतर तक हिल जाता है. हरीश राणा की कहानी भी ऐसी ही एक दर्दभरी लेकिन साहस से भरी दास्तान है, जिसमें 13 साल का लंबा इंतजार, परिवार का अटूट साथ और अंत में इंसानियत की मिसाल देखने को मिलती है. अब यही कहानी बड़े पर्दे पर आने की तैयारी में है, जिसने पहले ही लोगों के दिलों को छूना शुरू कर दिया है.

    करीब 13 साल पहले एक हादसे ने हरीश राणा की पूरी जिंदगी बदल दी. वह एक होनहार छात्र थे और सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन रक्षाबंधन के दिन हुए एक हादसे में वह चौथी मंजिल से गिर गए. इस हादसे के बाद डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से जूझ रहे हैं, जिसमें शरीर के चारों अंग काम करना बंद कर देते हैं. एक पल में उनका सक्रिय जीवन पूरी तरह बिस्तर तक सिमट गया.

    इसके बाद शुरू हुआ दर्द, संघर्ष और उम्मीद का लंबा सफर. परिवार ने कभी हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में हरीश के साथ खड़ा रहा. इलाज, देखभाल और उम्मीद के बीच साल दर साल बीतते गए, लेकिन हालत में कोई बड़ा सुधार नहीं आया. आखिरकार परिवार ने कानूनी रास्ता अपनाया और इस मामले को अदालत तक लेकर गए.

    लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी. यह फैसला जितना संवेदनशील था, उतना ही भावनात्मक भी. इसके बाद उन्हें एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर वार्ड में शिफ्ट किया गया, जहां उनकी तकलीफ को कम करने के लिए विशेष चिकित्सा प्रक्रिया अपनाई जा रही है.

     ताकि उन्हें कम से कम दर्द महसूस हो. मेडिकल बोर्ड की निगरानी में हर कदम बेहद सावधानी से उठाया जा रहा है.

    इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पहलू है परिवार का साहस और उनका बड़ा फैसला. हरीश के पिता अशोक राणा ने अपने बेटे के अंगदान का निर्णय लिया है. यह फैसला न सिर्फ उनके बेटे की पीड़ा को एक अर्थ देता है, बल्कि समाज के लिए भी एक प्रेरणा बनता है. इतने सालों तक बेटे को इस हालत में देखना किसी भी माता-पिता के लिए असहनीय होता है, लेकिन उन्होंने हर पल धैर्य और हिम्मत दिखाई.

    अब इस सच्ची घटना पर फिल्म बनाने की योजना भी सामने आई है. एक राइटर प्रोड्यूसर ने इस कहानी को बड़े पर्दे पर लाने की इच्छा जताई है और इसके लिए बातचीत भी शुरू हो चुकी है. हालांकि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए फिलहाल जल्दबाजी नहीं की जा रही है.

    हरीश राणा की कहानी सिर्फ दर्द और अंत की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्यार, त्याग और इंसानियत की गहराई को भी दर्शाती है. जब यह कहानी बड़े पर्दे पर आएगी, तो शायद हर दर्शक के दिल में कई सवाल और भावनाएं छोड़ जाएगी. यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि मुश्किल हालात में भी इंसानियत और संवेदनशीलता सबसे बड़ी ताकत होती है.

  • 3 साल की अनिका के लिए समय से दौड़: 13.5 किलो से पहले लगना है 9 करोड़ का इंजेक्शन, अब भी चाहिए 3.40 करोड़

    3 साल की अनिका के लिए समय से दौड़: 13.5 किलो से पहले लगना है 9 करोड़ का इंजेक्शन, अब भी चाहिए 3.40 करोड़


    इंदौर। तीन साल दो महीने की मासूम अनिका शर्मा इन दिनों जिंदगी की सबसे कठिन जंग लड़ रही है। वह दुर्लभ बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी टाइप 2 से पीड़ित है। डॉक्टरों ने साफ कहा है कि उसे 9 करोड़ रुपए का विशेष इंजेक्शन 13.5 किलो वजन होने से पहले लगना जरूरी है। फिलहाल उसका वजन 10.5 किलो है। अगर वजन तय सीमा से ऊपर चला गया तो इलाज का यह आखिरी मौका भी हाथ से निकल सकता है।

    अनिका के माता पिता पिछले तीन महीनों से उसका वजन नियंत्रित रखने के लिए सख्त डाइट फॉलो करवा रहे हैं। मां सरिता शर्मा बताती हैं कि बच्ची को रोटी चावल या वजन बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ नहीं दिए जा रहे। उसे पपीता सीमित फ्रूट जूस चाय बिस्किट और मखाना बादाम अखरोट से बना हलवा दिया जाता है ताकि पेट भी भरे और वजन भी न बढ़े। कई बार अनिका सुबह से शाम तक भूखी रह जाती है क्योंकि वह रोज एक जैसा खाना खाकर परेशान हो चुकी है।

    इलाज के लिए जो इंजेक्शन लगना है वह अमेरिकी कंपनी बनाती है और बेहद महंगा है। दिल्ली स्थित AIIMS से मिले प्रिस्क्रिप्शन के अनुसार इलाज के दो मापदंड थे पहला दो साल की उम्र से पहले इंजेक्शन लगना चाहिए था जो निकल चुका है; दूसरा 13.5 किलो वजन से पहले इंजेक्शन लगना अनिवार्य है। अब यही अंतिम उम्मीद बची है।

    परिवार नवंबर से क्राउड फंडिंग अभियान चला रहा है। अब तक 5 करोड़ 60 लाख रुपए जुटाए जा चुके हैं लेकिन 3 करोड़ 40 लाख रुपए अभी और चाहिए। अनिका के पिता प्रवीण शर्मा बताते हैं कि इंदौर के अलावा रतलाम बदनावर बड़नगर में कैंप लगाकर सहयोग मांगा गया है और अब खंडवा व उज्जैन में अभियान की तैयारी है। कई लोगों और हस्तियों ने भी वीडियो संदेश जारी कर मदद की अपील की है।

    बीमारी की गंभीरता समझाते हुए एमजीएम मेडिकल कॉलेज के पूर्व डीन डॉ. हेमंत जैन बताते हैं कि एसएमए एक दुर्लभ न्यूरो मस्क्यूलर जेनेटिक बीमारी है जिसमें रीढ़ की हड्डी की मोटर नर्व सेल्स धीरे धीरे नष्ट होने लगती हैं। दिमाग से मांसपेशियों तक सिग्नल नहीं पहुंच पाते जिससे बच्चा शरीर पर नियंत्रण खोने लगता है। समय के साथ बैठना चलना निगलना और सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है।

    डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी की पहचान गर्भावस्था में भी संभव है। समय रहते इलाज मिल जाए तो स्थिति बेहतर हो सकती है लेकिन देरी होने पर नष्ट हुई कोशिकाएं दोबारा जीवित नहीं की जा सकतीं। इंजेक्शन केवल नई कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करता है।

    अनिका की मां कहती हैं अगर उसका वजन बढ़ गया तो हमारी सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। परिवार को अब भी समाज से उम्मीद है कि शेष राशि जुटाकर मासूम की जिंदगी बचाई जा सके।

  • UP Medical Negligence: मोतियाबिंद सर्जरी बनी काल! 42 मरीजों में फैला खतरनाक संक्रमण, स्वास्थ्य विभाग ने सील किया अस्पताल का ओटी

    UP Medical Negligence: मोतियाबिंद सर्जरी बनी काल! 42 मरीजों में फैला खतरनाक संक्रमण, स्वास्थ्य विभाग ने सील किया अस्पताल का ओटी


    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से एक ऐसी झकझोर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य मानकों और निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। सिकरीगंज स्थित न्यू राजेश हाईटेक हॉस्पिटल में एक और दो फरवरी को मोतियाबिंद की सर्जरी कराने वाले परिवारों के लिए यह ऑपरेशन किसी भयावह दुस्वप्न में बदल गया है। अस्पताल में सर्जरी कराने वाले कुल 42 मरीजों में से 22 की हालत इतनी बिगड़ी कि उन्हें आनन-फानन में दिल्ली के एम्स अस्पताल रेफर करना पड़ा। संक्रमण की तीव्रता इतनी घातक थी कि अब तक चार मरीजों की आंखें सर्जरी कर निकालनी पड़ी हैं, जबकि छह अन्य की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए बुझ चुकी है। यह पूरी घटना स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और संक्रमण नियंत्रण की पोल खोलती नजर आ रही है।

    एम्स के विशेषज्ञों की देखरेख में चल रहे इस उपचार के दौरान कई दर्दनाक कहानियां सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि शुरुआत में सात मरीजों को भर्ती कराया गया था, लेकिन संक्रमण की गंभीरता के चलते मंगलवार और बुधवार के बीच 15 और मरीज दिल्ली पहुंच गए। इन सभी की आंखों में संक्रमण फैल चुका है और उनका इलाज विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में जारी है। जिन 12 मरीजों में संक्रमण की स्थिति बेहद गंभीर थी, उनमें से चार की आंखें निकालनी पड़ीं ताकि संक्रमण दिमाग तक न पहुंचे। तीन अन्य मरीजों की स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है और डॉक्टर एक से दो दिन में आगे की सर्जरी या उपचार को लेकर निर्णय लेंगे।

    बेलघाट क्षेत्र की रहने वाली 60 वर्षीय महिला बहाउद्दीन का इलाज एम्स में चल रहा है। उनकी बेटी के अनुसार संक्रमण के कारण उनकी मां की आंखों की रोशनी चली गई। इसी तरह बारी गांव की देवराजी की आंख में संक्रमण इतना बढ़ गया कि मवाद और खून आने लगा। जांच के बाद डॉक्टरों ने पाया कि रोशनी पूरी तरह जा चुकी है और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए आंख निकालनी पड़ी। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों ने बताया कि देरी होती तो संक्रमण का असर दिमाग तक पहुंच सकता था। इन्नडीह के अर्जुन सिंह और बेलीपार के रामदरश सहित अन्य मरीजों की भी आंखें निकालनी पड़ी हैं या अतिरिक्त सर्जरी की तैयारी चल रही है। इन घटनाओं ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी है।

    मामले की जांच के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी टीम ने अस्पताल पहुंचकर ऑपरेशन थियेटर और अन्य स्थानों से 10 से अधिक सैंपल लिए हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. अमरेश सिंह के अनुसार जांच रिपोर्ट गुरुवार तक आने की संभावना है। रिपोर्ट से संक्रमण के असली कारणों का पता चल सकेगा। अस्पताल संचालक राजेश राय का कहना है कि उनके यहां वर्षों से मोतियाबिंद की सर्जरी की जा रही है और पहली बार इस तरह की घटना सामने आई है।

    एसीएमओ डॉ. एके चौधरी ने बताया कि अस्पताल का ऑपरेशन थियेटर सील कर दिया गया है और स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले पर नजर रखे हुए है। रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर निजी अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण और ऑपरेशन थियेटर की स्वच्छता को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। फिलहाल पीड़ित परिवारों की उम्मीद एम्स के डॉक्टरों पर टिकी है।