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  • एमबीबीएस अभ्यर्थियों के लिए एम्स कल्याणी में निकली 84 पदों पर भर्ती, जानिए योग्यता, चयन प्रक्रिया और अंतिम तिथि

    एमबीबीएस अभ्यर्थियों के लिए एम्स कल्याणी में निकली 84 पदों पर भर्ती, जानिए योग्यता, चयन प्रक्रिया और अंतिम तिथि

    नई दिल्ली । सरकारी मेडिकल संस्थान में नौकरी की तैयारी कर रहे एमबीबीएस अभ्यर्थियों के लिए अच्छी खबर है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) कल्याणी ने जूनियर रेजिडेंट (गैर-शैक्षणिक) के 84 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी है। योग्य और इच्छुक उम्मीदवार निर्धारित पात्रता पूरी करने के बाद 24 अगस्त तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। भर्ती प्रक्रिया कार्यकाल आधारित होगी और चयनित अभ्यर्थियों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार वेतन और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

    जारी भर्ती अधिसूचना के अनुसार कुल 84 रिक्तियों में विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग पद निर्धारित किए गए हैं। इनमें अनारक्षित वर्ग के लिए 34, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 8, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 23, अनुसूचित जाति के लिए 13 और अनुसूचित जनजाति के लिए 6 पद शामिल हैं। आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन रखी गई है और उम्मीदवारों को अंतिम तिथि की शाम 5 बजे तक अपना आवेदन सफलतापूर्वक जमा करना होगा।

    भर्ती के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के पास राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से मान्यता प्राप्त संस्थान से एमबीबीएस की डिग्री होना अनिवार्य है। इसके साथ ही अभ्यर्थी ने अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी कर ली हो और उसके पास इंटर्नशिप पूर्ण होने का प्रमाणपत्र उपलब्ध होना चाहिए। किसी भी राज्य मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण भी आवश्यक शर्तों में शामिल है। जिन अभ्यर्थियों ने पहले दो बार जूनियर रेजिडेंसी पूरी कर ली है, उन्हें इस भर्ती प्रक्रिया में पात्र नहीं माना जाएगा।

    अभ्यर्थियों की अधिकतम आयु 33 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना आवेदन की अंतिम तिथि के आधार पर होगी। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नियमों के अनुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट का लाभ मिलेगा। अभ्यर्थियों को आवेदन से पहले सभी पात्रता शर्तों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने की सलाह दी गई है।

    चयन प्रक्रिया में सबसे पहले आवेदन पत्र और आवश्यक दस्तावेजों की जांच की जाएगी। इसके बाद पात्र अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में शामिल होना होगा। लिखित परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को व्यक्तिगत साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा। अंतिम चयन दोनों चरणों में प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार लिखित परीक्षा 8 सितंबर को एम्स कल्याणी परिसर में आयोजित की जाएगी, जबकि साक्षात्कार की तिथि बाद में अलग से घोषित की जाएगी।

    चयनित उम्मीदवारों को सातवें वेतन आयोग के पे मैट्रिक्स के लेवल-10 के अनुसार वेतन मिलेगा। इसके साथ 5,400 रुपये ग्रेड पे तथा अन्य निर्धारित भत्ते और सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी। आवेदन शुल्क सामान्य और ओबीसी वर्ग के लिए 1,000 रुपये तथा एससी, एसटी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए 500 रुपये निर्धारित किया गया है। दिव्यांग श्रेणी के उम्मीदवारों को आवेदन शुल्क से छूट दी गई है।

    सरकारी मेडिकल संस्थानों में कार्य करने की इच्छा रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह भर्ती एक महत्वपूर्ण अवसर मानी जा रही है। ऐसे उम्मीदवार जो निर्धारित योग्यता रखते हैं, वे समय सीमा के भीतर आवेदन प्रक्रिया पूरी कर इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं।

  • MP: इंदौर की 3 वर्षीय अनिका के लिए एक-एक पल भारी, राशि जुटाने के बाद शुरू नहीं हुआ इलाज…. AIIMS में घूम रहीं फाइलें

    MP: इंदौर की 3 वर्षीय अनिका के लिए एक-एक पल भारी, राशि जुटाने के बाद शुरू नहीं हुआ इलाज…. AIIMS में घूम रहीं फाइलें


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इंदौर (Indore) की तीन वर्षीय अनिका शर्मा (Anika Sharma) के लिए समय लगातार भारी पड़ता जा रहा है. स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी (Spinal Muscular Atrophy- SMA) टाइप-2 जैसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही इस मासूम का इलाज अब भी शुरू नहीं हो पाया है. जबकि परिवार, समाज और संस्थाओं की मदद से उपचार के लिए अधिकांश राशि जुटाई जा चुकी है. इसके बावजूद प्रशासनिक देरी बच्ची के इलाज की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है.

    दरअसल, इसी मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने सुनवाई करते हुए दिल्ली एम्स की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई. अदालत ने पाया कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद एम्स की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया गया. इस पर अदालत ने साफ निर्देश दिए कि हर हाल में 23 जुलाई 2026 तक जवाब पेश किया जाए. मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को होगी।

    याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि इलाज के लिए अब केवल सीमित राशि की जरूरत है, लेकिन एम्स की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने से जीवनरक्षक इंजेक्शन की खरीद अटकी हुई है. एक ओर केंद्र सरकार से स्वीकृत सहायता की प्रक्रिया लंबित है, तो दूसरी ओर क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि भी इनवॉइस के अभाव में जारी नहीं हो पा रही है।

    हाईकोर्ट ने संकेत दिए हैं कि इतने संवेदनशील मामले में अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी, क्योंकि अनिका के लिए बीतता हर दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि जिंदगी और उम्मीद के बीच की दूरी बढ़ा रहा है।

    इससे पहले, हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से 22 जून को जवाब तलब किया था. साथ ही राज्य सरकार से यह बताने को कहा था कि वह बच्ची के इलाज में किसी प्रकार सहायता कर सकती है या नहीं?

    बता दें कि बच्ची के इलाज के लिए करीब 9.50 करोड़ रुपये की जरूरत है. परिजन अब तक करीब 8 करोड़ रुपये जुटा चुके हैं, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से स्वीकृत 50 लाख रुपये और तमाम लोगों एवं सामाजिक संगठनों से प्राप्त सहयोग राशि शामिल है.

    बच्ची के इलाज के लिए अमेरिका से एक इंजेक्शन मंगाया जाना है. यह इंजेक्शन मंगवाकर उसका इलाज जल्द से जल्द शुरू किया जाना चाहिए, क्योंकि हर गुजरते दिन के साथ उसके स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ रहा है.

    स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक आनुवंशिक तंत्रिका-मांसपेशीय रोग है. इसमें रीढ़ की हड्डी में मौजूद ‘मोटर न्यूरॉन’ धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं, जिससे मांसपेशियां कमजोर होती जाती हैं और उनका क्षय होने लगता है.

    ‘मोटर न्यूरॉन’ मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में पाई जाने वाली खास तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं, जो दिमाग से शरीर की मांसपेशियों तक अलग-अलग क्रियाओं के वास्ते संदेश पहुंचाती हैं, जिनमें सांस लेना, निगलना और बोलना शामिल हैं. फिलहाल मासूम की हालत स्थिर है और उसे डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है।

  • दुर्लभ बीमारी से जूझ रही तीन वर्षीय बच्ची के इलाज में कथित देरी पर हाई कोर्ट सख्त, दिल्ली AIIMS से मांगा जवाब, 23 जुलाई तक रिपोर्ट तलब

    दुर्लभ बीमारी से जूझ रही तीन वर्षीय बच्ची के इलाज में कथित देरी पर हाई कोर्ट सख्त, दिल्ली AIIMS से मांगा जवाब, 23 जुलाई तक रिपोर्ट तलब


    मध्य प्रदेश: हाई कोर्ट ने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) टाइप-2 जैसी दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित तीन वर्षीय बच्ची के इलाज में कथित देरी को गंभीरता से लेते हुए नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) से निर्धारित समय सीमा के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की संवेदनशीलता और बच्ची की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए जवाब 23 जुलाई तक हर हाल में दाखिल किया जाना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को निर्धारित की गई है।

    इंदौर निवासी तीन वर्षीय अनिका शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। सुनवाई के दौरान AIIMS की ओर से पेश अधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय का अनुरोध किया, लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से इसका विरोध किया गया। उनका कहना था कि इलाज के लिए आवश्यक धनराशि का बड़ा हिस्सा जुटाए जाने के बावजूद उपचार शुरू नहीं हो सका है।

    इससे पहले भी अदालत केंद्र और राज्य सरकार से इस मामले में जानकारी मांग चुकी है। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा था कि क्या राज्य सरकार बच्ची के उपचार में किसी प्रकार की आर्थिक या प्रशासनिक सहायता उपलब्ध करा सकती है। अदालत का मानना है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के मामलों में संबंधित संस्थाओं को समयबद्ध और संवेदनशील तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए।

    याचिका के अनुसार बच्ची के इलाज के लिए लगभग 9.50 करोड़ रुपये की आवश्यकता है। परिवार अब तक करीब 8 करोड़ रुपये की व्यवस्था कर चुका है। इसमें केंद्र सरकार से स्वीकृत आर्थिक सहायता के अलावा सामाजिक संगठनों और विभिन्न दानदाताओं का सहयोग भी शामिल है। परिवार का कहना है कि उपचार में जितनी अधिक देरी होगी, बीमारी के बढ़ने का जोखिम उतना ही बढ़ता जाएगा।

    मामले में बताया गया है कि उपचार के लिए एक विशेष जीवनरक्षक इंजेक्शन विदेश से मंगाना आवश्यक है। यह दवा अमेरिका से आयात की जानी है और इसके बिना उपचार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार एसएमए जैसी बीमारी में समय पर इलाज अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि देरी होने पर मांसपेशियों की कार्यक्षमता लगातार प्रभावित होती जाती है और रोगी की स्थिति अधिक जटिल हो सकती है।

    स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक दुर्लभ आनुवंशिक न्यूरोमस्कुलर बीमारी है, जिसमें रीढ़ की हड्डी के मोटर न्यूरॉन्स धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। इसके कारण शरीर की मांसपेशियां कमजोर होती जाती हैं और सांस लेने, निगलने तथा सामान्य गतिविधियां करने जैसी आवश्यक शारीरिक क्षमताएं भी प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह है कि इस बीमारी में समय पर उपचार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

    अब सभी की निगाहें AIIMS की ओर से अदालत में प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब और आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि न्यायालय के निर्देशों के बाद उपचार प्रक्रिया को लेकर स्थिति जल्द स्पष्ट होगी और बच्ची को आवश्यक चिकित्सा सहायता समय पर उपलब्ध कराने की दिशा में आगे की कार्रवाई तेज होगी।

  • गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

    गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य


    नई दिल्ली । गर्भावस्था का समय किसी भी महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस दौरान खानपान से लेकर जीवनशैली तक हर छोटी बड़ी बात का सीधा असर मां और गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। अब ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस नई दिल्ली की अगुवाई में हुई एक नई रिसर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कुछ कॉस्मेटिक्स पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और प्लास्टिक से जुड़े रसायन गर्भवती महिलाओं के शरीर में जमा होकर हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी पड़ सकता है।

    इस शोध में 641 स्वस्थ गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। गर्भावस्था के अलग अलग चरणों में उनके यूरिन सैंपल की जांच की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि शरीर में कौन कौन से रसायन मौजूद हैं। जांच के दौरान सबसे अधिक मात्रा मिथाइलपैराबेन नामक रसायन की पाई गई। यह एक प्रिजर्वेटिव है जिसका इस्तेमाल सामान्य रूप से स्किन केयर प्रोडक्ट्स लोशन फेस क्रीम शैंपू मेकअप और अन्य पर्सनल केयर उत्पादों में किया जाता है।

    शोधकर्ताओं को मोनोएथाइल फ्थेलेट नामक रसायन भी अधिक मात्रा में मिला। यह रसायन प्लास्टिक उत्पादों और सिंथेटिक खुशबू वाले कई सामानों में इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स की श्रेणी में आते हैं। ऐसे रसायन शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और गर्भावस्था के दौरान यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान इन रसायनों का स्तर सबसे अधिक पाया गया। यही वह समय होता है जब गर्भ में पल रहे शिशु के अंगों और शरीर का तेजी से विकास हो रहा होता है। ऐसे संवेदनशील चरण में यदि हार्मोन के कार्य में किसी प्रकार की बाधा आती है तो इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है।

    एम्स के विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं के शरीर में इन रसायनों का स्तर अधिक पाया गया उनके नवजात शिशुओं के जन्म के समय वजन लंबाई और विटामिन डी के स्तर में भी अंतर देखा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल संभावित संबंधों की ओर संकेत करता है। इन निष्कर्षों की पूरी पुष्टि के लिए भविष्य में और बड़े स्तर पर विस्तृत शोध किए जाने की आवश्यकता होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को इस दौरान अनावश्यक कॉस्मेटिक्स के उपयोग से बचना चाहिए और जहां तक संभव हो कम रसायन वाले या सुरक्षित उत्पादों का चयन करना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक के बर्तनों और पैकेजिंग में लंबे समय तक भोजन रखने से भी बचना बेहतर हो सकता है। प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने से संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में ऐसे रसायनों के उपयोग और उनकी निगरानी के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए ताकि उपभोक्ताओं विशेषकर गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध हो सकें। जागरूकता बढ़ाने के साथ यदि महिलाएं चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उत्पादों का चयन करें तो गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • ट्विशा केस: जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल, सबूत हैंडलिंग और दस्तावेज़ लीक की जांच तेज

    ट्विशा केस: जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल, सबूत हैंडलिंग और दस्तावेज़ लीक की जांच तेज


    मध्‍य प्रदेश ट्विशा शर्मा डेथ केस में पुलिस जांच की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठे हैं। हाईकोर्ट में पेश दस्तावेजों के अनुसार सबूतों के हैंडलिंग, केस डायरी की पहुंच और मेडिकल रिकॉर्ड को लेकर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। अब सीबीआई पूरे मामले की हर कड़ी को दोबारा जांच रही है।

    जांच प्रक्रिया में सामने आई खामियां
    मामले में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार जांच के शुरुआती चरण में कई प्रक्रियागत चूक हुईं। 13 मई 2026 को सब-इंस्पेक्टर द्वारा फंदे की रस्सी जब्त की गई थी, लेकिन रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं है कि उसकी पहचान और सीलिंग किसने की। सबसे बड़ा सवाल यह है कि महत्वपूर्ण सबूत को सीधे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने के बजाय उसे पुलिस वाहन में रखा गया, जिससे उसकी सुरक्षा और प्रमाणिकता पर सवाल उठे हैं।

    सबूत की हैंडलिंग पर विवाद
    दस्तावेजों में दावा किया गया है कि रस्सी और अन्य अहम साक्ष्यों को तुरंत एम्स या फॉरेंसिक लैब भेजने की बजाय देर से प्रोसेस किया गया। इस देरी को जांच की गंभीर चूक माना जा रहा है।

    इसके अलावा यह भी सामने आया है कि जब्ती से जुड़े दस्तावेजों में फंदे की पहचान करने वाले अधिकारी का स्पष्ट रिकॉर्ड दर्ज नहीं है, जिससे जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

    केस डायरी और दस्तावेज लीक का आरोप
    हाईकोर्ट में पेश जवाब में यह भी आरोप लगाया गया है कि केस डायरी से जुड़े दस्तावेज समय से पहले संबंधित पक्षों तक पहुंच गए।

    इससे जांच की गोपनीयता पर गंभीर सवाल उठे हैं। हालांकि पुलिस या जांच एजेंसियों की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    सीबीआई की नई जांच दिशा
    सीबीआई अब इस मामले में कई स्तरों पर जांच कर रही है:
    सबूतों की जब्ती और उनकी सुरक्षा प्रक्रिया
    मेडिकल दस्तावेजों की सत्यता
    केस डायरी की गोपनीयता
    जांच के दौरान की गई प्रशासनिक प्रक्रियाएं
    सीबीआई ने उस मनोचिकित्सक से भी पूछताछ की है, जिनका नाम इलाज संबंधी दस्तावेजों में सामने आया था।

    मेडिकल रिकॉर्ड पर भी सवाल
    जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या पीड़िता का वास्तव में इलाज हुआ था या मेडिकल दस्तावेजों का उपयोग कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया गया।

    डॉक्टर से इलाज, काउंसलिंग और मानसिक स्थिति से जुड़े बिंदुओं पर पूछताछ की गई है, जबकि डॉक्टर ने मरीज की निजी जानकारी साझा करने से इनकार किया है।

    अग्रिम जमानत और कोर्ट में दलीलें
    दस्तावेजों के आधार पर आरोप है कि कुछ महत्वपूर्ण जानकारी हाईकोर्ट में पहले ही प्रस्तुत की गई, जिसके चलते संबंधित पक्षों को कानूनी लाभ मिला। हाईकोर्ट ने पहले ही इस मामले में अग्रिम जमानत से जुड़ा फैसला सुनाया था, जिसके बाद जांच पर और सवाल उठे।

    ट्विशा केस अब सिर्फ एक आपराधिक जांच नहीं, बल्कि पुलिस प्रक्रिया, सबूत प्रबंधन और न्यायिक पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला बनता जा रहा है। सीबीआई की जांच से यह तय होगा कि चूक लापरवाही थी या किसी बड़े स्तर पर गड़बड़ी।

  • सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल से कोमा में युवक को इच्छामृत्यु की अनुमति

    सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल से कोमा में युवक को इच्छामृत्यु की अनुमति

    नई दिल्ली। भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में Supreme Court of India ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 13 साल से कोमा में पड़े युवक को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। अदालत ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय Harish Rana के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाने का निर्देश दिया है।

    यह फैसला जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) में मेडिकल प्रक्रिया इस तरह पूरी की जाए कि मरीज की गरिमा और मानवीय सम्मान बना रहे।

    दरअसल हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ स्थित Panjab University में बीटेक की पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर चोटों के कारण वे कोमा में चले गए और डॉक्टरों ने उन्हें Quadriplegia से पीड़ित बताया। इस स्थिति में मरीज शरीर के लगभग सभी अंगों को नियंत्रित नहीं कर पाता और पूरी तरह वेंटिलेटर व फीडिंग ट्यूब पर निर्भर रहता है।

    करीब 13 साल से बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और शरीर पर गहरे बेडसोर्स भी बन गए। परिवार लंबे समय से मानसिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा था। इसी वजह से हरीश के माता-पिता निर्मला राणा और अशोक राणा ने अदालत से पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति देने की गुहार लगाई थी।

    फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं रह जाती और इलाज केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखता है, तो ऐसे मामलों में मानवीय गरिमा को ध्यान में रखते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने पर विचार किया जा सकता है। जस्टिस पारदीवाला ने अपने फैसले में साहित्यकार William Shakespeare के प्रसिद्ध कथन “To be or not to be” का भी उल्लेख किया।

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया से जुड़े स्पष्ट कानून बनाने पर भी विचार करने को कहा है। फिलहाल भारत में यह प्रक्रिया अदालत द्वारा तय दिशानिर्देशों और मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के आधार पर ही संभव है।

    गौरतलब है कि 2018 में Supreme Court of India ने ‘सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार’ को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मान्यता दी थी। हालांकि एक्टिव यूथेनेशिया यानी किसी दवा या इंजेक्शन से मौत देना भारत में अब भी गैरकानूनी है।

    इस फैसले को देश में इच्छामृत्यु से जुड़े कानून और मानवीय अधिकारों की बहस में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।