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  • डेढ़ साल के बच्चे की आंखों की रोशनी पर जांच रिपोर्ट, नोजल ड्रॉप से संक्रमण की आशंका खारिज; एम्स भोपाल में होगा कॉर्निया ट्रांसप्लांट

    डेढ़ साल के बच्चे की आंखों की रोशनी पर जांच रिपोर्ट, नोजल ड्रॉप से संक्रमण की आशंका खारिज; एम्स भोपाल में होगा कॉर्निया ट्रांसप्लांट

    मध्य प्रदेश  सागर जिले के बंडा सिविल अस्पताल में इलाज के बाद डेढ़ साल के बच्चे की आंखों की रोशनी प्रभावित होने के मामले में स्वास्थ्य विभाग की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि बच्चे की आंखों की गंभीर समस्या का कारण अस्पताल में डाली गई कथित नोजल ड्रॉप नहीं, बल्कि कुपोषण और विटामिन-ए की कमी से विकसित हुए कॉर्नियल अल्सर हैं। हालांकि, जिस नोजल ड्रॉप का उल्लेख परिजनों ने किया है, वह बच्चे तक कैसे पहुंची, इसकी जांच अभी जारी है।

    स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार बच्चे का उपचार फिलहाल भोपाल स्थित एम्स में चल रहा है, जहां उसकी आंखों की स्थिति को देखते हुए कॉर्निया ट्रांसप्लांट की तैयारी की जा रही है। चिकित्सकों का कहना है कि बच्चे के उपचार के लिए आवश्यक सभी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी और शासन स्तर पर भी हरसंभव सहायता दी जाएगी।

    जांच रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिस बैच की नोजल ड्रॉप को लेकर आरोप लगाए गए थे, वह अस्पताल के उपलब्ध स्टॉक में मौजूद ही नहीं थी। विशेषज्ञों ने बताया कि सामान्य सलाइन आधारित नोजल ड्रॉप से आंखों की स्थायी रोशनी जाना चिकित्सकीय दृष्टि से संभव नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में अधिकतम अस्थायी जलन या हल्की असुविधा हो सकती है, लेकिन स्थायी दृष्टि हानि का कारण नहीं बनती।

    यह मामला तब सामने आया था जब भूसा कमलपुर निवासी इंद्राज विश्वकर्मा अपने डेढ़ वर्षीय पुत्र विनय को सर्दी और आंखों में लालिमा की शिकायत के चलते बंडा सिविल अस्पताल लेकर पहुंचे थे। परिजनों का आरोप था कि चिकित्सकीय पर्चे के आधार पर आई ड्रॉप की जगह उन्हें नोजल ड्रॉप दे दी गई, जिसे आंखों में डालने के बाद बच्चे की आंखों में तेज जलन हुई और बाद में उसकी रोशनी चली गई। हालत बिगड़ने पर बच्चे को पहले सागर और फिर भोपाल एम्स रेफर किया गया।

    परिजनों का यह भी दावा रहा कि भोपाल में चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान उन्हें इलाज में लापरवाही और संक्रमण की आशंका के बारे में बताया गया था। इसके बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया और परिवार ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ शिकायत दर्ज कर निष्पक्ष जांच तथा जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की।

    मामले की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग ने तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी। टीम ने दो दिनों तक अस्पताल के रिकॉर्ड, दवा वितरण प्रणाली, चिकित्सकीय दस्तावेज और संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ के आधार पर प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की। जांच में विशेषज्ञों ने बच्चे की आंखों की समस्या को विटामिन-ए की कमी से उत्पन्न कॉर्नियल अल्सर से जुड़ा माना है, जो गंभीर कुपोषण की स्थिति में विकसित हो सकता है।

    हालांकि अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि मामले की जांच अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। विशेष रूप से इस पहलू की पड़ताल की जा रही है कि परिजनों के पास कथित नोजल ड्रॉप कैसे पहुंची और उसका स्रोत क्या था। जांच पूरी होने के बाद यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल बच्चे के उपचार और दृष्टि बचाने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में चिकित्सा जारी है।

  • डॉ. रश्मि वर्मा आत्महत्या मामले में NHRC का नोटिस, एम्स और भोपाल पुलिस को 15 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश

    डॉ. रश्मि वर्मा आत्महत्या मामले में NHRC का नोटिस, एम्स और भोपाल पुलिस को 15 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश

    भोपाल एम्स में महिला असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा की आत्महत्या का मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के संज्ञान में आया है आयोग ने एम्स भोपाल के संचालक और भोपाल पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर इस घटना की जांच करने और 15 दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है आयोग ने FIR और पॉश कमेटी की रिपोर्ट के साथ पीएम की रिपोर्ट भी दिल्ली तलब की है

    मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग की प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, एम्स संचालक और पुलिस कमिश्नर को नोटिस भेजा है ताकि पूरी जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो सके

    मामला 11 दिसंबर 2025 का है जब भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा ने आत्महत्या कर ली थी डॉ. रश्मि पर उनके विभाग के HOD डॉ. यूनुस द्वारा लगातार प्रताड़ना किए जाने के आरोप लगे थे इस घटना ने संस्थान में हड़कंप मचा दिया और उच्चस्तरीय जांच की मांग उठी

    जानकारी के अनुसार, घटना वाले दिन डॉ. रश्मि ने अपनी ड्यूटी पूरी कर घर लौटने के बाद एनेस्थीसिया की उच्च मात्रा इंजेक्ट कर ली उनके दिल करीब 7 मिनट तक बंद रहे जिससे उनके मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचा MRI रिपोर्ट में ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन डैमेज की पुष्टि हुई डॉ. रश्मि का करीब तीन सप्ताह तक इलाज चलने के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका

    इस मामले की गंभीरता को देखते हुए ट्रॉमा और इमरजेंसी विभाग के HOD डॉ. यूनुस को उनके पद से हटा दिया गया था इसके अलावा हाई लेवल कमेटी का गठन किया गया था ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो सके

    NHRC ने निर्देश दिए हैं कि जांच में प्रताड़ना के सभी पहलुओं की समीक्षा की जाए और दोषियों के खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाए आयोग ने 15 दिन में रिपोर्ट सौंपने का समय तय किया है ताकि जल्द से जल्द इस मामले का निपटारा हो सके

    यह मामला एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर उत्पीड़न की गंभीर समस्याओं को उजागर करता है विशेषज्ञों का मानना है कि संस्थानों में ऐसे मामलों की समय पर पहचान और कार्रवाई बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में किसी भी कर्मचारी की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके

    भोपाल एम्स में हुई इस घटना ने पूरे चिकित्सा समुदाय को झकझोर दिया है और कार्यस्थल पर उत्पीड़न, मानसिक दबाव और प्रताड़ना के मामलों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता को रेखांकित किया है

  • स्वास्थ्य सेवा में एआई की नई छलांग: एम्स भोपाल में शुरू हुई डिजिटल नेविगेशन सुविधा, रोजाना 12 हजार मरीजों का सफर होगा आसान।

    स्वास्थ्य सेवा में एआई की नई छलांग: एम्स भोपाल में शुरू हुई डिजिटल नेविगेशन सुविधा, रोजाना 12 हजार मरीजों का सफर होगा आसान।


    मध्य प्रदेश की राजधानी स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान AIIMS भोपाल ने देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। अक्सर बड़े अस्पतालों के विशाल परिसर और एक जैसी इमारतों के बीच मरीज और उनके परिजन विभाग ढूँढ़ते हुए भटक जाते हैं, लेकिन अब एम्स भोपाल में इस समस्या का अंत होने जा रहा है। संस्थान ने देश की पहली ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI आधारित नेविगेशन प्रणाली’ शुरू की है। इस स्मार्ट तकनीक की मदद से अब रोजाना अस्पताल आने वाले 10 से 12 हजार लोगों को अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए किसी से रास्ता पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

    यह आधुनिक प्रणाली बिल्कुल वैसे ही काम करेगी जैसे हम अनजान शहरों में ‘गूगल मैप्स’ का उपयोग करते हैं। अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार और प्रमुख चौराहों पर विशेष क्यूआर कोड लगाए जा रहे हैं। जैसे ही कोई मरीज या परिजन अपने मोबाइल से इस कोड को स्कैन करेगा उसकी स्क्रीन पर पूरे अस्पताल का इंटरैक्टिव मैप खुल जाएगा। यह तकनीक आईआईटी इंदौर की विशेषज्ञ टीम और एक स्थानीय स्टार्टअप के सहयोग से तैयार की गई है, जो वेब और मोबाइल एप दोनों स्वरूपों में उपलब्ध होगी।

    अस्पताल प्रशासन ने इस सिस्टम को बेहद सटीक बनाने के लिए इमारतों के बाहर जीपीएस और भवनों के अंदर ‘रिले उपकरणों’ का उपयोग किया है। चूंकि इमारतों के भीतर जीपीएस सिग्नल कमजोर हो जाते हैं, इसलिए हर 15 मीटर पर विशेष सेंसर लगाए गए हैं जो मोबाइल को बिल्कुल सटीक दिशा संकेत देंगे। यह पायलट प्रोजेक्ट फिलहाल एक महीने के परीक्षण पर है, जिसकी सफलता के बाद इसे पूरे परिसर में स्थायी रूप से लागू कर दिया जाएगा। इस पहल से न केवल मरीजों का कीमती समय बचेगा, बल्कि भ्रम की स्थिति खत्म होने से अस्पताल के स्टाफ पर से भी मार्गदर्शन का अतिरिक्त बोझ कम होगा।

  • गलत इस्तेमाल से एंटीबायोटिक दवाओं पर खतरा बढ़ा: एम्स निदेशक का चेतावनी संदेश, AMR बना सामान्य संक्रमणों के लिए जानलेवा

    गलत इस्तेमाल से एंटीबायोटिक दवाओं पर खतरा बढ़ा: एम्स निदेशक का चेतावनी संदेश, AMR बना सामान्य संक्रमणों के लिए जानलेवा


    नई दिल्ली। आईसीयू में भर्ती गंभीर मरीजों से लेकर कई सामान्य रोगी सही इलाज के बावजूद ठीक नहीं हो पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण एंटीबायोटिक दवाओं का घटता प्रभाव माना जा रहा है। यह स्थिति एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के रूप में जानी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस मुद्दे को उठाया था, वहीं सोमवार को एम्स भोपाल में इस विषय पर विशेष चर्चा हुई।

    एम्स के निदेशक डॉ. माधवानंद कर ने बताया कि AMR पूरी दुनिया में चिकित्सा क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक लेना, गलत खुराक, अधूरा कोर्स और जरूरत से ज्यादा शक्तिशाली दवाओं का इस्तेमाल इस संकट को और बढ़ा रहे हैं। यदि एंटीबायोटिक के जिम्मेदार उपयोग पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सामान्य बीमारियां जैसे निमोनिया और मूत्र मार्ग संक्रमण भी जानलेवा हो सकती हैं।

    एम्स की रिसर्च में पता चला है कि यूरीन इन्फेक्शन, फेफड़े और खून के संक्रमण में इस्तेमाल होने वाली दवाएं तेजी से बेअसर हो रही हैं। 3,330 मरीजों पर किए गए अध्ययन में सिप्रोफ्लॉक्सासिन दवा अब ई.कोलाई बैक्टीरिया पर केवल 39% असर दिखा रही है। वहीं, मेरोपेनम दवा, जो केलबसीला न्यूमोनिया के इलाज में उपयोग होती थी, अब सिर्फ 52% मामलों में प्रभावी रही।

    डॉ. कर ने चेताया कि अगर AMR पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में आम संक्रमण भी जानलेवा बन सकते हैं। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस वह स्थिति है, जब बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं,

    जिससे पहले असरदार दवाएं अब रोग को ठीक नहीं कर पा रही हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के कारण निमोनिया, मूत्र मार्ग संक्रमण, त्वचा और पेट के कई रोगों का इलाज पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है। मरीजों को महंगी और अधिक साइड इफेक्ट वाली दवाओं पर निर्भर होना पड़ रहा है। इसका मुख्य कारण है आम लोगों की गलत आदतें, जैसे डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेना, अधूरी खुराक लेना, जल्दी दवा बंद कर देना और हाई-एंड एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा उपयोग।

    एम्स भोपाल ने रोकथाम के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें सुव्यवस्थित एंटीबायोटिक नीति, नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम, जनजागरूकता अभियान और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अवेयरनेस वीक शामिल हैं। डॉ. कर के अनुसार, डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के साथ-साथ आम नागरिकों की जागरूकता भी AMR से लड़ाई में बेहद अहम है।

    एम्स निदेशक ने अंतिम चेतावनी दी कि एंटीबायोटिक दवाएं मानव सभ्यता की सबसे बड़ी चिकित्सा उपलब्धियों में से एक हैं। अगर इनका गलत इस्तेमाल जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियां इन जीवनरक्षक दवाओं के लाभ से वंचित रह जाएंगी। इसलिए जिम्मेदारी और सतर्कता आज ही जरूरी है।