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  • यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम बहुल सीटों और विपक्षी दलों के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए परिवारवाद का आरोप लगाया है। कैराना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आजमगढ़, बदायूं और फिरोजाबाद का जिक्र किया और दावा किया कि इन क्षेत्रों में पहले मुस्लिम सांसद चुने जाते थे, लेकिन अब यादव परिवार के सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

    ओवैसी ने अपने भाषण में कहा कि एक समय आजमगढ़ से मुस्लिम सांसद जीतकर संसद पहुंचते थे, जबकि अब वहां से अखिलेश यादव के भाई सांसद हैं। उन्होंने बदायूं और फिरोजाबाद का उल्लेख करते हुए भी समाजवादी पार्टी पर परिवार के सदस्यों को राजनीतिक अवसर देने का आरोप लगाया। उनके बयान का मुख्य मुद्दा मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समाजवादी पार्टी में परिवार की भूमिका रहा।

    AIMIM प्रमुख ने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी के बजाय समाजवादी यादव परिवार रख लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यादव परिवार की राजनीति में परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जा रही है और मुस्लिम समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग पीछे रखे।

    उन्होंने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी सीमित की जा रही है। ओवैसी के अनुसार, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में उसकी क्या नीति है। उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे को उठाते हुए सपा पर मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया।

    ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर भी अखिलेश यादव की आलोचना की। हालांकि, उनके इस बयान के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी में सपा की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन समाजवादी पार्टी समेत कई दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में ओवैसी के बयान को आगामी चुनाव से पहले विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    विपक्षी गठबंधन को लेकर ओवैसी ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्षी दलों का उद्देश्य भाजपा को हराना है, तो AIMIM भी उनके साथ आने के लिए तैयार है। ओवैसी ने यह भी कहा कि वह योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। उनके इस रुख से संकेत मिलता है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की संभावना पर उनकी पार्टी बातचीत के लिए तैयार है, हालांकि गठबंधन की कोई अंतिम रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    ओवैसी की राजनीतिक रणनीति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIMIM अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। खबर में उल्लेख किया गया है कि 15 अक्टूबर को मुस्लिम विद्वान और राजनीतिक विश्लेषक हाजी अब्दुल सलाम ने दावा किया था कि AIMIM राज्य की 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। उनके अनुसार, यदि पार्टी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में जगह नहीं मिलती है, तो कुछ सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यह फिलहाल एक रणनीतिक आकलन है, न कि घोषित उम्मीदवारों की अंतिम सूची।

    मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और संभल जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं का रुझान आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन क्षेत्रों में विभिन्न दलों की चुनावी रणनीति और गठबंधन की स्थिति राजनीतिक मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि AIMIM कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और विपक्षी दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर क्या सहमति बनेगी।

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी के बयानों ने समाजवादी पार्टी की राजनीति, परिवारवाद और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल गठबंधन को लेकर क्या फैसला करते हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं।

  • यूपी चुनाव 2027 में ओवैसी की 200 सीटों पर तैयारी, सपा के PDA और कांग्रेस के समीकरण को मिल सकती है चुनौती

    यूपी चुनाव 2027 में ओवैसी की 200 सीटों पर तैयारी, सपा के PDA और कांग्रेस के समीकरण को मिल सकती है चुनौती

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपनी राजनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की रणनीति के तहत राज्य में मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पार्टी करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। हालांकि, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन को लेकर बातचीत की गुंजाइश भी बनी हुई है। ऐसे में चुनाव से पहले राज्य में विपक्षी दलों के बीच सीटों और मतदाताओं के समीकरण को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।

    AIMIM की रणनीति का पहला हिस्सा उन विधानसभा क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। पार्टी ऐसे क्षेत्रों में अपना संगठन मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक आधार बढ़ाने की तैयारी में है। इसके लिए उन सीटों की पहचान की जा रही है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। पार्टी की कोशिश है कि इन इलाकों में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाकर चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति मजबूत की जाए।

    दूसरी प्राथमिकता पश्चिमी उत्तर प्रदेश को बनाया गया है। इस क्षेत्र की लगभग 65 विधानसभा सीटों पर AIMIM विशेष ध्यान दे रही है। मेरठ समेत कई जिलों में पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ाने की योजना बना रही है। इस रणनीति के तहत असदुद्दीन ओवैसी की जनसभाएं भी प्रस्तावित हैं। कार्यक्रम के अनुसार, 17 अक्टूबर को रामपुर में जनसभा, 24 अक्टूबर को कैराना में सभा और 14 नवंबर को मेरठ में बड़ी रैली आयोजित करने की योजना है। इन कार्यक्रमों के जरिए पार्टी अपने समर्थकों तक पहुंचने और संगठन को सक्रिय करने का प्रयास करेगी।

    AIMIM की तीसरी योजना राज्यभर में संगठन का विस्तार करने से जुड़ी है। यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ गठबंधन पर सहमति नहीं बनती है, तो पार्टी लगभग 200 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के विकल्प पर काम कर रही है। इस संभावित रणनीति से विपक्षी दलों के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा का स्वरूप प्रभावित हो सकता है। खासकर उन सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है, जहां समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी पहले से अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश करती रही हैं।

    पूर्वांचल में भी AIMIM ने कई विधानसभा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है। पार्टी की तैयारियों में आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, मऊ और बलिया जैसे जिले शामिल हैं। आजमगढ़ की मुबारकपुर, गोपालपुर, निजामाबाद और सदर सीटों पर पार्टी की नजर है। जौनपुर की सदर और शाहगंज सीटों के साथ मऊ की सदर तथा घोसी विधानसभा सीटों को भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके अलावा बहराइच और श्रावस्ती जैसे क्षेत्रों में भी संगठन विस्तार की योजना है।

    पार्टी की रणनीति में स्थानीय और प्रभावशाली नेताओं को शामिल करना भी अहम बताया जा रहा है। ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देने की योजना है, जिन्हें दूसरे राजनीतिक दलों में पर्याप्त अवसर नहीं मिला है। AIMIM को उम्मीद है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरों के जरिए वह अपने समर्थन का दायरा बढ़ा सकती है। हालांकि, इन प्रयासों का चुनावी परिणाम क्या होगा, यह उम्मीदवारों के चयन, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

    गठबंधन को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। AIMIM की ओर से दूसरे विपक्षी दलों के साथ संभावित समझौते की संभावना खुली रखी गई है। इस महीने के अंत तक बातचीत को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद जताई गई है। यदि गठबंधन नहीं बनता है, तो पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी को आगे बढ़ा सकती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीति में AIMIM की भूमिका और उसका प्रभाव आगामी चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना रह सकता है।

  • आजमगढ़ में ओवैसी की जनसभा से उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी तेज, एआईएमआईएम ने एक लाख लोगों के जुटने का किया दावा

    आजमगढ़ में ओवैसी की जनसभा से उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी तेज, एआईएमआईएम ने एक लाख लोगों के जुटने का किया दावा


    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। इसी क्रम में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी 11 अक्टूबर को आजमगढ़ में एक जनसभा को संबोधित करने वाले हैं। इस कार्यक्रम के जरिए पार्टी पूर्वांचल में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। जनसभा के लिए आजमगढ़ के कोटिला के पास स्थित सिरसल क्लब ग्राउंड को चुना गया है। पार्टी की ओर से कार्यक्रम में एक लाख से अधिक लोगों के शामिल होने का दावा किया गया है।

    कार्यक्रम की तैयारियों को लगभग पूरा बताया गया है। एआईएमआईएम के जिला अध्यक्ष नदीम अहमद के अनुसार, जनसभा शाम चार बजे से शुरू होगी, जबकि असदुद्दीन ओवैसी के शाम करीब छह बजे कार्यक्रम में पहुंचने का कार्यक्रम है। नदीम अहमद ने कहा कि ओवैसी अल्लामा शिब्ली नोमानी की ऐतिहासिक धरती से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान की शुरुआत करेंगे। हालांकि, जनसभा में वास्तविक रूप से कितने लोग शामिल होते हैं, यह कार्यक्रम के बाद ही स्पष्ट होगा।

    आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर एआईएमआईएम ने राज्य में अलग राजनीतिक गठबंधन बनाने का संकेत दिया है। जिला अध्यक्ष नदीम अहमद ने कहा कि उनकी पार्टी ने खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दलों से भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने का अनुरोध किया था। उनके मुताबिक, इन दलों ने एआईएमआईएम को अपने साथ शामिल करने में रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में पार्टी अब तीसरा मोर्चा बनाकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। उनके बयान के अनुसार, पार्टी चुनाव में गठबंधन के विकल्प पर आगे बढ़ रही है।

    आजमगढ़ की राजनीतिक स्थिति को लेकर भी नदीम अहमद ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी अब जिले में पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं है। उनका कहना था कि आजमगढ़ को समाजवादी पार्टी का गढ़ मानना उचित नहीं है और पार्टी नेतृत्व ने जिले के विकास की अपेक्षा अपने गृह क्षेत्र सैफई पर अधिक ध्यान दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में आजमगढ़ के विकास के लिए पर्याप्त काम नहीं हुआ। नदीम अहमद के मुताबिक, जिले के लोग अब इन मुद्दों को समझ रहे हैं।

    नदीम अहमद ने यह भी दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए ओवैसी के नेतृत्व में एक मजबूत गठबंधन तैयार हो चुका है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह गठबंधन आजमगढ़ की अधिकतर विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करेगा। हालांकि, यह पार्टी पदाधिकारी का चुनावी दावा है और इसके परिणाम का आकलन मतदान के बाद ही किया जा सकेगा।

    आजमगढ़ लंबे समय से समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाला क्षेत्र रहा है। वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आजमगढ़ सदर और लालगंज, दोनों लोकसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में एआईएमआईएम की जनसभा और तीसरा मोर्चा बनाने की घोषणा आगामी चुनाव से पहले जिले में पार्टी की रणनीति को सामने लाती है।

  • ओवैसी ने यूपी में मुस्लिम नेतृत्व का मुद्दा उठाया, AIMIM के संगठन और संभावित गठबंधन पर जल्द तस्वीर साफ होने के संकेत

    ओवैसी ने यूपी में मुस्लिम नेतृत्व का मुद्दा उठाया, AIMIM के संगठन और संभावित गठबंधन पर जल्द तस्वीर साफ होने के संकेत

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक दलों की तैयारियों के बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राज्य में गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार संगठन को मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर लोगों से जुड़ने का काम कर रही है। गठबंधन को लेकर उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकती है।

    ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी के संगठन का जिक्र करते हुए कहा कि AIMIM के स्थानीय नेता लगातार लोगों के बीच काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य में अलग-अलग बिरादरियों की राजनीतिक नेतृत्व व्यवस्था मौजूद है, लेकिन मुस्लिम समाज के लिए वैसी मजबूत राजनीतिक आवाज नहीं बन पाई है। उन्होंने लोकतंत्र में प्रत्येक समाज को अपनी बात रखने का अवसर मिलने की बात कही।

    समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के सवाल पर ओवैसी ने कहा कि अगले 10 से 12 दिनों में स्थिति स्पष्ट हो सकती है। उन्होंने व्यापक विपक्षी एकजुटता की संभावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि सभी साथ आकर चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा को रोकने में मदद मिल सकती है। इस बयान के बाद यूपी में AIMIM और सपा के बीच संभावित राजनीतिक समीकरण को लेकर चर्चा तेज हुई है।

    ओवैसी ने बिहार के चुनावी अनुभव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वहां उनकी पार्टी ने गठबंधन के तहत छह सीटों की मांग की थी, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी। उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक राजनीतिक दल को अपनी रणनीति और संगठन के हिसाब से काम करना चाहिए।

    उत्तर प्रदेश में AIMIM की गतिविधियां भी लगातार बढ़ रही हैं। ओवैसी राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यक्रम कर रहे हैं और पार्टी के संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में मैदान में रहेगी और इसके लिए व्यापक समर्थन की जरूरत होगी।

    मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दों पर भी ओवैसी ने अपनी बात रखी। उन्होंने सहारनपुर की मस्जिद और पुराने कब्रिस्तान से संबंधित कार्रवाई का उल्लेख किया। इसके अलावा उन्होंने कुछ लोगों को कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे जाने और लखनऊ में परवेज नाम के व्यक्ति के साथ भीड़ द्वारा मारपीट किए जाने का आरोप लगाया। ये दावे ओवैसी की ओर से किए गए हैं।

    उन्होंने आरोप लगाया कि एक समुदाय को निशाना बनाए जाने का मुद्दा चुनाव में महत्वपूर्ण रहेगा। वहीं महिला मतदाताओं को लेकर उन्होंने कहा कि AIMIM चुनाव लड़ेगी और पार्टी को सभी वर्गों के समर्थन की आवश्यकता होगी।

    गठबंधन को लेकर ओवैसी ने अभी किसी दल के साथ अंतिम समझौते की घोषणा नहीं की है। ताजा बयानों में उन्होंने समान सोच रखने वाले दलों के साथ मिलकर काम करने की संभावना खुली रखी है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार AIMIM ने उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए गठबंधन से जुड़े फैसले की घोषणा 2 अक्टूबर तक करने का संकेत दिया है।

    इस बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में विभिन्न दल अपने संगठन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में AIMIM का गठबंधन को लेकर रुख आने वाले दिनों में राज्य के राजनीतिक समीकरणों और विपक्षी दलों के बीच बातचीत का एक महत्वपूर्ण विषय बना रहेगा।

  • UCC के विरोध में भोपाल पहुंचे ओवैसी RSS पर लगाया एजेंडा चलाने का आरोप भाजपा विधायक को दी चुनौती

    UCC के विरोध में भोपाल पहुंचे ओवैसी RSS पर लगाया एजेंडा चलाने का आरोप भाजपा विधायक को दी चुनौती


    नई दिल्ली। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी मंगलवार को भोपाल पहुंचे। उन्होंने सेंट्रल लाइब्रेरी ग्राउंड में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए समान नागरिक संहिता यानी UCC का विरोध किया। यह सभा AIMIM के UCC विरोधी अभियान का हिस्सा थी। इस दौरान ओवैसी ने मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय को UCC से बाहर रखने और मुसलमानों को इसके दायरे में लाने को लेकर सवाल उठाए।

    ओवैसी ने कहा कि मध्यप्रदेश की आबादी में आदिवासियों की बड़ी हिस्सेदारी है और उनकी अलग संस्कृति परंपराएं तथा सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। उनके मुताबिक इन्हीं कारणों से आदिवासियों को UCC से बाहर रखा गया है। उन्होंने सवाल किया कि यदि अलग संस्कृति और परंपराओं को आधार मानकर एक समुदाय को UCC से अलग रखा जा सकता है तो मुसलमानों को इसके दायरे में क्यों लाया जा रहा है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि UCC के जरिए RSS का एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है।

    सभा में ओवैसी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों की अपनी धार्मिक और सामाजिक पहचान है। उन्होंने UCC के जरिए हिंदू मैरिज एक्ट हिंदू सक्सेशन एक्ट और अडॉप्शन एंड कस्टडी से जुड़े प्रावधानों को गैर हिंदुओं पर लागू करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 25 26 और 29 का उल्लेख करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों की बात कही।

    ओवैसी ने केंद्र में भाजपा के सहयोगी दलों से भी UCC को लेकर अपना रुख स्पष्ट करने की अपील की। उन्होंने TDP JDU चिराग पासवान एचडी कुमारस्वामी और जयंत चौधरी का नाम लेते हुए कहा कि यदि इन दलों का भाजपा से कुछ वैचारिक अंतर अभी भी है तो उन्हें UCC का विरोध करना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब समान नागरिक संहिता को लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है।

    भोपाल की सभा में भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा का मुद्दा भी उठा। ओवैसी ने काजी कैंप से जुड़े उनके पुराने मिसाइल वाले बयान का जिक्र करते हुए उन्हें काजी कैंप आने की चुनौती दी। उन्होंने इस क्षेत्र से जुड़े स्वतंत्रता संग्राम के योगदानकर्ताओं के नाम भी गिनाए और कहा कि भोपाल की इस जमीन का अपना ऐतिहासिक महत्व है।

    ओवैसी ने भाजपा शासित राज्यों में मस्जिदों और कब्रिस्तानों को नुकसान पहुंचाए जाने के आरोप भी लगाए। हालांकि ये आरोप उनके राजनीतिक वक्तव्य के तौर पर सामने आए। उन्होंने सागर में जहरीली शराब के मामले का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री से कार्रवाई की मांग की। लव जिहाद से जुड़े सवाल पर ओवैसी ने कहा कि यदि दो बालिग अपनी इच्छा से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें रोकने का अधिकार सरकार या किसी अन्य व्यक्ति को नहीं होना चाहिए।

    सभा के दौरान ओवैसी ने सोवियत यूनियन का उदाहरण देते हुए RSS पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वहां कम्युनिस्ट शासन के दौरान मदरसों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद मुस्लिम परिवारों ने अपने बच्चों की पढ़ाई घर पर जारी रखी। भोपाल में हुई इस सभा के दौरान UCC के साथ धार्मिक स्वतंत्रता सामाजिक पहचान अल्पसंख्यक अधिकार और राजनीतिक मुद्दों पर ओवैसी ने अपनी पार्टी का पक्ष रखा।

  • रेवंत रेड्डी ने ओवैसी बंधुओं की देशभक्ति पर उठे सवाल खारिज किए, बोले मोदी और शाह से कम नहीं देशभक्ति

    रेवंत रेड्डी ने ओवैसी बंधुओं की देशभक्ति पर उठे सवाल खारिज किए, बोले मोदी और शाह से कम नहीं देशभक्ति

    नई दिल्ली ।तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी की देशभक्ति को लेकर खुलकर उनका बचाव किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि दोनों नेताओं की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देशभक्ति और देश की रक्षा के मामले में असदुद्दीन ओवैसी और अकबरुद्दीन ओवैसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से कम नहीं हैं।

    रेवंत रेड्डी ने यह बयान हैदराबाद में चंचलगुडा-संतोषनगर चार लेन वाले नवनिर्मित स्टील फ्लाईओवर के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोगों ने ओवैसी भाइयों को देश के खिलाफ बताया है, लेकिन वह इस धारणा को स्वीकार नहीं करते। उनके मुताबिक राजनीतिक विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे किसी व्यक्ति की देशभक्ति पर सवाल खड़ा नहीं किया जाना चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने असदुद्दीन ओवैसी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वह भारतीय सैनिकों के समर्थन में आयोजित रैली में कांग्रेस नेताओं के साथ शामिल हुए थे। उन्होंने अभियान में शामिल सैनिकों की सलामती के लिए प्रार्थना भी की थी। रेवंत रेड्डी ने इसी आधार पर कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर ओवैसी भाइयों की प्रतिबद्धता को लेकर किसी को उंगली नहीं उठानी चाहिए।

    रेवंत रेड्डी ने कहा कि राजनीतिक टिप्पणियां अलग-अलग हो सकती हैं और विभिन्न दलों के नेताओं के अपने राजनीतिक विचार हो सकते हैं। हालांकि, जब बात देशभक्ति और देश की रक्षा की आती है तो ओवैसी भाइयों की निष्ठा पर सवाल उठाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के मामले में दोनों पीछे हटने वाले नहीं हैं।

    इस दौरान AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी तेलंगाना की राजनीति को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उन्हें यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि उनकी पार्टी का समर्थन किसी राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को है। ओवैसी के इस बयान के बाद दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    रेवंत रेड्डी और ओवैसी के बीच राजनीतिक संबंधों को लेकर तेलंगाना में पहले भी चर्चा होती रही है। AIMIM का प्रभाव मुख्य रूप से हैदराबाद और आसपास के क्षेत्रों में माना जाता है, जबकि कांग्रेस राज्य में सत्तारूढ़ दल है। ऐसे में मुख्यमंत्री का सार्वजनिक मंच से ओवैसी बंधुओं की देशभक्ति का बचाव करना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से असदुद्दीन ओवैसी की देशभक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से कम देशभक्त नहीं हैं। उन्होंने अपने बयान में अकबरुद्दीन ओवैसी को भी शामिल करते हुए दोनों भाइयों की देश के प्रति प्रतिबद्धता पर भरोसा जताया।

    रेवंत रेड्डी के बयान ने तेलंगाना की राजनीति में एक नई चर्चा को जन्म दिया है। उनके बयान का मुख्य संदेश यही रहा कि राजनीतिक मतभेदों को देशभक्ति के आकलन का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने ओवैसी भाइयों के सार्वजनिक आचरण और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैनिकों के समर्थन में उनकी भागीदारी का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी।

  • 'गेम बदलने' के दावे के साथ मैदान में उतरे ओवैसी, मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस से सपा-कांग्रेस की बढ़ी चिंता, बीजेपी भी रख रही पैनी नजर

    'गेम बदलने' के दावे के साथ मैदान में उतरे ओवैसी, मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस से सपा-कांग्रेस की बढ़ी चिंता, बीजेपी भी रख रही पैनी नजर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राज्य की राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। हाल के दिनों में विभिन्न जिलों के दौरों और लगातार जनसभाओं के जरिए उन्होंने यह संकेत दिया है कि उनकी पार्टी इस बार पहले की तुलना में अधिक संगठित और आक्रामक रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। इसी क्रम में उनके ‘गेम बदलने’ वाले दावे ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।

    ओवैसी ने मुस्लिम बहुल और सामाजिक रूप से प्रभावशाली मानी जाने वाली विधानसभा सीटों पर विशेष फोकस करने की रणनीति बनाई है। पार्टी का कहना है कि वह प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में संगठन को मजबूत कर रही है और स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है। चुनावी सभाओं के माध्यम से एआईएमआईएम खुद को एक वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है।

    हालांकि उत्तर प्रदेश में अब तक पार्टी को विधानसभा चुनावों में कोई सीट हासिल नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई सीटों पर सीमित वोटों का अंतर भी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में यदि एआईएमआईएम कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय वोट हासिल करती है तो इसका असर उन दलों पर पड़ सकता है, जिनका पारंपरिक समर्थन आधार अल्पसंख्यक मतदाता रहे हैं।

    प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टियां लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से को अपने साथ बनाए रखने का प्रयास करती रही हैं। ऐसे में एआईएमआईएम की सक्रियता विपक्षी दलों के लिए नई चुनौती के रूप में देखी जा रही है। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विपक्षी मतों का बिखराव होता है तो इसका सीधा असर कई करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर दिखाई दे सकता है।

    दूसरी ओर, एआईएमआईएम का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी दल को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि अपने राजनीतिक आधार का विस्तार करना और उन वर्गों की आवाज को मजबूती देना है, जिन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। पार्टी नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह प्रदेश की राजनीति में दीर्घकालिक भूमिका निभाने के इरादे से चुनाव लड़ रही है।

    चुनावी तैयारियों के बीच संभावित राजनीतिक गठबंधनों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। अलग-अलग क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल की संभावनाओं पर समय-समय पर अटकलें लगती रही हैं, हालांकि फिलहाल किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है। राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार चुनाव नजदीक आने पर नए समीकरण बनने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल सीटों की संख्या का मुकाबला नहीं होता, बल्कि सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और मतों के ध्रुवीकरण जैसे कई कारक परिणाम तय करते हैं। ऐसे में एआईएमआईएम का प्रदर्शन भले सीटों में न बदले, लेकिन कई निर्वाचन क्षेत्रों में उसका प्रभाव चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकता है।

    आने वाले महीनों में जैसे-जैसे चुनावी गतिविधियां तेज होंगी, विभिन्न दल अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देंगे। ऐसे माहौल में ओवैसी की सक्रियता और उनकी पार्टी की चुनावी योजना उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनावी मैदान में यह रणनीति वास्तविक जनसमर्थन में कितनी बदल पाती है और प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर इसका कितना असर पड़ता है।

  • भाषा, दस्तावेज और डेटा विसंगतियों को लेकर ओवैसी का सवाल, कहा- लोकतांत्रिक अधिकारों से किसी को वंचित न किया जाए

    भाषा, दस्तावेज और डेटा विसंगतियों को लेकर ओवैसी का सवाल, कहा- लोकतांत्रिक अधिकारों से किसी को वंचित न किया जाए

    नई दिल्ली । तेलंगाना में चल रही विशेष मतदाता सत्यापन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती जा रही है। इसी क्रम में AIMIM प्रमुख और सांसद Asaduddin Owaisi ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण और सत्यापन से जुड़े कई मुद्दों पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी वास्तविक मतदाता का नाम तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से सूची से बाहर न हो जाए।

    ओवैसी ने विशेष रूप से चुनाव अधिकारियों के पास पहले से उपलब्ध मतदाता डेटा के उपयोग का मुद्दा उठाया। उनका तर्क है कि जिन मतदाताओं की जानकारी पहले ही सफलतापूर्वक सत्यापित और रिकॉर्ड में दर्ज है, उनसे दोबारा वही जानकारी मांगने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार पहले से उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करने से प्रक्रिया अधिक सरल, तेज और प्रभावी बन सकती है। इससे मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति कम होगी और प्रशासनिक स्तर पर भी अनावश्यक बोझ घटेगा।

    उन्होंने सत्यापन फॉर्म की भाषा को लेकर भी सवाल उठाए। ओवैसी का कहना है कि यदि फॉर्म केवल एक भाषा में उपलब्ध होंगे तो बड़ी संख्या में मतदाताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने मांग की कि फॉर्म को अंग्रेजी और उर्दू सहित अन्य आवश्यक भाषाओं में भी उपलब्ध कराया जाए ताकि अधिक से अधिक लोग बिना किसी कठिनाई के प्रक्रिया में भाग ले सकें। उनका मानना है कि भाषा की सुलभता लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

    AIMIM प्रमुख ने मतदाता रिकॉर्ड में दर्ज तथाकथित विसंगतियों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नामों की वर्तनी में अंतर, उम्र संबंधी मामूली असमानता या पारिवारिक विवरण में छोटी-मोटी त्रुटियों को मतदाता की पात्रता पर संदेह का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार ऐसी अनेक गलतियां वर्षों पहले हुई डेटा एंट्री त्रुटियों का परिणाम हो सकती हैं और इनके कारण किसी नागरिक के मतदान अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया में पूर्व में हुई गलतियों का खामियाजा आम नागरिकों को नहीं भुगतना चाहिए। यदि किसी मतदाता की जानकारी में तकनीकी त्रुटि पाई जाती है तो उसे सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए, न कि सीधे संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। ओवैसी के अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात में है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर मिले।

    सत्यापन प्रक्रिया में स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों को लेकर भी उन्होंने सुझाव दिए। उनका कहना है कि पहचान और पते के प्रमाण के रूप में अधिक दस्तावेजों को मान्यता दी जानी चाहिए ताकि नागरिकों को अपनी पात्रता साबित करने में कठिनाई न हो। उन्होंने कहा कि कई बार निर्धारित दस्तावेज सभी लोगों के पास उपलब्ध नहीं होते, जिससे वास्तविक मतदाताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    ओवैसी ने सभी राजनीतिक दलों से भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि कोई पात्र नागरिक तकनीकी, प्रक्रियागत या प्रशासनिक कमियों के कारण अपने मतदान अधिकार से वंचित न हो।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सत्यापन प्रक्रिया को लेकर उठी ये चिंताएं आने वाले समय में व्यापक राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकती हैं। फिलहाल यह मुद्दा चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित कर रहा है।

  • तेजस्वी यादव की मुश्किलें बढ़ीं, कांग्रेस ने राजद का गणित बिगाड़ा

    तेजस्वी यादव की मुश्किलें बढ़ीं, कांग्रेस ने राजद का गणित बिगाड़ा



    नई दिल्ली।  बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन के लिए बड़ा झटका आया है। RJD के उम्मीदवार एडी सिंह के लिए वोट देने के लिए कांग्रेस के तीन और RJD के एक विधायक मतदान में शामिल नहीं हुए। यह स्थिति RJD अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव के लिए चिंता का विषय बन गई है।

    तेजस्वी ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और मायावती की BSP से समर्थन जुटाकर छह अतिरिक्त वोट जोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन महागठबंधन के अपने चार विधायकों के अनुपस्थित रहने से यह रणनीति कमजोर पड़ गई।

    कांग्रेस के वाल्मीकि नगर विधायक सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा, फारबिसगंज के मनोज विश्वास, मनिहारी के मनोहर प्रसाद सिंह और RJD के ढाका के फैसल रहमान वोटिंग में शामिल नहीं हुए। कुल 243 में से 239 विधायकों ने वोट डाला।

    महागठबंधन की योजना थी कि ओवैसी और मायावती के समर्थन से संख्या 35 से बढ़ाकर 41 हो जाएगी। लेकिन चार विधायकों की अनुपस्थिति से यह घटकर 37 रह गई। इससे एनडीए के पांचवें उम्मीदवार शिवेश राम की जीत की संभावना मजबूत हो गई है।

    तेजस्वी यादव ने विधानसभा में मौजूद रहकर भी इस पर कोई टिप्पणी नहीं दी। उन्होंने कहा कि मतदान शाम 4 बजे तक है और परिणाम आने के बाद ही वह इस पर कुछ कहेंगे।

    विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना महागठबंधन के भीतर तालमेल की कमी और कांग्रेस के अंदर मतभेदों को उजागर करती है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी महागठबंधन के सीट बंटवारे में देरी और किचकिच को पराजय के कारणों में गिना गया था, और यही माहौल अब राज्यसभा चुनाव में भी देखने को मिला।

    एनडीए के अन्य चार उम्मीदवार हैं: नीतीश कुमार (JDU अध्यक्ष और CM), नितिन नवीन (BJP अध्यक्ष), रामनाथ ठाकुर (JDU केंद्रीय मंत्री) और उपेंद्र कुशवाहा (RLM अध्यक्ष)। चार विधायकों के वोट न डालने से एनडीए की स्थिति मजबूत हुई है और उनके सभी उम्मीदवार दिल्ली पहुंच सकते हैं।

    राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह घटना महागठबंधन के लिए गंभीर चेतावनी है। कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक कमजोरी और मतभेद गठबंधन की सफलता पर असर डाल सकते हैं। तेजस्वी यादव और RJD को अब संगठन मजबूत करने, सहयोग सुनिश्चित करने और वोटिंग रणनीति पर नजर रखने की जरूरत है।

  • UP Politics: यूपी की सियासत से बड़ी खबर, AIMIM से बसपा अलायंस करेगी या नहीं? मायावती ने साफ कर दी तस्वीर

    UP Politics: यूपी की सियासत से बड़ी खबर, AIMIM से बसपा अलायंस करेगी या नहीं? मायावती ने साफ कर दी तस्वीर


    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले दावा किया जा रहा था कि बहुजन समाज पार्टी किसी दल के साथ गठबंधन कर सकती है. इस रेस में सबसे पहले नाम हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की अध्यक्षता वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का चल रहा था. अब इस पर राज्य की पूर्व सीएम और बसपा सुप्रीमो मायावती ने तस्वीर साफ कर दी है.

    बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने कहा है कि जैसे-जैसे UP में चुनाव पास आएंगे, जो लोग हमारे खिलाफ हैं, वे हमें सत्ता से दूर रखने की और भी कोशिश करेंगे और हमारे खिलाफ साजिश करेंगे. सिर्फ UP में ही नहीं बल्कि पूरे देश में सभी अंबेडकरवादियों को डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के आत्म-सम्मान पाने के आंदोलन को मजबूत करने के लिए काम करते रहना चाहिए.पूर्व सीएम ने कहा कि आप सबको पता है कि इन दिनों AI को सफलता की पूंजी बताने की स्वार्थी बताने के बीच मीडिया में एक और चर्चा है कि विधानसभा 2027 चुनाव बसपा गठबंधन में लड़ेगी जो कि बिल्कुल झूठ है. ये फेक न्यूज है. मीडिया को ऐसी खबरों से बचना चाहिए.

    एक प्रेस वार्ता में मायावती ने कहा कि हम पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि हम विधानसभा चुनाव अकेले लडेंगे, लेकिन कुछ लोग और मीडिया घिनौनी साजिश में पड़कर अपनी इमेज खराब करते हैं. ये बसपा विरोधी एजेंडा है. लोगों को ऐसी खबरों पर ध्यान नहीं देना. कांग्रेस, सपा और बीजेपी की सोच संकीर्ण और बाबा साहेब की विरोधी है.

    मायावती ने क्यों किया अलायंस से इनकार?

    उन्होंने कहा कि इनसे गठबन्धन करके बसपा को नुकसान होता है. बसपा के लोग अकेले चुनाव लड़ने के लिए जी जान से लगे हुए हैं. बसपा, 2007 की तरह अकेले चुनाव लड़ेगी और चुनाव जीतेगी. बसपा सुप्रीमो को सिक्युरिटी दृष्टिगत टाइप 8 का बंगला मिलने के सवाल पर मायावती ने कहा कि जब यह मिला तो उसमें भी षडयंत्र के तहत ग़लत खबरें चलाई गई हैं एजेंडा के तहत. अब सुरक्षा के दृष्टिगत टाइप 8 का बंगला मिला जिसे मैने स्वीकार किया
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    उत्तर प्रदेश में 2027 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि बहुजन समाज पार्टी किसी दल के साथ गठबंधन कर सकती है। सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा थी, वह हैदराबाद के सांसदअसदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का था।
    उन्होंने आरोप लगाया कि सपा सरकार और उनके सुप्रीमो के कहने पर 2 जून 1995 गेस्ट हाउस में मुझपर हमला हुआ था जिसके अगले दिन भारत सरकार द्वारा मुझे सुरक्षा दी गई थी और सुरक्षित आवास भी लेकिन अब इतने समय के बाद भी सुरक्षा ख़तरा बड़ा है. पहले भी मुझे टाइप 8 का बंगला ही मिला था. चुनाव के नजदीक आते ही बसपा को सत्ता से दूर रखने के लिए विपक्षियों के हथकंडे बढ़ते जाएंगे.