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  • अखिलेश का योगी सरकार पर हमला, बोले- विपक्ष को बदनाम करने AI वीडियो बनाकर वायरल कर रही सरकार

    अखिलेश का योगी सरकार पर हमला, बोले- विपक्ष को बदनाम करने AI वीडियो बनाकर वायरल कर रही सरकार

    लखनऊ। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार को लखनऊ में मीडिया से बातचीत के दौरान योगी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी नेताओं को बदनाम करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से वीडियो तैयार कराकर वायरल कर रही है। अखिलेश ने कहा, ‘सरकार हमें बदनाम करने के लिए बच्चों के खेल न खेले। AI में हम उनसे काफी आगे हैं।’

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर बनाया गया एक AI वीडियो भी दिखाया गया। इसमें प्रदेश की कानून-व्यवस्था समेत कई मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए। अखिलेश ने कहा कि सरकार अगर AI का इस्तेमाल विपक्ष को बदनाम करने के लिए करेगी तो वे भी इस तकनीक में उसे पीछे छोड़ देंगे। उन्होंने सरकार को ऐसी गतिविधियों से बचने की नसीहत दी।

    ‘यूपी में बड़े पैमाने पर लूट, सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार’
    सपा प्रमुख ने प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा, ‘प्रदेश में इस समय बड़े पैमाने पर लूट हो रही है। यह अब तक यूपी की सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार स्कूल बंद करवा रही है। अखिलेश ने कहा कि सपा बंद किए गए स्कूलों में जाकर कार्यक्रम करेगी और लोगों को सरकार के कामकाज की जानकारी देगी।

    एक्सप्रेसवे में गड्ढों को लेकर सरकार पर सवाल
    अखिलेश ने कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा बनाए गए एक्सप्रेसवे में गड्ढे हो गए हैं। अब इसके डिजाइन में गड़बड़ी की बात कही जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि अगर डिजाइन में गलती हुई है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित एक एक्सप्रेसवे की स्थिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें भी गड्ढे हो गए हैं। अखिलेश ने आरोप लगाया कि पीडब्ल्यूडी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है।

    ‘कुंभ से अब तक एक लाख करोड़ से ज्यादा खर्च, विकास कहां हुआ?’
    अखिलेश ने प्रयागराज में हुए खर्च को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि कुंभ से लेकर अब तक प्रयागराज में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है। इसके बावजूद सवाल यह है कि वास्तव में कितना विकास हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है और पूरा राज्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है।

    जयंत चौधरी पर बोले अखिलेश- ‘भाजपा 61 सीटें दे तो सम्मान होगा’
    अखिलेश यादव ने केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को लेकर भी भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भाजपा अगर जयंत चौधरी को 61 सीटें देती है तो इसे उनका सम्मान माना जाएगा। इससे कम सीटें मिलने पर यह उनका अपमान होगा।

  • अखिलेश के बयान पर भड़के ओपी राजभर! जयंत चौधरी को लेकर कही बात पर पलटवार, अजय राय की मछली पार्टी पर भी उठाए सवाल

    अखिलेश के बयान पर भड़के ओपी राजभर! जयंत चौधरी को लेकर कही बात पर पलटवार, अजय राय की मछली पार्टी पर भी उठाए सवाल


    उत्तर प्रदेश । उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज होती दिखाई दे रही है। मंगलवार को कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय पर तीखे हमले किए। लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राजभर ने अखिलेश यादव के पुराने बयान को लेकर उन पर निशाना साधा और कहा कि उन्हें पढ़ने की जरूरत है। उन्होंने अखिलेश पर मानसिक संतुलन खोने तक का आरोप लगाया और समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव से जुड़े पुराने राजनीतिक रिश्तों का हवाला देते हुए जयंत चौधरी को लेकर दिए गए बयान पर पलटवार किया।

    दरअसल अखिलेश यादव ने 17 अगस्त को गठबंधन की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कुछ ऐसे गठबंधन भी किए जिनके लोग बाद में अलग हो गए। उन्होंने बिना नाम लिए कहा था कि जिनको चवन्नी से रुपया बनाया वे भी उन्हें छोड़कर चले गए। माना गया कि उनका इशारा राष्ट्रीय लोक दल और जयंत चौधरी की तरफ था। इसी बयान पर ओपी राजभर ने जवाब देते हुए कहा कि विरासत में सत्ता मिल सकती है लेकिन बुद्धि नहीं। उन्होंने कहा कि जिन चौधरी चरण सिंह को मुलायम सिंह यादव ने नेता बनाया था उनकी पार्टी को चवन्नी कहना उचित नहीं है।

    राजभर ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के अयोध्या में हुए एक कार्यक्रम में मछली परोसे जाने के मुद्दे पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि सावन के महीने में सनातन परंपरा को मानने वाले कई लोग मछली नहीं खाते हैं। ऐसे में अयोध्या में मछली परोसे जाने को लेकर उन्होंने सवाल उठाया और इसे सनातन का अपमान बताया। अजय राय की ओर से मछली नहीं खाने की बात कहे जाने पर राजभर ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर उन्होंने नहीं खाई तो भी कार्यक्रम में मछली बनाई गई थी।

    दिलचस्प बात यह रही कि जब राजभर से पूछा गया कि क्या वह खुद मछली खाते हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि अगर मिल जाती है तो खा लेते हैं और नहीं मिलती तो नहीं खाते। इसके बाद जब उनसे पश्चिम बंगाल में भाजपा का भगवा पटका पहनकर मछली खाने से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सावन के दौरान उन्होंने ऐसा नहीं किया।

    वहीं आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सीट बंटवारे के सवाल पर ओपी राजभर ने कहा कि भाजपा के साथ सीटों को लेकर कोई विवाद नहीं है। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ लोग लगातार खड़े हो रहे हैं। राजभर के इस बयान को यूपी में आने वाले चुनाव से पहले गठबंधन की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इसी बीच बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने भी चुनावी राजनीति को लेकर बड़ा फैसला किया है। मायावती ने पंजाब विधानसभा चुनाव में BSP के अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन की राजनीति से पार्टी को सीट और वोट प्रतिशत दोनों में नुकसान हुआ है। इसके अलावा गठबंधन के कारण कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित होता है। पिछली बार BSP ने पंजाब में अकाली दल के साथ गठबंधन किया था।

    लखनऊ स्थित BSP कार्यालय में पंजाब के पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक के बाद मायावती ने चुनावी तैयारियों की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि पंजाब के साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भी पार्टी की तैयारियां तेज की जाएंगी। उम्मीदवारों के चयन में मेहनती और ईमानदार नेताओं को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

    उधर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि श्रद्धालुओं की ओर से दिया गया एक एक पैसा सीधे मंदिर की तिजोरी तक पहुंचना चाहिए। मंदिर में चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी के आरोपों के बीच अदालत ने हाई पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट पर गौर किया। इससे मंदिर की वित्तीय व्यवस्था और चढ़ावे की पारदर्शिता को लेकर निगरानी और सख्त होने के संकेत मिले हैं।

  • सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण

    सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण


    नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के चवन्नी को रुपया बनाने वाले बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन की राजनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अखिलेश यादव ने 16 अगस्त को सहयोगी दलों पर तंज कसते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कई ऐसे गठबंधन किए जिनमें छोटे दलों को साथ लेकर उन्हें राजनीतिक ताकत दी लेकिन बाद में वही सहयोगी उन्हें छोड़कर चले गए। उनके इस बयान पर राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी के समर्थकों और बसपा प्रमुख मायावती की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनावी आंकड़े भी अखिलेश के दावे को मजबूती देते हैं और सपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों को वास्तव में राजनीतिक फायदा मिला।

    अगर 2024 के लोकसभा चुनाव से शुरुआत करें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 62 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत दर्ज की। यह उसके लिए बड़ी वापसी थी क्योंकि इससे पहले लगातार दो लोकसभा चुनाव में पार्टी महज पांच पांच सीटों पर सिमट गई थी। इसी चुनाव में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में 17 सीटों पर मैदान में उतरी और छह सीटें जीतने में सफल रही। 2019 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली थी। इस लिहाज से सपा के साथ गठबंधन के बाद उसके प्रदर्शन में बड़ा सुधार हुआ।

    2024 में जन अधिकार पार्टी को भी सपा के साथ गठबंधन का फायदा मिला। पार्टी के प्रमुख बाबू सिंह कुशवाहा को जौनपुर सीट से सपा के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज कर पहली बार लोकसभा का रास्ता तय किया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी भदोही से चुनाव हार गए और पार्टी का खाता नहीं खुल सका।

    अब 2019 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो सपा और बसपा ने लंबे अंतराल के बाद साथ चुनाव लड़ा था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। बसपा ने 10 सीटें जीतीं जबकि सपा के खाते में सिर्फ पांच सीटें आईं। खास बात यह थी कि 2014 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी। इस लिहाज से 2019 में उसका प्रदर्शन बड़ी वापसी माना गया। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद दोनों दलों का गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बसपा ने सपा से दूरी बना ली।

    2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने कई छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर आठ सीटें जीतीं। 2017 में रालोद के खाते में सिर्फ एक सीट आई थी। इसी तरह ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं। हालांकि अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल को सिराथू से बड़ी जीत मिली लेकिन पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा। दूसरी ओर महान दल और जनवादी पार्टी समाजवादी गठबंधन के बावजूद कोई सीट नहीं जीत सके।

    2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन दोनों दलों को बड़ा फायदा नहीं मिला। सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर लड़कर सात सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 2012 की तुलना में 21 सीटों का नुकसान हुआ था।

    इन आंकड़ों को देखें तो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करने वाले कई बड़े दलों के प्रदर्शन में सुधार जरूर दिखाई देता है। हालांकि हर सहयोगी को समान सफलता नहीं मिली। कुछ दलों को सीटें मिलीं तो कुछ गठबंधन के बावजूद चुनावी जमीन मजबूत नहीं कर सके। यही वजह है कि अखिलेश के बयान को लेकर राजनीतिक बहस आंकड़ों के साथ साथ गठबंधन की रणनीति और सीट बंटवारे तक पहुंच गई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा और उसके संभावित सहयोगियों के बीच यह सियासी रिश्ता किस दिशा में जाता है।

  • अखिलेश के बयान पर सियासी घमासान: जयंत के समर्थन में उतरीं मायावती, बोलीं- तुरंत माफी मांगें सपा प्रमुख

    अखिलेश के बयान पर सियासी घमासान: जयंत के समर्थन में उतरीं मायावती, बोलीं- तुरंत माफी मांगें सपा प्रमुख


    नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के ‘चवन्नी को रुपया बना दिया’ वाले बयान को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में बयानबाजी तेज हो गई है। राष्ट्रीय लोकदल (RLD) अध्यक्ष जयंत चौधरी के जाट समाज को निशाना बनाए जाने के आरोप के बाद अब बसपा सुप्रीमो मायावती भी उनके समर्थन में उतर आई हैं। मायावती ने अखिलेश यादव के बयान को अहंकारी और अशोभनीय बताते हुए उनसे तुरंत माफी मांगने की मांग की है।

    जयंत बोले- राजनीतिक लड़ाई में मेरा नाम लेते, समाज को क्यों घसीटा?

    जयंत चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर अखिलेश यादव पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोध के बीच अखिलेश ने पूरे जाट समाज को निशाना बनाया। जयंत ने कहा कि अगर अखिलेश को उनसे कोई शिकायत थी तो सीधे उनका नाम लेकर बात करनी चाहिए थी। पूरे समाज को इस विवाद में घसीटना उचित नहीं है।

    जयंत ने अखिलेश के रवैये को अहंकारी बताते हुए कहा कि उन्होंने इस तरह के राजनीतिक अहंकार को करीब से देखा है और यही किसी के राजनीतिक पतन की वजह बनता है।

    मायावती ने जयंत का किया समर्थन

    मायावती ने भी X पर पोस्ट कर जयंत चौधरी का समर्थन किया। उन्होंने अखिलेश यादव के बयान को न केवल जयंत और राष्ट्रीय लोकदल का अपमान बताया, बल्कि इसे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और जाट समाज का भी अपमान करार दिया।

    मायावती ने कहा कि अखिलेश यादव को अपने बयान के लिए तुरंत माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने समाजवादी पार्टी पर अहंकारी रवैया अपनाने का आरोप भी लगाया।

    1993 के सपा-बसपा गठबंधन का भी किया जिक्र

    मायावती ने सपा पर निशाना साधते हुए 1993 के सपा-बसपा गठबंधन का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के इसी अहंकारी रवैये के कारण गठबंधन टूट गया था और इसके बाद स्टेट गेस्ट हाउस कांड हुआ।

    मायावती का कहना है कि बाद में दोनों दलों के बीच राजनीतिक गठबंधन जरूर हुआ, लेकिन अखिलेश यादव के रवैये में भी कथित तौर पर वही अहंकार दिखाई दिया। उन्होंने सपा पर राजनीतिक जरूरत के हिसाब से रुख बदलने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी काम निकलने के बाद ‘गिरगिट की तरह रंग बदलती है।’

    PDA में पंडितों को शामिल करने पर भी साधा निशाना

    मायावती ने अखिलेश यादव के PDA में ‘P’ को पंडितों से जोड़ने वाले बयान पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा अब पंडित समाज को अपना हितैषी बताने की कोशिश कर रही है, जबकि उनके मुताबिक पार्टी ने कभी पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों या ब्राह्मण समाज के हित में वास्तविक रूप से काम नहीं किया।

    क्या था अखिलेश का ‘चवन्नी’ वाला बयान?

    दरअसल, कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने अपने सहयोगी दलों और राजनीतिक साथियों का जिक्र करते हुए बिना नाम लिए आरएलडी और जयंत चौधरी पर तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि समाजवादी पार्टी ने अपने सहयोगियों को आगे बढ़ाया, लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग पार्टी का साथ छोड़कर चले गए।

    अखिलेश ने इसी संदर्भ में कहा था कि ‘हम लोगों ने चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी हमें छोड़कर चले गए।’ इसी बयान को लेकर अब जयंत चौधरी और मायावती ने सपा प्रमुख पर हमला बोला है।

  • पहली बार यूपी में नेताओं को दी गई बुलेट प्रूफ जैकेट, 11 मंत्रियों समेत 52 नाम शामिल; जानिए किसे मिली कौन सी सुरक्षा

    पहली बार यूपी में नेताओं को दी गई बुलेट प्रूफ जैकेट, 11 मंत्रियों समेत 52 नाम शामिल; जानिए किसे मिली कौन सी सुरक्षा


    उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। योगी सरकार ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती समेत 52 नेताओं को बुलेट प्रूफ जैकेट उपलब्ध कराई है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं को इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है। सूची में सत्ता पक्ष के नेताओं के साथ विपक्ष के प्रमुख चेहरे और अलग-अलग दलों से जुड़े कई नेता भी शामिल हैं।

    जानकारी के मुताबिक सुरक्षा मुख्यालय की ओर से इन बुलेट प्रूफ जैकेट की खरीद की गई है। एक जैकेट की कीमत करीब डेढ़ लाख रुपये बताई जा रही है। पहले चरण में आठ नेताओं को जैकेट दी गई थी जबकि दूसरे चरण में 44 और नेताओं को यह सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराया गया है। इस तरह कुल 52 नेता अब बुलेट प्रूफ जैकेट पाने वालों की सूची में शामिल हो गए हैं। इनमें प्रदेश सरकार के 11 कैबिनेट मंत्री भी बताए जा रहे हैं।

    जिन प्रमुख नामों को जैकेट दी गई है उनमें मंत्री संजय निषाद नंद गोपाल गुप्ता नंदी ओम प्रकाश राजभर और अपर्णा यादव शामिल हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चर्चित भाजपा नेताओं संगीत सोम और सुरेश राणा का नाम भी सूची में बताया गया है। हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए नेताओं को बुलेट प्रूफ जैकेट देने का फैसला किया गया। सुरक्षा मुख्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक पहले बुलेट प्रूफ जैकेट सुरक्षा मानकों में शामिल नहीं थी लेकिन अब इसे सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है।

    इस फैसले को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सुरक्षा तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रदेश में कई नेताओं को पहले से ही अलग-अलग श्रेणियों की सुरक्षा उपलब्ध है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल 98 नेताओं और अन्य महत्वपूर्ण लोगों को विभिन्न सुरक्षा श्रेणियां मिली हुई हैं। इनमें सबसे अधिक लोगों को Y श्रेणी की सुरक्षा हासिल है जबकि कुछ लोगों को Y प्लस और एस्कॉर्ट के साथ अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान की गई है।

    राज्य की सबसे ऊंची सुरक्षा श्रेणियों में शामिल Z प्लस सुरक्षा पाने वालों में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा अखिलेश यादव और मायावती भी शामिल बताए गए हैं। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पूर्व सांसद मुरली मनोहर जोशी और विनय कटियार समेत कई अन्य प्रमुख नेताओं को भी इस श्रेणी में सुरक्षा दी गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुरेश राणा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश का नाम भी Z प्लस सुरक्षा सूची में बताया गया है।

    वहीं उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा को Z श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और प्रदेश सरकार के मंत्री नंद गोपाल नंदी समेत कई नेताओं को भी इसी स्तर की सुरक्षा हासिल है। दूसरी ओर ओम प्रकाश राजभर बेबी रानी मौर्य लक्ष्मी नारायण चौधरी और बलदेव सिंह औलख समेत कई नेताओं को Y प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी गई है।

    मंत्री संजय निषाद को Y श्रेणी की सुरक्षा एस्कॉर्ट के साथ मिली हुई है। उनके अलावा कई सांसद विधायक पूर्व राज्यपाल और अन्य राजनीतिक हस्तियों को भी अलग-अलग श्रेणियों में सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है। बुलेट प्रूफ जैकेट के मामले में मंत्री संजय निषाद ने बताया कि उन्हें अभी इसे पहनने का प्रशिक्षण नहीं मिला है।

    कुल मिलाकर चुनावी वर्ष से पहले उत्तर प्रदेश में नेताओं की सुरक्षा को लेकर सरकार की तैयारियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। हालांकि बुलेट प्रूफ जैकेट बांटने के फैसले की विस्तृत वजह सरकार की ओर से सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में यह कदम सुरक्षा समीक्षा का हिस्सा है या चुनाव से पहले संभावित खतरे को देखते हुए एहतियाती व्यवस्था इसका स्पष्ट जवाब आने वाले समय में ही सामने आएगा।

  • यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?

    यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?


    लखनऊ।
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच ब्राह्मण मतदाता एक बार फिर सियासी दलों के केंद्र में आते दिख रहे हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के गठजोड़ यानी पीडीए की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अब ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में जुटे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश ने पीडीए के ‘पीडी’ का अर्थ ‘पंडित’ बताया।

    अखिलेश ने विकास दुबे एनकाउंटर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा पर निशाना साधा। सियासी जानकारों की नजर में यह कोशिश इसलिए अहम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 115 से 120 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव माना जाता है। पूर्वांचल के कुछ क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक बताई जाती है।

    राम मंदिर आंदोलन के बाद बदला ब्राह्मणों का रुख
    90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर कांग्रेस की नीतियों से नाराज ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया। इसके पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों के प्रति समुदाय का झुकाव भी एक प्रमुख कारण माना गया। इसी दौर में मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से दूर हुए।

    1990 में अयोध्या जा रहे कारसेवकों की गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुस्लिम समुदाय का मजबूत समर्थन मिला। यादव और मुस्लिम मतों के समीकरण ने मुलायम की राजनीतिक जमीन को मजबूती दी। वहीं, ब्राह्मणों के भाजपा के साथ आने से 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

    1993 में सपा और बसपा के गठबंधन ने पिछड़ा, दलित और मुस्लिम समीकरण के सहारे सत्ता हासिल की। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बाद में भाजपा और सपा के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला बन गया।

    मायावती ने भी आजमाया था ब्राह्मण कार्ड
    2003 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। उन्होंने दलित और ब्राह्मणों के बीच राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए अभियान चलाया। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 41 चुनाव जीते। इसके बाद मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं।

    इस दौरान बसपा के नारे भी बदले और पार्टी ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ की राजनीति को आगे बढ़ाया। सतीश मिश्र और रामवीर उपाध्याय जैसे ब्राह्मण नेताओं को पार्टी में प्रमुख भूमिका मिली। हालांकि सरकार बनने के कुछ समय बाद दलित और ब्राह्मण कैडर के बीच मतभेद की खबरें सामने आने लगीं।

    2012 में सपा ने भी साधे ब्राह्मण
    2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की। मुलायम सिंह यादव ने 45 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 21 चुनाव जीतने में सफल रहे। इसके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

    हालांकि सरकार के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक घटनाओं और हिंदू धार्मिक आयोजनों को लेकर उठे सवालों ने ब्राह्मणों के एक वर्ग को सपा से दूर कर दिया। इसके बाद 2017 में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर भाजपा के साथ दिखाई दिया।

    भाजपा के साथ क्यों जुड़ा ब्राह्मण वोट?
    2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 68 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 46 जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2022 के चुनाव में भी भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक निर्वाचित हुए।

    योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्ववादी राजनीति, कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख और सनातन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देने की नीति को भाजपा के साथ ब्राह्मणों के जुड़ाव की वजहों में गिना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यूजीसी गाइडलाइन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और संगठन में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।

    पिछले वर्ष दिसंबर में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर ब्राह्मण विधायकों की बैठक और इस पर पार्टी अध्यक्ष पंकज चौधरी की सार्वजनिक नाराजगी के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया।

    अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
    अखिलेश यादव अब इन्हीं संभावित असंतोष के बीच भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन और अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश के लिए यह राह आसान नहीं होगी। 2022 से पहले भी सपा ने परशुराम और विष्णु मंदिर बनाने तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने जैसे वादों के जरिए इसी तरह की कोशिश की थी, लेकिन उसका चुनावी असर सीमित रहा।

    इसके अलावा सपा का पारंपरिक यादव वोट बैंक और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच राजनीतिक तालमेल बनाना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, अखिलेश के सामने मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने और ब्राह्मणों को आकर्षित करने के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी होगी।

    मायावती भी पीछे नहीं
    ब्राह्मण वोटों को लेकर बसपा प्रमुख मायावती भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने घोषित उम्मीदवारों में ब्राह्मणों को अच्छी संख्या में जगह दी है। जालौन के माधौगढ़ से आशीष पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने की कोशिश की है। मायावती पहले भी ब्राह्मण-दलित समीकरण के जरिए सत्ता हासिल कर चुकी हैं। 2007 में उनका प्रयोग सफल रहा था। इस बार भी वह दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के बीच सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही हैं।

    किसके पाले में जाएगा ब्राह्मण वोट?
    2027 के चुनाव में सपा और बसपा दोनों ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। अखिलेश के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह ब्राह्मणों को आकर्षित करते हुए अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को किस तरह साथ रख पाएंगे। वहीं मायावती के सामने 2007 वाला सामाजिक समीकरण दोहराने की चुनौती है। ऐसे में यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोट किस दल के पक्ष में कितना झुकता है, इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव के कई सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।

  • लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सियासत तेज, पंखे से सड़क सुखाने के वीडियो पर अखिलेश का तंज

    लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सियासत तेज, पंखे से सड़क सुखाने के वीडियो पर अखिलेश का तंज


    लखनऊ।
    लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की निर्माण गुणवत्ता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मरम्मत के दौरान सड़क को पंखों से सुखाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर निशाना साधा है। वहीं, सड़क धंसने की घटनाओं के बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने निर्माण एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है और मामले की जांच आईआईटी खड़गपुर को सौंपी गई है।

    अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वायरल वीडियो साझा करते हुए तंज कसा, “भाजपाई तरक्की की नई हवा”। उन्होंने कहा कि जिस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन कुछ ही दिन पहले हुआ हो, उसकी बार-बार मरम्मत होना निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने यह भी पूछा कि जब सड़क उद्घाटन के दो-तीन सप्ताह के भीतर ही कई बार मरम्मत मांग रही है, तो उस पर तेज रफ्तार से सफर करने का जोखिम आखिर कौन उठाएगा।

    20 दिन में कई जगह सड़क धंसने के मामले
    करीब 63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 13 जुलाई को किया गया था। लगभग 4,200 करोड़ रुपये की लागत से बने इस एक्सप्रेसवे पर उद्घाटन के बाद करीब 20 दिनों के भीतर कई स्थानों पर सड़क धंसने और सतह खिसकने की घटनाएं सामने आई हैं, जिसके बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं।

    NHAI ने शुरू की सख्त कार्रवाई
    लगातार शिकायतों के बाद NHAI ने निर्माण एजेंसी PNC Infratech के खिलाफ नॉन-परफॉर्मर घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। परियोजना निदेशक नकुल प्रकाश वर्मा को हटाकर उनके मूल विभाग भेज दिया गया है। इसके अलावा पूर्व परियोजना निदेशक सौरभ चौरसिया को आरोपपत्र जारी किया गया है।

    साथ ही प्रोजेक्ट मैनेजर विवेक गुप्ता, रेजिडेंट इंजीनियर यतेंद्र कुमार और स्वतंत्र अभियंता टीम के प्रमुख सुरेंद्र कुमार को दो वर्षों के लिए NHAI और सड़क परिवहन मंत्रालय की परियोजनाओं से प्रतिबंधित कर दिया गया है।

    IIT खड़गपुर करेगी तकनीकी जांच
    NHAI का कहना है कि लगातार बारिश के कारण सड़क के नीचे की मिट्टी तक पानी पहुंचने से कुछ हिस्सों में स्लिपेज की स्थिति बनी है। हालांकि वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञों की समिति गठित की गई है। इसके अलावा पूरे एक्सप्रेसवे का लेजर प्रोफिलोमीटर तकनीक से परीक्षण कराया जा रहा है।

    मरम्मत तक नहीं लगेगा टोल
    प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित हिस्सों की मरम्मत पर आने वाला करीब 3 करोड़ रुपये का खर्च निर्माण कंपनी ही वहन करेगी। मरम्मत पूरी होने तक एक्सप्रेसवे पर टोल वसूली भी स्थगित रहेगी और इस दौरान यात्रियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। टोल से होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई भी निर्माण एजेंसी से ही की जाएगी।

  • अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    गाजियाबाद। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की मनोकामना को लेकर रेसलिंग खिलाड़ी बॉबी यादव हरिद्वार से 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल यात्रा पर निकले हैं। शुक्रवार को वह अपने साथियों के साथ मुरादनगर पहुंचे, जहां कांवड़ियों ने स्थानीय थाने में विश्राम किया और उनका स्वागत किया गया।

    नोएडा के सर्फाबाद निवासी बॉबी यादव ने बताया कि उन्होंने एक जुलाई को अखिलेश यादव के जन्मदिन के अवसर पर हरिद्वार से गंगाजल उठाया था। उन्होंने विशेष संकल्प के साथ यह कांवड़ यात्रा शुरू की है और पैदल चलते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं।

    साथियों के साथ जारी है यात्रा
    बॉबी यादव के साथ इस यात्रा में रिंकू, मोनू, हर्ष, राज, लविश समेत कई साथी भी शामिल हैं। यात्रा के दौरान यह दल विभिन्न स्थानों पर पड़ाव डालते हुए आगे बढ़ रहा है। रास्ते में स्थानीय लोगों और समर्थकों की ओर से उनका स्वागत और सत्कार भी किया जा रहा है।

    आस्था और संकल्प का प्रतीक
    बॉबी यादव का कहना है कि यह कांवड़ यात्रा उनकी धार्मिक आस्था और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उनका विश्वास है कि भगवान शिव की कृपा से उनकी मनोकामना पूरी होगी और वे इसी भावना के साथ गंगाजल अर्पित करने की यात्रा पूरी कर रहे हैं।
  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद पर सियासत तेज, अखिलेश यादव ने AI वीडियो शेयर कर BJP पर साधा निशाना

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद पर सियासत तेज, अखिलेश यादव ने AI वीडियो शेयर कर BJP पर साधा निशाना


    नई दिल्‍ली । अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बार फिर बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है. इस बार उन्होंने सोशल मीडिया पर भगवान श्रीराम का 4 मिनट 40 सेकेंड का AI वीडियो शेयर किया और सवाल किया, “क्या फिर चले गए वनवास?” इस वीडियो के जरिए मंदिर में हुई चोरी और उससे जुड़े घटनाक्रम को प्रतीकात्मक अंदाज में दिखाया गया है.

    अखिलेश यादव ने जो वीडियो शेयर किया है, वह सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि एक सिनेमैटिक प्रस्तुति है. इसकी शुरुआत सूनी और शांत अयोध्या से होती है. इसके बाद मंदिर के अंदर भगवान श्रीराम की AI से बनाई गई आकृति दिखाई देती है. पूरे वीडियो में माहौल गंभीर रखा गया है, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि मंदिर में हुई घटना से अयोध्या का वातावरण बदल गया है.

    वीडियो के अगले हिस्से में मंदिर का वो कोना दिखता है जहां चोरी हुई. विजुअल्स में एक बड़ा दानपात्र और आसपास का सामान नजर आता है. गाना आगे बढ़ने पर अयोध्या के लोग और साधु-संत हाथ जोड़े खड़े दिखाई देते हैं, और प्रभु राम नगरी की सीमा की तरफ बढ़ते हैं. कुल मिलाकर अखिलेश यादव ने इस पूरे वीडियो और भजन के माध्यम से धर्म के नाम पर सरकार को आड़े हाथों लिया है.

    बता दें कि अबतक इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन की टीमों ने अनुकल्प मिश्रा समेत सभी सात आरोपियों के घरों पर एक साथ छापेमारी की. करीब डेढ़ से ढाई घंटे चली इस कार्रवाई में अलमारियों और बक्सों का कोना-कोना छाना गया. जांच में सामने आया है कि आरोपी अनुकल्प मिश्रा ने अपने घर पर सात दिनों की भव्य रामकथा का आयोजन कराया था, जिस पर 50 लाख रुपये से अधिक खर्च किए गए थे. इस आयोजन के एक वीडियो में चंपत राय भी मौजूद दिख रहे हैं.

    यह पूरा मामला 5 जून 2026 को तब सामने आया था, जब राम मंदिर परिसर में रूटीन चेकिंग के दौरान सुरक्षाकर्मियों ने कुछ कर्मचारियों की जेब से नकदी बरामद की. इसके बाद 7 जून को जब यह बात पब्लिक हुई, तो अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर इस गबन का मुद्दा उठाकर जांच की मांग की. विपक्ष के दबाव और लोगों के गुस्से को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 13 जून 2026 को इस पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय एसआईटी (SIT) का गठन कर दिया.

    फिलहाल मामले की जांच तेज है. प्रशासन लगातार सभी आरोपियों की अवैध संपत्तियों और सबूतों को जुटाने में लगा है, ताकि इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया जा सके.

  • लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर ओपी राजभर का हमला, बोले- भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नमूना, 'सैफई परिवार को मिलेगी सजा

    लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर ओपी राजभर का हमला, बोले- भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नमूना, 'सैफई परिवार को मिलेगी सजा


    लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी का दौर लगातार तेज होता जा रहा है। योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने एक बार फिर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है। इस बार उन्होंने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे के निर्माण को लेकर गंभीर आरोप लगाते हुए इसे “भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नमूना” करार दिया।

    ओपी राजभर ने कहा कि यदि किसी को अखिलेश यादव सरकार के समय हुए भ्रष्टाचार के उदाहरण देखने हों तो लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे सबसे बड़ा उदाहरण है। उनका आरोप है कि निजी लाभ और धन कमाने की लालसा में एक्सप्रेसवे के निर्माण में मानकों की अनदेखी की गई, जिसके कारण यह सड़क हादसों का केंद्र बन गई। उन्होंने दावा किया कि कई लोग इसे “मौत का एक्सप्रेसवे” भी कहने लगे हैं क्योंकि यहां बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं हुई हैं।

    राजभर ने आरोप लगाया कि एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान सैफई परिवार और उनके करीबी लोगों ने जनता के धन का दुरुपयोग किया। उन्होंने कहा कि फिरोजाबाद से लेकर इटावा तक जमीन खरीद और मुआवजे में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। उनके मुताबिक पहले औने-पौने दाम पर जमीनें खरीदी गईं, फिर एक्सप्रेसवे का रूट बदला गया और रिकॉर्ड में बदलाव कर जमीनों को आवासीय श्रेणी में दिखाया गया, जिससे भारी मुआवजा हासिल किया जा सके।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक्सप्रेसवे की घोषणा के बाद भी कई जमीनों की रजिस्ट्रियां कराई गईं और बाद में उन जमीनों का मुआवजा लिया गया। राजभर का दावा है कि एक्सप्रेसवे का मार्ग इस तरह बदला गया कि सैफई परिवार और उनसे जुड़े लोगों की जमीनों का मूल्य कई गुना बढ़ गया।

    कैबिनेट मंत्री ने कहा कि मूल रूप से करीब 270 किलोमीटर लंबा प्रस्तावित एक्सप्रेसवे निजी हितों के चलते 300 किलोमीटर से अधिक लंबा कर दिया गया। उनका कहना था कि इसका खामियाजा आज भी आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। लंबी दूरी तय करने के कारण यात्रियों का समय, ईंधन और पैसा तीनों अधिक खर्च हो रहे हैं।

    ओपी राजभर ने कहा कि इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार की परतें समय-समय पर सामने आती रहती हैं और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि उनके पास कथित अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं और समय आने पर सभी तथ्य सार्वजनिक किए जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार करने वालों को सजा मिलेगी और कानून अपना काम करेगा।

    राजभर के इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सियासी माहौल गर्म हो गया है। हालांकि, इन आरोपों पर समाजवादी पार्टी की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मामले को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।