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  • यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम बहुल सीटों और विपक्षी दलों के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए परिवारवाद का आरोप लगाया है। कैराना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आजमगढ़, बदायूं और फिरोजाबाद का जिक्र किया और दावा किया कि इन क्षेत्रों में पहले मुस्लिम सांसद चुने जाते थे, लेकिन अब यादव परिवार के सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

    ओवैसी ने अपने भाषण में कहा कि एक समय आजमगढ़ से मुस्लिम सांसद जीतकर संसद पहुंचते थे, जबकि अब वहां से अखिलेश यादव के भाई सांसद हैं। उन्होंने बदायूं और फिरोजाबाद का उल्लेख करते हुए भी समाजवादी पार्टी पर परिवार के सदस्यों को राजनीतिक अवसर देने का आरोप लगाया। उनके बयान का मुख्य मुद्दा मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समाजवादी पार्टी में परिवार की भूमिका रहा।

    AIMIM प्रमुख ने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी के बजाय समाजवादी यादव परिवार रख लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यादव परिवार की राजनीति में परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जा रही है और मुस्लिम समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग पीछे रखे।

    उन्होंने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी सीमित की जा रही है। ओवैसी के अनुसार, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में उसकी क्या नीति है। उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे को उठाते हुए सपा पर मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया।

    ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर भी अखिलेश यादव की आलोचना की। हालांकि, उनके इस बयान के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी में सपा की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन समाजवादी पार्टी समेत कई दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में ओवैसी के बयान को आगामी चुनाव से पहले विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    विपक्षी गठबंधन को लेकर ओवैसी ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्षी दलों का उद्देश्य भाजपा को हराना है, तो AIMIM भी उनके साथ आने के लिए तैयार है। ओवैसी ने यह भी कहा कि वह योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। उनके इस रुख से संकेत मिलता है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की संभावना पर उनकी पार्टी बातचीत के लिए तैयार है, हालांकि गठबंधन की कोई अंतिम रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    ओवैसी की राजनीतिक रणनीति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIMIM अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। खबर में उल्लेख किया गया है कि 15 अक्टूबर को मुस्लिम विद्वान और राजनीतिक विश्लेषक हाजी अब्दुल सलाम ने दावा किया था कि AIMIM राज्य की 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। उनके अनुसार, यदि पार्टी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में जगह नहीं मिलती है, तो कुछ सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यह फिलहाल एक रणनीतिक आकलन है, न कि घोषित उम्मीदवारों की अंतिम सूची।

    मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और संभल जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं का रुझान आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन क्षेत्रों में विभिन्न दलों की चुनावी रणनीति और गठबंधन की स्थिति राजनीतिक मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि AIMIM कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और विपक्षी दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर क्या सहमति बनेगी।

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी के बयानों ने समाजवादी पार्टी की राजनीति, परिवारवाद और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल गठबंधन को लेकर क्या फैसला करते हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं।

  • रामपुर जेल में आजम खान से मिले अखिलेश यादव, एक घंटे की मुलाकात के बाद 2027 चुनाव को लेकर भाजपा पर साधा निशाना

    रामपुर जेल में आजम खान से मिले अखिलेश यादव, एक घंटे की मुलाकात के बाद 2027 चुनाव को लेकर भाजपा पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुरुवार को रामपुर जिला जेल में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुलाकात के बाद जेल से बाहर आए अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा और कहा कि समाजवादी पार्टी का लक्ष्य भाजपा को सत्ता से हटाना है। इस मुलाकात को उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों और पार्टी के राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में अहम माना जा रहा है।

    अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि समाजवादी पार्टी का उद्देश्य स्पष्ट है और पार्टी के कार्यकर्ता भाजपा को हराने के लिए मजबूती से काम कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि सत्ताधारी दल का जनाधार कमजोर हो रहा है और आगामी चुनावों में उसे जनता के विरोध का सामना करना पड़ेगा। अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता भाजपा को सत्ता से बाहर करने का फैसला करेगी। ये बयान सपा अध्यक्ष की राजनीतिक रणनीति और आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के रुख को दर्शाते हैं।

    सपा प्रमुख ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन परिणामों से जनता का संदेश सामने आ चुका है। अखिलेश यादव के मुताबिक, 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति में पीडीए की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। पीडीए से आशय पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से है। पार्टी इस सामाजिक समीकरण के साथ सामाजिक न्याय और जमीनी मुद्दों को भी अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाने पर जोर दे रही है।

    मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों से जुड़े मुद्दों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से वंचित और पीडीए समुदायों को आगे बढ़ने का अवसर देना रहा है। उनके बयान में शिक्षा, सामाजिक न्याय और संस्थानों पर हो रही कार्रवाई से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। हालांकि, इन कार्रवाइयों के विशिष्ट मामलों और उनके कानूनी पहलुओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।

    आजम खान समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे हैं और रामपुर की राजनीति में उनका लंबे समय से प्रभाव रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव की उनसे जेल में हुई मुलाकात को पार्टी के भीतर संपर्क और राजनीतिक एकजुटता के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। मुलाकात के दौरान किन विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, जेल से बाहर आने के बाद अखिलेश यादव की टिप्पणियों में भाजपा के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष और 2027 के चुनाव की तैयारी प्रमुख रही।

    रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज होने की संभावना है। समाजवादी पार्टी के समर्थकों के लिए यह मुलाकात वरिष्ठ नेताओं के बीच संवाद का संकेत है, जबकि इसके राजनीतिक प्रभाव का आकलन आगामी घटनाक्रम और पार्टी की रणनीति के आधार पर किया जा सकेगा। फिलहाल अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से भाजपा को हराने और पीडीए के मुद्दों को आगामी विधानसभा चुनाव में केंद्र में रखने का संदेश दिया है।

  • अयोध्या में योगी बनाम अखिलेश का मुकाबला हुआ तो कौन पड़ेगा भारी? पिछले चुनावों के आंकड़े क्या कहते हैं

    अयोध्या में योगी बनाम अखिलेश का मुकाबला हुआ तो कौन पड़ेगा भारी? पिछले चुनावों के आंकड़े क्या कहते हैं

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज होने के साथ ही नेताओं के बीच जुबानी जंग भी बढ़ने लगी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती ने सियासी चर्चा को और तेज कर दिया है। हालांकि, दोनों नेताओं के अयोध्या से चुनाव लड़ने को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है, लेकिन इस बयानबाजी के बाद संभावित मुकाबले को लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं।

    दरअसल, अयोध्या में एक कार्यक्रम के दौरान अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनौती देते हुए कहा कि वह पवन पांडेय के खिलाफ चुनाव लड़कर दिखाएं। इसके जवाब में योगी आदित्यनाथ ने कहा कि चेलों से मुकाबला करने के बजाय दोनों अयोध्या से नामांकन कर चुनाव लड़ें। इस बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि यदि दोनों नेता वास्तव में अयोध्या विधानसभा सीट से आमने-सामने आते हैं, तो किसका पलड़ा भारी रह सकता है?

    फिलहाल यह मुकाबला काल्पनिक है। इसके संभावित नतीजे का अनुमान पिछले चुनावों, सामाजिक समीकरणों, स्थानीय मुद्दों और दोनों दलों के संगठनात्मक प्रभाव के आधार पर ही लगाया जा सकता है। यहां दिए गए जातीय आंकड़े विभिन्न मीडिया रिपोर्टों पर आधारित अनुमान हैं, आधिकारिक मतदाता आंकड़े नहीं। इसलिए इन्हें चुनाव परिणाम की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।

    अयोध्या में जातीय समीकरण की क्या है तस्वीर?

    अयोध्या विधानसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण को लेकर अलग-अलग चुनावी रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। वर्ष 2022 की एक रिपोर्ट में ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत, यादव मतदाताओं की 12 प्रतिशत और दलित मतदाताओं की 15 प्रतिशत बताई गई थी। वहीं, दूसरी रिपोर्ट में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या करीब 40 हजार और दलित मतदाताओं की संख्या लगभग 65 हजार बताई गई थी।

    एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में करीब 45 हजार ब्राह्मण, 43 हजार अनुसूचित जाति और 36 हजार यादव मतदाता थे। इन आंकड़ों में अंतर होने के कारण जातीय समीकरण का आकलन करते समय सावधानी जरूरी है।

    अगड़ी जातियों का रुख किसके पक्ष में जा सकता है?

    अयोध्या विधानसभा सीट पर ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, बनिया, अग्रवाल और कायस्थ जैसे समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ब्राह्मण मतदाता भाजपा और सपा, दोनों के लिए अहम हो सकते हैं। उनका रुख संभावित मुकाबले की दिशा प्रभावित कर सकता है।

    ठाकुर मतदाताओं को भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्गों में गिना जाता है, जबकि वैश्य, बनिया और अग्रवाल समुदाय का प्रभाव शहरी और कारोबारी मतदाताओं के बीच महत्वपूर्ण माना जाता है। इन वर्गों का झुकाव किस पार्टी की ओर रहता है, यह उम्मीदवारों की छवि, स्थानीय मुद्दों और चुनाव प्रचार पर भी निर्भर करेगा।

    पिछड़ी जातियों के वोट पर भी रहेगी नजर

    अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में यादव, कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, निषाद, केवट, राजभर, लोध और अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाता भी चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    यादव समुदाय को समाजवादी पार्टी का पारंपरिक समर्थक वर्ग माना जाता है। अखिलेश यादव के लिए चुनौती यह होगी कि वह यादव मतदाताओं के साथ-साथ दूसरे पिछड़े वर्गों और दलित मतदाताओं का कितना समर्थन हासिल कर पाते हैं।

    दूसरी ओर, कुर्मी, मौर्य, निषाद और राजभर जैसे समुदायों के बीच भाजपा की पकड़ संभावित मुकाबले में उसके लिए फायदेमंद हो सकती है। हालांकि, किसी समुदाय के सभी मतदाताओं के एक ही पार्टी को वोट देने की धारणा सही नहीं मानी जा सकती। स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय समस्याएं और व्यक्तिगत पसंद भी मतदान को प्रभावित करते हैं।

    योगी के लिए राम मंदिर और विकास होंगे अहम मुद्दे

    यदि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या से चुनाव लड़ते हैं, तो राम मंदिर, धार्मिक पर्यटन, शहर का विकास, बुनियादी सुविधाएं और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे चुनाव प्रचार के केंद्र में रह सकते हैं। भाजपा के संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी उनके लिए महत्वपूर्ण होगी।

    इसके साथ ही यह देखना होगा कि अगड़ी जातियों के अलावा पिछड़े वर्गों और दलित मतदाताओं के बीच भाजपा कितना समर्थन बनाए रख पाती है। केवल राम मंदिर या विकास के मुद्दे के आधार पर नतीजे का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं होगा।

    अखिलेश के लिए पीडीए की कितनी होगी भूमिका?

    अखिलेश यादव की राजनीति में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सामाजिक गठजोड़ को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन ने इस रणनीति को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया था।

    अयोध्या विधानसभा सीट पर अखिलेश यादव के लिए अहम सवाल यह होगा कि यादव मतदाताओं के साथ दूसरे पिछड़े वर्गों और दलित समुदायों का कितना समर्थन मिल पाता है। इसके अलावा ब्राह्मणों और अन्य गैर-यादव मतदाताओं का रुख भी संभावित मुकाबले पर असर डाल सकता है।

    पिछले तीन विधानसभा चुनावों में क्या रहा परिणाम?

    अयोध्या विधानसभा सीट पर पिछले तीन चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहां भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले का रुख समय के साथ बदला है।

    विधानसभा चुनाव विजेता पार्टी जीत का अंतर
    2012 तेज नारायण पांडेय (पवन पांडेय) सपा 5,405
    2017 वेद प्रकाश गुप्ता भाजपा 50,440
    2022 वेद प्रकाश गुप्ता भाजपा 19,990

    इन नतीजों से स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी वर्ष 2012 में अयोध्या सीट जीत चुकी है, जबकि भाजपा ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की। वर्ष 2022 में भाजपा की जीत का अंतर 2017 के मुकाबले कम रहा था।

    वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट से समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने जीत दर्ज की थी। हालांकि, अयोध्या विधानसभा क्षेत्र के चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, इस हिस्से में भाजपा के लल्लू सिंह को सपा के अवधेश प्रसाद के मुकाबले करीब 4,667 मतों की बढ़त मिली थी। इससे पता चलता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं का रुख अलग-अलग हो सकता है।

    आखिर किसका पलड़ा रहेगा भारी?

    योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच अयोध्या से संभावित मुकाबले में किसी एक को अभी से विजेता घोषित करना जल्दबाजी होगी। योगी के पक्ष में भाजपा का संगठन, हिंदुत्व की राजनीति और अयोध्या के विकास से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। वहीं, अखिलेश यादव के लिए पीडीए का सामाजिक समीकरण, पिछड़े वर्गों और दलित मतदाताओं का समर्थन तथा स्थानीय स्तर पर पार्टी की सक्रियता निर्णायक साबित हो सकती है।

    पिछले चुनावों के आंकड़े भाजपा की लगातार दो विधानसभा जीत और सपा की पुरानी जीत, दोनों को सामने रखते हैं। ऐसे में अंतिम नतीजा उम्मीदवारों की लोकप्रियता, चुनावी रणनीति, स्थानीय मुद्दों और विभिन्न समुदायों के मतदान व्यवहार पर निर्भर करेगा। जब तक दोनों नेताओं के अयोध्या से चुनाव लड़ने की औपचारिक घोषणा नहीं होती, तब तक यह चर्चा केवल संभावनाओं और उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान ही रहेगी। वास्तविक तस्वीर चुनाव के नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर सियासी घमासान, रामलला के दर्शन नहीं करने को लेकर संतों और भाजपा नेताओं ने उठाए सवाल

    अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर सियासी घमासान, रामलला के दर्शन नहीं करने को लेकर संतों और भाजपा नेताओं ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे को लेकर भाजपा नेताओं और संतों ने सवाल उठाए हैं। अखिलेश यादव बीते दिन पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय के आवास पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में शामिल होने अयोध्या पहुंचे थे। हालांकि, उनके राम मंदिर में रामलला के दर्शन नहीं करने को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर समेत भाजपा नेताओं ने अखिलेश यादव पर निशाना साधा।

    उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस तरह की राजनीति की जा रही है, उससे खुद अखिलेश यादव के सशंकित होने का संकेत मिलता है। राजभर ने कहा कि यदि अखिलेश यादव अयोध्या गए थे, तो उन्हें हनुमानगढ़ी और भगवान राम के दर्शन भी कर लेने चाहिए थे। उनके मुताबिक, ऐसा करने से इस तरह के सवाल खड़े नहीं होते। राजभर ने श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन स्थल पर नारेबाजी को लेकर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जहां भागवत कथा हो रही है, वहां अखिलेश यादव के लोग नारेबाजी कर रहे हैं। उन्होंने इस कृत्य की निंदा करते हुए कहा कि भागवत कथा के स्थान को राजनीतिक मंच बनाना अखिलेश यादव को ही शोभा देता है।

    उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी इस मामले में समाजवादी पार्टी को आत्मावलोकन करने की सलाह दी। भाजपा नेता ने सपा पर मुस्लिम तुष्टिकरण और जाति के नाम पर वोट मांगने की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ऐसी राजनीति करने वाले लोग उत्तर प्रदेश में सफल नहीं होंगे। पाठक ने अयोध्या में प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल करने का दावा भी किया। उनके बयान से स्पष्ट है कि भाजपा नेता अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे को आगामी चुनावों के राजनीतिक संदर्भ में देख रहे हैं।

    भाजपा नेता राकेश त्रिपाठी ने भी अखिलेश यादव के दौरे को लेकर पलटवार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव ने सत्ता में रहते हुए अयोध्या को भुला दिया था। त्रिपाठी ने कहा कि योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद अयोध्या में 50 हजार से अधिक की परियोजनाएं आई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राम मंदिर भाजपा का मंदिर नहीं है, लेकिन अयोध्या पहुंचने के बावजूद अखिलेश यादव रामलला के दर्शन करने नहीं गए। उनके बयान में अयोध्या के विकास और राम मंदिर से जुड़े मुद्दों को लेकर सपा की भूमिका पर सवाल उठाए गए।

    अखिलेश यादव के राम मंदिर में दर्शन नहीं करने को लेकर संतों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। अयोध्या दौरे के दौरान अखिलेश यादव ने श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के मंच से भगवान कृष्ण और न्याय की बात की, लेकिन राम के बारे में कुछ नहीं कहा। यह बात संतों को खटकी और उनके दौरे को लेकर सवाल उठने लगे। इस तरह धार्मिक आयोजन में उनकी मौजूदगी और रामलला के दर्शन नहीं करने का मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।

    उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में नेताओं के दौरे और बयानों को चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी समाजवादी पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर उठे सवालों के बीच भाजपा नेताओं ने सपा की राजनीतिक रणनीति और धार्मिक मुद्दों पर उसके रुख को निशाने पर लिया है। वहीं, इस पूरे विवाद का केंद्र अखिलेश यादव का भागवत कथा में शामिल होना और रामलला के दर्शन नहीं करना बना हुआ है।

  • वाराणसी की सड़कों पर सीवर का पानी, विदेशी पर्यटक भी परेशान, अखिलेश यादव ने योगी सरकार की व्यवस्था पर उठाए सवाल

    वाराणसी की सड़कों पर सीवर का पानी, विदेशी पर्यटक भी परेशान, अखिलेश यादव ने योगी सरकार की व्यवस्था पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । वाराणसी के भेलूपुर स्थित शिवाला इलाके में सीवर का पानी सड़कों और आसपास के घरों तक पहुंचने से लोगों की परेशानी बढ़ गई। सड़कों और गलियों में गंदा पानी जमा होने के कारण स्थानीय लोगों को आने-जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। काशी घूमने पहुंचे विदेशी पर्यटक भी जलभराव वाले रास्तों से गुजरते नजर आए।

    शिवाला क्षेत्र में सीवर का पानी सड़क पर जमा होने के साथ आसपास की गलियों में भी फैल गया। कई स्थानों पर पानी घरों के आसपास तक पहुंच गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, जलभराव के कारण रोजमर्रा के काम प्रभावित हुए और आवागमन में भी परेशानी हुई। अस्सी क्षेत्र के कुछ रास्तों पर भी जलभराव की स्थिति सामने आई।

    वाराणसी में सामने आई इस स्थिति को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए शहर की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। वीडियो में शिवाला इलाके की स्थिति और गंदे पानी से होकर गुजरते लोगों को दिखाया गया था।

    मामला सामने आने के बाद जलकल विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के निर्देश पर अधिकारियों ने प्रभावित इलाके का निरीक्षण किया। टीम ने पुरानी ट्रंक सीवर लाइन और कोनिया सीवेज पंपिंग स्टेशन का भी निरीक्षण किया।

    जांच के दौरान कुछ पंप बंद मिले। इसके बाद संबंधित विभाग के साथ समन्वय कर खराब पड़े पंपों को ठीक कराने का काम शुरू किया गया। अधिकारियों की कार्रवाई के बाद बंद पंपों को दोबारा चालू कराया गया।

    नगर निगम के अनुसार, करीब डेढ़ घंटे में पंप फिर से चलने लगे। इसके बाद सड़कों और गलियों में जमा सीवर के पानी को निकालने की प्रक्रिया शुरू की गई। इससे प्रभावित इलाकों में जमा पानी को हटाया गया और आवागमन की परेशानी को दूर करने का प्रयास किया गया।

    वाराणसी के अलग-अलग हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से जलभराव और सीवर से जुड़ी शिकायतें सामने आने की बात कही गई है। शिवाला और अस्सी क्षेत्र की स्थिति के बाद नगर निगम की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। खास तौर पर उन इलाकों में समस्या सामने आई जहां स्थानीय लोगों के साथ काशी घूमने आने वाले पर्यटक भी पहुंचते हैं।

    शिवाला में सीवर का पानी सड़क पर जमा होने के दौरान विदेशी पर्यटकों को भी उसी रास्ते से गुजरना पड़ा। इससे इलाके में मौजूद लोगों के साथ बाहर से आए पर्यटकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

    नगर निगम ने तत्काल समस्या से निपटने के बाद भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए स्थायी ड्रेनेज प्लान तैयार करने की बात कही है। विभाग की ओर से पंपों की स्थिति की जांच और सीवर व्यवस्था को लेकर की गई कार्रवाई के बाद तत्काल जमा पानी निकालने का काम पूरा किया गया।

    इस पूरे घटनाक्रम में एक ओर जलभराव और सीवर के पानी को लेकर स्थानीय लोगों की परेशानी सामने आई, वहीं दूसरी ओर मामले को लेकर अखिलेश यादव ने सरकार पर राजनीतिक तंज कसा। उनके वीडियो साझा करने के बाद संबंधित विभाग ने मौके पर कार्रवाई करते हुए बंद पंपों को चालू कराया और जमा पानी निकालने का काम शुरू किया।

  • अखिलेश यादव की पार्टी 5 से 11 सितंबर तक चलाएगी पीडीए जागरुकता अभियान, शिक्षा और रोजगार के मुद्दे होंगे केंद्र में

    अखिलेश यादव की पार्टी 5 से 11 सितंबर तक चलाएगी पीडीए जागरुकता अभियान, शिक्षा और रोजगार के मुद्दे होंगे केंद्र में


    नई दिल्ली । 
    उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी ने छात्र और युवा वर्ग के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने की दिशा में अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। शिक्षक दिवस के मौके पर पार्टी की छात्र सभा की ओर से 5 से 11 सितंबर तक छात्र, नौजवान एवं पीडीए जागरुकता अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान का नाम पाठशाला पुकारे रखा गया है।

    समाजवादी पार्टी के अनुसार, अभियान के दौरान प्रदेश में बंद किए गए प्राथमिक, जूनियर और हाईस्कूलों के बाहर शिक्षक सम्मान कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी का कहना है कि इन कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाया जाएगा और स्थानीय लोगों को भी संवाद का हिस्सा बनाया जाएगा।

    अभियान के तहत विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र सम्मेलन तथा शिक्षक सम्मान समारोह भी आयोजित किए जाने हैं। बंद स्कूलों के परिसर के बाहर उपलब्ध स्थानों पर शिक्षक दिवस से जुड़े कार्यक्रम किए जाएंगे। इनमें स्थानीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ ग्रामीणों की भागीदारी भी प्रस्तावित है।

    सपा छात्र सभा के कार्यक्रम को अलग अलग चरणों में आयोजित करने की योजना बनाई गई है। 7 सितंबर को पीडीए वृक्षारोपण और पर्चा वितरण का कार्यक्रम होगा। इसके बाद 8 सितंबर को विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिविर लगाकर छात्रों से संपर्क किया जाएगा।

    9 सितंबर को छात्रों से सुझाव लिए जाएंगे और उनकी समस्याओं को सुना जाएगा। इस दौरान उनसे संकल्प पत्र भी भरवाए जाने की योजना है। पार्टी का उद्देश्य छात्रों से सीधे संवाद स्थापित करके शिक्षा, रोजगार और अन्य संबंधित विषयों पर उनकी प्राथमिकताओं को समझना बताया गया है।

    10 सितंबर को छात्र छात्राओं और युवाओं की राजनीति में भूमिका को लेकर चर्चा की जाएगी। इसके बाद 11 सितंबर को मेधावी छात्रों और टॉपर्स के सम्मान के साथ अभियान का समापन किया जाएगा। पार्टी ने इस कार्यक्रम को छात्र और युवा वर्ग से जुड़ने के अपने प्रयास के तौर पर सामने रखा है।

    अभियान में शिक्षा और युवाओं से जुड़े कई मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। इनमें पेपर लीक, समान पाठ्यक्रम, बढ़ती फीस, रोजगार, आरक्षण और उच्च शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियों में कथित भ्रष्टाचार जैसे विषय शामिल हैं। पार्टी आरक्षण व्यवस्था में पारदर्शिता और रोस्टर प्रणाली को लेकर भी सवाल उठाने की तैयारी में है।

    इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, छात्रों को डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराने, पुस्तकालयों की व्यवस्था मजबूत करने तथा नए विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के निर्माण जैसे मुद्दों को भी अभियान में शामिल किया गया है। सपा का कहना है कि इन विषयों के माध्यम से छात्रों और युवाओं की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता दी जाएगी।

    यह अभियान ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपनी गतिविधियां तेज कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के लिए छात्र और युवा वर्ग महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार माना जाता है। ऐसे में शिक्षा, रोजगार और आरक्षण जैसे मुद्दों के जरिए पार्टी इस वर्ग के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

    पाठशाला पुकारे अभियान के माध्यम से बंद सरकारी स्कूलों और ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा भी राजनीतिक बहस में लाने की तैयारी है। अभियान के दौरान सामने आने वाली छात्र समस्याओं और सुझावों को पार्टी किस तरह अपने आगामी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल करती है, इस पर भी नजर रहेगी।

  • सपा के साथ आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री से INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

    सपा के साथ आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री से INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले ही साथ चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दे चुके हैं, लेकिन अब आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री ने विपक्षी गठबंधन की रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि अगर सपा और आप के बीच सीटों को लेकर सहमति बनती है तो कांग्रेस के सामने गठबंधन के भीतर नई चुनौती खड़ी हो सकती है।

    सियासी हलकों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव के लिए करीब 15 से 20 सीटें देने पर विचार कर सकती है। इस संभावना को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आप नेता संजय सिंह के बीच हुई मुलाकातों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद यूपी की चुनावी रणनीति को लेकर अटकलें तेज हुई हैं।

    संजय सिंह और अखिलेश यादव की इसी साल अप्रैल में मुलाकात हुई थी। इसके बाद 23 अगस्त को भी दोनों नेताओं के बीच मुलाकात हुई। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 15 से 20 सीटों की मांग कर सकती है। हालांकि, सीटों के बंटवारे को लेकर अभी अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

    सपा और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन के बीच आप को साथ लाने की कोशिश कांग्रेस के लिए आसान नहीं मानी जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि 2027 में उत्तर प्रदेश के साथ पंजाब और गोवा में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से मौजूद है। ऐसे में दोनों दलों को एक ही गठबंधन में लाने का फैसला कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है।

    इसके अलावा आम आदमी पार्टी के INDIA गठबंधन से दूरी बनाने वाले बयानों ने भी स्थिति को जटिल बनाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आप की उत्तर प्रदेश में प्रत्यक्ष चुनावी भूमिका नहीं रही थी। पार्टी ने यूपी में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे और समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया था।

    2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 349 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी को कुल 3 लाख 47 हजार 187 वोट मिले थे। हालांकि उसका प्रदर्शन व्यापक रूप से प्रभावी नहीं रहा, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में उसे अपेक्षाकृत अधिक मत मिले थे। रुधौली में आप उम्मीदवार को 24,367 और खलीलाबाद में 25,123 वोट मिले थे।

    इसके अलावा लोनी, साहिबाबाद, नोएडा और मोहनलालगंज जैसे क्षेत्रों में भी पार्टी के उम्मीदवारों को पांच हजार से अधिक वोट मिले थे। यही कारण है कि आगामी चुनाव में आप इन क्षेत्रों को संभावित सीट दावेदारी के आधार के रूप में देख सकती है। यदि सपा इन क्षेत्रों में आप को जगह देती है तो सीट बंटवारे की प्रक्रिया में कांग्रेस की भूमिका और रणनीति महत्वपूर्ण हो जाएगी।

    2024 के लोकसभा चुनाव में आप ने उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार नहीं उतारे थे और सपा को समर्थन दिया था। चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ प्रेस वार्ता भी की थी। वहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सपा ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन किया था।

    ऐसे में उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस और आप के संभावित समीकरण को लेकर राजनीतिक नजरें टिकी हैं। यदि आप की गठबंधन में औपचारिक एंट्री होती है तो सीटों के बंटवारे के साथ-साथ तीनों दलों के बीच क्षेत्रीय प्रभाव और चुनावी रणनीति को लेकर भी बातचीत करनी होगी। फिलहाल सपा और आप के बीच संभावित तालमेल की चर्चा ने यूपी की विपक्षी राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।

  • अखिलेश के बयान से गरमाई यूपी की सियासत, मायावती ने सपा की जातीय राजनीति और पुराने गठबंधन पर उठाए सवाल

    अखिलेश के बयान से गरमाई यूपी की सियासत, मायावती ने सपा की जातीय राजनीति और पुराने गठबंधन पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की राष्ट्रीय लोकदल और जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए उनके बयान को अमर्यादित और अशोभनीय बताया है। मायावती ने जयंत चौधरी और उनके राजनीतिक परिवार का सम्मान करने की बात कहते हुए अखिलेश यादव से माफी मांगने की मांग की है।

    मायावती ने कहा कि अखिलेश यादव की ओर से यह कहना कि उन्होंने अपने पुराने सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकदल और उसके नेता को चवन्नी से रुपया बनाया, राजनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से उचित नहीं है। उन्होंने इस टिप्पणी को लेकर अखिलेश यादव से राष्ट्रीय लोकदल, जयंत चौधरी और चौधरी चरण सिंह के परिवार के प्रति कथित अपमान के लिए माफी मांगने को कहा।

    बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी का अपने सहयोगी दलों के साथ व्यवहार लंबे समय से राजनीतिक स्वार्थ और संकीर्णता से प्रभावित रहा है। उन्होंने कहा कि सपा की इसी कार्यशैली के कारण कई मौकों पर उसके राजनीतिक सहयोगियों के साथ संबंध खराब हुए हैं। मायावती ने दावा किया कि ऐसे राजनीतिक मतभेदों का लाभ अक्सर भारतीय जनता पार्टी को मिला और विपक्षी या धर्मनिरपेक्ष ताकतें कमजोर हुईं।

    मायावती ने अपने बयान में सपा और बसपा के पुराने गठबंधन का भी उल्लेख किया। उन्होंने 1993 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा के साथ बसपा के गठबंधन और बाद में उसके टूटने की घटना को याद किया। उन्होंने 2 जून 1995 के लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड का भी जिक्र करते हुए उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों को अपने आरोपों के संदर्भ में सामने रखा।

    बसपा प्रमुख ने इसके बाद अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए सपा और बसपा के चुनावी गठबंधन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के लिए दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ था, लेकिन अपेक्षित चुनावी परिणाम नहीं आने के बाद यह गठबंधन ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। मायावती ने इसके लिए सपा के रवैये को जिम्मेदार ठहराया।

    मायावती ने अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अखिलेश यादव पीडीए में शामिल पी शब्द को कभी पिछड़ा वर्ग और कभी पंडितों के हित से जोड़ते हैं। मायावती ने दावा किया कि सपा पिछड़े वर्गों में अपनी जाति के अलावा अन्य समुदायों, अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के हितों के प्रति पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं रही है।

    उन्होंने सपा की पिछली सरकारों पर दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और ऊंची जातियों के लोगों के साथ भेदभाव तथा उत्पीड़न के आरोप भी लगाए। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि सपा शासन के दौरान अपराधी और अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला। इन दावों के आधार पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से आगामी विधानसभा चुनाव में सपा को सत्ता से दूर रखने की अपील की।

    जयंत चौधरी को लेकर शुरू हुई टिप्पणी अब सपा, बसपा और अन्य राजनीतिक दलों के बीच व्यापक बहस का विषय बनती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन, सामाजिक समीकरण और पीडीए की रणनीति आगामी चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। मायावती के ताजा हमले ने इन मुद्दों पर राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है।

  • जयंत चौधरी पर टिप्पणी से बढ़ा यूपी सियासी विवाद, अखिलेश यादव के खिलाफ केशव मौर्य और मायावती हुए मुखर

    जयंत चौधरी पर टिप्पणी से बढ़ा यूपी सियासी विवाद, अखिलेश यादव के खिलाफ केशव मौर्य और मायावती हुए मुखर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की एक टिप्पणी को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को लेकर की गई ‘चवन्नी से रुपया’ वाली टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव से जयंत चौधरी से माफी मांगने की मांग की है। वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने भी इस बयान को जाट समाज से जोड़ते हुए सपा प्रमुख पर निशाना साधा है।

    केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव पर पलटवार करते हुए कहा कि जयंत चौधरी के खिलाफ की गई टिप्पणी उचित नहीं है। उन्होंने सपा प्रमुख से अपने बयान के लिए माफी मांगने को कहा। मौर्य ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव राजनीतिक परेशानी के कारण अगड़े, पिछड़े और दलित समाज को लेकर भी ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं, जिन्हें उचित नहीं माना जा सकता।

    मौर्य ने अपने बयान में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह ने सैफई परिवार के लिए काफी कुछ किया था और परिवार पर उनका बड़ा एहसान रहा है। मौर्य के मुताबिक, ऐसे राजनीतिक और पारिवारिक संबंधों की पृष्ठभूमि में जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी पर अखिलेश यादव को विचार करना चाहिए और माफी मांगनी चाहिए।

    उपमुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा राजनीति का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता समाजवादी पार्टी को सत्ता से दूर रखेगी। मौर्य ने कहा कि भाजपा के साथ अगड़े, पिछड़े और दलित समाज के लोग खड़े हैं। उनके इस बयान को आगामी चुनाव के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    इसी विवाद के बीच बसपा प्रमुख मायावती ने भी अखिलेश यादव की टिप्पणी पर नाराजगी जताई। मायावती ने कहा कि ‘चवन्नी से रुपया’ बनाने वाली टिप्पणी जाट समाज को पसंद नहीं आई है। उन्होंने अखिलेश यादव पर राजनीतिक अहंकार का आरोप लगाते हुए कहा कि सपा प्रमुख को अपने बयान के लिए जाट समाज से माफी मांगनी चाहिए।

    जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभाव रखने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हैं और उनका राजनीतिक आधार मुख्य रूप से जाट समुदाय से जुड़ा माना जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ किसी टिप्पणी को लेकर सामाजिक प्रतिक्रिया का मुद्दा बनना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि भाजपा और बसपा दोनों ने अखिलेश यादव के बयान को लेकर उन्हें घेरने का प्रयास किया है।

    उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार तेज हो रहे हैं। विभिन्न दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे समय में नेताओं के बयानों पर होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया चुनावी माहौल को प्रभावित करने वाले मुद्दों का रूप ले सकती है।

    फिलहाल विवाद का केंद्र अखिलेश यादव की जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी है। केशव मौर्य और मायावती दोनों ने अलग-अलग तरीके से इस बयान की आलोचना करते हुए माफी की मांग की है। अब राजनीतिक चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि अखिलेश यादव इस विवाद पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या उनकी ओर से कोई स्पष्टीकरण सामने आता है।

  • अखिलेश यादव ने अमित शाह के संसद में जवाब देने के बयान पर साधा निशाना, कहा देश भाषण सुनने के मूड में नहीं

    अखिलेश यादव ने अमित शाह के संसद में जवाब देने के बयान पर साधा निशाना, कहा देश भाषण सुनने के मूड में नहीं


    नई दिल्ली ।
    समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संसद में विपक्ष के सवालों का जवाब देने संबंधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। बुधवार को सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार की ओर से जवाब देने के लिए समय सीमा तय करना अपने आप में अलोकतांत्रिक है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वास्तविक जवाब देने के बजाय सत्र समाप्त करने की जल्दबाजी में है।

    अमित शाह ने कहा था कि यदि विपक्ष छात्र आंदोलन से जुड़े विषय पर चर्चा के लिए तैयार होता है तो वह संसद में उठाए जाने वाले हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है और चर्चा के दौरान स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

    इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि संसद में जवाब देने के लिए सरकार द्वारा समय-सीमा तय करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना के अनुरूप नहीं है। उनके अनुसार जवाब केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि उसमें सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।

    अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि सरकार जिस समय सीमा में जवाब देने की बात कर रही है, वह वास्तविक उत्तर देने के बजाय एक बयान तक सीमित रह सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती कि विपक्ष के सवालों का विस्तृत जवाब दिया जाए और वह संसद के मौजूदा सत्र को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

    समाजवादी पार्टी प्रमुख ने अपने बयान में जिम्मेदारी और जवाबदेही का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि किसी सरकार की जवाबदेही समय की शर्त से नहीं, बल्कि उसके उत्तरदायित्व और तर्क से तय होती है। उन्होंने छात्र आंदोलन से जुड़े पूरे मामले को गंभीर बताते हुए विस्तृत जवाब की मांग दोहराई।

    दरअसल, 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष लगातार सरकार से सवाल कर रहा है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पैलेट गन और कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता सरकार से स्पष्टीकरण की मांग कर चुके हैं।

    विपक्ष की ओर से इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगा जा रहा है। इसी बीच सरकार की ओर से संसद में चर्चा और जवाब देने की बात कही गई है। अमित शाह ने संकेत दिया है कि यदि विपक्ष छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार होता है तो वह सभी सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं।

    संसद के मौजूदा मानसून सत्र की निर्धारित अवधि 13 अगस्त तक है। ऐसे में विपक्ष के सवालों और सरकार के जवाब को लेकर समय को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि, सदन की कार्यवाही की आवश्यकता होने पर समय सीमा बढ़ाए जाने की संभावना की भी चर्चा है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच अखिलेश यादव का बयान विपक्ष की ओर से सरकार पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है। वहीं, सरकार का कहना है कि वह छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में इस मुद्दे पर चर्चा होती है या नहीं और अमित शाह विपक्ष के आरोपों पर किस तरह जवाब देते हैं।