Tag: Allahabad High Court

  • स्कूल ड्रेस कोड पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त! हिजाब की अलग अनुमति से संस्थागत अनुशासन प्रभावित होने की बात

    स्कूल ड्रेस कोड पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त! हिजाब की अलग अनुमति से संस्थागत अनुशासन प्रभावित होने की बात

    नई दिल्ली । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूलों में ड्रेस कोड और धार्मिक पहनावे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा है कि स्कूल की तय यूनिफॉर्म का पालन सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से जरूरी है। कोर्ट ने स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि एक शिक्षण संस्थान में समान यूनिफॉर्म का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच बराबरी की भावना पैदा करना और धार्मिक या सामाजिक भेदभाव से मुक्त वातावरण बनाए रखना है। कोर्ट के मुताबिक किसी एक विद्यार्थी को अलग ड्रेस की अनुमति देने से संस्थान के अनुशासन और ड्रेस कोड से जुड़े अधिकार पर असर पड़ सकता है।

    यह मामला प्रयागराज के एक निजी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा से जुड़ा था। छात्रा ने अपनी मां के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उसका कहना था कि वह कक्षा 6 से लेकर 10वीं तक स्कूल में हिजाब पहनकर पढ़ती रही है और उस दौरान स्कूल की तरफ से कोई आपत्ति नहीं जताई गई। छात्रा ने पुराने पहचान पत्र और स्कूल की तस्वीरों को भी अपने पक्ष में पेश किया। 11वीं कक्षा में पहुंचने के बाद जब उसे स्कूल के ड्रेस कोड के अनुसार हिजाब पहनने की अनुमति नहीं मिली तो उसने अधिकारियों से शिकायत की और बाद में हाईकोर्ट का रुख किया।

    याचिका में छात्रा की तरफ से तर्क दिया गया कि हिजाब पहनना उसकी धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत पसंद से जुड़ा हुआ है। इसलिए उसे इसे पहनने से रोकना उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। छात्रा की ओर से निजता धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे अधिकारों का भी हवाला दिया गया। दूसरी तरफ स्कूल प्रशासन का कहना था कि संस्थान में सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है और किसी एक विद्यार्थी को अलग छूट देने से व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

    जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिविजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि स्कूल का ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होता है और उसमें किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता तो ड्रेस तय करने का अधिकार संस्थान के पास है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर स्कूल ने पहले किसी समय हेडस्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति दी थी तो इससे यह स्थायी अधिकार नहीं बन जाता कि भविष्य में भी वही छूट जारी रखनी पड़े।

    अदालत ने अपने फैसले में स्कूल यूनिफॉर्म के व्यापक उद्देश्य पर भी जोर दिया। कोर्ट के अनुसार समान पोशाक विद्यार्थियों के बीच समानता की भावना मजबूत करती है और स्कूल की एक अलग पहचान बनाती है। यदि प्रत्येक छात्र अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग करने लगे तो संस्थान के लिए अपने ड्रेस कोड और अनुशासन को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

    कोर्ट ने हिजाब को लेकर पहले दिए गए कुछ न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि इस मामले में छात्रा की धार्मिक आस्था पर रोक लगाने का सवाल नहीं है बल्कि स्कूल के संस्थागत नियमों का पालन करने का मुद्दा है। अदालत ने यह भी कहा कि हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए याचिका में पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किया गया।

    हिजाब से जुड़े विवाद का देश में पहले भी कानूनी स्तर पर असर देखने को मिला है। कर्नाटक में 2022 में स्कूल और कॉलेजों के ड्रेस कोड को लेकर बड़ा विवाद सामने आया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा जहां दो न्यायाधीशों की अलग अलग राय सामने आई थी। इसके बाद मामला बड़ी पीठ के सामने भेजा गया था और इस मुद्दे पर अंतिम कानूनी स्थिति को लेकर लंबे समय से चर्चा जारी है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के ताजा फैसले में फिलहाल स्कूल के समान ड्रेस कोड और संस्थागत अनुशासन को प्राथमिकता दी गई है। फैसले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और शैक्षणिक संस्थानों के अनुशासन के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाना चाहिए।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता तय नियम नहीं, मामले के आधार पर होगी राशि

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता तय नियम नहीं, मामले के आधार पर होगी राशि


    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा पति की आय का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी को देना कोई अनिवार्य कानूनी नियम नहीं है। अदालत ने कहा कि यह केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश है और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालतें इससे कम या अधिक गुजारा भत्ता तय कर सकती हैं।

    जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने कानपुर देहात के एक दंपति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी को मिलने वाला मासिक गुजारा भत्ता 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये करने का आदेश दिया।

    यह मामला पिंकी उर्फ प्रीति और उनके पति श्री जय प्रकाश से संबंधित है। पति ने पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया था। तलाक के आदेश के आधार पर पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए गुजारा भत्ते को चुनौती दी, जबकि पत्नी ने भत्ते की राशि अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केवल तलाक हो जाने से पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। यदि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और उसने दोबारा विवाह नहीं किया है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ नहीं रह रही है, तो वह गुजारा भत्ते की हकदार रहेगी।

    अदालत ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य केवल जीवन-निर्वाह भर की राशि उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिला को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना है।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि रिवीजन कोर्ट सामान्य परिस्थितियों में निचली अदालत द्वारा तय की गई भत्ते की राशि में बदलाव नहीं करती, क्योंकि उसका दायित्व केवल आदेश की वैधानिकता की समीक्षा करना होता है। हालांकि, यदि निचली अदालत का निर्णय गलत तथ्यों पर आधारित हो या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की गई हो, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

    मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि पति का मासिक वेतन 86,674 रुपये है, जबकि विभिन्न कटौतियों के बाद उसके खाते में 67,043 रुपये प्राप्त होते हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण किए बिना गुजारा भत्ता निर्धारित कर दिया था। साथ ही, पति ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अपनी संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया था।

    इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने 10 जुलाई को दिए अपने फैसले में पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए मासिक गुजारा भत्ता 20 हजार रुपये निर्धारित किया, जो आवेदन की तारीख से प्रभावी होगा।

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग की शादी की दलील इलाहाबाद HC ने की रद्द, कहा- कानून सबसे ऊपर

    मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग की शादी की दलील इलाहाबाद HC ने की रद्द, कहा- कानून सबसे ऊपर


    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिगों के विवाह से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ की व्यवस्थाएं बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम जैसे केंद्रीय कानूनों से ऊपर नहीं हो सकतीं। अदालत ने कहा कि देश में विवाह की न्यूनतम आयु से संबंधित कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में भले ही यौवन (प्यूबर्टी) को विवाह योग्य आयु माना गया हो, लेकिन यह प्रावधान बाल विवाह निषेध अधिनियम और पॉक्सो कानून के प्रभाव को समाप्त नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पॉक्सो अधिनियम बच्चों के साथ यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखता है और किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर इससे छूट नहीं दी जा सकती।

    बुलंदशहर की घटना से जुड़ा मामला
    यह टिप्पणी अदालत ने रूबी और अन्य 18 लोगों की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग की थी। मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का है, जहां 16 वर्षीय मुस्लिम किशोरी का बाल विवाह रुकवाने पहुंची पुलिस और चाइल्डलाइन की रेस्क्यू टीम पर हमला करने तथा सरकारी कार्य में बाधा डालने का आरोप याचिकाकर्ताओं पर है।

    याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि शरिया कानून के अनुसार लड़की के यौवन प्राप्त करने के बाद, जिसे सामान्यतः 15 वर्ष माना जाता है, उसका विवाह कराया जा सकता है। उनका कहना था कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 उनके व्यक्तिगत कानून पर लागू नहीं होता।

    हाईकोर्ट ने दलील को किया खारिज
    अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि यदि 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के विवाह को वैध माना जाए, तो वैवाहिक संबंधों के चलते पॉक्सो अधिनियम का सीधा उल्लंघन होगा। इसलिए किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर बाल विवाह को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

    खंडपीठ ने माना कि इस विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं, लेकिन उसने केरल हाईकोर्ट के उस मत से सहमति जताई, जिसमें कहा गया है कि कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह पर लगे कानूनी प्रतिबंध को समाप्त नहीं कर सकता।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी किया उल्लेख
    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के एक आदेश का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 संसद में लंबित रहने के दौरान इस विषय पर कुछ कानूनी प्रश्न उठे थे। हालांकि, 17वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह विधेयक स्वतः समाप्त हो गया और इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।

    एफआईआर रद्द करने से किया इनकार
    अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि मामले में नाबालिग के परिजनों और अन्य लोगों द्वारा कानून का उल्लंघन किया गया है। साथ ही पुलिस और चाइल्डलाइन की टीम की त्वरित कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि सरकारी अधिकारियों के कार्य में बाधा डालने, उनके साथ अभद्रता और हमला करने के आरोपों की विस्तृत जांच आवश्यक है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 1 जुलाई को दिए अपने आदेश में एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

  • UP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपियों को पुलिस नौकरी नहीं

    UP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपियों को पुलिस नौकरी नहीं



    नई दिल्ली। इलाहाबाद उच्च न्यायालयकी लखनऊ पीठ ने पुलिस भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी व्यक्तियों को पुलिस सेवा में नियुक्ति नहीं दी जा सकती, चाहे उनकी दोषसिद्धि अभी तक न हुई हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस विभाग केवल रोजगार का माध्यम नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था और जनता के भरोसे से जुड़ी संवेदनशील सेवा है।

    यह फैसला न्यायमूर्ति Amitabh Kumar Rai की एकल पीठ ने शेखर नामक अभ्यर्थी की याचिका खारिज करते हुए दिया। याची ने अदालत में दलील दी थी कि उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला दुर्भावनापूर्ण है और अभी अदालत ने उसे दोषी नहीं ठहराया है, इसलिए उसे पुलिस भर्ती से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

    हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल दोषसिद्धि न होना किसी उम्मीदवार को स्वतः सरकारी नौकरी पाने का अधिकार नहीं देता। विशेष रूप से पुलिस जैसे अनुशासित बल में भर्ती के लिए अभ्यर्थी का चरित्र, आचरण और सामाजिक छवि अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

    न्यायालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर प्रकृति के आपराधिक मामले लंबित हैं, तो संबंधित प्राधिकारी उसके चरित्र सत्यापन और पृष्ठभूमि का मूल्यांकन कर उसे नियुक्ति के लिए अनुपयुक्त मान सकता है। अदालत ने माना कि पुलिस बल समाज में कानून लागू करने वाली संस्था है और यदि गंभीर आरोपों से घिरा व्यक्ति इसमें शामिल होता है तो इससे विभाग की साख और जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है।

    अपने फैसले में अदालत ने Supreme Court of India के कई पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवाओं, खासकर पुलिस विभाग में भर्ती के दौरान चरित्र सत्यापन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है और राज्य सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को सेवा में शामिल होने से रोके।

    अदालत के इस फैसले को पुलिस भर्ती और सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन के लिहाज से अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
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  • उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट का सजा निलंबन आदेश रद्द, जेल में रहना तय

    उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट का सजा निलंबन आदेश रद्द, जेल में रहना तय


    नई दिल्ली। उन्नाव रेप केस में दोषी करार दिए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सेंगर की सजा को अस्थायी रूप से निलंबित किया गया था। इस फैसले के बाद अब उनकी सजा बरकरार रहेगी और उन्हें जेल में ही रहना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट में यह मामला CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया, जहां मामले से जुड़े कई कानूनी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा सजा निलंबन का आदेश सही नहीं था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।

    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में CBI की अपील अभी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। वहीं वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन ने दलील दी कि पीड़िता नाबालिग नहीं थी और AIIMS बोर्ड की रिपोर्ट भी आरोपी के पक्ष में संकेत देती है, लेकिन इसके बावजूद सजा जारी है।

    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में मुख्य मुद्दा सजा निलंबन से जुड़ा है, जबकि मामले में कई गंभीर कानूनी बिंदु हैं जिन पर विस्तार से विचार आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मेरिट (मामले की गहराई) पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

    सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि क्या विधायक को POCSO कानून के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ माना जा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा कि यह मामला बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा है, इसलिए कानून की व्याख्या अत्यंत सावधानी से होनी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने अंत में हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुख्य अपील पर जल्द से जल्द सुनवाई करे। यदि जल्दी सुनवाई संभव न हो, तो सजा निलंबन की अर्जी पर नया निर्णय लिया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से निर्णय ले।

    इस फैसले के बाद कुलदीप सिंह सेंगर की कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं और फिलहाल उन्हें जेल में ही रहना होगा।

  • हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कैसरबाग कोर्ट परिसर के अतिक्रमण हटाने पर सख्ती, पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराने के निर्देश

    हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कैसरबाग कोर्ट परिसर के अतिक्रमण हटाने पर सख्ती, पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराने के निर्देश


    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कैसरबाग स्थित जनपद न्यायालय परिसर के आसपास वकीलों और दुकानदारों द्वारा किए गए अतिक्रमण को लेकर बड़ा और सख्त आदेश जारी किया है। अदालत ने साफ कहा है कि अवैध कब्जों को हटाने के लिए नगर निगम को पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध कराया जाए, ताकि कार्रवाई में कोई बाधा न आए।

    मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने अनुराधा सिंह और अन्य की याचिका पर की।

    कोर्ट ने नगर निगम से अतिक्रमण हटाने की पूरी कार्रवाई रिपोर्ट भी तलब की है और अगली सुनवाई 25 मई को तय की गई है।

    नगर निगम की रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र में करीब 72 अतिक्रमण चिन्हित किए गए हैं, जिनमें अधिकांश वकीलों के चैंबर और अवैध दुकानें शामिल हैं। कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि इन अतिक्रमणों को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह हटाया जाए और जरूरत पड़ने पर पुलिस सहायता तुरंत दी जाए।

    सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने पुलिस बल उपलब्ध न कराए जाने के कारणों से जुड़े डीसीपी स्तर के पत्र भी अदालत में प्रस्तुत किए।

    नगर निगम ने अतिक्रमण हटाने के लिए 12 मई की नई तारीख तय करने की जानकारी दी, जिस पर कोर्ट ने कहा कि प्रशासन सुनिश्चित करे कि उस दिन पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध रहे।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि अतिक्रमण से आम जनता, मरीजों और यातायात व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है। पहले भी अदालत ने इस क्षेत्र में एंबुलेंस फंसने और मरीज की मौत जैसी गंभीर घटना का संज्ञान लिया था।

    अब हाईकोर्ट ने प्रशासन को 15 दिन के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं और मामले की अगली सुनवाई पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

  • राहुल गांधी पर CBI जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में बड़ा मामला… क्या आज आएगा अहम फैसला? देशभर की नजर लखनऊ बेंच पर!

    राहुल गांधी पर CBI जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में बड़ा मामला… क्या आज आएगा अहम फैसला? देशभर की नजर लखनऊ बेंच पर!



    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर एक याचिका पर आज महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। यह मामला कथित आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़ा बताया जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, याचिका में मांग की गई है कि राहुल गांधी और उनके परिवार के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा विस्तृत जांच की जाए और इस मामले में नियमित आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।

    यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति जफर अहमद की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध की गई है। मामले की सुनवाई पहले 6 मई को नए मामलों की सूची में शामिल थी, लेकिन याची की अर्जेंट अपील पर इसे चैंबर में सुनवाई के लिए मंजूरी दी गई। अब इस पर आज दोपहर 2:15 बजे सुनवाई होनी है।

    याचिकाकर्ता कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर ने दावा किया है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसकी गंभीर जांच आवश्यक है। याचिका में सीबीआई के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, गृह मंत्रालय और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को भी पक्षकार बनाया गया है।

    इस पूरे मामले में आरोप है कि राहुल गांधी की संपत्ति उनके ज्ञात आय स्रोतों से अधिक हो सकती है, जिसकी जांच की मांग की गई है।

    फिलहाल अदालत में इस याचिका की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला राजनीतिक रूप से भी काफी अहम माना जा रहा है।

  • पिता की कस्टडी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्राकृतिक संरक्षक अधिकार पर दी अहम टिप्पणी

    पिता की कस्टडी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्राकृतिक संरक्षक अधिकार पर दी अहम टिप्पणी


    नई दिल्ली। नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल यह तथ्य कि पिता बच्चों को मां से अपने साथ ले गया, उसे अवैध कस्टडी या बंधक बनाना नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसमें किसी अदालत के आदेश का उल्लंघन या स्पष्ट गैरकानूनी स्थिति साबित न हो। अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार पिता को नाबालिग बच्चों का प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है और इसी आधार पर उसकी कस्टडी को स्वतः अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

    यह मामला एक महिला द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसके पूर्व पति ने वर्ष 2022 में कथित रूप से बल प्रयोग करते हुए बच्चों को अपने साथ ले लिया और तब से उन्हें अपने पास रखे हुए है। याचिकाकर्ता ने इसे अवैध कस्टडी बताते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी। हालांकि अदालत ने मामले की परिस्थितियों और प्रस्तुत तथ्यों की समीक्षा के बाद याचिका को खारिज कर दिया।

    अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब यह सिद्ध हो कि कस्टडी कानून के विरुद्ध है या किसी वैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल आरोप के आधार पर कस्टडी को अवैध नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब बच्चे लंबे समय से एक अभिभावक के साथ रह रहे हों और उनके कल्याण पर कोई प्रत्यक्ष खतरा सिद्ध न हो।

    फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि कानूनी दृष्टि से पिता को प्राकृतिक संरक्षक का दर्जा प्राप्त है, और इस आधार पर उसकी अभिरक्षा को तब तक वैध माना जाता है जब तक कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा विपरीत आदेश न दिया गया हो। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे यदि लंबे समय से किसी एक अभिभावक के साथ रह रहे हों, तो अचानक कस्टडी बदलने से उनके मानसिक और सामाजिक स्थायित्व पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है।

    न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में भावनात्मक पक्ष महत्वपूर्ण होने के बावजूद निर्णय कानूनी प्रावधानों और बच्चों के सर्वोत्तम हितों के आधार पर ही लिया जा सकता है। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि बच्चों की वर्तमान कस्टडी गैरकानूनी है या उनके हितों के विपरीत है।

  • सिर्फ मेरा धर्म ही सत्य कहना अस्वीकार्य हाई कोर्ट ने धार्मिक टिप्पणी पर दी कड़ी चेतावनी

    सिर्फ मेरा धर्म ही सत्य कहना अस्वीकार्य हाई कोर्ट ने धार्मिक टिप्पणी पर दी कड़ी चेतावनी


    इलाहाबाद । इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और सेक्युलर देश में कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि केवल उसका ही धर्म सत्य है और बाकी सभी गलत हैं अदालत ने यह टिप्पणी एक पादरी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए की जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त करने की मांग की थी

    मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़ा है जहां वर्ष 2023 में पादरी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी आरोप था कि वह प्रार्थना सभाओं के दौरान यह कहते थे कि संसार में केवल एक ही धर्म सत्य है और वह ईसाई धर्म है साथ ही उन पर यह भी आरोप लगाए गए कि वे अन्य धर्मों को नीचा दिखाते हैं जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं

    न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारत का संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देने की बात करता है और यही इसकी मूल भावना है ऐसे में किसी एक धर्म को सर्वोच्च या एकमात्र सत्य बताना न केवल सामाजिक सद्भाव के खिलाफ है बल्कि कानून की दृष्टि में भी आपत्तिजनक हो सकता है अदालत ने यह भी कहा कि विविधता में एकता भारत की पहचान है और इसे बनाए रखना सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है

    अदालत ने विशेष रूप से आईपीसी की धारा 295ए का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी धर्म या उसके अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास करता है तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है पादरी के कथित बयान इस दायरे में आते हैं या नहीं इसका निर्णय निचली अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा

    पादरी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को बेवजह परेशान किया जा रहा है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं उन्होंने कहा कि जांच के दौरान भी धर्मांतरण जैसे आरोप साबित नहीं हुए हैं और बिना निष्पक्ष जांच के ही चार्जशीट दाखिल कर दी गई है इसलिए मामला रद्द किया जाना चाहिए

    वहीं सरकारी पक्ष ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामला बनता है और इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता अदालत ने भी इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि समन जारी करने या संज्ञान लेने के लिए प्रारंभिक साक्ष्य पर्याप्त होते हैं जिनका मूल्यांकन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकता है

    अंततः अदालत ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और इसे खारिज किया जाता है इस फैसले के साथ ही अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान भारतीय समाज की आधारशिला है और इसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं होने दिया जा सकता

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की संभल प्रशासन को कड़ी फटकार: हालात नहीं संभल रहे, तो इस्तीफा दें SP और DM

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की संभल प्रशासन को कड़ी फटकार: हालात नहीं संभल रहे, तो इस्तीफा दें SP और DM


    नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल जिले में रमजान के पवित्र महीने के दौरान नमाजियों की संख्या सीमित करने के जिला प्रशासन के फैसले पर सख्त नाराजगी जाहिर की है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पुलिस अधीक्षक SP और जिलाधिकारी DM को लगता है कि वे कानून के शासन को प्रभावी ढंग से लागू करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें या तो अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर तुरंत तबादले की मांग करनी चाहिए। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन और न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की खंडपीठ ने मुनाजिर खान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की।

    मामले की जड़ गाटा संख्या-291 पर स्थित एक स्थल है, जिसे याचिकाकर्ता ने मस्जिद बताते हुए वहां नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी। याचिका में दलील दी गई थी कि स्थानीय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला देते हुए नमाजियों की संख्या को केवल 20 तक सीमित कर दिया है, जो धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित भूमि निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज है और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंधात्मक सीमा तय की गई थी।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रत्येक समुदाय को अपने निर्धारित पूजा स्थलों पर शांतिपूर्वक इबादत और पूजा-अर्चना करने का संवैधानिक अधिकार है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि राज्य का प्राथमिक कर्तव्य कानून का शासन स्थापित करना है, न कि अधिकारों को सीमित करना। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित स्थल की तस्वीरें और राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करने के लिए समय दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 मार्च को होगी और अदालत ने इसे ताजा मामलों की सूची में शीर्ष 10 में शामिल करने का निर्देश दिया है।