Tag: Allahabad High Court

  • UP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपियों को पुलिस नौकरी नहीं

    UP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपियों को पुलिस नौकरी नहीं



    नई दिल्ली। इलाहाबाद उच्च न्यायालयकी लखनऊ पीठ ने पुलिस भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी व्यक्तियों को पुलिस सेवा में नियुक्ति नहीं दी जा सकती, चाहे उनकी दोषसिद्धि अभी तक न हुई हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस विभाग केवल रोजगार का माध्यम नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था और जनता के भरोसे से जुड़ी संवेदनशील सेवा है।

    यह फैसला न्यायमूर्ति Amitabh Kumar Rai की एकल पीठ ने शेखर नामक अभ्यर्थी की याचिका खारिज करते हुए दिया। याची ने अदालत में दलील दी थी कि उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला दुर्भावनापूर्ण है और अभी अदालत ने उसे दोषी नहीं ठहराया है, इसलिए उसे पुलिस भर्ती से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

    हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल दोषसिद्धि न होना किसी उम्मीदवार को स्वतः सरकारी नौकरी पाने का अधिकार नहीं देता। विशेष रूप से पुलिस जैसे अनुशासित बल में भर्ती के लिए अभ्यर्थी का चरित्र, आचरण और सामाजिक छवि अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

    न्यायालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर प्रकृति के आपराधिक मामले लंबित हैं, तो संबंधित प्राधिकारी उसके चरित्र सत्यापन और पृष्ठभूमि का मूल्यांकन कर उसे नियुक्ति के लिए अनुपयुक्त मान सकता है। अदालत ने माना कि पुलिस बल समाज में कानून लागू करने वाली संस्था है और यदि गंभीर आरोपों से घिरा व्यक्ति इसमें शामिल होता है तो इससे विभाग की साख और जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है।

    अपने फैसले में अदालत ने Supreme Court of India के कई पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवाओं, खासकर पुलिस विभाग में भर्ती के दौरान चरित्र सत्यापन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है और राज्य सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को सेवा में शामिल होने से रोके।

    अदालत के इस फैसले को पुलिस भर्ती और सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन के लिहाज से अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
    कीवर्ड:

  • उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट का सजा निलंबन आदेश रद्द, जेल में रहना तय

    उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट का सजा निलंबन आदेश रद्द, जेल में रहना तय


    नई दिल्ली। उन्नाव रेप केस में दोषी करार दिए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सेंगर की सजा को अस्थायी रूप से निलंबित किया गया था। इस फैसले के बाद अब उनकी सजा बरकरार रहेगी और उन्हें जेल में ही रहना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट में यह मामला CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया, जहां मामले से जुड़े कई कानूनी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा सजा निलंबन का आदेश सही नहीं था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।

    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में CBI की अपील अभी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। वहीं वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन ने दलील दी कि पीड़िता नाबालिग नहीं थी और AIIMS बोर्ड की रिपोर्ट भी आरोपी के पक्ष में संकेत देती है, लेकिन इसके बावजूद सजा जारी है।

    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में मुख्य मुद्दा सजा निलंबन से जुड़ा है, जबकि मामले में कई गंभीर कानूनी बिंदु हैं जिन पर विस्तार से विचार आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मेरिट (मामले की गहराई) पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

    सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि क्या विधायक को POCSO कानून के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ माना जा सकता है। जस्टिस बागची ने कहा कि यह मामला बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा है, इसलिए कानून की व्याख्या अत्यंत सावधानी से होनी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने अंत में हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुख्य अपील पर जल्द से जल्द सुनवाई करे। यदि जल्दी सुनवाई संभव न हो, तो सजा निलंबन की अर्जी पर नया निर्णय लिया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से निर्णय ले।

    इस फैसले के बाद कुलदीप सिंह सेंगर की कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं और फिलहाल उन्हें जेल में ही रहना होगा।

  • हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कैसरबाग कोर्ट परिसर के अतिक्रमण हटाने पर सख्ती, पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराने के निर्देश

    हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कैसरबाग कोर्ट परिसर के अतिक्रमण हटाने पर सख्ती, पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराने के निर्देश


    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कैसरबाग स्थित जनपद न्यायालय परिसर के आसपास वकीलों और दुकानदारों द्वारा किए गए अतिक्रमण को लेकर बड़ा और सख्त आदेश जारी किया है। अदालत ने साफ कहा है कि अवैध कब्जों को हटाने के लिए नगर निगम को पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध कराया जाए, ताकि कार्रवाई में कोई बाधा न आए।

    मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने अनुराधा सिंह और अन्य की याचिका पर की।

    कोर्ट ने नगर निगम से अतिक्रमण हटाने की पूरी कार्रवाई रिपोर्ट भी तलब की है और अगली सुनवाई 25 मई को तय की गई है।

    नगर निगम की रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र में करीब 72 अतिक्रमण चिन्हित किए गए हैं, जिनमें अधिकांश वकीलों के चैंबर और अवैध दुकानें शामिल हैं। कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि इन अतिक्रमणों को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह हटाया जाए और जरूरत पड़ने पर पुलिस सहायता तुरंत दी जाए।

    सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने पुलिस बल उपलब्ध न कराए जाने के कारणों से जुड़े डीसीपी स्तर के पत्र भी अदालत में प्रस्तुत किए।

    नगर निगम ने अतिक्रमण हटाने के लिए 12 मई की नई तारीख तय करने की जानकारी दी, जिस पर कोर्ट ने कहा कि प्रशासन सुनिश्चित करे कि उस दिन पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध रहे।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि अतिक्रमण से आम जनता, मरीजों और यातायात व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है। पहले भी अदालत ने इस क्षेत्र में एंबुलेंस फंसने और मरीज की मौत जैसी गंभीर घटना का संज्ञान लिया था।

    अब हाईकोर्ट ने प्रशासन को 15 दिन के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं और मामले की अगली सुनवाई पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

  • राहुल गांधी पर CBI जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में बड़ा मामला… क्या आज आएगा अहम फैसला? देशभर की नजर लखनऊ बेंच पर!

    राहुल गांधी पर CBI जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में बड़ा मामला… क्या आज आएगा अहम फैसला? देशभर की नजर लखनऊ बेंच पर!



    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर एक याचिका पर आज महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। यह मामला कथित आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़ा बताया जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, याचिका में मांग की गई है कि राहुल गांधी और उनके परिवार के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा विस्तृत जांच की जाए और इस मामले में नियमित आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।

    यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति जफर अहमद की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध की गई है। मामले की सुनवाई पहले 6 मई को नए मामलों की सूची में शामिल थी, लेकिन याची की अर्जेंट अपील पर इसे चैंबर में सुनवाई के लिए मंजूरी दी गई। अब इस पर आज दोपहर 2:15 बजे सुनवाई होनी है।

    याचिकाकर्ता कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर ने दावा किया है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसकी गंभीर जांच आवश्यक है। याचिका में सीबीआई के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, गृह मंत्रालय और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को भी पक्षकार बनाया गया है।

    इस पूरे मामले में आरोप है कि राहुल गांधी की संपत्ति उनके ज्ञात आय स्रोतों से अधिक हो सकती है, जिसकी जांच की मांग की गई है।

    फिलहाल अदालत में इस याचिका की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला राजनीतिक रूप से भी काफी अहम माना जा रहा है।

  • पिता की कस्टडी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्राकृतिक संरक्षक अधिकार पर दी अहम टिप्पणी

    पिता की कस्टडी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्राकृतिक संरक्षक अधिकार पर दी अहम टिप्पणी


    नई दिल्ली। नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल यह तथ्य कि पिता बच्चों को मां से अपने साथ ले गया, उसे अवैध कस्टडी या बंधक बनाना नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसमें किसी अदालत के आदेश का उल्लंघन या स्पष्ट गैरकानूनी स्थिति साबित न हो। अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार पिता को नाबालिग बच्चों का प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है और इसी आधार पर उसकी कस्टडी को स्वतः अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

    यह मामला एक महिला द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसके पूर्व पति ने वर्ष 2022 में कथित रूप से बल प्रयोग करते हुए बच्चों को अपने साथ ले लिया और तब से उन्हें अपने पास रखे हुए है। याचिकाकर्ता ने इसे अवैध कस्टडी बताते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी। हालांकि अदालत ने मामले की परिस्थितियों और प्रस्तुत तथ्यों की समीक्षा के बाद याचिका को खारिज कर दिया।

    अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब यह सिद्ध हो कि कस्टडी कानून के विरुद्ध है या किसी वैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल आरोप के आधार पर कस्टडी को अवैध नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब बच्चे लंबे समय से एक अभिभावक के साथ रह रहे हों और उनके कल्याण पर कोई प्रत्यक्ष खतरा सिद्ध न हो।

    फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि कानूनी दृष्टि से पिता को प्राकृतिक संरक्षक का दर्जा प्राप्त है, और इस आधार पर उसकी अभिरक्षा को तब तक वैध माना जाता है जब तक कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा विपरीत आदेश न दिया गया हो। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे यदि लंबे समय से किसी एक अभिभावक के साथ रह रहे हों, तो अचानक कस्टडी बदलने से उनके मानसिक और सामाजिक स्थायित्व पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है।

    न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में भावनात्मक पक्ष महत्वपूर्ण होने के बावजूद निर्णय कानूनी प्रावधानों और बच्चों के सर्वोत्तम हितों के आधार पर ही लिया जा सकता है। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि बच्चों की वर्तमान कस्टडी गैरकानूनी है या उनके हितों के विपरीत है।

  • सिर्फ मेरा धर्म ही सत्य कहना अस्वीकार्य हाई कोर्ट ने धार्मिक टिप्पणी पर दी कड़ी चेतावनी

    सिर्फ मेरा धर्म ही सत्य कहना अस्वीकार्य हाई कोर्ट ने धार्मिक टिप्पणी पर दी कड़ी चेतावनी


    इलाहाबाद । इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और सेक्युलर देश में कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि केवल उसका ही धर्म सत्य है और बाकी सभी गलत हैं अदालत ने यह टिप्पणी एक पादरी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए की जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त करने की मांग की थी

    मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़ा है जहां वर्ष 2023 में पादरी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी आरोप था कि वह प्रार्थना सभाओं के दौरान यह कहते थे कि संसार में केवल एक ही धर्म सत्य है और वह ईसाई धर्म है साथ ही उन पर यह भी आरोप लगाए गए कि वे अन्य धर्मों को नीचा दिखाते हैं जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं

    न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारत का संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देने की बात करता है और यही इसकी मूल भावना है ऐसे में किसी एक धर्म को सर्वोच्च या एकमात्र सत्य बताना न केवल सामाजिक सद्भाव के खिलाफ है बल्कि कानून की दृष्टि में भी आपत्तिजनक हो सकता है अदालत ने यह भी कहा कि विविधता में एकता भारत की पहचान है और इसे बनाए रखना सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है

    अदालत ने विशेष रूप से आईपीसी की धारा 295ए का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी धर्म या उसके अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास करता है तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है पादरी के कथित बयान इस दायरे में आते हैं या नहीं इसका निर्णय निचली अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा

    पादरी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को बेवजह परेशान किया जा रहा है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं उन्होंने कहा कि जांच के दौरान भी धर्मांतरण जैसे आरोप साबित नहीं हुए हैं और बिना निष्पक्ष जांच के ही चार्जशीट दाखिल कर दी गई है इसलिए मामला रद्द किया जाना चाहिए

    वहीं सरकारी पक्ष ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामला बनता है और इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता अदालत ने भी इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि समन जारी करने या संज्ञान लेने के लिए प्रारंभिक साक्ष्य पर्याप्त होते हैं जिनका मूल्यांकन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकता है

    अंततः अदालत ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और इसे खारिज किया जाता है इस फैसले के साथ ही अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान भारतीय समाज की आधारशिला है और इसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं होने दिया जा सकता

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की संभल प्रशासन को कड़ी फटकार: हालात नहीं संभल रहे, तो इस्तीफा दें SP और DM

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की संभल प्रशासन को कड़ी फटकार: हालात नहीं संभल रहे, तो इस्तीफा दें SP और DM


    नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल जिले में रमजान के पवित्र महीने के दौरान नमाजियों की संख्या सीमित करने के जिला प्रशासन के फैसले पर सख्त नाराजगी जाहिर की है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पुलिस अधीक्षक SP और जिलाधिकारी DM को लगता है कि वे कानून के शासन को प्रभावी ढंग से लागू करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें या तो अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर तुरंत तबादले की मांग करनी चाहिए। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन और न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की खंडपीठ ने मुनाजिर खान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की।

    मामले की जड़ गाटा संख्या-291 पर स्थित एक स्थल है, जिसे याचिकाकर्ता ने मस्जिद बताते हुए वहां नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी। याचिका में दलील दी गई थी कि स्थानीय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला देते हुए नमाजियों की संख्या को केवल 20 तक सीमित कर दिया है, जो धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित भूमि निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज है और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंधात्मक सीमा तय की गई थी।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रत्येक समुदाय को अपने निर्धारित पूजा स्थलों पर शांतिपूर्वक इबादत और पूजा-अर्चना करने का संवैधानिक अधिकार है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि राज्य का प्राथमिक कर्तव्य कानून का शासन स्थापित करना है, न कि अधिकारों को सीमित करना। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित स्थल की तस्वीरें और राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करने के लिए समय दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 मार्च को होगी और अदालत ने इसे ताजा मामलों की सूची में शीर्ष 10 में शामिल करने का निर्देश दिया है।

  • यूपी पुलिस वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना के लिए कर रही हाफ एनकाउंटर, हाईकोर्ट ने DGP को किया तलब

    यूपी पुलिस वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना के लिए कर रही हाफ एनकाउंटर, हाईकोर्ट ने DGP को किया तलब


    नई दिल्ली । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में कथित हाफ एनकाउंटर की बढ़ती घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने आरोपियों के पैरों में गोली मारकर बाद में उसे मुठभेड़ बताने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि दंड देने का अधिकार केवल न्यायालयों के पास है, पुलिस के पास नहीं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा न्यायिक अधिकार क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण अस्वीकार्य है, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां शासन कानून के तहत चलता है.

    हाईकोर्ट ने राज्य के डीजीपी और गृह सचिव से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि क्या पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में गोली मारने के संबंध में कोई मौखिक या लिखित निर्देश जारी किए गए हैं. अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मुठभेड़अब एक नियमित घटना बनते जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है.

    इन घटनाओं में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई- हाईकोर्ट

    कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके सामने अक्सर ऐसे मामले आते हैं, जिनमें मामूली अपराधों में भी पुलिस अंधाधुंध गोलीबारी कर घटनाओं को मुठभेड़ का रूप दे देती है. यह टिप्पणी अदालत ने मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार और दो अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की जो अलग-अलग पुलिस मुठभेड़ों में घायल हुए थे. अदालत ने नोट किया कि इन घटनाओं में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, जिससे बल प्रयोग की आवश्यकता और अनुपातिकता पर सवाल उठते हैं.

    एक मामले में अदालत ने पहले राज्य सरकार से पूछा था कि क्या कथित मुठभेड़ को लेकर एफआईआर दर्ज हुई और क्या घायल का बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी के सामने दर्ज किया गया. राज्य की ओर से बताया गया कि एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन घायल का बयान न तो मजिस्ट्रेट और न ही किसी डॉक्टर के समक्ष दर्ज किया गया. साथ ही यह भी जानकारी दी गई कि पहले एक सब-इंस्पेक्टर को जांच सौंपी गई थी, जिसे बाद में एक इंस्पेक्टर को स्थानांतरित कर दिया गया.

    स्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ में हुई सुनवाई

    दलीलों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मुठभेड़ संबंधी दिशानिर्देशों का पालन होता नहीं दिख रहा है. यह सुनवाई जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ में हुई.

  • न्यायालय ने कहा केवल अदालत को है सजा देने का अधिकार पुलिस नहीं कर सकती एनकाउंटर

    न्यायालय ने कहा केवल अदालत को है सजा देने का अधिकार पुलिस नहीं कर सकती एनकाउंटर

    नई दिल्ली। प्रयागराज में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की हाफ एनकाउंटर प्रथा पर गहरी चिंता और तीखी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने इस मामले में प्रदेश के डीजीपी और गृह सचिव को तलब किया है और स्पष्ट जवाब देने को कहा है। हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के पैरों या शरीर के किसी अन्य हिस्से में गोली मारने के संबंध में कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिए गए हैं।

    जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने यह आदेश मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार समेत अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी मुठभेड़ अब नियमित होती जा रही हैं और कथित तौर पर इसका उद्देश्य वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस आरोपी के पैरों में गोली मारकर इसे मुठभेड़ बताती है और यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति को सजा देने का अधिकार केवल अदालत के पास है पुलिस के पास नहीं है। कोर्ट ने चिंता जताई कि छोटे मोटे अपराधों जैसे चोरी के मामलों में भी पुलिस एनकाउंटर का सहारा ले रही है।

    कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसे निर्देश जारी किए गए और उनका पालन किया गया तो संबंधित जिले के पुलिस प्रमुख यानी SP SSP या कमिश्नर व्यक्तिगत रूप से कोर्ट की अवमानना के लिए जिम्मेदार होंगे। इस स्थिति में उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे निर्देश और प्रथाएं कानून व्यवस्था के नाम पर अनुचित और असंवैधानिक हैं।अदालत ने यह भी कहा कि हाफ एनकाउंटर प्रथा से न केवल आरोपी का जीवन खतरे में पड़ता है बल्कि यह पुलिस के प्रति आम जनता के विश्वास को भी प्रभावित करती है। न्यायालय ने डीजीपी और गृह सचिव से पूछा कि इस तरह के निर्देश किसी प्रकार से नीति या प्रशिक्षण का हिस्सा तो नहीं बन गए।

    हाईकोर्ट के आदेश के बाद यूपी पुलिस में हलचल मची है और सभी वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में लिखित रूप से स्पष्ट जवाब देने की तैयारी में हैं। पुलिस विभाग का कहना है कि कानून का पालन किया जाएगा और भविष्य में किसी भी प्रकार की असंवैधानिक कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी।इस आदेश को पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका के बीच जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों की सीमा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन विवाद हाई कोर्ट तक पहुँचा, अधिकारियों के निलंबन और CBI जांच की मांग

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन विवाद हाई कोर्ट तक पहुँचा, अधिकारियों के निलंबन और CBI जांच की मांग

    नई दिल्ली। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन के बीच उत्पन्न विवाद अब इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुंच गया है। याचिका में 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के दिन घटित घटना की CBI जांच कराने की मांग की गई है। यह मामला धार्मिक भावनाओं, प्रशासनिक हस्तक्षेप और नाबालिगों के अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा हुआ है।

    अधिवक्ता गौरव द्विवेदी ने मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष लेटर पिटीशन दाखिल की है। याचिकाकर्ता का दावा है कि माघ मेला सनातन धर्म का अत्यंत पवित्र उत्सव है, जिसमें मौनी अमावस्या का संगम स्नान सर्वोच्च धार्मिक महत्व रखता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जब अपने शिष्यों के साथ पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तब मेला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने उन्हें जबरन पालकी से उतार दिया और पैदल स्नान करने का निर्देश दिया।

    याचिका में यह भी कहा गया है कि स्वामीजी के साथ चल रहे 11 से 14 वर्ष आयु के नाबालिग बटुकों को हिरासत में लिया गया, उनके साथ कथित मारपीट की गई और उनकी शिखा (चोटी) पकड़कर घसीटा गया। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि नाबालिगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) एक्ट का उल्लंघन करता है और यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

    याचिका में यह भी उल्लेख है कि बटुकों की शिखा खींचना सनातन धर्म की धार्मिक भावनाओं का अपमान है। मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पद और शंकराचार्य नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए थे, जबकि याचिकाकर्ता का कहना है कि शंकराचार्य की नियुक्ति की मान्य धार्मिक प्रक्रिया अखाड़ों और काशी विद्वत परिषद के माध्यम से होती है। प्रशासन को इस प्रक्रिया या पद की वैधता पर प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है।

    अधिवक्ता ने कोर्ट से मांग की है कि मामले की तुरंत CBI जांच करवाई जाए, मेला और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ निलंबन किया जाए, और नाबालिग बटुकों के साथ मारपीट करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए।

    धार्मिक अधिकारों और नाबालिग सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह याचिका हाई कोर्ट में विचाराधीन है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि प्रशासनिक हस्तक्षेप ने न केवल धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई, बल्कि छोटे बच्चों के अधिकारों का भी उल्लंघन किया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक दखल और बाल सुरक्षा का संगम है और इसका निर्णय पूरे धार्मिक और प्रशासनिक तंत्र के लिए एक मिसाल साबित हो सकता है। कोर्ट से उम्मीद जताई जा रही है कि CBI जांच और अधिकारियों के निलंबन के निर्देश जल्द जारी होंगे।