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  • FCRA बिल पर घिरी सरकार… परिसीमन विधेयक की राह में खतरा बनेगी सहयोगी दलों की नाराजगी!

    FCRA बिल पर घिरी सरकार… परिसीमन विधेयक की राह में खतरा बनेगी सहयोगी दलों की नाराजगी!


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) के मौजूदा सत्र में केंद्र सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। चर्चा इस बात को लेकर तेज है कि क्या भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाली सरकार विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में संशोधन से जुड़े विधेयक को इसी सप्ताह सदन में पेश करेगी या फिर इसे आगे के लिए टाल दिया जाएगा। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक समीकरण बताया जा रहा है, जिसका सीधा संबंध प्रस्तावित परिसीमन विधेयक (Proposed Delimitation Bill) से जुड़ा हुआ है।

    FCRA संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को संसद में साधारण बहुमत की जरूरत होगी, लेकिन परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दिलाने के लिए व्यापक समर्थन जुटाना आवश्यक होगा। यही वजह है कि दोनों विधेयकों को लेकर सरकार की रणनीति को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं बढ़ गई हैं।

    सूत्रों के अनुसार, भाजपा अपने महत्वाकांक्षी परिसीमन विधेयक, जिसे 131वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किए जाने की संभावना है, को पारित कराने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से बाहर मौजूद दलों से भी संपर्क साध रही है। हालांकि दूसरी ओर विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कई विपक्षी और क्षेत्रीय दलों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। तमिलनाडु की डीएमके और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे दल इसका विरोध करने के संकेत दे चुके हैं, जबकि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी जैसे दल अभी अपने रुख को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं।

    एक समाचार चैनल द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं और सूत्रों से बातचीत में यह सामने आया कि FCRA विधेयक को लेकर दलों के बीच मतभेद गहरे हैं। इसमें भाजपा के सहयोगी दलों की राय भी शामिल है। दक्षिण भारत की एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी ने मौजूदा स्वरूप में FCRA विधेयक को लेकर चिंता जताई है। पार्टी को आशंका है कि प्रस्तावित बदलावों का असर उन संस्थानों पर पड़ सकता है, जो उसके परंपरागत मतदाता वर्ग से जुड़े हुए हैं।

    पार्टी के एक वरिष्ठ सूत्र ने कहा, “सरकार के साथ बातचीत अभी जारी है। यदि हमारे सुझावों को स्वीकार किया जाता है तो हम सहयोग करने पर विचार कर सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो हमें विरोध करना पड़ेगा।” मतदान से दूरी बनाने के विकल्प पर उन्होंने कहा कि यह उनके लिए संभव नहीं है। पार्टी या तो विधेयक के समर्थन में मतदान करेगी या फिर विरोध में। उनका कहना था कि यह विषय उनके मुख्य मतदाता वर्ग से सीधे जुड़ा हुआ है और इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    सूत्रों के अनुसार, इस क्षेत्रीय दल का बड़ा समर्थन आधार ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों में है। पार्टी को डर है कि FCRA विधेयक का वर्तमान स्वरूप इन समुदायों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है। राजनीतिक स्थिति यह है कि परिसीमन विधेयक पर यह दल सरकार के साथ खड़ा हो सकता है, लेकिन इसके लिए उसकी अपनी शर्तें हैं। वहीं FCRA संशोधन विधेयक पर समर्थन मिलने की संभावना काफी कम नजर आ रही है।

    इधर, एनसीपी (शरद पवार गुट) और डीएमके ने भी स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे FCRA विधेयक के मौजूदा स्वरूप के पक्ष में नहीं हैं। दोनों दल चाहते हैं कि इस विधेयक को आगे विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए। एनसीपी (शरद पवार गुट) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि हर दानदाता और हर संस्था को संदेह की नजर से क्यों देखा जाए।

    एनसीपी सांसद ने कहा कि सामाजिक संस्थाओं और धर्मार्थ संगठनों के माध्यम से मिलने वाली सहायता का उपयोग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और जनकल्याण के कार्यों में होता है। उनका कहना था कि कुछ संस्थाओं की गलतियों के आधार पर सभी संस्थानों और दानदाताओं पर संदेह करना उचित नहीं है।

    उन्होंने कहा कि मौजूदा स्वरूप में उनकी पार्टी इस विधेयक का समर्थन नहीं कर सकती और इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग करेगी। वहीं परिसीमन विधेयक पर समर्थन के सवाल पर उन्होंने कहा कि जब तक राजनीतिक दलों को विधेयक का प्रारूप उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक कोई अंतिम निर्णय लेना संभव नहीं है।

    डीएमके भी FCRA विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने की मांग कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, तमिलनाडु में कांग्रेस से दूरी बढ़ने के बाद डीएमके इस मुद्दे पर अपनी अलग राजनीतिक लाइन तैयार कर रही है। डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने आरोप लगाया कि मौजूदा स्वरूप में यह विधेयक अल्पसंख्यक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों और गैर सरकारी संगठनों पर दबाव बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। उनका कहना था कि विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे सरकार को FCRA के तहत धन प्राप्त करने वाले संस्थानों की संपत्तियों पर कार्रवाई करने का अधिकार मिल सकता है, जिसमें पहले से खरीदी गई संपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं।

    डीएमके नेता ने सवाल उठाया कि वर्षों पहले खरीदी गई संपत्तियों पर बाद में कार्रवाई करने का अधिकार देना कितना उचित होगा। उन्होंने कहा कि गैर सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यदि सुधार की जरूरत है तो नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसा प्रावधान नहीं होना चाहिए जिससे सभी संस्थानों को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाए।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियां FCRA विधेयक का विरोध करती हैं और दूसरी ओर परिसीमन विधेयक पर भाजपा का समर्थन करती हैं तो उनके सामने राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। सूत्रों के अनुसार, इन दलों में इस मुद्दे पर गंभीर मंथन चल रहा है। वहीं विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक ने संसद में FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा कि कांग्रेस कई कारणों से इस विधेयक का विरोध करेगी।

    केरल से जुड़े कांग्रेस नेताओं ने भी आशंका जताई है कि प्रस्तावित संशोधनों का असर राज्य के गैर सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ सकता है। विपक्ष का कहना है कि पिछली तारीख से संपत्तियों पर कार्रवाई करने की संभावित शक्ति और अधिकारियों को व्यापक अधिकार देना चिंता का विषय है। एक वरिष्ठ सीपीएम नेता ने दावा किया कि प्रस्तावित FCRA संशोधन के तहत अधिकारियों को मिलने वाली शक्तियां वक्फ संशोधन कानून में दिए गए अधिकारों से भी अधिक व्यापक हो सकती हैं।

    गौरतलब है कि इससे पहले महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को विपक्षी एकजुटता के कारण संसद में चुनौती का सामना करना पड़ा था। हालांकि पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी मतभेद सामने आए हैं। वहीं एनसीपी के नए राजनीतिक समीकरण और ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता के बाद NDA का संख्या बल मजबूत हुआ है।

    ऐसे में भाजपा आने वाले छह महीने से कम समय में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अब इस विधेयक के पारित होने की संभावना पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है, लेकिन FCRA संशोधन विधेयक पर सहयोगी दलों और विपक्ष की नाराजगी सरकार के लिए नई चुनौती बन सकती है।

  • इंडिया गठबंधन में कांग्रेस रहेगी तो हम नहीं…. इंडिया गठबंधन में सहयोगियों दलों ने खोला मोर्चा

    इंडिया गठबंधन में कांग्रेस रहेगी तो हम नहीं…. इंडिया गठबंधन में सहयोगियों दलों ने खोला मोर्चा


    नई दिल्ली।
    हाल ही में तमिलनाडु (Tamil Nadu), केरल (Kerala) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) के विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) के बाद ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन में दरारें गहरी होती जा रही हैं। सोमवार को नई दिल्ली में हुई विपक्षी दलों की अहम बैठक में वीसीके (VCK) और वामपंथी दलों ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर जोरदार हमला बोला है। तमिलनाडु की सत्ता से बाहर हुई डीएमके की नाराजगी इस कदर बढ़ गई है कि उसने गठबंधन में कांग्रेस के मौजूद रहने पर ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

    डीएमके की दो टूक- ‘कांग्रेस रहेगी तो हम नहीं’
    डीएमके के सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा तभी बनेगी, जब कांग्रेस इस गुट का हिस्सा नहीं होगी। डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “हम चुनाव प्रणाली ‘SIR’ के मुद्दे पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजे जाने वाले पत्र पर भी हस्ताक्षर नहीं करेंगे।” नई दिल्ली में हुई इस बैठक में कांग्रेस द्वारा डीएमके से नाता तोड़ने का मुद्दा पूरी तरह छाया रहा और सहयोगियों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी।


    राहुल गांधी पर वामदलों का सीधा हमला

    केरल में कांग्रेस और वामदलों के बीच की तल्खी बैठक के दौरान खुलकर सामने आ गई। सीपीएम नेता जॉन ब्रिटास, सीपीआई के संतोष कुमार और डी. राजा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने केरल चुनाव के दौरान लेफ्ट को ‘बीजेपी की बी-टीम’ बताया था।

    वामपंथी नेताओं ने डीएमके के गठबंधन से अलग होने के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहराया और कई आरोप लगाए। जैसे- कांग्रेस ने तमिलनाडु चुनाव खत्म होने के ठीक बाद अचानक टीवीके (TVK) के पाले में जाकर द्रविड़ पार्टी (डीएमके) को उकसाने का काम किया है। कांग्रेस के इसी रवैये के कारण डीएमके ने गठबंधन छोड़ने जैसा बड़ा कदम उठाया।


    कांग्रेस की रणनीति से बिखर रहा है विपक्ष: वीसीके

    बैठक के दौरान वीसीके (VCK) के प्रमुख तोल थिरुमावलवन ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पार्टी के हालिया फैसलों ने कई सहयोगी दलों के भीतर गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। उन्होंने गठबंधन के भविष्य पर चिंता जताते हुए कुछ अहम बिंदु रखे: जैसे- केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस की जो रणनीति रही है, उसने गठबंधन के उन प्रमुख स्तंभों को कमजोर किया है जो अब तक मजबूती से खड़े थे। कांग्रेस के इस रवैये से मुख्य रूप से डीएमके, टीएमसी (TMC) और सीपीएम (CPM) जैसी अहम पार्टियों को नुकसान पहुंचा है। वीसीके प्रमुख ने स्पष्ट किया कि विपक्षी एकजुटता के बड़े लक्ष्य को देखते हुए कांग्रेस की यह रणनीति न तो वांछनीय है और न ही किसी भी तरह से फायदेमंद।

    सूत्रों ने बताया कि बैठक में शामिल माकपा के राज्यसभा सदस्य ने राहुल गांधी और कांग्रेस के आरोपों का विषय उठाया। भाकपा महासचिव डी राजा ने भी इसको लेकर नाराजगी जताई कि राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस द्वारा केरल में वाम नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए गए।

    सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नीति के तहत पार्टी की ओर से चुनाव में एक विषय उठाया गया था। विपक्ष के कुछ अन्य नेताओं ने भी कहा कि अब इन बातों को भूलकर आगे बढ़ना है और मिलकर भाजपा का मुकाबला करना है। सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने कहा कि गठबंधन के घटक दलों को एक दूसरे की आलोचना से बचना चाहिए।


    क्या रहा बैठक का नतीजा?

    विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक में शामिल कई नेताओं ने पुराने गिले-शिकवे भूलकर, बड़ा दिल दिखाते हुए और एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा मोदी सरकार को चुनौती देने का सुझाव दिया।

    सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने इस बात की जोरदार पैरवी की कि गठबंधन में शामिल दलों को एक दूसरे की आलोचना करने से बचना चाहिए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद इस गठबंधन को लेकर उनके रुख में बड़ा बदलाव आया है।

    बैठक में ममता और कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी के बीच गर्मजोशी भरी मुलाकात भी हुई। सूत्रों ने बताया कि बैठक औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ममता ने सोनिया गांधी से करीब 10 मिनट लंबी बातचीत की। कांग्रेस ने दोनों नेताओं की एक-दूसरे को गले लगाते हुए तस्वीर भी अपने सोशल मीडिया मंच पर साझा की।

  • पश्चिम एशिया संकट से निपटने के तरीके पर सरकार के साथ नजर आ रहे ये नेता… बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किल!

    पश्चिम एशिया संकट से निपटने के तरीके पर सरकार के साथ नजर आ रहे ये नेता… बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किल!


    नई दिल्ली।
    कांग्रेस (Congress) के कुछ नेताओं ने पश्चिम एशिया (West Asia) संकट से निपटने के तरीके पर सरकार के साथ खड़े नजर आकर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पहले भी कई मौकों पर कांग्रेस को असहज स्थिति में डाल चुके पार्टी सांसद शशि थरूर (MP Shashi Tharoor) के अलावा मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के पूर्व सीएम कमलनाथ (Former CM Kamal Nath) और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा (Anand Sharma) और मनीष तिवारी (Manish Tewari) ने पिछले कुछ दिनों में पार्टी के आधिकारिक रुख से अलग राय जताई है।


    नेताओं की बयानबाजी से कांग्रेस की हुई किरकिरी

    इन प्रमुख नेताओं की बयानबाजी ने कांग्रेस की काफी किरकिरी कराई है। खासकर ऐसे समय जब पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण देश में ऊर्जा संकट उत्पन्न होने को लेकर लगातार नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं। राहुल ने हाल ही में कहा था कि आने वाले समय में ईंधन एक बड़ी समस्या बनने वाला है, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो चुकी है। यह स्थिति गलत विदेश नीति के कारण पैदा हुई है।


    आनंद शर्मा, कमलनाथ के बाद सरकार के साथ मनीष तिवारी

    कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने पश्चिम एशिया में जारी जंग पर एक टीवी चैनल पर कहा, सरकार संभवतः सही काम कर रही है। अभी दो दिन पहले कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं आनंद शर्मा और कमलनाथ ने भी मौजूदा स्थिति को संभालने के केंद्र के तरीके की सराहना की थी। आनंद शर्मा ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि भारत का कूटनीतिक तरीका समझदारी भरा रहा है। इससे संभावित मुश्किलों से बचा गया है।

    एलपीजी की कोई कमी नहीं है- कमलनाथ
    मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने छिंदवाड़ा में एक कार्यक्रम के दौरान कहा, एलपीजी की कोई कमी नहीं है। बस ये माहौल बनाया जा रहा है कि कमी है। कुछ लोगों राजनीतिक फायदे के लिए जानबूझकर डर फैला रहे हैं। शशि थरूर ने पिछले महीने एक लेख में पश्चिम एशिया संकट पर भारत सरकार के संयमित रुख का समर्थन करते हुए इसे जिम्मेदारी भरा बताया है। उनके मुताबिक, इस मामले में चुप्पी कायरता नहीं है। हमें समझना होगा कि हमारे राष्ट्रीय हित इस इलाके से जुड़े हैं।

  • असफल वंशज पर न पार्टी नेताओं को भरोसा, न सहयोगियों को… कांग्रेस के सियासी घमासान पर BJP का तंज

    असफल वंशज पर न पार्टी नेताओं को भरोसा, न सहयोगियों को… कांग्रेस के सियासी घमासान पर BJP का तंज


    नई दिल्ली
    । कांग्रेस पार्टी (Congress Party) के लिए सोमवार का दिन उलझनों भरा रहा। मणिशंकर अय्यर (Mani Shankar Aiyar.) जैसे नेता ने पार्टी हाई कमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, तो वहीं असम के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा (Bhupen Bora) ने भी पार्टी को अपना इस्तीफा भेज दिया। उन्होंने पार्टी हाई कमान पर उन्हें नजर अंदाज करने का आरोप लगाया था। इस उठा पटक के बीच भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) ने राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के नेतृत्व के ऊपर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा की तरफ से राहुल गांधी को एक ‘असफल वंशज’ करार देते हुए कहा गया कि उन पर न तो उनकी पार्टी के नेताओं को भरोसा है और न ही उनके सहयोगियों को भरोसा है।

    दिन भर से कांग्रेस पार्टी के अंदर जारी घमासान पर भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने जमकर तंज कसा। उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस कहती है राहुल को हटाओ, ममता को लाओ, ‘इंडी-गठबंधन’ को बचाओ। असम के कांग्रेस नेता भूपेन बोरा ने इस्तीफा दिया। मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि कांग्रेस केरल हारेगी और विजयन जीतेंगे।” भाजपा नेता ने सवाल किया कि क्या यह समझने के लिए और सबूतों की जरूरत है कि न तो गांधी की अपनी पार्टी के नेता और न ही उनके सहयोगी उन्हें गंभीरता से लेते हैं। भाजपा नेता ने अपने हमले को और भी तीखा करते हुए कहा, “राहुल गांधी के पास न तो जनमत है और न ही संगत… वह बस एक असफल विशेषाधिकार प्राप्त वंशवादी हैं।”

    आपको बता दें, खबर लिखे जाने तक असम के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने इस्तीफे को वापस ले लिया था। इसके अलावा मणिशंकर अय्यर को लेकर कांग्रेस पार्टी की तरफ से कहा गया कि वह अब पार्टी में नहीं है, ऐसे में उनके बयान को पार्टी से जोड़ने का कोई मतलब नहीं है। दरअसल, मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि उन्हें विश्वास है कि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अपने पद पर बने रहेंगे। इसके अलावा उन्होंने प्रवक्ता पवन खेड़ा और शशि थरूर पर भी निशाना साधा था। उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी की तरफ से जबरदस्त विरोध देखने को मिला था। पार्टी की तरफ से कांग्रेस से संबंध न होने की बात पर पूर्व सांसद ने कहा कि उन्हें केवल अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ही पार्टी से निकाल सकते हैं।

    कांग्रेस पार्टी ने भले ही खुद को इस बयान से दूर कर लिया हो लेकिन भाजपा ने हमला बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ा। प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा, “कांग्रेस नेताओं द्वारा राहुल गांधी को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है। राहुल गांधी को कांग्रेस के कट्टर वफादार मणिशंकर अय्यर ने खुलेआम नकार दिया।”

    भंडारी ने कहा, ”अय्यर हों या तृणमूल कांग्रेस या भूपेन बोरा सब जानते हैं। राहुल गांधी राजनीतिक ‘पप्पू’ हैं। कांग्रेस में अपना पूरा जीवन बिताने वाले वफादार अब खुलेआम राहुल गांधी के खिलाफ बोल रहे हैं।”

    दरअसल, यह पूरा मामला कांग्रेस के पूर्व सांसद मणिशंकर अय्यर के बयान के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कांग्रेस नेताओं के ऊपर निशाना साधा। उन्होंने पवन खेड़ा, केसी वेणुगोपाल और शशि थरूर को भी अपने निशाना पर लिया। इसके अलावा असम से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन के इस्तीफे ने भी कांग्रेस पार्टी के दिन को बर्बाद करने की कोशिश की। मणिशंकर के मामले पर कांग्रेस पार्टी की तरफ से तीखी टिप्पणी आई, जिसमें कहा गया कि मणिशंकर अय्यर अब पार्टी में नहीं है, तो उस पर उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह नेहरू वादी और राजीववादी हैं लेकिन राहुलवादी नहीं है। इतना ही नहीं अय्यर ने कहा कि उन्हें पार्टी से निकालने का अधिकार केवल कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को है।