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  • UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    नई दिल्‍ली। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं। अब भारत की इस दावेदारी पर चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। खास बात है कि चीन वीटो अधिकार प्राप्त सदस्य है।

    UNSC यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के दावे पर अब चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। पड़ोसी मुल्क ने कहा है कि वह इस तरह की खबरों पर गौर कर रहा है। खास बात है कि पहले ही कई बड़े देश भारत का साथ दे रहे हैं।

    चीन की तरफ से यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं।
    क्या बोला चीन

    चीन ने गुरुवार को कहा कि उसने 2028-29 की अवधि के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता हासिल करने की भारत की दावेदारी से जुड़ी खबरों पर गौर किया है। सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने की भारत की घोषणा पर चीन के रुख के बारे में पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘चीन ने इससे जुड़ी खबरों पर गौर किया है।’
    क्या बोले जयशंकर

    विदेश मंत्री जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत के आधिकारिक प्रचार अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम में विभिन्न देशों के राजदूत, राजनयिक और अधिकारी शामिल हुए थे।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का दृष्टिकोण ‘शांति अर्थात मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के जरिये समग्र प्रगति सुनिश्चित करने’ पर आधारित है।

    उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत के संभावित कार्यकाल की प्राथमिकताओं का भी विस्तार से उल्लेख किया था।
    चीन नहीं करता भारत का समर्थन

    चीन सुरक्षा परिषद के वीटो अधिकार प्राप्त पांच स्थायी सदस्यों में शामिल है लेकिन उसने अभी तक भारत की दावेदारी का समर्थन नहीं किया है। इसके विपरीत, पांच स्थायी सदस्यों में शामिल अन्य चार देश-अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस-सुधार के बाद गठित होने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का स्पष्ट रूप से समर्थन कर चुके हैं।
    किस देश से है मुकाबला

    सुरक्षा परिषद में 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होंगे। इसमें एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।

    भारत पिछली बार 2021-22 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना था।

    यह संयुक्त राष्ट्र के 15 सदस्यीय इस शक्तिशाली निकाय में भारत का आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-2012 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है।
    सुरक्षा परिषद में नहीं हुआ खास सुधार

    भारत का कहना है कि UNSC का 80 साल पुराना ढांचा मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। और इसी वजह से यह वैश्विक संस्था दुनिया भर में जारी संघर्षों से हो रही मानवीय पीड़ा को खत्म करने में प्रभावी साबित नहीं हुई।

    भारत ने यह भी कहा कि विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए वैश्विक वित्तीय ढांचे में भी बदलाव होना चाहिए।

    स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने मंगलवार को कहा, ‘हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों में सुरक्षा परिषद प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाई है।’

  • क्या भाजपा को पहले से था विधेयक गिरने का अंदाजा, फिर क्यों महिला आरक्षण में संशोधन का खेला दांव

    क्या भाजपा को पहले से था विधेयक गिरने का अंदाजा, फिर क्यों महिला आरक्षण में संशोधन का खेला दांव

    नई दिल्‍ली। लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक के गिरने के बाद बीजेपी विपक्ष पर आक्रामक है तो वहीं विपक्ष का कहना है कि यह बीजेपी की सोची-समझी साजिश है। बिना संवाद के विशेष सत्र बुलाया गया और फिर विधेयक ना पास होने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा रहा है।
    महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2023 और परिसीमन विधेयक 2026 समेत तीन विधेयकों को पास कराने के लिए पांच राज्यों में चुनाव के बीच ही संसद का विशेष सत्र बुलाया गया। पहले दिन रात 1 बजे के बाद तक विधेयकों पर चर्चा होती रही। 17 अप्रैल को सरकार ने महिला आरक्षण कानून को लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी और फिर शाम को जब वोटिंग हुई तो विधेयक निचले सदन में गिर गया। विधेयक गिरते ही बीजेपी विपक्ष पर आक्रामक हो गई।
    बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस समेत विपक्ष महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। वहीं कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीजेपी पर आरोप लगाया है कि यह एक तरह का षड्यंत्र था ताकि बीजेपी विधानसभा चुनाव के बीच बिना ठीक से संवाद किए ऐसी परिस्थितियां बनाए कि विधेयक पारित ना होने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा सके।

    बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में वोटिंग से पहले ही सोशल मीडिया पर अपना संदेश जारी करते हुए कहा विपक्षी सांसदों से भी अपील की थी कि वे विधेयक के पक्ष में वोटिंग करें। वहीं विपक्ष के सांसदों का कहना था कि 2023 में पारित विधेयक को उसी रूप में लागू किया जाए। इसमें संशोधन की जरूरत कहां से पड़ गई अशोक गहलोत ने शुक्रवार को कहा, धानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित पूरी सरकार को यह पहले दिन से मालूम था कि संविधान संशोधन विधेयक विपक्ष के सहयोग के बिना पास नहीं हो सकता। इसके बावजूद उन्होंने विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं लिया।
    बीजेपी ने किया विपक्ष में फूट डालने का प्रयास- गहलोत

    गहलोत ने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रहे थे, परन्तु इतने महत्वपूर्ण विषय पर प्रधानमंत्री ने सभी विपक्षी पार्टियों को एक साथ बुलाकर बात करने के बजाय अलग-अलग बात कर उनमें फूट डालने का प्रयास किया।

    कैसे गिर गया विधेयक

    सदन में ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’, पर हुए मत विभाजन के दौरान इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। विधेयक पर मत विभाजन में 528 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इस विधेयक को पारित करने के लिए 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी।

    विधेयक गिरने का भी फायदा उठाएगी बीजेपी?

    विधानसभा चुनावों में बीजेपी अकसर महिला वोटों के लिए कोई ना कोई दांव खेलती है। ऐसे में जानकारों का कहना है कि बीजेपी को पहले से पता था कि इस विधेयक को लेकर विपक्ष एकजुट होने का प्रयास करेगा। अगर विधेयक पास होता है तब भी बीजेपी इसे बंगाल चुनाव में मुद्दा बना सकती है। वहीं अगर विधेयक पास नहीं होता है तो वह इसी के बहाने विपक्ष को निशाने पर ले सकती है। अब इस राजनीति की शुरुआत पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से हो चुकी है। यह मुद्दा 2029 के चुनाव में भी भुनाया जा सकता है।