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  • बूढ़े होते भारत में डिमेंशिया का बढ़ता खतरा, 2036 तक 1.69 करोड़ मरीज होने का अनुमान, राष्ट्रीय योजना की जरूरत

    बूढ़े होते भारत में डिमेंशिया का बढ़ता खतरा, 2036 तक 1.69 करोड़ मरीज होने का अनुमान, राष्ट्रीय योजना की जरूरत


    नई दिल्ली ।
    भारत में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ने के साथ बुजुर्गों के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां भी गंभीर होती जा रही हैं। कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियों पर व्यापक चर्चा होती है, लेकिन डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश के बढ़ते खतरे और उससे प्रभावित लोगों की देखभाल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। यह बीमारी केवल याददाश्त को प्रभावित नहीं करती, बल्कि व्यक्ति की पहचान, निर्णय लेने की क्षमता, स्वतंत्रता और रोजमर्रा के जीवन को भी मुश्किल बना सकती है। ऐसे में भारत में एक समर्पित राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना की जरूरत महसूस की जा रही है।

    डिमेंशिया ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। अल्जाइमर रोग इसके प्रमुख कारणों में से एक है, लेकिन डिमेंशिया केवल अल्जाइमर तक सीमित नहीं है। गंभीर अवस्था में मरीज परिचित लोगों को पहचानने, दैनिक गतिविधियां करने और अपने आसपास हो रही घटनाओं को समझने में कठिनाई महसूस कर सकता है। इससे उसकी सुरक्षा के साथ गरिमा और स्वायत्तता बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

    भारत में इस समस्या का वास्तविक आकार समझने के लिए उपलब्ध आंकड़े महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। वर्ष 2017 से 2020 के बीच जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित एक राष्ट्रीय अध्ययन में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में डिमेंशिया की व्यापकता 7.4 प्रतिशत आंकी गई थी। इस दर को जनसंख्या अनुमानों पर लागू करते हुए शोधकर्ताओं ने वर्ष 2016 में देश में लगभग 88 लाख मामले होने का अनुमान लगाया था। यदि यह दर अपरिवर्तित रहती है, तो वर्ष 2036 तक मरीजों की संख्या बढ़कर 1.69 करोड़ तक पहुंच सकती है।

    दुनिया के अन्य देशों में भी डिमेंशिया गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इंग्लैंड और वेल्स में वर्ष 2025 के दौरान यह सभी मौतों के 12.7 प्रतिशत मामलों से जुड़ा था। महिलाओं की मौतों में इसका हिस्सा 16.5 प्रतिशत बताया गया। अमेरिका में वर्ष 2024 के दौरान लगभग 10 प्रतिशत मौतों के लिए डिमेंशिया जिम्मेदार था। भारत में मृत्यु संबंधी आंकड़ों की विश्वसनीयता सीमित होने के कारण इस बीमारी के प्रभाव का सटीक आकलन करना कठिन है।

    चिकित्सा विज्ञान में प्रगति ने लोगों की उम्र बढ़ाने में मदद की है, लेकिन लंबा जीवन हमेशा बेहतर स्वास्थ्य की गारंटी नहीं देता। अल्जाइमर की कुछ नई दवाएं शुरुआती चरण में पहचाने गए चुनिंदा मरीजों में संज्ञानात्मक गिरावट की गति को कुछ हद तक धीमा कर सकती हैं। हालांकि, ये दवाएं डिमेंशिया का पूर्ण इलाज नहीं हैं और न ही गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त मस्तिष्क को पहले जैसी स्थिति में ला सकती हैं। इसलिए शुरुआती पहचान, नियमित देखभाल और परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

    डिमेंशिया का प्रभाव मरीज तक सीमित नहीं रहता। गंभीर अवस्था में व्यक्ति को भोजन करने, नहाने, शौचालय जाने और सुरक्षित रहने के लिए लगातार मदद की जरूरत पड़ सकती है। भारत में यह जिम्मेदारी अक्सर पत्नी, बेटी या बहू पर आती है। लंबे समय तक देखभाल करने के कारण परिवार के सदस्यों के रोजगार, आर्थिक स्थिति और अपने स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

    शहरीकरण, रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में पलायन और छोटे होते परिवारों ने पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था की देखभाल संबंधी क्षमता को भी प्रभावित किया है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार पेशेवर देखभाल और आवासीय सुविधाएं ले सकते हैं, लेकिन वहां भी मरीज की स्वतंत्रता और सम्मान बनाए रखना जरूरी है। सुरक्षा के नाम पर उसकी गतिविधियों पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाना नई समस्याएं पैदा कर सकता है।

    भारत सरकार ने वर्ष 2010 में बुजुर्गों की स्वास्थ्य देखभाल के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया था, लेकिन इसमें डिमेंशिया के लिए अलग समर्पित व्यवस्था नहीं है। केरल में डिमेंशिया से संबंधित विशेष सेवाएं शुरू की गई हैं, जबकि कर्नाटक में जिला स्तर पर 32 मस्तिष्क स्वास्थ्य क्लीनिक स्थापित किए गए हैं। इसके बावजूद वर्ष 2025 की एक समीक्षा में राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना, समर्पित वित्तपोषण और मापने योग्य लक्ष्यों की कमी सामने आई।

    बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच डिमेंशिया की चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं, परिवारों और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही है। समय पर पहचान, प्रशिक्षित देखभालकर्मियों की उपलब्धता, परिवारों को आर्थिक और मानसिक सहयोग तथा मरीजों की गरिमा की रक्षा पर केंद्रित राष्ट्रीय योजना इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • नाम या सामान भूलना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार रास्ता भूलना और फैसलों में परेशानी खतरे का संकेत

    नाम या सामान भूलना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार रास्ता भूलना और फैसलों में परेशानी खतरे का संकेत

    नई दिल्ली ।उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त में कुछ बदलाव आना सामान्य माना जा सकता है। किसी व्यक्ति का नाम तुरंत याद न आना, सामान रखने के बाद उसकी जगह भूल जाना या किसी तारीख को याद करने में थोड़ा अधिक समय लगना उम्र से जुड़ी सामान्य भूल का हिस्सा हो सकता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति आमतौर पर अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां खुद करने में सक्षम रहता है।

    हालांकि, हर तरह की भूल को उम्र का सामान्य प्रभाव मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। बढ़ती उम्र में डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी स्थितियों का खतरा भी बढ़ सकता है। डिमेंशिया में केवल याददाश्त ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि सोचने-समझने, निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने और भाषा से जुड़ी क्षमताओं में भी बदलाव आ सकता है। इसका असर धीरे-धीरे व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन पर दिखाई देने लगता है।

    सामान्य उम्र से जुड़ी भूल और डिमेंशिया के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि डिमेंशिया की स्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा है, परिचित जगह पर जाने के बावजूद रास्ता भूल जाता है या सामान्य बातचीत के दौरान जरूरी शब्द याद नहीं कर पाता, तो इन संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है।

    पैसों और जरूरी दस्तावेजों को संभालने में अचानक परेशानी होना भी एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। बिलों का हिसाब रखने, रोजमर्रा के कामों की योजना बनाने या पहले आसानी से किए जाने वाले फैसले लेने में लगातार कठिनाई होने लगे तो इसे केवल उम्र का असर मानना सही नहीं है।

    कुछ मामलों में व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व में भी बदलाव दिखाई दे सकता है। पहले की तुलना में बातचीत करने, ध्यान लगाने या सामान्य परिस्थितियों को समझने में परेशानी बढ़ सकती है। यदि ऐसे बदलाव लगातार दिखाई दे रहे हैं और उनकी वजह से रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं, तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी हो सकता है।

    दूसरी ओर, याददाश्त कमजोर होने का अर्थ हमेशा डिमेंशिया नहीं होता। इसके पीछे कई ऐसे कारण भी हो सकते हैं जिनकी पहचान और उपचार संभव है। नींद की समस्या, लंबे समय तक बना तनाव, डिप्रेशन, थायरॉइड से जुड़ी परेशानी और विटामिन बी12 जैसे जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी याददाश्त और ध्यान को प्रभावित कर सकती है।

    इसलिए बुजुर्ग व्यक्ति में अचानक या तेजी से बढ़ती याददाश्त की समस्या को खुद से डिमेंशिया का संकेत मान लेना उचित नहीं है। समस्या के पीछे वास्तविक कारण जानने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी होता है। लक्षणों की अवधि, उनकी गंभीरता और रोजमर्रा की गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाता है।

    परिवार के सदस्यों की भूमिका भी इस दौरान महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति में बार-बार भूलने के साथ व्यवहार, भाषा, निर्णय लेने या रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में लगातार बदलाव दिखाई दे रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से समस्या के कारण को समझने और आवश्यक कदम तय करने में मदद मिल सकती है।