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  • डॉ. अंबेडकर जयंती पर बड़ा फैसला: उम्रकैद काट रहे 9 बंदी हुए रिहा

    डॉ. अंबेडकर जयंती पर बड़ा फैसला: उम्रकैद काट रहे 9 बंदी हुए रिहा


    नई दिल्ली। ग्वालियर की सेंट्रल जेल में अंबेडकर जयंती के अवसर पर एक अहम मानवीय निर्णय लिया गया। इस मौके पर आजीवन कारावास की सजा काट रहे 9 बंदियों को रिहा किया गया, जिनमें एक महिला बंदी भी शामिल है। शासन द्वारा यह निर्णय उनके अच्छे आचरण और सुधारात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी को देखते हुए लिया गया।

    14 साल से अधिक सजा काट चुके थे सभी बंदी
    रिहा किए गए सभी बंदी हत्या जैसे गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए थे और 14 साल से अधिक समय तक जेल में सजा काट चुके थे। वे एक ही प्रकरण से जुड़े थे और लंबे समय से उनके व्यवहार और सुधार को लगातार परखा जा रहा था।

    शासन की मंजूरी के बाद पूरी हुई प्रक्रिया
    जेल प्रशासन ने इन बंदियों के नाम और आचरण से संबंधित रिपोर्ट शासन को भेजी थी। प्रस्ताव पर स्वीकृति मिलने के बाद उनकी रिहाई की औपचारिकताएं पूरी की गईं। जेल अधीक्षक विदित सरवईया के अनुसार, सभी बंदियों का आचरण संतोषजनक रहा, जिसके आधार पर उनकी शेष सजा माफ की गई।

    परिजनों से मिलकर भावुक हुए बंदी
    जेल से बाहर आते ही बंदियों ने अपने परिवारजनों से मुलाकात की। लंबे समय बाद मिलन के इस भावुक क्षण में कई बंदी और उनके परिजन भावुक नजर आए और एक-दूसरे को गले लगाकर खुशी जताई।

    सम्मान के साथ दी गई विदाई
    रिहाई से पहले जेल प्रशासन द्वारा सभी बंदियों को शॉल और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया। इस दौरान जेल अधिकारी और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे, जिन्होंने इस पहल को पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

    अब अन्य अवसरों पर भी मिल रही राहत
    पहले केवल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर ही इस तरह की सजा माफी दी जाती थी, लेकिन पिछले दो वर्षों से अंबेडकर जयंती और गांधी जयंती जैसे अवसरों पर भी यह प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिससे सुधार की दिशा में बंदियों को प्रोत्साहन मिल रहा है।

    रिहा हुए बंदियों के नाम
    रिहा किए गए बंदियों में सुरेश उर्फ सज्जन, पंचम जाटव, आशीष शर्मा, जमुना अहिरवार, छोटे और छोटया माली, अजय तोमर, मोहर सिंह, महेंद्र सिंह और लीलाबाई शामिल हैं।

  • उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों का दलित वोट पर विशेष फोकस।

    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों का दलित वोट पर विशेष फोकस।


    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने दलित वोट बैंक को साधने के लिए पूरी तैयारी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस सभी अपने-अपने स्तर पर दलित वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति बना रहे हैं। अंबेडकर जयंती के मौके पर यह प्रतिस्पर्धा और भी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है।

    भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद से ही दलित वोटों को सहेजने की कवायद शुरू कर दी थी। संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने दलित पेशेवरों के बीच जाकर उनकी समस्याओं और अपेक्षाओं को समझने का प्रयास किया, कई संगोष्ठियों का आयोजन किया और 45 जिलों में सरकारी योजनाओं की जानकारी साझा की।

    इसी प्रक्रिया के तहत सरकार ने अंबेडकर मूर्ति विकास योजना की शुरुआत की है, जिसके अंतर्गत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ-साथ संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसी महान विभूतियों की मूर्तियों का सौंदर्यीकरण और संरक्षण किया जाएगा। आगामी 14 अप्रैल को हर विधानसभा क्षेत्र में इस योजना को लेकर विशेष कार्यक्रम आयोजित होंगे, जिसमें स्थानीय जनप्रतिनिधि जनता को जानकारी देंगे। भाजपा का कहना है कि उसकी सरकार ने दलित उत्थान के लिए लगातार काम किया है, जबकि सपा सरकारों में दलितों का उत्पीड़न हुआ।

    समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में मिले उत्साह को आधार बनाकर दलित वर्ग पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है। पार्टी ने बसपा से आए नेताओं की मदद से दलित समाज में पैठ बनाने का काम तेज कर दिया है। कांशीराम जयंती और अंबेडकर जयंती मनाने की परंपरा को सपा ने फिर से शुरू किया है। पार्टी का कहना है कि भाजपा की दलित नीति केवल चुनावी प्रतीकात्मक राजनीति है और वास्तविक लाभ नहीं पहुंचाती।

    कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में दलित वोटों को साधने के लिए प्रयासरत है। पार्टी ने पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को बुलाया और कई कार्यक्रम आयोजित किए। कांग्रेस का दावा है कि उसने सरकारों के दौरान दलितों के लिए प्रभावी योजनाएं और कानून बनाए हैं, जबकि भाजपा केवल चुनावी हथकंडे अपनाती है।

    बहुजन समाज पार्टी अपने पारंपरिक जाटव वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी लगातार प्रमोशन, आरक्षण और गेस्ट हाउस कांड जैसे मुद्दों को उठाकर सपा को आगाह कर रही है। मायावती दलित राजनीति में प्रमुख चेहरा मानी जाती हैं और ब्राह्मण-दलित समीकरण को साधने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल क्षेत्रों में दलित वोट कई सीटों पर जीत और हार तय करने वाला है। इसी कारण सभी दल इस वर्ग पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दे रहा है, और यह चुनावी रणनीतियों के केंद्र में है।