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  • महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा

    महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा


    नई दिल्ली । धरती पर जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर जंगलों की आग, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ते समुद्र स्तर की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा अदृश्य खतरा तेजी से बढ़ रहा है जो पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बदल सकता है। यह खतरा अटलांटिक महासागर की गहराइयों में बहने वाली विशाल समुद्री धारा AMOC यानी अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन से जुड़ा है, जिसे धरती की जलवायु प्रणाली की रीढ़ भी माना जाता है।

    AMOC एक ऐसा महासागरीय तंत्र है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी को उत्तरी अटलांटिक और यूरोप की ओर ले जाता है। वहां यह पानी ठंडा होकर भारी हो जाता है और हजारों मीटर गहराई में जाकर वापस दक्षिण दिशा की ओर बहता है। यह निरंतर प्रक्रिया सदियों से वैश्विक तापमान, समुद्री लवणता और मौसम संतुलन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती रही है।

    हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह डेटा संकेतों के अनुसार यह शक्तिशाली समुद्री धारा अब धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रणाली और अधिक धीमी पड़ गई या पूरी तरह असंतुलित हो गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार इसके कमजोर होने से उत्तरी यूरोप में सर्दियां और अधिक कठोर हो सकती हैं, जहां तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे तक गिर सकता है। वहीं दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मानसून के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र स्तर बढ़ने का खतरा भी बढ़ सकता है, जिससे तटीय इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

    इस पूरे मुद्दे की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह खतरा दिखाई नहीं देता। यह समुद्र की हजारों मीटर गहराई में बेहद धीमी गति से काम करता है, इसलिए इसका कोई स्पष्ट दृश्य प्रमाण नहीं होता जिसे कैमरे में कैद कर दिखाया जा सके। इसी कारण यह विषय आम जनता की नजरों से अक्सर दूर रह जाता है, जबकि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर बेहद बड़ा हो सकता है।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिक जलवायु संकटों में सबसे बड़ी समस्या यही है कि कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं अदृश्य हैं। वे न तो तूफान की तरह दिखाई देती हैं और न ही आग की तरह तुरंत महसूस होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव लंबे समय में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।

    इस स्थिति की तुलना अक्सर महासागरों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से की जाती है, जो आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन पूरे समुद्री जीवन को प्रभावित करता है। इसी तरह AMOC भी एक ऐसा सिस्टम है जिसकी गिरावट धीरे-धीरे लेकिन गहरे प्रभाव के साथ सामने आ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के जलवायु संकेतों को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए वैश्विक स्तर पर इस पर लगातार निगरानी और शोध बेहद जरूरी है ताकि समय रहते इसके प्रभावों को समझा और नियंत्रित किया जा सके।

  • होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट

    होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट


    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे समुद्री मार्गों का महत्व अक्सर चर्चा में रहता है। इन मार्गों पर किसी भी तरह का भू-राजनीतिक तनाव या सैन्य संघर्ष वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इन दिनों पश्चिमी देशों और वैज्ञानिकों की चिंता किसी समुद्री व्यापारिक मार्ग को लेकर नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राकृतिक समुद्री धारा को लेकर है जो यूरोप के मौसम और जीवनशैली की आधारशिला मानी जाती है। यह धारा है गल्फ स्ट्रीम, जिसके कमजोर पड़ने की आशंका ने वैज्ञानिकों को सतर्क कर दिया है।

    गल्फ स्ट्रीम अटलांटिक महासागर में बहने वाली गर्म समुद्री धारा है, जो एक बड़े समुद्री परिसंचरण तंत्र का हिस्सा है। वैज्ञानिक इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) के नाम से जानते हैं। यह प्रणाली समुद्र के भीतर एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों से गर्म पानी उत्तर दिशा की ओर बहता है और ठंडे क्षेत्रों में पहुंचकर नीचे डूब जाता है। इसके बाद यह ठंडा पानी फिर दक्षिण की ओर लौटता है। यह सतत चक्र पृथ्वी के तापमान और मौसम को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

    यूरोप के अपेक्षाकृत गर्म मौसम के पीछे भी इसी गल्फ स्ट्रीम का बड़ा योगदान माना जाता है। ब्रिटेन, नॉर्वे और पश्चिमी यूरोप के कई देशों में सर्दियां उतनी कठोर नहीं होतीं जितनी समान अक्षांश वाले अन्य क्षेत्रों में होती हैं। इसका कारण यही गर्म समुद्री धारा है, जो इन क्षेत्रों तक गर्मी पहुंचाती रहती है। यदि यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है तो यूरोप का जलवायु संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग इस समुद्री तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। बढ़ते तापमान के कारण आर्कटिक और उत्तरी क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र में मीठे पानी की मात्रा बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मीठा पानी खारे पानी की तुलना में हल्का होता है, जिससे समुद्री जल का सामान्य डूबने वाला चक्र प्रभावित हो सकता है। यदि पानी पर्याप्त मात्रा में नीचे नहीं डूबेगा तो AMOC की गति धीमी पड़ सकती है और गल्फ स्ट्रीम कमजोर हो सकती है।

    यदि ऐसा होता है तो इसके प्रभाव बेहद व्यापक होंगे। उत्तर-पश्चिम यूरोप में तापमान कई डिग्री तक गिर सकता है, जिससे भीषण ठंड का दौर शुरू हो सकता है। दक्षिणी यूरोप में बारिश का पैटर्न बदलने से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, ऊर्जा की मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा वैश्विक मुद्दा बन सकता है।

    हालांकि वैज्ञानिकों को कुछ उम्मीदें भी दिखाई दे रही हैं। हालिया शोधों में संकेत मिले हैं कि आर्कटिक महासागर में बर्फ पिघलने से बनने वाले नए खुले समुद्री क्षेत्र पानी को तेजी से ठंडा करने में मदद कर सकते हैं। इससे समुद्री परिसंचरण तंत्र को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। हालांकि यह संभावना अभी शोध के स्तर पर है और वैज्ञानिक लगातार इस पर निगरानी बनाए हुए हैं।

    कुल मिलाकर गल्फ स्ट्रीम का भविष्य केवल यूरोप ही नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि वैज्ञानिक और नीति निर्माता इस समुद्री धारा की स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं।