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  • सर्वपितृ अमावस्या 2026: पितरों के भोग में जरूर शामिल करें ये 7 चीजें, श्राद्ध की थाली में इन खाद्य पदार्थों का है विशेष महत्व

    सर्वपितृ अमावस्या 2026: पितरों के भोग में जरूर शामिल करें ये 7 चीजें, श्राद्ध की थाली में इन खाद्य पदार्थों का है विशेष महत्व

    नई दिल्ली । पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में इस दिन को विशेष महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण करने से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। यह दिन उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, जो किसी कारण अपने मृत परिजनों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर नहीं कर पाए हों या जिन्हें उनकी मृत्यु की सही तारीख याद न हो। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है। इस अवसर पर पितरों को भोजन अर्पित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भोग की थाली में कुछ विशेष खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। इनमें खीर, चावल, उड़द दाल से बने व्यंजन, पूड़ी, मौसमी सब्जियां, मौसमी फल और पितरों की पसंद का भोजन प्रमुख हैं।

    श्राद्ध की थाली में सबसे पहले खीर को विशेष स्थान दिया जाता है। मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोग में खीर जरूर शामिल करनी चाहिए। इसे पितरों के भोजन का अहम हिस्सा माना जाता है। परंपरा के अनुसार, खीर गाय के दूध से तैयार करने की बात कही जाती है। धार्मिक मान्यता में भैंस के दूध के बजाय गाय के दूध से बनी खीर को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए इस दिन भोग तैयार करते समय खीर बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर विशेष ध्यान दिया जाता है। श्राद्ध की थाली में दूसरा महत्वपूर्ण पदार्थ चावल है। मान्यता है कि पितरों को चावल अर्पित करने से पितृ दोष से राहत मिल सकती है। इसी कारण श्राद्ध के भोजन में चावल को शामिल करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

    तीसरे स्थान पर उड़द दाल से बने व्यंजनों को रखा जाता है। श्राद्ध के भोजन में उड़द दाल की कोई डिश शामिल करने की परंपरा बताई जाती है। इसके लिए उड़द की दाल बनाई जा सकती है। इसके अलावा उड़द के पकौड़े, दाल की कचौड़ी और दही बड़े जैसे व्यंजन भी तैयार किए जा सकते हैं। चौथा खाद्य पदार्थ पूड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूड़ी को पितरों के प्रिय भोजन में शामिल माना जाता है, इसलिए इसे श्राद्ध की थाली में रखने की सलाह दी जाती है। भोग तैयार करते समय इन पारंपरिक व्यंजनों को शामिल करके श्राद्ध की थाली सजाई जाती है। इन खाद्य पदार्थों को पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    पांचवीं चीज मौसमी सब्जियां हैं। श्राद्ध के भोजन में मौसम के अनुसार उपलब्ध सब्जी शामिल की जा सकती है। इस अवसर पर विशेष रूप से कद्दू की सब्जी बनाने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है। इसके बाद छठे स्थान पर मौसमी फलों को रखा जाता है। पितरों को फल अर्पित करने के लिए मौसम में उपलब्ध किसी भी फल को श्राद्ध की थाली में शामिल किया जा सकता है। फल भी भोग का हिस्सा माने जाते हैं। सातवीं चीज पितरों की पसंद का भोजन है। मान्यता के अनुसार, सामान्य रूप से तैयार किए जाने वाले व्यंजनों के साथ उन खाद्य पदार्थों को भी शामिल किया जा सकता है, जो दिवंगत परिजन को पसंद थे। इनमें राजमा, छोले, कढ़ी और रबड़ी जैसे व्यंजन शामिल हो सकते हैं। इस तरह खीर, चावल, उड़द दाल के पकवान, पूड़ी, मौसमी सब्जी, फल और पसंदीदा पकवान मिलाकर भोग की थाली तैयार की जा सकती है।

    सर्वपितृ अमावस्या पर भोग बनाते समय भोजन की शुद्धता का विशेष ध्यान रखने की बात कही जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोजन में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस दिन शुद्ध सात्विक भोजन तैयार करने और श्रद्धापूर्वक उसे पूर्वजों को अर्पित करने पर जोर दिया जाता है। श्राद्ध की परंपरा में भोजन केवल खाद्य पदार्थों का संग्रह नहीं, बल्कि दिवंगत परिजनों के प्रति सम्मान और स्मरण का माध्यम भी माना जाता है। हालांकि, पितृ दोष से राहत और पितरों की कृपा से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। सर्वपितृ अमावस्या पर परिवार अपनी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध तथा भोग की विधि अपना सकते हैं।

  • पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध के लिए विशेष अवधि माना जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। इसे सोलह श्राद्ध या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के 16 दिनों में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान करने से पितृ दोष तथा पूर्वजों के ऋण से मुक्ति मिलती है और परिवार को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    पितृपक्ष के दौरान नई शुरुआत और मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ संस्कार जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसका कारण यह माना जाता है कि पितृपक्ष का पूरा समय पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए किए जाने वाले कर्मकांड को समर्पित रहना चाहिए।

    धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि पूर्वजों की पूजा में विधि और अनुष्ठान का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस अवधि में परिवार का ध्यान श्राद्ध कर्म और तर्पण पर केंद्रित रखने की परंपरा है। इसी वजह से उत्सव और मांगलिक आयोजनों को टालने की मान्यता प्रचलित है।

    पितृपक्ष में नई चीजें खरीदने को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं। इस दौरान रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी वस्तुएं खरीदने पर सामान्यतः रोक नहीं मानी जाती, लेकिन बड़ी खरीदारी से परहेज करने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नए कपड़े, गहने, वाहन, मकान-जमीन और लोहे से जुड़ी बड़ी वस्तुओं की खरीदारी को इस अवधि में शुभ नहीं माना जाता।

    नए कपड़ों को लेकर भी पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं कही जाती, लेकिन पितृपक्ष में सादे और सात्विक वस्त्र पहनने को उचित माना गया है। श्राद्ध और तर्पण के समय सफेद, हल्के पीले या अन्य हल्के रंग के कपड़े पहनने की परंपरा बताई गई है। इसका उद्देश्य इस अवधि की सादगी और धार्मिक एकाग्रता बनाए रखना माना जाता है।

    पितृपक्ष के दौरान भगवान विष्णु के चातुर्मास से जुड़ी मान्यता भी बताई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण चातुर्मास में भी कई प्रकार के मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा है।

    इसके अलावा पितृपक्ष के दौरान खान-पान और दैनिक व्यवहार को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। इस अवधि में सात्विक भोजन करने, मांस, मछली, अंडा, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई धार्मिक परंपराओं में लहसुन और प्याज से भी परहेज करने की बात कही गई है। बाल और दाढ़ी न कटाने की मान्यता भी कुछ परंपराओं में प्रचलित है।

    पितृपक्ष में घर का वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण रखने पर जोर दिया जाता है। झगड़े, अपशब्द और गलत व्यवहार से बचने की सलाह दी जाती है। पशु-पक्षियों और जरूरतमंद लोगों के प्रति भी संवेदनशील व्यवहार करने की मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस अवधि में विनम्रता, संयम और श्रद्धा के साथ पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए।

  • पितृ पक्ष 2026 कब से शुरू होगा? 26 सितंबर से श्राद्ध पक्ष, जानें पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी महत्वपूर्ण तिथियां

    पितृ पक्ष 2026 कब से शुरू होगा? 26 सितंबर से श्राद्ध पक्ष, जानें पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक सभी महत्वपूर्ण तिथियां

    नई दिल्ली ।पितृ पक्ष हिंदू धार्मिक परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस अवधि में परिवार अपने पितरों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन दिनों पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल तर्पण, अन्न अर्पण और दान-पुण्य किया जाता है। पारिवारिक परंपराओं के अनुसार श्राद्ध कर्म दोपहर के समय करने का विधान बताया गया है।

    साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध से होगी। इसके बाद अलग-अलग तिथियों के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध किया जाएगा। पितृ पक्ष की अवधि में प्रतिपदा से लेकर चतुर्दशी तक विभिन्न तिथियों पर श्राद्ध कर्म होंगे। वहीं, 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।

    पितृ पक्ष की शुरुआत पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध से होगी। 26 सितंबर को पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। इसके अगले दिन 27 सितंबर, रविवार को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध होगा। 28 सितंबर, सोमवार को द्वितीया और 29 सितंबर, मंगलवार को तृतीया तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाएगा।

    30 सितंबर, बुधवार को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध होगा। इसके बाद 1 अक्टूबर, गुरुवार को षष्ठी और 2 अक्टूबर, शुक्रवार को सप्तमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। 3 अक्टूबर, शनिवार को अष्टमी और 4 अक्टूबर, रविवार को नवमी तिथि के लिए श्राद्ध कर्म होगा।

    5 अक्टूबर, सोमवार को दशमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। 6 अक्टूबर, मंगलवार को एकादशी तिथि के श्राद्ध का दिन रहेगा। 7 अक्टूबर, बुधवार को द्वादशी तिथि के साथ मघा तिथि का श्राद्ध भी बताया गया है। इसके बाद 8 अक्टूबर, गुरुवार को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर, शुक्रवार को चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध होगा।

    पितृ पक्ष का अंतिम दिन 10 अक्टूबर, शनिवार को होगा। इस दिन अमावस्या तिथि पर सर्वपितृ अमावस्या का तर्पण और श्राद्ध किया जाएगा। धार्मिक परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी उपलब्ध नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।

    पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया परिवार की परंपरा और मान्यताओं के अनुसार की जाती है। सामान्य रूप से पितरों का मन में स्मरण करने के बाद जल तर्पण और अन्न का अर्पण किया जाता है। इसके बाद दान-पुण्य करने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में किए गए इन कर्मों का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करना है।

    इस तरह 2026 में पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। पूर्णिमा से आरंभ होने वाली यह अवधि सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगी। परिवार अपने पितरों की संबंधित तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण की परंपरा का पालन कर सकते हैं।