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  • भोपाल मॉडल डेथ केस: परिवार का हत्या का दावा, अग्रिम जमानत पर टिकी निगाहें, SIT जांच तेज

    भोपाल मॉडल डेथ केस: परिवार का हत्या का दावा, अग्रिम जमानत पर टिकी निगाहें, SIT जांच तेज

    भोपाल में मॉडल और साउथ इंडियन एक्ट्रेस ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। शादी के कुछ ही महीनों बाद सामने आई इस घटना ने न केवल उनके परिवार को सदमे में डाल दिया है, बल्कि पूरे शहर में भी चर्चा का माहौल बना दिया है। परिवार ने साफ तौर पर इसे आत्महत्या नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या बताया है और ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मामले में आरोपी पति समर्थ सिंह और उनकी मां पर भी आरोप लगाए गए हैं, जिससे यह केस और अधिक संवेदनशील हो गया है।

    परिवार का कहना है कि शादी के बाद से ही ट्विशा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच उनकी संदिग्ध मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा विवाद जांच प्रक्रिया को लेकर सामने आया है, जहां पोस्टमार्टम के दौरान वह बेल्ट उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसे कथित तौर पर घटना में इस्तेमाल किया गया बताया जा रहा है। बाद में उस बेल्ट को जांच के लिए भेजा गया, लेकिन तब तक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जांच प्रभावित हो चुकी थी।

    परिजनों ने इस पूरे मामले में पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शुरुआती जांच में गंभीर लापरवाही हुई है, जिससे साक्ष्यों के सही विश्लेषण में बाधा आई है। इसी आधार पर परिवार लगातार मामले की दोबारा जांच और उच्च स्तर की निगरानी की मांग कर रहा है। परिवार ने यह भी कहा है कि उन्हें न्याय मिलने तक वह शव लेने से इनकार कर रहे हैं।

    इस बीच, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच के लिए विशेष जांच दल गठित कर दिया गया है। वहीं, आरोपी पति की अग्रिम जमानत याचिका पर अदालत में सुनवाई होनी है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। परिवार इस याचिका का विरोध कर रहा है और जमानत रद्द करने की मांग कर रहा है।

    परिवार ने यह भी मांग की है कि मामले का दोबारा पोस्टमार्टम दिल्ली के एम्स में कराया जाए ताकि मौत के कारणों को लेकर कोई संदेह न रहे। साथ ही वे इस केस को किसी अन्य राज्य में ट्रांसफर करने की भी अपील कर रहे हैं, ताकि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके।

    इस पूरे प्रकरण ने न केवल कानूनी और जांच प्रणाली को सवालों के घेरे में खड़ा किया है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर लगातार बहस जारी है। परिवार न्याय की मांग को लेकर लगातार आवाज उठा रहा है, जबकि पुलिस और जांच एजेंसियां मामले की हर कड़ी को जोड़ने में जुटी हुई हैं।

  • कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत, विदेश यात्रा पर रोक सहित कई शर्तें लागू

    कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत, विदेश यात्रा पर रोक सहित कई शर्तें लागू

    नई दिल्ली। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। मानहानि और कथित गलत आरोपों से जुड़े एक मामले में अदालत ने उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है, हालांकि इसके साथ कई सख्त शर्तें भी लगाई गई हैं। यह मामला असम के मुख्यमंत्री की पत्नी पर लगाए गए आरोपों से जुड़ा हुआ है, जिसमें कथित रूप से विदेशी संपत्तियों और पासपोर्ट को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था।

    सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पवन खेड़ा को राहत दी जा सकती है, लेकिन जांच प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा न आए, इसके लिए कुछ आवश्यक शर्तें लागू करना जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जांच में पूरा सहयोग करना होगा और आवश्यकता पड़ने पर जांच अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होना होगा।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पवन खेड़ा किसी भी तरह से साक्ष्यों को प्रभावित करने या जांच में हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं करेंगे। इसके साथ ही उन्हें यह अनुमति नहीं होगी कि वे बिना संबंधित अदालत की अनुमति के देश से बाहर यात्रा करें। यह शर्त इस उद्देश्य से लगाई गई है ताकि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के पूरी हो सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत की कुछ टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए। अदालत का मानना था कि उपलब्ध तथ्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया गया और कुछ टिप्पणियां ऐसी थीं जो आरोपी पर अनावश्यक रूप से भार डालती प्रतीत होती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी स्पष्ट कानूनी आधार के बिना निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जा सकता।

    यह मामला उस समय शुरू हुआ था जब मुख्यमंत्री की पत्नी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से गलत और भ्रामक जानकारी फैलाई गई है, जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है। इसके बाद यह मामला कानूनी प्रक्रिया में चला गया और विभिन्न स्तरों पर इसकी सुनवाई होती रही।

    इससे पहले पवन खेड़ा को कुछ समय के लिए ट्रांजिट अग्रिम जमानत भी मिली थी, लेकिन बाद में उस पर रोक से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया सामने आई। इसके बाद मामला उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अंतिम रूप से अग्रिम जमानत पर फैसला सुनाया गया।

    सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब पवन खेड़ा को राहत तो मिल गई है, लेकिन जांच प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। उन्हें आगे भी जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करना होगा और अदालत द्वारा तय की गई शर्तों का पालन करना अनिवार्य रहेगा।

    यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां एक तरफ इसे अभिव्यक्ति और आरोपों के संदर्भ में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे कानूनी प्रक्रिया और जांच की निष्पक्षता से जोड़ा जा रहा है। अब आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों और अदालत की आगामी सुनवाई पर निर्भर करेगी।

  • कानूनी मुश्किलें बढ़ीं: पवन खेड़ा की जमानत याचिका कोर्ट ने नहीं मानी..

    कानूनी मुश्किलें बढ़ीं: पवन खेड़ा की जमानत याचिका कोर्ट ने नहीं मानी..


    नई दिल्ली।कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को बड़ा कानूनी झटका लगा है, जहां गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री से जुड़े विवादित बयानों और उनकी पत्नी पर लगाए गए आरोपों से संबंधित है, जिसके बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। इसी एफआईआर से बचाव के लिए पवन खेड़ा ने अदालत में अग्रिम जमानत की मांग की थी, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल सकी।

    यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने एक सार्वजनिक बयान में मुख्यमंत्री की पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए थे। इन आरोपों में विदेशों में संपत्ति और कई देशों के पासपोर्ट रखने जैसे दावे शामिल थे। बयान के बाद संबंधित पक्ष की ओर से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और मामला कानूनी रूप से आगे बढ़ गया।

    एफआईआर दर्ज होने के बाद पवन खेड़ा ने गिरफ्तारी से बचने के लिए कानूनी रास्ता अपनाते हुए अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी। इससे पहले उन्हें कुछ स्तर पर अस्थायी राहत भी मिली थी, लेकिन बाद में वह राहत आगे नहीं बढ़ सकी। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी कानूनी स्थिति और कठिन हो गई है।

    इस निर्णय के बाद उनके खिलाफ जांच और संभावित कार्रवाई की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। अब यह मामला पूरी तरह जांच और आगे की कानूनी कार्यवाही पर निर्भर करेगा। दूसरी ओर, इस फैसले को लेकर राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। एक पक्ष इसे कानूनी प्रक्रिया बता रहा है, जबकि दूसरा इसे राजनीतिक विवाद से जोड़कर देख रहा है।

    फिलहाल, सभी की नजर इस बात पर है कि आगे पवन खेड़ा क्या कदम उठाते हैं और क्या वे ऊपरी अदालत में राहत के लिए फिर से अपील करते हैं या जांच प्रक्रिया का सामना करते हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट सख्त: पवन खेड़ा की ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक, तीन हफ्ते में जवाब तलब

    सुप्रीम कोर्ट सख्त: पवन खेड़ा की ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक, तीन हफ्ते में जवाब तलब


    नई दिल्ली।
    पवन खेड़ा को तेलंगाना हाई कोर्ट से मिली ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने कांग्रेस नेता को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

    न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश असम सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिका में तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा दी गई एक सप्ताह की ट्रांजिट बेल को चुनौती दी गई थी।

    कोर्ट का स्पष्ट निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि फिलहाल ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक रहेगी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पवन खेड़ा असम की सक्षम अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो इस आदेश से उस प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।

    असम सरकार की दलील

    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि इस मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट को सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि एफआईआर और कथित अपराध दोनों असम में दर्ज हुए हैं। उन्होंने इसे ‘फोरम शॉपिंग’ बताते हुए कानून के दुरुपयोग का आरोप लगाया।

    क्या है पूरा मामला

    यह विवाद हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भूयान सरमा को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा है। असम पुलिस ने पवन खेड़ा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जिनमें मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप शामिल हैं।

    खेड़ा का पक्ष

    खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है और अधिकतम मानहानि का मामला बनता है, जिसमें गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है।

    पहले क्या हुआ था

    तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 10 अप्रैल को खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी, ताकि वे संबंधित अदालत में नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकें। इसी आदेश को चुनौती देते हुए असम सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।

    राजनीतिक माहौल गर्म

    इस मामले ने राज्य की सियासत को भी गरमा दिया है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया है, जबकि बीजेपी ने खेड़ा के बयान को गैरजिम्मेदार और मानहानिकारक करार दिया है।

  • नोएडा: गड्ढे में गिरकर इंजीनियर की मौत का मामला, बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत

    नोएडा: गड्ढे में गिरकर इंजीनियर की मौत का मामला, बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत


    नई दिल्ली । नोएडा में इंजीनियर युवराज की मौत का मामला नोएडा सेक्टर-150 स्थित टी प्वाइंट के पास पानी से भरे गड्ढे में कार सहित गिरने से सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत के मामले में सत्र अदालत ने बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत दे दी है. जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल श्रीवास्तव की अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि प्रथम दृष्टया आरोपी की प्रत्यक्ष या सचेत भूमिका स्थापित करने वाला ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है और उसकी कस्टोडियल पूछताछ आवश्यक प्रतीत नहीं होती. हालांकि अदालत ने कहा कि वह बिना न्यायालय की अनुमति के देश नहीं छोड़ेंगे और जांच में सहयोग करेंगे.

    बचाव पक्ष की दलील

    आरोपी के अधिवक्ता एवं जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज भाटी बोड़ाकी व सचिव शोभाराम चंदीला ने अदालत में दलील दी कि आरोपी एक प्रतिष्ठित व्यवसायी और डेवलपर हैं. FIR में उनका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है और न ही किसी प्रत्यक्ष कृत्य का उल्लेख है. वह संबंधित कंपनी के निदेशक या की-मैनेजरियल पर्सन नहीं रहे हैं. कंपनी के शेयरों का बड़ा हिस्सा पहले ही अन्य कंपनी को हस्तांतरित किया जा चुका था. निर्माण स्थल पर दो वर्ष से अधिक समय से नोएडा प्राधिकरण द्वारा रोक लगी हुई थी.

    अदालत ने क्या पाया

    सत्र अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह स्थापित नहीं होता कि आरोपी का विवादित भूमि पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था. आरोपी के विरुद्ध किसी आपत्तिजनक वस्तु की बरामदगी प्रस्तावित नहीं है. संबंधित दस्तावेज प्राधिकरण या जांच एजेंसी के पास उपलब्ध हैं, जिनके लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं.

    प्राधिकरण द्वारा लगी थी रोक

    घटना से पूर्व नोएडा प्राधिकरण द्वारा निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई गई थी. अदालत ने कहा कि कॉर्पोरेट संरचना, लीज, सब-लीज, शेयर ट्रांसफर और MOU जैसे लेन-देन के मामलों में केवल स्वामित्व संबंध के आधार पर आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता. अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी कंपनी के प्रमोटर हैं और इस नाते जिम्मेदार हैं. लेकिन अदालत ने कहा कि प्रमोटर शब्द की स्पष्ट कानूनी परिभाषा और दायित्व का निर्धारण रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों से स्थापित नहीं होता.

    जलभराव की समस्या

    अदालत ने यह भी नोट किया कि जलभराव की समस्या को लेकर विजटाउन प्लानर्स द्वारा 2022 में आवेदन दिया गया था और सिंचाई विभाग द्वारा 2023 में जलनिकासी के लिए प्रस्ताव रखा गया था. नोएडा प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में 18 जनवरी 2021 को संबंधित भूखंड पर निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गई थी, जो जनवरी 2026 में हटाई गई. जब निर्माण और विकास कार्य पर वैधानिक रोक लागू थी, तब जलनिकासी या अन्य निर्माणात्मक हस्तक्षेप सीमित हो सकते थे.

    ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना कि आरोपी ने जानबूझकर पानी जमा रहने दिया, इस स्तर पर उचित नहीं है. तथ्यों, आरोपों की प्रकृति, प्रथम दृष्टया भूमिका के अभाव और कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता न होने को देखते हुए अदालत ने निर्मल सिंह की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली.