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  • 38 साल बाद भी बरकरार है इस सदाबहार गीत का जादू, शादी-ब्याह की हर रस्म में आज भी गूंजती है इसकी धुन

    38 साल बाद भी बरकरार है इस सदाबहार गीत का जादू, शादी-ब्याह की हर रस्म में आज भी गूंजती है इसकी धुन

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के कई गीत समय के साथ केवल फिल्मी संगीत तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा बन जाते हैं। वर्ष 1988 में रिलीज हुई फिल्म ‘गंगा जमुना सरस्वती’ का लोकप्रिय गीत ‘साजन मेरा उस पार है’ भी ऐसे ही सदाबहार गीतों में शामिल है। रिलीज के करीब 38 वर्ष बाद भी यह गीत शादी-ब्याह, हल्दी, मेहंदी और महिला संगीत जैसे पारिवारिक आयोजनों में पूरे उत्साह के साथ गाया और बजाया जाता है।

    इस गीत को अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि पर फिल्माया गया था, जो उस समय लगभग 24 वर्ष की थीं। उनके सहज अभिनय, पारंपरिक अंदाज और भावपूर्ण प्रस्तुति ने गीत को विशेष पहचान दिलाई। यही कारण है कि यह गीत केवल फिल्म का हिस्सा बनकर नहीं रह गया, बल्कि भारतीय शादियों की लोकप्रिय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन गया।

    ‘गंगा जमुना सरस्वती’ में अमिताभ बच्चन, मीनाक्षी शेषाद्रि, जया प्रदा और मिथुन चक्रवर्ती जैसे बड़े कलाकार मुख्य भूमिकाओं में दिखाई दिए थे। फिल्म को लेकर दर्शकों और समीक्षकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं, लेकिन इसके इस गीत को शुरुआत से ही व्यापक लोकप्रियता मिली। समय बीतने के बावजूद इसकी लोकप्रियता में कोई खास कमी नहीं आई और यह आज भी नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बनाए हुए है।

    गीत को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज दी थी। संगीतकार अनु मलिक ने इसकी धुन तैयार की, जबकि इसके बोल गीतकार इंद्रवीर ने लिखे थे। गीत की सरल भाषा, लोक संगीत से प्रेरित धुन और पारंपरिक माहौल इसे अन्य विवाह गीतों से अलग पहचान दिलाते हैं। यही वजह है कि यह गीत वर्षों बाद भी लोगों की पसंद बना हुआ है।

    बदलते समय के साथ शादी समारोहों में डीजे, रीमिक्स और आधुनिक वेडिंग सॉन्ग्स का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके बावजूद ‘साजन मेरा उस पार है’ की लोकप्रियता पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। विशेष रूप से गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में महिला संगीत की महफिलों में यह गीत आज भी पूरे उत्साह के साथ गाया जाता है। कई परिवारों में विवाह समारोह की शुरुआत इसी गीत से करने की परंपरा अब भी देखने को मिलती है।

    इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी मानी जाती है। ढोलक की पारंपरिक थाप के साथ गाया जाने वाला यह गीत महिलाओं को सहज रूप से जोड़ देता है। इसमें न केवल विवाह की खुशी झलकती है, बल्कि पारिवारिक अपनापन और भारतीय लोक संस्कृति की मिठास भी महसूस होती है। यही कारण है कि यह गीत अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों को समान रूप से आकर्षित करता है।

    संगीत विशेषज्ञों का भी मानना है कि कुछ गीत अपनी धुन, भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण समय की सीमाओं से आगे निकल जाते हैं। ‘साजन मेरा उस पार है’ भी उन्हीं गीतों में गिना जाता है जिसने दशकों बाद भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है। आज भी जब शादी समारोहों में ढोलक की थाप सुनाई देती है तो यह गीत स्वतः लोगों की जुबान पर आ जाता है और पूरे माहौल को उत्सवमय बना देता है।

  • 30 साल बाद भी कायम है ‘दिल की तन्हाई’ का जादू, शाहरुख खान और रम्या कृष्णन का यह गीत आज भी है यादगार

    30 साल बाद भी कायम है ‘दिल की तन्हाई’ का जादू, शाहरुख खान और रम्या कृष्णन का यह गीत आज भी है यादगार

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय गीतों में शामिल ‘दिल की तन्हाई’ ने अपनी रिलीज के तीन दशक पूरे कर लिए हैं। वर्ष 1996 में आई फिल्म ‘चाहत’ का यह भावनात्मक गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बना हुआ है। इस अवसर पर फिल्म के संगीतकार अनु मलिक ने पुराने दिनों को याद करते हुए अभिनेता शाहरुख खान के अभिनय, उनकी भाव-भंगिमाओं और गीत की स्थायी लोकप्रियता की सराहना की। सोशल मीडिया पर साझा किए गए उनके संदेश ने एक बार फिर इस गीत को चर्चा का विषय बना दिया है।

    अनु मलिक ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर ‘दिल की तन्हाई’ गीत का एक वीडियो साझा करते हुए लिखा कि शाहरुख खान के प्रभावशाली अभिनय और भावनात्मक अभिव्यक्तियों ने इस गीत को एक अलग पहचान दी। उन्होंने कहा कि अभिनेता ने अपने प्रदर्शन से गीत की संवेदनाओं को और गहराई प्रदान की, जिसकी वजह से यह आज भी दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाए हुए है। उन्होंने यह भी कहा कि समय बदलने के बावजूद इस गीत की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

    संगीतकार ने फिल्म के निर्देशक महेश भट्ट की भी प्रशंसा करते हुए कहा कि वे मानवीय भावनाओं को समझने और उन्हें प्रभावी ढंग से पर्दे पर प्रस्तुत करने की विशेष क्षमता रखते थे। उनके अनुसार, ‘चाहत’ में संगीत और कहानी का तालमेल ही इस गीत की सबसे बड़ी ताकत बना। अनु मलिक ने यह भी माना कि भावनात्मक विषयों पर आधारित गीतों को यादगार बनाने में निर्देशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    उन्होंने गीत के गायक कुमार सानू के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। अनु मलिक ने कहा कि कुमार सानू की आवाज ने ‘दिल की तन्हाई’ को ऐसी भावनात्मक गहराई दी, जिसने इसे लंबे समय तक श्रोताओं की यादों में जीवित रखा। उनका मानना है कि कुछ गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि लोगों की व्यक्तिगत यादों और भावनाओं का हिस्सा बन जाते हैं और यह गीत भी उन्हीं में से एक है।

    वर्ष 1996 में रिलीज हुई फिल्म ‘चाहत’ में शाहरुख खान, पूजा भट्ट, नसीरुद्दीन शाह, रम्या कृष्णन और अनुपम खेर ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। फिल्म में शाहरुख खान ने रूप सिंह राठौड़ का किरदार निभाया था, जबकि पूजा भट्ट उनकी प्रेमिका की भूमिका में नजर आई थीं। वहीं रम्या कृष्णन ने भी अपनी दमदार उपस्थिति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। बाद के वर्षों में ‘बाहुबली’ श्रृंखला में शिवगामी देवी की भूमिका निभाकर रम्या कृष्णन को नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी व्यापक पहचान मिली।

    ‘चाहत’ अपने संगीत, भावनात्मक कहानी और कलाकारों के अभिनय के कारण उस दौर की चर्चित फिल्मों में गिनी जाती है। इसके गीतों ने फिल्म की लोकप्रियता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। विशेष रूप से ‘दिल की तन्हाई’ को उन गीतों में शामिल किया जाता है, जिन्हें आज भी रेडियो, डिजिटल प्लेटफॉर्म और संगीत कार्यक्रमों में पसंद किया जाता है। इसकी धुन, बोल और प्रस्तुति ने इसे समय के साथ भी प्रासंगिक बनाए रखा है।

    फिल्म से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि वर्ष 2013 में शाहरुख खान की प्रोडक्शन कंपनी ने इसके अधिकार अपने पास ले लिए थे। इसके अलावा फिल्म की कहानी से प्रेरित होकर ओड़िया भाषा में भी इसका रीमेक बनाया गया था। तीन दशक बाद भी ‘दिल की तन्हाई’ की लोकप्रियता यह साबित करती है कि बेहतरीन संगीत, सशक्त अभिनय और प्रभावशाली प्रस्तुति समय की सीमाओं से परे जाकर दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखती है।