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  • 100 फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी देने पर SC ने सरकार से पूछा-कैसे करेंगे सप्लाई?

    100 फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी देने पर SC ने सरकार से पूछा-कैसे करेंगे सप्लाई?


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को सरकार (Government) से पूछा कि अगर 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों (ई-100) को अनुमति दी गई है, तो ईधन (100% Ethanol Fuel) की सप्लाई कैसे की जाएगी। ‘एथनॉल सप्लाई ईयर’ (ईएसवाई) 2025-26 (‘Ethanol Supply Year’ (ESY) 2025-26) के लिए एथेनॉल आवंटन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मुद्दे पर हाल ही में आई मीडिया रिपोर्टों का जिक्र किया।

    इस दौरान जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि हाल ही में हमने कुछ अखबारों की रिपोर्ट देखीं, जिनमें कहा गया है कि 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है। पीठ ने पूछा कि हम बस यह जानना चाहते हैं कि अगर 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है, तो आप इनकी सप्लाई कैसे करेंगे?


    ई-100 को मिली है मंजूरी

    इस पर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर विनिर्माण व्यवस्था में बदलाव करने होंगे। गौरतलब है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 26 अक्टूबर को केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन अधिसूचित किया था। इसके तहत ई100 यानी लगभग शुद्ध एथनॉल से चलने वाले वाहनों को भी नियमों में शामिल किया गया है। इससे पहले ई-85 जैसे अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन से चलने वाले वाहनों का प्रावधान था।


    क्या कह रही सरकार?

    हालांकि, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 27 अक्टूबर को कहा था कि सरकार की पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण मौजूदा 20 प्रतिशत से तत्काल आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने किसानों को सशक्त बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि इस मुद्दे को व्यापक जनहित और पर्यावरण के नजरिये से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी, खासकर गांवों में रहने वाले किसानों के हितों पर भी ध्यान देना होगा।


    किसानों से की जाएगी बात

    जस्टिस सुंदरेश ने कहा, ”देश की बड़ी आबादी के नजरिये से तीसरा पहलू, जो मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगता है, वह किसान हैं। हमें इस पहलू पर ध्यान देना होगा कि किसानों को किस तरह सशक्त बनाया जाए। इस पर कोई भी बात नहीं कर रहा है।” इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वह मामले में अपनी दलीलों के दौरान किसानों से जुड़े मुद्दे पर भी बात करेंगे। शीर्ष अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई अगले महीने के लिए टाल दी गई। बता दें कि उच्चतम न्यायालय 2025-26 के एथनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए आवंटन बढ़ाने से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा है।

  • E-20 के बाद सौ फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी…. जानें किन वाहनों में होगा इस्तेमाल?

    E-20 के बाद सौ फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी…. जानें किन वाहनों में होगा इस्तेमाल?


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) ने सौ फीसदी एथनॉल (Ethanol) (E-100) वाले ईंधन को मंजूरी दे दी है। इस ईंधन को सिर्फ उन्हीं गाड़ियों में इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिन्हें खासतौर पर ई-100 फ्यूल (E-100 fuel) से चलने के लिए बनाया हो। यह नियम अन्य वाहनों पर लागू नहीं होगा। ई-20 या सामान्य पेट्रोल से चलने वाले वाहन ई-85 या ई-100 ईंधन का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसके साथ ही सरकार ने पेट्रोल और डीजल (Petrol and Diesel) से चलने वाले हल्के वाहनों के लिए वजन की सीमा तीन हजार से बढ़ाकर 3,500 किलोग्राम कर दी है। नए नियमों से ऐसी कारों की टेस्टिंग और उन्हें चलाने की मंजूरी मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

    केंद्र ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम-1989 में संशोधन की अधिसूचना जारी की है। इसके अनुसार, केंद्र ने फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के लिए निर्धारित उत्सर्जन मानकों में ई-85 के साथ ई-100 को शामिल किया है। सड़क परिवहन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ई-20 से अधिक और ई-100 तक के ईंधन का इस्तेमाल केवल उन्हीं वाहनों में किया जा सकेगा, जिन्हें इसके लिए डिजाइन और प्रमाणित किया गया है।


    कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की कवायद

    सरकार कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दे रही। ई-20 की शुरुआत पहले हो चुकी है। बता दें कि ऑटोमोबाइल कंपनी मारुति सुजुकी ने इस साल जून में देश का पहला फ्लेक्स-फ्यूल यात्री वाहन पेश किया था।


    क्या होते हैं फ्लेक्स-फ्यूल वाहन?

    फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को ई-85 (85 प्रतिशत एथनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल) जबकि ई-100 (लगभग 100 फीसदी एथनॉल) जैसे अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधनों पर चलने के लिए बनाया जाता है। इसके विपरीत, सामान्य पेट्रोल वाहनों को कम मात्रा में एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन के इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी जाती है।


    ई-100 ईंधन के इस्तेमाल से क्या लाभ होगा?

    ई-100 के इसके इस्तेमाल से गाड़ियों से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन में भारी कमी आएगी। एथनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से कच्चे तेल पर निर्भरता घटेगी। एथनॉल के बढ़ते इस्तेमाल से देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।


    क्या होता है ई-100 ईंधन और कैसे बनता है?

    ई-100 100 फीसदी शुद्ध एथनॉल ईंधन है। एथनॉल मुख्य रूप से पौधों, गन्ना और मक्का से तैयार किया जाने वाला एक बायोफ्यूल है। इसमें पेट्रोल नहीं मिलाया जाता है। ईंधन इस तरह से तैयार किया जाता है कि वाहन के इंजन को कोई नुकसान नहीं होता है।


    नए नियम का मौजूदा कार मालिकों पर क्या असर होगा?

    ई-100 ईंधन की उपलब्धता से मौजूदा कार मालिकों को अपने वाहनों में बदलाव करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, सामान्य पेट्रोल कार में ई-100 डालने से पहले निर्माता की सलाह और इंजन की अनुकूलता जांचना जरूरी है।


    फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक क्या है और कैसे काम करती है?

    फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक वाली गाड़ियां पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले मिश्रण से चल सकती हैं। इनमें इंजन और इसे ऐसे डिजाइन किया जाता है कि वे ईंधन के अनुपात के अनुसार काम कर सकें। ई-100 के लिए विशेष अनुकूलता जरूरी है।


    दुनिया में और कहां फ्लेक्स-फ्यूल इस्तेमाल हो रहा?

    अमेरिका और ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का व्यापक इस्तेमाल होता है। ब्राजील में एथनॉल आधारित ईंधन खासा लोकप्रिय है।

    एथनॉल के लिए क्या इंजन में बदलाव होता है?
    ईंधन पंप, पाइप, सील और इंजेक्टर जैसे पुर्जों को एथेनॉल के अनुकूल बनाया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम भी ईंधन के अनुपात के अनुसार इंजन का संचालन करता है।


    एथनॉल की ऑक्टेन रेटिंग कैसी होती है?

    एथनॉल की ऑक्टेन रेटिंग अधिक होती है, जिससे इंजन में अनियंत्रित दहन की आशंका कम होती है। विशेष रूप से तैयार इंजन इसका बेहतर लाभ उठा सकता है।

    एथनॉल मिश्रित ईंधन की चुनौतियां क्या हैं?
    एथनॉल में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर ऊर्जा कम होती है, जिससे माइलेज घट सकता है। यह कुछ धातुओं, प्लास्टिक और रबर के पुर्जों को भी प्रभावित कर सकता है।

  • शिवपुरी नगर पालिका में सात महीने से सम्मेलन नहीं, आपसी खींचतान में करोड़ों के विकास कार्य अटके

    शिवपुरी नगर पालिका में सात महीने से सम्मेलन नहीं, आपसी खींचतान में करोड़ों के विकास कार्य अटके


    शिवपुरी: शहर में नगर पालिका परिषद का सम्मेलन लंबे समय से नहीं होने के कारण विकास कार्यों की मंजूरी और प्रशासनिक फैसलों पर असर पड़ रहा है। नियमानुसार नगर पालिका का साधारण सम्मेलन प्रत्येक दो महीने में आयोजित किया जाना चाहिए, लेकिन शिवपुरी में पिछले सात महीनों से परिषद की बैठक नहीं हुई है। इस स्थिति में शहर से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकृति के इंतजार में हैं। नगर पालिका अध्यक्ष और मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) सम्मेलन आयोजित करने के लिए एक-दूसरे को पत्र लिखने की बात कह रहे हैं, लेकिन बैठक की तारीख अब तक तय नहीं हो सकी है।

    नगर पालिका में सम्मेलन नहीं होने की प्रमुख वजह अध्यक्ष और 20 से अधिक विरोधी पार्षदों के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद बताया जा रहा है। पार्षदों और अध्यक्ष के बीच कुछ मुद्दों पर करीब दो साल से मतभेद हैं। परिषद की बैठकों के दौरान विरोधी पार्षदों के हंगामे और पहले हुए बहिष्कार के कारण भी बैठक आयोजित करने को लेकर मुश्किलें सामने आती रही हैं। इसी राजनीतिक खींचतान के बीच शहर के विकास से जुड़े प्रस्ताव लंबित हैं।

    नगर पालिका के सीएमओ यशवंत राठौर जुलाई में पदस्थ हुए थे। उनके मुताबिक, परिषद सम्मेलन का एजेंडा तैयार कर लिया गया है और बैठक आयोजित करने के संबंध में अध्यक्ष को पत्र भी भेजे जा चुके हैं। उन्होंने जल्द सम्मेलन कराने की बात कही है। दूसरी ओर, नगर पालिका अध्यक्ष का कहना है कि वह सीएमओ को तीन बार पत्र लिखकर सम्मेलन आयोजित करने के लिए कह चुकी हैं। अध्यक्ष के अनुसार, एजेंडे के कुछ बिंदु भी निर्धारित किए जा चुके हैं और उनकी ओर से बैठक बुलाने में कोई बाधा नहीं है। इस तरह दोनों पक्ष सम्मेलन में देरी के लिए अलग-अलग जिम्मेदारी बता रहे हैं।

    प्रस्तावित सम्मेलन में शहर की पेयजल व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। मड़ीखेड़ा और सतनवाड़ा फिल्टर प्लांट के लिए तीन-तीन मोटरों की दरों को स्वीकृति देने का प्रस्ताव एजेंडे में रखा गया है। इनमें से एक फिल्टर प्लांट की तीन मोटरें आ चुकी हैं और अब उनके संबंध में नगर पालिका से स्वीकृति ली जानी है। इसके अतिरिक्त बस स्टैंड के संचालन के लिए ठेका देने से संबंधित प्रस्ताव भी विचार के लिए रखा गया है।

    वार्ड नंबर 29, 30 और 35 में पानी की टंकियों के निर्माण पर हुए व्यय से संबंधित प्रस्ताव भी सम्मेलन में शामिल किए जाने हैं। शहर में बाजार बैठक की वसूली, सफाई व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए दो नई जेसीबी मशीनों की खरीद तथा दो नए डंपर और एक पोकलेन मशीन खरीदने के लिए प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति के मुद्दे भी लंबित एजेंडे का हिस्सा हैं। इन प्रस्तावों पर निर्णय होने से नगर पालिका के संसाधनों और शहर की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    इसके अलावा वर्ष 2026-27 में आयोजित होने वाले सिद्धेश्वर वाणगंगा मेले, गांधी पार्क मेले और अन्य मेलों के आयोजन पर भी परिषद में विचार किया जाना है। इन सभी प्रस्तावों पर निर्णय के लिए सम्मेलन आवश्यक है। नगर पालिका में कुछ कार्य बिना पूर्व स्वीकृति के किए जाने और बाद में उनकी मंजूरी लेने की स्थिति भी सामने आई है। इससे परिषद की नियमित बैठक और निर्धारित प्रक्रिया के पालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    नगर पालिका परिषद के वर्तमान कार्यकाल में करीब दस महीने शेष बताए गए हैं। ऐसे में लंबित प्रस्तावों पर निर्णय लेने और विकास कार्यों को गति देने के लिए परिषद तथा पीआईसी की बैठकें समय पर आयोजित करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सम्मेलन में लगातार देरी जारी रहने पर शहर की पेयजल व्यवस्था, सफाई, परिवहन सुविधाओं और अन्य विकास योजनाओं से जुड़े फैसले प्रभावित हो सकते हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि अध्यक्ष और सीएमओ के बीच पत्राचार के बाद परिषद की बैठक कब आयोजित होती है और लंबित प्रस्तावों पर कब निर्णय लिया जाता है।

  • गुजरात सरकार ने टेंडर वैलिडेशन अवधि 120 से घटाकर 90 दिन की, मंजूरी प्रक्रिया के लिए 51 और 66 दिन की समय-सीमा तय

    गुजरात सरकार ने टेंडर वैलिडेशन अवधि 120 से घटाकर 90 दिन की, मंजूरी प्रक्रिया के लिए 51 और 66 दिन की समय-सीमा तय

    नई दिल्ली । गुजरात सरकार ने विकास और निर्माण कार्यों से जुड़े टेंडर की मंजूरी प्रक्रिया में बदलाव करते हुए वैलिडेशन की अवधि 120 दिन से घटाकर 90 दिन कर दी है। नई व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक स्तर पर होने वाली देरी को कम करना और सड़क, पुल तथा सरकारी भवनों जैसी विकास परियोजनाओं को निर्धारित समय के भीतर शुरू करना है।

    नई व्यवस्था के तहत केवल फाइनेंशियल बिड वाले टेंडर की पूरी मंजूरी प्रक्रिया अधिकतम 51 दिनों में पूरी करनी होगी। वहीं जिन टेंडर में तकनीकी और वित्तीय दोनों स्तरों पर जांच की जरूरत होगी, उनके लिए अधिकतम 66 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है।

    जिन मामलों में ठेकेदारों की प्री-क्वालिफिकेशन की आवश्यकता नहीं है और केवल फाइनेंशियल बिड शामिल है, उनमें फील्ड या क्षेत्रीय कार्यालय से लेकर सचिवालय और वित्त विभाग तक की पूरी प्रक्रिया 51 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी। इसका उद्देश्य अलग-अलग प्रशासनिक स्तरों पर फाइलों के लंबित रहने की स्थिति को कम करना है।

    प्री-क्वालिफिकेशन वाले टेंडर में प्रक्रिया अपेक्षाकृत विस्तृत होगी। ऐसे मामलों में तकनीकी और वित्तीय दोनों बिड की जांच की जाती है। इसके लिए संबंधित कार्यालयों और प्रशासनिक स्तरों पर होने वाली पूरी प्रक्रिया को अधिकतम 66 दिनों में पूरा करने की समय-सीमा तय की गई है।

    सरकार ने टेंडर प्रक्रिया के दौरान होने वाली बातचीत यानी नेगोशिएशन को भी सीमित करने का निर्णय लिया है। निर्धारित नियमों के अनुसार व्यापक प्रचार के बाद यदि एक से अधिक टेंडर प्राप्त होते हैं, तो सामान्य परिस्थितियों में बातचीत से बचा जाएगा। केवल आवश्यकता महसूस होने पर ही नेगोशिएशन किया जा सकेगा।

    यदि बातचीत आवश्यक होती है तो इसे केवल एक स्तर पर सक्षम अधिकारी के स्तर पर किए जाने की व्यवस्था होगी। कई प्रशासनिक स्तरों पर बातचीत की अनुमति नहीं होगी। इससे टेंडर प्रक्रिया में लगने वाले अतिरिक्त समय को कम करने का प्रयास किया गया है।

    नई व्यवस्था में तय समय-सीमा का पालन नहीं होने की स्थिति में जवाबदेही निर्धारित करने का भी प्रावधान किया गया है। यदि किसी प्रस्ताव पर निर्धारित अवधि के भीतर कार्रवाई नहीं होती है तो देरी के कारणों को संबंधित स्तर पर दर्ज करना होगा। साथ ही देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही भी तय की जाएगी।

    यदि किसी प्रस्ताव के अधूरे होने के कारण प्रक्रिया में देरी होती है तो इसकी जिम्मेदारी उस स्तर की होगी जहां से प्रस्ताव आगे भेजा गया था। इस प्रावधान का उद्देश्य टेंडर से जुड़ी फाइलों और प्रस्तावों को पूरा करके समय पर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है।

    ये बदलाव विभिन्न विकास और निर्माण कार्यों से जुड़े टेंडरों पर लागू होंगे। इनमें सड़क, पुल और सरकारी भवनों सहित अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शामिल हैं। सरकार के अनुसार निर्धारित समय-सीमा के कारण टेंडर मंजूरी की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ सकेगी।

    नई व्यवस्था के तहत टेंडर की वैलिडिटी अवधि घटाकर 90 दिन किए जाने के साथ मंजूरी के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की गई है। इससे परियोजनाओं की प्रशासनिक प्रक्रिया को लंबा खिंचने से रोकने और निर्माण कार्यों को तय कार्यक्रम के अनुसार शुरू करने पर जोर दिया गया है।

    सरकार का कहना है कि समयबद्ध टेंडर मंजूरी से प्रशासनिक देरी कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही सड़क, पुल और अन्य सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पूरा होने के बाद नागरिकों को संबंधित सुविधाओं और सेवाओं का लाभ जल्द उपलब्ध कराने में भी सहायता मिलेगी।

  • कैबिनेट: मप्र के सर्वांगीण विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए 2 हजार 480 करोड़ स्वीकृति

    कैबिनेट: मप्र के सर्वांगीण विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए 2 हजार 480 करोड़ स्वीकृति


    भोपाल । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक मंगलवार को मंत्रालय में सम्पन्न हुई। मंत्रि-परिषद की बैठक में प्रदेश के सर्वांगीण विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और जनकल्याण को गति देने के लिए लगभग 2 हजार 480 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति दी गई। बैठक में खेल गतिविधियों, सिंचाई, महिला सशक्तिकरण, सूचना प्रौद्योगिकी और किसान कल्याण से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णयों पर मुहर लगाई गई।

    प्रमुख निर्णयों में अक्टूबर 2026 में भोपाल में ‘महिला एशियन हॉकी चैम्पियन्स ट्रॉफी’ के भव्य आयोजन के लिए 18 करोड़ 74 लाख रुपये की सैद्धांतिक स्वीकृति दी गई, जिससे राज्य की खेल अवसंरचना और पर्यटन को वैश्विक पहचान मिलेगी। कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिए रिहन्द एवं मल्हारगढ़ सिंचाई परियोजनाओं और किसानों को समर्थन मूल्य पर बोनस भुगतान योजना की निरंतरता को मंजूरी मिली। प्रदेश को तकनीकी रूप से अग्रणी बनाने के उद्देश्य से आईआईएसईआर (IISER) भोपाल में ड्रोन टेक्नोलॉजी आधारित ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ और आईटी पार्कों के विकास के लिए 857 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। इन निर्णय में आई टी पार्क की स्थापना के वर्ष 2031 तक संचालन की निरंतरता की स्वीकृति महत्वपूर्ण है ,इसके तहत करीब 8000 युवाओं को रोजगार मिल सकेगा। ‘मिशन शक्ति’ के अंतर्गत महिला सशक्तिकरण के लिए 198 करोड़ रुपये, कर्मचारी कल्याण एवं पेंशन योजनाओं के लिए 982 करोड़ रुपये और ग्वालियर में विद्युत सुरक्षा के निरीक्षकालय के नवीन वृत्त कार्यालय और नारायणगढ़ में 9 नए न्यायिक पदों के सृजन को भी स्वीकृति प्रदान की गई है।

    महिला एशियन हॉकी चैम्पियन्स ट्रॉफी 2026 के भोपाल में आयोजन के लिए 18 करोड़ 74 लाख रूपये की सैद्धांतिक स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने माह अक्टूबर 2026 में महिला एशियन हॉकी चैम्पियन्स ट्रॉफी 2026 के भोपाल के बरखेड़ा नाथू में स्थित अन्तर्राष्ट्रीय स्पोटर्स कॉम्पलेक्स में आयोजन के लिए संभावित व्यय राशि 18 करोड़ 74 लाख रूपये के व्यय की सैद्धांतिक सहमति प्रदान की है।

    हॉकी इण्डिया को अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ द्वारा देश में हॉकी खेल का संचालन, प्रोत्साहन और अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं के आयोजन के लिए अधिकृत किया गया है। प्रतियोगिता वर्ष 2010 से निरन्तर 2 वर्ष के अन्तराल में आयोजित की जा रही है। इस प्रतियोगिता को आयोजित करने का मुख्य उद्‌द्देश्य एशियाई महिला हॉकी टीमों की प्रतिभा को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करना है। महिला एशियन हॉकी चैम्पियन्स ट्रॉफी 2026 में एशिया की प्रमुख 6 महिला टीमों (भारत, चीन, जापान, मलेशिया, साउथ कोरिया, एवं थाईलैण्ड) के लगभग 200 खिलाडी व सपोर्ट स्टॉफ के सम्मिलित होने की संभावना है।

    यह अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता हॉकी इण्डिया और खेल और युवा कल्याण विभाग ‌द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की जायेगी। अनुबंध अनुसार हॉकी इण्डिया को खेल और युवा कल्याण विभाग द्वारा ‘पेजेंटिंग पार्टनर’ राईटस के लिए 11 करोड़ रूपये दिये जाएंगे। अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए विभाग दवारा 7 करोड़ 74 लाख रूपये का व्यय किया जायेगा। इस प्रकार आयोजन पर लगभग 18 करोड़ 74 लाख रूपये का व्यय होना संभावित है।

    भोपाल के बरखेड़ा नाथू में अन्तर्राष्ट्रीय स्पोटर्स कॉम्पलेक्स को नवीन एवं आधुनिक तकनीकों के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख प्रतियोगिताओं के आयोजन के लिए तैयार किया गया है। एशिया स्तर की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता के आयोजन से वैश्विक स्तर पर मध्यप्रदेश में निर्मित खेल अधोसरंचना का प्रचार प्रसार होगा। इससे प्रदेश के हॉकी खिलाड़ियों के मनोबल में वृ‌द्धि होगी और एशिया के प्रमुख देशों से सम्मिलित हुई टीमों के खिलाड़ियों के भोपाल आगमन से प्रदेश में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

    रिहन्द माइक्रो सिंचाई परियोजना के संचालन के लिए 111 करोड़ रूपये की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने सिंगरौली की रिहन्द माइक्रो सिंचाई परियोजना को सोलहवें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक निरन्तर संचालन के लिए 111 करोड़ 4 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। रिहन्द माइक्रो सिंचाई परियोजना का मुख्य उद्देश्य गोविन्द वल्लभ पंत सागर रिजर्वायर (रिहन्द नदी पर स्थित) से संचित जल का उद्वहन कर सिंगरौली, माड़ा, वैढन और जावद तहसील के 119 गांवों में 38,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के माध्यम से सिंचाई के लिए जल प्रदान करना है।

    मल्हारगढ़ दाबयुक्त वृहद उद्वहन सिंचाई परियोजना के संचालन के लिए 184 करोड़ रूपये की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने मंदसौर की मल्हारगढ़ दाबयुक्त वृहद उद्वहन सिंचाई परियोजना के सोलहवें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि 01 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक निरन्तर संचालन के लिए 184 करोड़ 20 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। मल्हारगढ़ दाबयुक्त वृहद उद्वहन सिंचाई परियोजना लिफ्ट सिंचाई परियोजना है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य मंदसौर जिले की 46,500 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित करना है।

    ड्रोन टेक्नोलॉजी पर आधारित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना सहित विभिन्न योजनाओं के लिए 857 करोड़ रूपये की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने आईसर में ड्रोन टेक्नोलॉजी पर आधारित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना के लिए 85 करोड़ 51 लाख रूपये सहित विज्ञान एवं प्रौ‌द्योगिकी विभाग की विभिन्न योजनाओं के सोलहवें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक निरन्तर संचालन के लिए 857 करोड़ 21 लाख रूपये की स्वीकृति प्रदान की है।

    आई टी पार्क स्थापना की निरंतरता को मंजूरी: 8000 को मिलेगा रोजगार

    प्रदेश में आईटी पार्क की स्थापना’ संबंधी योजना के लिए 595 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की गई है। योजना अंतर्गत प्रदेश में इन्दौर, भोपाल, जबलपुर एवं ग्वालियर में आई.टी. पार्को की स्थापना की गयी है। आई.टी. पार्क एवं आई.टी. टावर्स की स्थापना से प्रदेश में आधुनिक तकनीकी अधोसंरचना का विकास होगा जिससे देश-विदेश के निवेशकों को आकर्षित कर निवेश एवं औ‌द्योगिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा। परिणामस्वरुप प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के व्यापक अवसर सृजित होंगे तथा 8000 से अधिक स्थानीय युवाओं को कौशल आधारित रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। उल्लेखनीय है कि अब तक लगभग 22000 युवाओ को रोजगार प्राप्त हो चुका है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS) के अंतर्गत संपादित एमओयू के प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से आई.टी. एवं ई.एस.डी.एम. क्षेत्र का विस्तार होगा जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था सुदृढ होगी। डिजिटल एवं तकनीकी दक्षता में वृद्धि होगी तथा मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक उभरते तकनीकी एवं निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित होगा।

    मंत्रि-परिषद ने भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल में ड्रोन टेक्नोलॉजी पर आधारित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (COE) की स्थापना के लिए कुल लागत 85 करोड़ 51 लाख रूपये में से 17 करोड़ 90 लाख रूपये को आगामी तीन वर्षों तक प्रदाय किए जाने की स्वीकृति दी है। यह एक उन्नत अनुसंधान एवं विकास (R&D) आधारित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में कार्य करेगा, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन सिमुलेशन, डिजिटल ट्विन प्रौ‌द्योगिकी, UAV डिजाइन एवं निर्माण, स्वायत्त प्रणालियों तथा उन्नत अनुप्रयोगों पर अनुसंधान एवं नवाचार को बढावा दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त केंद्र में स्टार्टअप इन्क्यूबेशन, प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट (PoC), प्रोटोटाइप विकास एवं परीक्षण जैसी सुविधाएँ विकसित की जाएंगी, जिससे राज्य में ड्रोन प्रौ‌द्योगिकी का एक समग्र एवं आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो सकेगा।

    ‘नई तकनीक के लिए एम.पी.एस.ई.डी.सी. एवं अन्य संस्थाओं को सहायता’ योजना के लिए 110 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य शासन एवं उसके विभिन्न विभागों को नवीनतम सूचना प्रौ‌द्योगिकी एवं डिजिटल समाधान उपलब्ध कराकर प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक दक्ष, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना एवं नागरिकों को त्वरित, सरल और सुरक्षित ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करना है। इसमें AI/ML आधारित बिजनेस इंटेलिजेंस, व्हाट्‌सऐप चैटवॉट, ड्रोन सेवाएं, एसएमएस गेटवे, MP CODE, ई-साइन, राज्य ई-मेल नीति, लो-कोड/नो-कोड प्लेटफॉर्म और सिक्योरिटी ऑडिट लैब जैसी प्रमुख गतिविधियां शामिल हैं।

    ‘मध्यप्रदेश स्टेट स्पाटियल डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर (एम.पी. एस एस डी आई)’ योजना के लिए 40 करोड़ 20 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। योजना के उद्देश्य राज्य में भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तकनीक का उपयोग कर एकीकृत स्थानिक डाटा (Spatial Data) का निर्माण, संधारण एवं अद्‌यतन करते हुए विभिन्न विभागों, एजेसियों तथा योजनाओं को अद्‌यतन, विश्वसनीय एवं सुगम जीआइएस आधारित सेवाएँ उपलब्ध कराना है। इससे आपदा प्रबंधन, जल आपूर्ति, भूमि प्रबंधन, शहरी विकास एवं सड़क मरम्मत जैसे क्षेत्रों में रियल टाइम मॉनिटरिंग और निर्णय क्षमता में वृद्धि हुई है।

    इसी तरह ‘क्लाउड सेवाओं का प्रदाय व प्रबंधन’ के लिए 26 करोड़ 50 लाख रूपये की स्वीकृति दी गई है। इसका उद्देश्य डिजिटल मध्यप्रदेश की परिकल्पना को साकार करने और शासन की सभी सेवाओं में डिजिटल परिवर्तन (डिटिटल ट्रांसफार्मेशन) को गति देना है। इस योजना के अंतर्गत, मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPSEDC) ‌द्वारा तैयार क्लाउड अंगीकरण रूपरेखा (Cloud Adoption Framework) के आधार पर सभी शासकीय एवं अर्ध-शासकीय विभागों को सुरक्षित, लचीली, स्केलेवल एवं किफायती क्लाउड सेवाएं प्रदान की जा रही है। इसके माध्यम से शासन को अपने आईटी संसाधनों के निर्माण और रखरखाव पर भारी पूंजीगत निवेश की आवश्यकता नहीं होती है। आवश्यकतानुसार कम्प्यूटिंग संसाधन, स्टोरेज, नेटवर्किंग तथा सॉफ्टवेयर सेवाएँ क्लाउड प्लेटफॉर्म से प्राप्त कर सकते है।

    ग्वालियर में वि‌द्युत सुरक्षा निरीक्षकालय के नवीन वृत्त कार्यालय की स्थापना की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने ग्वालियर में वि‌द्युत सुरक्षा निरीक्षकालय के नवीन वृत्त कार्यालय और 9 नवीन पदों के सृजन की स्वीकृति दी है। सृजन संबंधी कार्यवाही के लिए ऊर्जा विभाग को अधिकृत किया गया है। उल्लेखनीय है कि सभी बड़े राजस्व संभागों (सागर, शहडोल, नर्मदापुरम को छोडकर) में विद्युत निरीक्षकालय के वृत्त कार्यालय स्थापित है। वर्तमान में ग्वालियर एवं चंबल संभाग के विद्युत सुरक्षा और राजस्व संग्रहण संबंधी कार्य भोपाल मुख्यालय से संपादित होते हैं। ग्वालियर में नवीन वृत्त कार्यालय प्रारंभ करने से विशेषत: मुरैना के बामौर और भिंड के मालनपुर औ‌द्योगिक क्षेत्र को लाभ प्राप्त हो सकेगा। इसके अतिरिक्त भविष्य में मुरैना में 600 मेगावाट का बैटरी स्टोरेज सोलर पॉवर प्लांट स्थापित किया जाना है जिसके लिए भी ग्वालियर में नवीन वृत्त कार्यालय स्थापित किया जाना आवश्यक है।

    नारायणगढ में जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सहित 9 नवीन पदों के सृजन की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने मंदसौर के नारायणगढ़ में जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश का एक नवीन पद सहित 9 नवीन पदों के सृजन की स्वीकृति दी है। इससे वहां नियमित रूप से न्यायालय का संचालन हो सकेगा जिससे स्थानीय अधिवक्ताओं और लोगों की मांग के साथ प्रकरणों का निराकरण किया जा सकेगा और आम जन को सुलभ व त्वरित न्याय मिल सकेगा।

    प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी के संचालन के लिए 129 करोड़ रूपये की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत आर.सी.व्ही.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी की गतिविधियों से संबंधित योजनाओं के सोलहवें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि 01 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक निरन्तर संचालन के लिए 129 करोड़ 12 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। स्वीकृति राशि से अकादमी के स्थापना एवं कार्यालयीन व्यय, मिशन कर्मयोगी, विभागीय परिसंपतियों का संधारण एवं प्रशासन अकादमी परिसर में प्रशिक्षण गतिविधियों के लिए भौतिक सुविधाओं का निर्माण संबंधित कार्य किए जायेंगे।

    संकल्प-हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ़ वुमेन, शक्ति सदन और सखी निवास के लिए 198 करोड़ रूपये की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद ने मिशन शक्ति- उपयोजना सामर्थ्य अंतर्गत संकल्प-हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ़ वुमेन, शक्ति सदन और सखी निवास योजना के वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक निरंतर क्रियान्वयन के लिए 198 करोड़ 59 लाख रूपये की स्वीकृति दी है।

    संकल्प -हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ वूमेन योजना का उद्देश्य जिला स्तर पर एक ऐसी इकाई के रूप में कार्य करना है जो महिलाओं को उनके कल्याण और सशक्तिकरण के लिए योजनाओं और नीतियों के बारे में जागरूकता के साथ-साथ पहुंच प्रदान करें। यह योजना पूर्व से सभी 52 जिलों में संचालित है और अब इसे 3 नवगठित जिलों में संचालित किया जायेगा।

    शक्ति सदन का उद्देश्य महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और सक्षम वातावरण बनाना तथा अवैध व्यापार, संकट में फंसी महिलाओं को कठिन परिस्थितियों से उबार कर एक नई शुरुआत करवाना है। वर्तमान में प्रदेश में 14 शक्ति सदन अशासकीय संस्थाओं के माध्यम से संचालित है। भारत सरकार द्वारा 5 नये शक्ति सदन स्वीकृत किये गये हैं।

    शहरी/ग्रामीण कामकाजी महिलाओं को सुविधाजनक व सुरक्षित आवास प्रदान करने के लिए सखी निवास योजना को लागू किया गया है। पूर्व में इस योजना का नाम महिला विश्रामालय था। सखी निवास में सभी वर्ग की कामकाजी महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है। सखी निवास में महिला कर्मचारियों के छोटे बच्चों के लिए डे-केयर सेंटर संचालन का भी प्रावधान है। प्रदेश में 3 शासकीय सखी निवास संचालित है।

    कर्मचारी कल्याण, पेंशन, भविष्य निधि और बीमा योजनाओं के लिए 982 करोड़ रूपये की स्वीकृति


    मंत्रि-परिषद ने वित्त विभाग के अंतर्गत कर्मचारी कल्याण, पेंशन, भविष्य निधि और बीमा की योजनाओं के 16वें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि 1 अप्रैल, 2026 से मार्च 2031 तक के लिए निरंतर संचालन के लिए 982 करोड़ 49 लाख रूपये की स्वीकृति दी है। स्वीकृति अनुसार संचालनालय पेंशन, भविष्य निधि एवं बीमा की योजनाओं, पेंशन तथा कर्मचारी कल्याण संचालनालय, जिला पेंशन कार्यालय, विभागीय परिसंपत्तियों का संधारण, पेंशनर कल्याण कोष, शासकीय सेवक परिवार कल्याण निधि पर ब्याज, शासकीय कर्मचारी समूह बीमा योजना, शासकीय कर्मचारी सह समूह बीमा योजना को संचालित किया जायेगा।

    समर्थन मूल्य पर उपार्जन पर किसानों को बोनस भुगतान योजना की निरंतरता की स्वीकृति
    मंत्रि-परिषद ने खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग अंतर्गत 500 करोड़ से अधिक की योजना अंतर्गत समर्थन मूल्य पर किसानों को उपार्जन पर बोनस भुगतान के 16वें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक में निरंतर संचालन की स्वीकृति दी है।

    मध्यप्रदेश विधिक माप विज्ञान नियम 2011 में संशोधन की स्वीकृति


    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश विधिक माप विज्ञान नियम, 2011 में संशोधन की स्वीकृति दी है। भारत सरकार द्वारा जनविश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2026 के माध्यम से विधिक मापविज्ञान अधिनियम, 2009 में किए गए संशोधनों को राज्य में प्रभावी रूप से लागू करने, Compliance Reduction and Deregulation के अंतर्गत की गई अनुशंसाओं का अनुपालन सुनिश्चित करने तथा नाप-तौल उपकरणों के सत्यापन शुल्क के पुनरीक्षण के उद्देश्य से यह संशोधन किया गया है।
  • जनकल्याण और बुनियादी ढांचे पर सरकार का बड़ा निवेश, 8,445 करोड़ रुपये शहरी विकास के लिए स्वीकृत, मूंग उपार्जन और सिंचाई परियोजनाओं को भी मिली मंजूरी

    जनकल्याण और बुनियादी ढांचे पर सरकार का बड़ा निवेश, 8,445 करोड़ रुपये शहरी विकास के लिए स्वीकृत, मूंग उपार्जन और सिंचाई परियोजनाओं को भी मिली मंजूरी

    मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और जनकल्याण योजनाओं को गति देने के उद्देश्य से 10 हजार 800 करोड़ रुपये से अधिक के विभिन्न विकास प्रस्तावों को मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में शहरी अधोसंरचना, सिंचाई, कृषि, महिला एवं बाल विकास तथा प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। सरकार का मानना है कि इन फैसलों से प्रदेश के विकास कार्यों को नई दिशा मिलेगी और विभिन्न वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा।

    बैठक में सबसे बड़ी स्वीकृति नगरीय क्षेत्रों के अधोसंरचना विकास के लिए दी गई। राज्य सरकार ने आगामी पांच वर्षों के लिए 8 हजार 445 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है। यह धनराशि नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद क्षेत्रों में सड़क, जल निकासी, पेयजल, सार्वजनिक सुविधाओं और अन्य आधारभूत विकास परियोजनाओं पर खर्च की जाएगी। साथ ही स्थानीय निकायों द्वारा विकास कार्यों के लिए लिए गए ऋणों के पुनर्भुगतान में भी इसका उपयोग किया जाएगा, जिससे शहरी विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी।

    मंत्रिपरिषद ने किसानों के हित में भी महत्वपूर्ण निर्णय लिया। रबी वर्ष 2023-24 के दौरान लक्ष्य से अधिक खरीदी गई मूंग के भुगतान के लिए 1,587 करोड़ रुपये की निःशुल्क शासकीय प्रत्याभूति उपलब्ध कराने को मंजूरी दी गई। इस निर्णय के तहत विभिन्न बैंकों से ली गई साख सीमा के शेष दायित्वों के लिए सरकारी गारंटी प्रदान की जाएगी। सरकार का उद्देश्य किसानों के हितों की रक्षा करना और उपार्जन प्रक्रिया को वित्तीय रूप से सुचारु बनाए रखना है।

    सिंचाई सुविधाओं के विस्तार को लेकर भी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राजगढ़ जिले की कुण्डलिया वृहद सिंचाई परियोजना के संचालन को वर्ष 2031 तक जारी रखने के लिए 245 करोड़ 45 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान की गई है। इस परियोजना के माध्यम से राजगढ़ और आगर-मालवा जिलों के लगभग 1 लाख 39 हजार 600 हेक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के जरिए सिंचाई क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। सरकार का मानना है कि इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी।

    बैठक में महिला एवं बाल विकास से जुड़ा भी अहम निर्णय लिया गया। टेक-होम राशन के उत्पादन और वितरण की व्यवस्था को राज्य आजीविका फोरम से वापस लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपने का निर्णय लिया गया है। अंतरिम व्यवस्था के तहत स्व-सहायता समूहों के माध्यम से पूरक पोषण आहार उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही भविष्य में केंद्र सरकार के नए दिशा-निर्देशों के अनुरूप स्थायी व्यवस्था विकसित की जाएगी, जिससे पोषण योजनाओं का संचालन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके।

    मंत्रिपरिषद ने वाणिज्यिक कर विभाग की स्थापना योजनाओं के संचालन के लिए भी 521 करोड़ 4 लाख रुपये की स्वीकृति दी है। यह राशि आगामी पांच वर्षों तक मुख्यालय, जिला और परिक्षेत्रीय कार्यालयों के संचालन, कर्मचारियों के वेतन-भत्तों, कार्यालय व्यय, व्यावसायिक सेवाओं तथा आवश्यक संसाधनों के रखरखाव पर खर्च की जाएगी। सरकार का मानना है कि इन निर्णयों से प्रशासनिक व्यवस्था और सेवा वितरण प्रणाली को मजबूती मिलेगी।

    राज्य सरकार का कहना है कि शहरी विकास, कृषि, सिंचाई, पोषण और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े इन फैसलों का उद्देश्य प्रदेश के समग्र विकास को नई गति देना है। विभिन्न विभागों को मिली वित्तीय स्वीकृतियों के माध्यम से विकास परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन, किसानों के हितों की सुरक्षा, शहरी सुविधाओं के विस्तार और जनकल्याण कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होने की उम्मीद है।

  • बड़ा फैसला…. छह साल बाद सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेगी जजों की संख्या…. कैबिनेट ने दी मंजूरी

    बड़ा फैसला…. छह साल बाद सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेगी जजों की संख्या…. कैबिनेट ने दी मंजूरी


    नई दिल्ली।
    केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में जजों की संख्या को लेकर मंगलवार को अहम फैसला लिया। कैबिनेट ने SC में न्यायाधीशों की कुल संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने की मंजूरी दे दी। यह फैसला छह साल बाद लिया गया है, जब 2019 में इसे 31 से बढ़ाकर 33 किया गया था। सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद सुप्रीम कोर्ट को और मजबूत करना व न्याय प्रक्रिया को तेज (Justice Process Speeding up) करना है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं।

    केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnav) ने बताया कि फिलहाल अदालत में 33 न्यायाधीश और एक मुख्य न्यायाधीश हैं। संसद के आगामी सत्र में इस संबंध में एक विधेयक पेश किया जाएगा। विधेयक के पारित होने के बाद मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के जजों की कुल संख्या 38 हो जाएगी। यह फैसला न्यायालय में लंबित मामलों के बोझ को कम करने और न्याय प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से लिया गया है।


    SC में कुछ इस तरह बढ़ती गई जजों की संख्या

    सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम 1956 में मूल रूप से मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर 10 न्यायाधीशों का प्रावधान था। 1960 में इसे 13 और बाद में 17 किया गया। 1986 के संशोधन से संख्या 25 हो गई और 2009 में इसे 30 कर दिया गया। फिलहाल ताजा प्रस्ताव के बाद न्यायपालिका को मजबूत करने की दिशा में एक अहम उठाया गया है, जो देश के न्यायिक ढांचे को और अधिक प्रभावी बनाने में सहायक साबित होगा।

    भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट की कुल संख्या तय नहीं है। अनुच्छेद 124(1) के तहत चीफ जस्टिस के अलावा अन्य जजों की संख्या संसद तय करती है। समय-समय पर बढ़ती मुकदमों की संख्या को देखते हुए इसमें बदलाव किया जाता है। इस बढ़ोतरी का मकसद लंबित मामलों के बोझ को कम करना है। हालांकि, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने से ही न्याय में देरी पूरी तरह दूर नहीं हो सकती।