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  • कौन हैं ITBP के शौर्य कमांडो, LAC पर चीनी सैनिकों के सामने कैसे संभालते हैं मोर्चा..

    कौन हैं ITBP के शौर्य कमांडो, LAC पर चीनी सैनिकों के सामने कैसे संभालते हैं मोर्चा..


    नई दिल्ली
    । भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सीमा सुरक्षा और सैनिकों की गश्त को लेकर सतर्कता लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। अरुणाचल प्रदेश के संवेदनशील इलाकों में दोनों देशों के सैनिकों के आमने-सामने आने की स्थितियों के बीच भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के शौर्य कमांडो विशेष चर्चा में हैं। कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में काम करने के लिए प्रशिक्षित ये जवान सीमा पर त्वरित प्रतिक्रिया देने और तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    राजस्थान के अलवर में आयोजित ITBP के वार्षिक अभिनंदन समारोह में संगठन के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने अरुणाचल प्रदेश में LAC के कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना तथा तनातनी की स्थिति बने रहने की बात कही। उन्होंने शौर्य कमांडो के प्रदर्शन और उनकी भूमिका की भी सराहना की। इन विशेष दस्तों का उद्देश्य संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में जवानों की प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाना और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करना है।

    शौर्य कमांडो दस्तों के गठन की पृष्ठभूमि वर्ष 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प से जुड़ी है। इस घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त, निगरानी और सैनिकों की त्वरित तैनाती को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत महसूस की गई। इसी दिशा में ITBP ने अपने जवानों में से शारीरिक रूप से सक्षम, मानसिक तौर पर मजबूत और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले कर्मियों को चुनकर विशेष प्रशिक्षण देने की व्यवस्था विकसित की।

    इन कमांडो को भारतीय सेना की घातक प्लाटून की तर्ज पर तैयार किया गया है। इनके प्रशिक्षण में पर्वतीय क्षेत्रों में आवाजाही, अत्यधिक ठंड में काम करना, हाथों से मुकाबला करने की तकनीक, हथियारों का संचालन और तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम बनाए रखना शामिल है। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी, दुर्गम रास्तों और बेहद कम तापमान के बीच काम करना इनके लिए बड़ी चुनौती होती है। इसलिए शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता भी इनके प्रशिक्षण का अहम हिस्सा है।

    ITBP की तैनाती व्यवस्था के तहत चीन सीमा पर तैनात प्रत्येक बटालियन के साथ कम से कम एक शौर्य कमांडो टीम जोड़े जाने की जानकारी दी गई है। अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इनकी भूमिका को देखते हुए दो अतिरिक्त इकाइयां तैयार किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। भविष्य में इन दस्तों को कंपनी स्तर तक विकसित करने और एक अलग, समर्पित बटालियन बनाने की योजना पर काम किए जाने की बात कही गई है। ऐसी इकाई तैयार होने पर जरूरत के समय विशेष प्रशिक्षित जवानों को तनावग्रस्त क्षेत्रों में तेजी से पहुंचाने की क्षमता बढ़ सकती है।

    अरुणाचल प्रदेश में बुमला और मेचूका जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सीमा पर गश्त और सैनिकों की गतिविधियों पर निगरानी महत्वपूर्ण है। जब दोनों देशों के जवान आमने-सामने आते हैं, तब प्रशिक्षित टीमें स्थिति को संभालने, रास्ता रोकने और भारतीय क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखने में भूमिका निभा सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया के साथ तनाव को अनावश्यक रूप से बढ़ने से रोकना भी महत्वपूर्ण होता है।

    सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ITBP आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संगठन ड्रोन और ड्रोन रोधी प्रणालियों सहित तकनीकी संसाधनों पर निवेश बढ़ा रहा है। सीमा पर तैनात बटालियनों में ड्रोन प्लाटून शामिल किए जाने की व्यवस्था भी बताई गई है, जिनका संचालन प्रशिक्षित जवान करते हैं। ड्रोन के जरिए दुर्गम घाटियों और ऊंची चोटियों पर गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। इससे जमीन पर तैनात जवानों को परिस्थितियों की जानकारी मिलने और जरूरत के अनुसार कार्रवाई करने में सहायता मिलती है।

    इस तरह शौर्य कमांडो की विशेष ट्रेनिंग, बटालियन स्तर पर तैनाती और आधुनिक निगरानी तकनीक का इस्तेमाल LAC पर ITBP की तैयारियों का हिस्सा है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सीमा की सुरक्षा करते हुए इन दस्तों की भूमिका त्वरित प्रतिक्रिया, सतर्कता और संवेदनशील परिस्थितियों के प्रबंधन से जुड़ी हुई है।

  • अरुणाचल सीमा पर चीनी सैनिकों से आमना-सामना, ITBP ने तैयार कीं शौर्य कमांडो टीमें..

    अरुणाचल सीमा पर चीनी सैनिकों से आमना-सामना, ITBP ने तैयार कीं शौर्य कमांडो टीमें..

    नई दिल्ली । भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव की स्थिति को लेकर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि राज्य के कई सीमावर्ती स्थानों पर भारतीय जवानों और चीनी सैनिकों के बीच आमने-सामने की स्थिति बनी है। इनमें से कुछ स्थानों पर ऐसी परिस्थितियां अब भी जारी हैं। उन्होंने बल के जवानों को संबोधित करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात ‘शौर्य कमांडो’ टीमों के प्रदर्शन की सराहना की।

    यह जानकारी आईटीबीपी के 65वें स्थापना दिवस से पहले आयोजित ‘हिमवीर सम्मान समारोह’ के दौरान सामने आई। कपूर ने कहा कि हाल के दिनों में अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में जवानों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। इन स्थितियों में तैनात शौर्य कमांडो टीमों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार सतर्कता बनाए रखने और कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए बल अपनी परिचालन क्षमताओं को मजबूत कर रहा है।

    आईटीबीपी प्रमुख के अनुसार, बल की प्रत्येक बटालियन में कमांडो टीम तैयार की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त दो और टीमें गठित करने की प्रक्रिया चल रही है। दीर्घकालिक लक्ष्य हर बटालियन में एक पूर्ण कमांडो कंपनी तैयार करना है। इसके साथ ही विशेष अभियानों के संचालन के लिए एक अलग कमांडो बटालियन बनाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इन इकाइयों को विशेष रूप से पहाड़ी और अधिक ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में काम करने के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां मौसम, भौगोलिक परिस्थितियां और सीमित पहुंच जवानों के सामने चुनौतियां पैदा करती हैं।

    सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए आईटीबीपी आधुनिक तकनीक पर भी ध्यान दे रही है। कपूर ने कहा कि ड्रोन ने युद्ध के पारंपरिक तरीकों में बदलाव किया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और अन्य उन्नत तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी को देखते हुए बल ड्रोन संचालन, पायलटों के प्रशिक्षण और ड्रोन निर्माण की अपनी क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है।

    ड्रोन के साथ-साथ एंटी-ड्रोन प्रणालियों के विकास और इस्तेमाल की तैयारी भी की जा रही है। इन तकनीकों का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन से पैदा होने वाले संभावित खतरों का मुकाबला करना और निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाना है। बल की आधुनिकीकरण योजना में ड्रोन तथा एंटी-ड्रोन प्रणालियों के लिए लगभग 1,000 करोड़ रुपये निर्धारित करने की बात कही गई है। इसके अलावा वाहनों, उपकरणों और गोला-बारूद को आधुनिक बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

    दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में तेजी से आवाजाही और प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष वाहनों, स्वचालित जमीनी वाहनों और क्विक रिएक्शन व्हीकल को भी योजना में शामिल किया गया है। इसके साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की तैयारी है। इन कदमों का उद्देश्य जरूरत पड़ने पर जवानों और उपकरणों की तैनाती को अधिक प्रभावी बनाना है।

    भारत और चीन के बीच सीमा संबंधी मुद्दों पर सैन्य स्तर पर बातचीत भी जारी रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 6 सितंबर 2026 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में वाचा-दमाई बॉर्डर पर्सनल मीटिंग पॉइंट पर कोर कमांडर स्तर की बैठक हुई थी। सीमा पर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाओं के कारण कुछ क्षेत्रों में गश्त के दौरान आमने-सामने की स्थिति बनती रही है।

    आईटीबीपी प्रमुख का बयान बताता है कि सीमा पर सतर्कता बनाए रखने के साथ-साथ बल अपनी विशेष इकाइयों, निगरानी प्रणालियों और आधुनिक उपकरणों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। हालांकि, अरुणाचल प्रदेश में जिन स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति बनी हुई है, उनके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

  • अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन कोर कमांडर वार्ता आज, वचा-दमाई में एलएसी तनाव घटाने पर होगी अहम चर्चा

    अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन कोर कमांडर वार्ता आज, वचा-दमाई में एलएसी तनाव घटाने पर होगी अहम चर्चा


    नई दिल्ली । 
    अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर हालिया तनाव के बीच भारत और चीन की सेनाओं के बीच आज 6 सितंबर को पहली बार कोर कमांडर स्तर की उच्चस्तरीय सैन्य वार्ता होने जा रही है। यह बैठक अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में स्थित वचा-दमाई बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर आयोजित की जाएगी। दोनों पक्षों के बीच होने वाली इस बातचीत को पूर्वी सेक्टर में सीमा प्रबंधन और तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    अब तक भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर की अधिकांश महत्वपूर्ण सैन्य वार्ताएं पूर्वी लद्दाख के चुशूल-मोल्दो बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर होती रही हैं। अरुणाचल प्रदेश में पहली बार इसी स्तर की बैठक होने से दोनों सेनाओं के बीच पूर्वी सेक्टर से जुड़े स्थानीय और परिचालन संबंधी मुद्दों पर सीधे संवाद का नया माध्यम स्थापित होगा।

    भारतीय पक्ष का नेतृत्व 3 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया करेंगे। रंगापहार स्थित 3 कोर, जिसे स्पीयर कोर के नाम से भी जाना जाता है, अरुणाचल प्रदेश में एलएसी के कई संवेदनशील और दुर्गम इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालती है। राज्य में एलएसी की सुरक्षा के लिए तेजपुर स्थित 4 कोर और रंगापहार स्थित 3 कोर की महत्वपूर्ण भूमिका है।

    बैठक की पृष्ठभूमि में ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में हालिया तनाव और दोनों पक्षों के बीच उत्पन्न गतिरोध को प्रमुख वजह माना जा रहा है। भारत और चीन के बीच एलएसी की स्थिति को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। कई स्थानों पर इन्हीं मतभेदों के कारण सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं और स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति बनती है।

    ऐसे में सैन्य कमांडरों की सीधी बातचीत का उद्देश्य जमीन पर पैदा होने वाली गलतफहमियों को रोकना और मौजूदा मतभेदों का बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशना है। भारत की ओर से सीमा से जुड़े मामलों में स्पष्ट और दृढ़ रुख बनाए रखने के साथ सैन्य संपर्क के माध्यम से स्थिरता कायम करने पर जोर दिया जाता रहा है।

    अरुणाचल प्रदेश में होने वाली यह बैठक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया चीन यात्रा के बाद बने व्यापक कूटनीतिक माहौल में हो रही है। दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा प्रबंधन, शांति और सैन्य संपर्क को मजबूत करने को लेकर बातचीत हुई थी। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा पर संवाद के अतिरिक्त तंत्र विकसित करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।

    भारत और चीन के संबंधों में वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद एलएसी पर सैन्य तैयारियों को लेकर विशेष सतर्कता रही है। पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक चले गतिरोध के दौरान भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी सैन्य मौजूदगी और परिचालन क्षमता को मजबूत किया। अब अरुणाचल सेक्टर में उच्चस्तरीय सैन्य संवाद शुरू होना सीमा प्रबंधन के दायरे के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।

    भारतीय सेना ने अरुणाचल क्षेत्र में अपनी परिचालन तैयारियों की भी समीक्षा की है। 3 कोर मुख्यालय में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की ओर से क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति, तैनाती और क्षमताओं को लेकर नियमित आकलन किया जाता रहा है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस क्षेत्र में सैन्य बुनियादी ढांचे और तैयारियों का महत्व भी काफी अधिक है।

    वचा-दमाई में होने वाली वार्ता से तत्काल किसी बड़े समाधान की अपेक्षा के बजाय दोनों सेनाओं के बीच संवाद को मजबूत करने, स्थानीय तनाव नियंत्रित करने और एलएसी पर स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों को आगे बढ़ाने की उम्मीद है। पूर्वी सेक्टर में इस नए सैन्य संपर्क तंत्र से भविष्य में सीमा से जुड़े मुद्दों पर सीधे बातचीत का रास्ता और मजबूत हो सकता है।

  • अरुणाचल का डोंग गांव बना खास सनराइज डेस्टिनेशन, पहाड़ों और लोहित नदी के बीच दिखती है सूरज की पहली किरण

    अरुणाचल का डोंग गांव बना खास सनराइज डेस्टिनेशन, पहाड़ों और लोहित नदी के बीच दिखती है सूरज की पहली किरण

    नई दिल्ली ।भारत में सूर्योदय देखने के लिए कई खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश की डोंग वैली अपनी भौगोलिक स्थिति और शानदार प्राकृतिक नजारों के कारण खास पहचान रखती है। अंजॉ जिले में स्थित डोंग गांव और आसपास की घाटी को देश में सबसे पहले सूर्योदय देखने वाली प्रमुख जगहों में गिना जाता है। यहां पहाड़ों के बीच उगते सूर्य की पहली किरणें देखने के लिए पर्यटक सुबह से पहले ही निकल पड़ते हैं।

    डोंग वैली वालॉन्ग और लोहित नदी के आसपास के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। चारों ओर फैले घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां, गहरी घाटियां और नदी का बहता पानी इस क्षेत्र को बेहद आकर्षक बनाते हैं। सूर्योदय के समय जब आसमान का रंग धीरे-धीरे बदलता है और पहाड़ों के पीछे से सूर्य दिखाई देता है, तब पूरा इलाका सुनहरी रोशनी से भर उठता है।

    डोंग को भारत में सबसे पहले सूर्योदय देखने वाली जगह के तौर पर विशेष पहचान वर्ष 1999 के आसपास मिली थी। इसके बाद नए साल के मौके पर यहां सूर्योदय देखने की दिलचस्पी बढ़ी। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग इस अनोखे अनुभव के लिए डोंग पहुंचने लगे। हालांकि वास्तविक सूर्योदय का समय मौसम और वर्ष के समय के अनुसार बदलता रहता है।

    डोंग में सूर्योदय देखना सामान्य पर्यटन अनुभव से थोड़ा अलग है। इसके लिए कई पर्यटकों को अंधेरे में पहाड़ी रास्तों पर पैदल ट्रेक करना पड़ता है। सूर्योदय के लिए निर्धारित व्यू पॉइंट तक पहुंचने के बाद इंतजार का सिलसिला शुरू होता है। रात का अंधेरा कम होने के साथ क्षितिज पर हल्की रोशनी दिखाई देती है और कुछ समय बाद सूर्य की पहली किरणें पहाड़ियों को रोशन करती हैं।

    डोंग की यात्रा केवल सूर्योदय तक सीमित नहीं है। आसपास स्थित वालॉन्ग भी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। डोंग से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह क्षेत्र पहाड़ी वातावरण और शांत प्राकृतिक परिवेश के कारण यात्रियों को आकर्षित करता है। इसके अलावा किबिथू भी इस इलाके का महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है, जो भारत के पूर्वी छोर के निकट अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण खास महत्व रखता है।

    लोहित नदी इस पूरे क्षेत्र की खूबसूरती को और बढ़ाती है। पहाड़ों के बीच बहती नदी और आसपास की हरियाली यहां के प्राकृतिक दृश्य को अलग पहचान देती है। क्षेत्र में स्थानीय समुदायों की संस्कृति और परंपराओं को जानना भी यात्रियों के लिए एक अलग अनुभव हो सकता है।

    डोंग का इलाका भारत, चीन और म्यांमार की सीमाओं के नजदीक स्थित है। इसलिए यहां घूमने वाले पर्यटकों के लिए स्थानीय प्रशासन के निर्देशों और सुरक्षा नियमों का पालन करना जरूरी है। कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता हो सकती है। यात्रा से पहले मौसम, सड़क की स्थिति, स्थानीय नियम और ट्रेकिंग मार्ग की जानकारी लेना भी उपयोगी रहता है।

    डोंग वैली की खासियत यही है कि यहां सूर्योदय केवल आसमान में बदलते रंगों का दृश्य नहीं, बल्कि पहाड़ों, जंगलों और नदी के बीच प्रकृति को करीब से देखने का अवसर देता है। शांत वातावरण और अनोखी भौगोलिक स्थिति इसे उन यात्रियों के लिए आकर्षक बनाती है, जो सामान्य पर्यटन स्थलों से अलग अनुभव तलाशते हैं।