Tag: Asaduddin Owaisi

  • असम में यूसीसी बिल पर बढ़ा राजनीतिक विवाद, ओवैसी ने उठाए संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों के सवाल

    असम में यूसीसी बिल पर बढ़ा राजनीतिक विवाद, ओवैसी ने उठाए संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों के सवाल

    नई दिल्ली । असम में समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में संबंधित विधेयक पेश किए जाने के बाद अब इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इसी क्रम में हैदराबाद से सांसद और एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi ने प्रस्तावित व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इस कानून के कई प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए और कहा कि यह मुद्दा केवल कानून का नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संरचना से भी जुड़ा हुआ है। उनके बयान के बाद इस विषय पर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है।

    असम सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के तहत विवाह, तलाक, विरासत और पारिवारिक कानूनों से जुड़े कई प्रावधानों में समान व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार बहुविवाह और एक से अधिक विवाह को गैर-कानूनी बनाए जाने का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में महिलाओं को समान अधिकार देने की भी बात कही गई है। सरकार का मानना है कि ऐसे प्रावधान सामाजिक समानता और कानूनी स्पष्टता को बढ़ावा देंगे।

    हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी असहमति व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की व्यवस्था कुछ समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक परंपराओं को प्रभावित कर सकती है। उनके अनुसार कानून यदि समानता के उद्देश्य से लाया जा रहा है तो उसका दायरा और प्रभाव भी सभी वर्गों पर एक जैसा होना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कुछ वर्गों या समुदायों को विशेष छूट दी जाती है तो फिर समानता के सिद्धांत पर बहस स्वाभाविक हो जाती है।

    ओवैसी ने यह भी कहा कि संविधान के अंतर्गत विभिन्न समुदायों को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार प्राप्त है। उनके अनुसार किसी भी कानून को लागू करते समय संवैधानिक संतुलन और सामाजिक विविधता का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने विरासत और उत्तराधिकार के मामलों को लेकर भी अपनी चिंताएं सामने रखीं और कहा कि इन विषयों पर व्यापक चर्चा आवश्यक है।

    दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों को एक समान कानूनी ढांचे के अंतर्गत लाना और महिलाओं को अधिक सुरक्षा एवं अधिकार उपलब्ध कराना है। प्रस्ताव में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य करने और वैवाहिक नियमों को अधिक स्पष्ट बनाने जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। इस मुद्दे ने अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर और अधिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि यह मुद्दा केवल कानून तक सीमित नहीं बल्कि समाज और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • ओवैसी और कांग्रेस पर किरेन रिजिजू का तीखा बयान, अल्पसंख्यक राजनीति पर फिर छिड़ी बहस

    ओवैसी और कांग्रेस पर किरेन रिजिजू का तीखा बयान, अल्पसंख्यक राजनीति पर फिर छिड़ी बहस

    नई दिल्ली ।भारतीय राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी देखने को मिली है, जब केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री Kiren Rijiju ने एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi को लेकर एक बयान दिया, जिसने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। उनके बयान के केंद्र में न केवल ओवैसी रहे, बल्कि मुख्य विपक्षी दल Indian National Congress पर भी गंभीर आरोप लगाए गए।

    मामला तब सामने आया जब किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी करते हुए ओवैसी को देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में से एक बताया और साथ ही यह भी कहा कि वे लगातार मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की बात उठाते रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसे “मुस्लिम लीग पार्टी” जैसा बताने की बात कही, जिससे राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

    रिजिजू के इस बयान के बाद देश की राजनीति में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। उन्होंने अपने विचारों में यह भी संकेत दिया कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, अपनी जनसंख्या और स्थिति को लेकर किसी तरह की हीन भावना न रखें, क्योंकि देश का लोकतांत्रिक ढांचा सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है।

    अपने बयान के दौरान उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि देश में अलग-अलग धार्मिक समुदाय शांतिपूर्वक और सुरक्षित वातावरण में रहते हैं। उन्होंने पारसी समुदाय का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमित संख्या में होने के बावजूद यह समुदाय भी भारत में सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने यह तर्क देने की कोशिश की कि भारत में धार्मिक आधार पर भेदभाव की स्थिति नहीं है और सभी समुदायों को समान अवसर प्राप्त हैं।

    इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में विभिन्न दलों की ओर से प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। विपक्षी नेताओं ने इस टिप्पणी को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आलोचना की है, जबकि समर्थक इसे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं। इस मुद्दे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश में अल्पसंख्यक राजनीति की दिशा और परिभाषा क्या होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान चुनावी राजनीति के दौरान अक्सर चर्चा का केंद्र बन जाते हैं, जिससे जनमत पर भी प्रभाव पड़ता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इस तरह की बयानबाजी से राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है।

    फिलहाल, किरेन रिजिजू के इस बयान ने न केवल सोशल मीडिया पर बहस को तेज कर दिया है, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच भी नई बयानबाजी की शुरुआत कर दी है, जिसका असर आने वाले समय में और स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।

  • मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी शैली’ मस्जिद पर सियासी हलचल, हुमायूं कबीर का बड़ा दावा-65 फुट से ऊंची होगी इमारत

    मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी शैली’ मस्जिद पर सियासी हलचल, हुमायूं कबीर का बड़ा दावा-65 फुट से ऊंची होगी इमारत


    नई दिल्ली / मुर्शिदाबाद /पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक और सियासी मुद्दों का मेल चर्चा का विषय बन गया है। तृणमूल कांग्रेस TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद शैली की मस्जिद को लेकर कई अहम दावे किए हैं। उनका कहना है कि यह मस्जिद पहले से ज्यादा ऊंची चौड़ी और भव्य होगी जिसकी ऊंचाई 65 फुट से भी अधिक रखी जाएगी। कबीर के इन बयानों ने न केवल राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर नजरें टिक गई हैं।समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में हुमायूं कबीर ने कहा कि मस्जिद के निर्माण के लिए अब तक 5 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जुटाई जा चुकी है। इसके अलावा निर्माण सामग्री भी आ चुकी है जिसकी अनुमानित कीमत डेढ़ से दो करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है। उन्होंने दावा किया कि जिस मॉडल पर यह मस्जिद बनाई जा रही है वह पहले की तुलना में अधिक ऊंचा और चौड़ा होगा ताकि इसे एक भव्य धार्मिक संरचना के रूप में विकसित किया जा सके।

    हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर को मुर्शिदाबाद में इस मस्जिद की नींव रखी थी। इसके बाद से ही राजनीतिक विवाद तेज हो गया। माना जा रहा है कि इस कदम से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नाराज हुईं जिसके बाद टीएमसी ने कबीर को पार्टी से निलंबित कर दिया। हालांकि पार्टी की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। कबीर का कहना है कि उन्होंने यह कदम सामाजिक और धार्मिक भावना के तहत उठाया है न कि किसी राजनीतिक उकसावे के लिए।राजनीतिक भविष्य को लेकर हुमायूं कबीर ने यह भी ऐलान किया है कि वह 22 दिसंबर को अपनी नई पार्टी की घोषणा करेंगे। उनके अनुसार यह घोषणा दोपहर 12 से 1 बजे के बीच की जाएगी। माना जा रहा है कि नई पार्टी के जरिए कबीर राज्य की राजनीति में एक नया विकल्प पेश करने की कोशिश करेंगे खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों को लेकर।

    इसी बीच सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन AIMIM की पश्चिम बंगाल इकाई ने हुमायूं कबीर के साथ संभावित गठबंधन के संकेत दिए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने कहा कि कबीर से बातचीत चल रही है और आने वाले विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर तालमेल की संभावना तलाशी जा रही है। सोलंकी के अनुसार कबीर अल्पसंख्यकों की आवाज के रूप में उभरे हैं और AIMIM उनके साथ राजनीतिक सहयोग पर विचार कर रही है।हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया है कि गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला AIMIM के राष्ट्रीय नेतृत्व यानी असदुद्दीन ओवैसी द्वारा लिया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय स्तर पर AIMIM ने फिलहाल किसी भी औपचारिक गठबंधन से इनकार किया है जिससे सियासी तस्वीर और जटिल हो गई है।

    हुमायूं कबीर ने एसआईआर Special Intensive Revision जैसे मुद्दों पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि इसका मुर्शिदाबाद में कोई खास असर नहीं पड़ेगा। उनका दावा है कि स्थानीय स्तर पर जनता उनके साथ है और आने वाले समय में इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलेगा।कुल मिलाकर बाबरी मस्जिद शैली की इस प्रस्तावित मस्जिद ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। धार्मिक भावनाओं राजनीतिक गठजोड़ और आगामी चुनावों के बीच यह मुद्दा आने वाले दिनों में और भी तूल पकड़ सकता है।

  • पर्सनल लॉ बोर्ड ने किरेन रीजीजू से की मुलाकात, वक्फ संपत्तियों के 'उम्मीद' पोर्टल की दिक्कतों को दूर करने की मांग

    पर्सनल लॉ बोर्ड ने किरेन रीजीजू से की मुलाकात, वक्फ संपत्तियों के 'उम्मीद' पोर्टल की दिक्कतों को दूर करने की मांग


    नई दिल्‍ली । ऑल इंडिया (All India)मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बृहस्पतिवार (Thursday)को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रीजीजू(Kiren Rijiju) से मुलाकात कर आग्रह किया कि वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण से संबंधित ‘उम्मीद’ पोर्टल से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने के साथ ही दस्तावेजों के अपलोड की समयसीमा एक साल के लिए और बढ़ाई जाए। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ पदाधिकारियों के साथ ही सांसद असदुद्दीन ओवैसी, मोहम्मद जावेद और चंद्रशेखर भी रीजीजू से मिले।

    रीजीजू ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया कि आज मेरे कार्यालय में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत हुई। हमने उम्मीद पोर्टल में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की और विचारों का सुखद आदान-प्रदान किया।

    वहीं, बोर्ड ने एक बयान में कहा कि पंजीकृत वक्फ संपत्तियों को अपलोड करने के लिए निर्धारित छह महीने की समय सीमा बेहद कम थी। पोर्टल पर विवरण अपलोड करते समय कई तकनीकी समस्याओं और गड़बड़ियों का सामना करना पड़ा। इसलिए, सभी संपत्तियों को अपलोड करना बेहद कठिन और व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। नतीजतन, पंजाब वक्फ बोर्ड, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड, गुजरात वक्फ बोर्ड और राजस्थान वक्फ बोर्ड ने समय बढ़ाने की मांग करते हुए न्यायाधिकरण से संपर्क किया और न्यायाधिकरण ने समयसीमा बढ़ा दी।

    उसका कहना है कि इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वक्फ बोर्ड भी छह महीने की समयसीमा का पालन करने में असमर्थ थे और उन्हें अधिक समय का अनुरोध करना पड़ा। उसने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने अनुरोध किया कि मुतवल्लियों के सामने आने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए अपलोड करने की समयसीमा एक वर्ष और बढ़ा दी जाए।

    कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने बताया कि हमने मंत्री के समक्ष उम्मीद पोर्टल से जुड़ी समस्याओं को रखा और उन्होंने आश्चासन दिया कि दिक्कतों को दूर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पोर्टल से संबंधित दिक्कतों को दूर किया जाना बहुत जरूरी है क्योंकि अब तक लाखों वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण नहीं हो सका है।