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  • ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में नहीं पहुंचे ओवैसी, बोले- मेरा क्या काम, बताईं 2 बड़ी मांगें

    ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में नहीं पहुंचे ओवैसी, बोले- मेरा क्या काम, बताईं 2 बड़ी मांगें


    नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मंगलवार को INDIA गठबंधन के प्रदर्शन में AIMIM प्रमुख और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी शामिल नहीं हुए। ओवैसी ने इसकी वजह साफ करते हुए कहा कि उनकी पार्टी INDIA गठबंधन का हिस्सा नहीं है। हालांकि, उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव और SIR को लेकर अपनी अलग मांगें सामने रखीं।

    ‘मैं INDIA का हिस्सा नहीं, तो मेरा क्या काम’
    ओवैसी से जब पूछा गया कि वह ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के प्रदर्शन में क्यों शामिल नहीं हुए, तो उन्होंने कहा कि AIMIM INDIA गठबंधन का हिस्सा नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “मैं उसका हिस्सा नहीं हूं, तो किस्सा ही खत्म। मैं उसका हिस्सा नहीं हूं। बेगानी शादी में मेरा क्या काम।”

    हालांकि, प्रदर्शन में शामिल नहीं होने के बावजूद ओवैसी ने चुनाव आयोग की व्यवस्था और SIR को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया है।

    CEC के चयन में CJI को शामिल करने की मांग
    ओवैसी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनने की मौजूदा प्रक्रिया कार्यपालिका के पक्ष में है और इसमें बदलाव होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि CEC की नियुक्ति करने वाले पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया जाए।

    मौजूदा कानून के तहत CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। ओवैसी लंबे समय से इस व्यवस्था में CJI को शामिल किए जाने की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है।

    SIR को लेकर भी विरोध
    ओवैसी ने दूसरी बड़ी आपत्ति मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जताई। उन्होंने कहा कि बिहार में SIR शुरू होने के समय AIMIM ने भी इसका विरोध किया था और पार्टी की ओर से मतदाताओं से संबंधित दस्तावेज जमा किए गए थे।

    ओवैसी ने SIR की तुलना NRC से करते हुए इसे लेकर अपनी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इसे स्वीकार नहीं करती और इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है।

    यह भी ध्यान देने वाली बात है कि SIR को लेकर विपक्षी दलों की आपत्तियां और चुनाव आयोग का पक्ष अलग-अलग हैं। विपक्षी दल प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग मतदाता सूची को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के तौर पर इसका बचाव करता रहा है।

    AAP और DMK भी मंगलवार के प्रदर्शन से दूर
    मंगलवार को दिल्ली में हुए INDIA गठबंधन के प्रदर्शन में AAP और DMK भी शामिल नहीं हुए। हालांकि, AAP ने चुनाव आयोग के खिलाफ आगे होने वाले विरोध प्रदर्शन से दूरी नहीं बनाई है। पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज के मुताबिक, बुधवार को दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय के बाहर होने वाले प्रदर्शन में AAP शामिल होगी।

    उन्होंने कहा कि जब भी सड़क पर विरोध प्रदर्शन होगा, AAP के कार्यकर्ता उसमें शामिल होंगे। उनके मुताबिक, कांग्रेस और वाम दलों के साथ AAP भी इस प्रदर्शन में हिस्सा लेगी।

    राहुल-प्रियंका ने आकाशवाणी भवन परिसर में दिया धरना
    मंगलवार को INDIA गठबंधन के सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च किया था। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, SIR को रोकना और मतदाता सूची से हटाए गए नामों को बहाल करना शामिल था।

    मार्च को पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने आकाशवाणी भवन परिसर में धरना शुरू कर दिया। करीब आठ-नौ घंटे तक चले इस विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।

    चुनाव आयोग बोला- शाम 4 बजे तक नहीं मांगा था समय
    विपक्ष के प्रदर्शन के बाद चुनाव आयोग ने मंगलवार रात अपने पक्ष में स्पष्टीकरण जारी किया। आयोग ने कहा कि शाम 4 बजे तक किसी राजनीतिक दल ने अपने अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए बैठक के लिए औपचारिक समय नहीं मांगा था।

    आयोग के मुताबिक, करीब 4 बजे दिल्ली पुलिस ने उसे बताया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में 240 सांसदों का प्रतिनिधिमंडल आयोग से मिलकर ज्ञापन देना चाहता है। आयोग ने कहा कि राजनीतिक दलों से बैठक के लिए 2025 में तय प्रक्रिया पहले से लागू है और सभी दल इससे अवगत हैं।

    आयोग के अनुसार, जब बैठक की जगह को लेकर जानकारी मिली तो संसद भवन परिसर में बैठक का प्रस्ताव सामने आया। आयोग ने कहा कि उसके प्रोटोकॉल के मुताबिक राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडल से बैठक निर्वाचन आयोग परिसर में ही होती है। उसने ज्ञापन लेने के लिए वरिष्ठ अधिकारी भेजने का प्रस्ताव भी दिया था।

    इस तरह एक तरफ INDIA गठबंधन CEC के इस्तीफे और SIR को लेकर आंदोलन तेज करने की तैयारी में है, वहीं ओवैसी ने गठबंधन के प्रदर्शन से अलग रहते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में CJI को शामिल करने और SIR को खत्म करने की अपनी मांग दोहराई है।

  • ओवैसी की चुनौती पर रामेश्वर शर्मा का जवाब काजी कैंप और UCC को लेकर फिर आमने सामने आए दोनों नेता

    ओवैसी की चुनौती पर रामेश्वर शर्मा का जवाब काजी कैंप और UCC को लेकर फिर आमने सामने आए दोनों नेता


    भोपाल । AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भोपाल में दिए गए बयान के बाद भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने पलटवार किया है। ओवैसी ने मंगलवार को भोपाल के सेंट्रल लाइब्रेरी ग्राउंड में आयोजित UCC विरोधी सभा के दौरान रामेश्वर शर्मा के काजी कैंप में मिसाइल लॉन्च करने वाले बयान का जिक्र किया था। उन्होंने विधायक को काजी कैंप आने की चुनौती दी थी। इसके बाद बुधवार को रामेश्वर शर्मा ने ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अपने पुराने बयान पर कायम रहने की बात कही।

    रामेश्वर शर्मा ने ओवैसी को संबोधित करते हुए कहा कि अगर वह बैरिस्टर हैं तो उन्हें बदतमीजी की भाषा छोड़ देनी चाहिए। इसके बाद विधायक ने बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए ओवैसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के वैज्ञानिकों की ओर से तैयार की गई मिसाइलों का इस्तेमाल भारतीय सेना ने किया और पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। शर्मा ने दावा किया कि आतंकवाद और भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े ठिकानों के खिलाफ भारत की मिसाइल कार्रवाई जारी रहेगी।

    विधायक ने कहा कि मिसाइल चलती थी और मिसाइल चलती रहेगी। उन्होंने कहा कि जहां आतंकवाद के कैंप होंगे और जहां भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े कैंप होंगे वहां भारत की मिसाइल तैयार है। शर्मा ने कहा कि वह अपने पहले दिए गए बयान पर कल भी कायम थे और आज भी कायम हैं। उन्होंने ओवैसी को पूरा भाषण सुनने की बात कहते हुए कहा कि अगर उन्हें आपत्ति है तो वह वकील होने के नाते इसे अदालत में ले जा सकते हैं।

    इसके बाद रामेश्वर शर्मा ने समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर भी ओवैसी के बयान पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल हिंदुओं से वोट मांगते हैं तो हिंदुओं से जुड़े कानूनों को लेकर सवाल क्यों उठाए जाते हैं। उन्होंने UCC को लेकर अपनी पार्टी के समर्थन की बात दोहराई और कहा कि मध्यप्रदेश में UCC लागू हो चुका है। शर्मा ने यह भी दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 तक 21 राज्यों में UCC लागू होने की बात कही है।

    ओवैसी ने भोपाल में आयोजित अपनी सभा में UCC को लेकर अलग रुख रखा था। उन्होंने सवाल उठाया था कि यदि मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय को उनकी संस्कृति परंपरा और धार्मिक पहचान के कारण UCC से बाहर रखा गया है तो मुसलमानों को इसके दायरे में क्यों शामिल किया गया। उन्होंने UCC के जरिए RSS का एजेंडा चलाने का आरोप लगाया था। ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान में दिए गए अधिकारों का भी हवाला दिया था।

    इस तरह भोपाल में UCC को लेकर दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर ओवैसी UCC के प्रावधानों और इसके दायरे को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो दूसरी ओर रामेश्वर शर्मा इसे लागू करने के समर्थन में अपना पक्ष रख रहे हैं। मिसाइल संबंधी पुराने बयान को लेकर ओवैसी की चुनौती के बाद शर्मा के जवाब ने इस राजनीतिक विवाद को और चर्चा में ला दिया है।

  • UCC के विरोध में भोपाल पहुंचे ओवैसी RSS पर लगाया एजेंडा चलाने का आरोप भाजपा विधायक को दी चुनौती

    UCC के विरोध में भोपाल पहुंचे ओवैसी RSS पर लगाया एजेंडा चलाने का आरोप भाजपा विधायक को दी चुनौती


    नई दिल्ली। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी मंगलवार को भोपाल पहुंचे। उन्होंने सेंट्रल लाइब्रेरी ग्राउंड में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए समान नागरिक संहिता यानी UCC का विरोध किया। यह सभा AIMIM के UCC विरोधी अभियान का हिस्सा थी। इस दौरान ओवैसी ने मध्यप्रदेश में आदिवासी समुदाय को UCC से बाहर रखने और मुसलमानों को इसके दायरे में लाने को लेकर सवाल उठाए।

    ओवैसी ने कहा कि मध्यप्रदेश की आबादी में आदिवासियों की बड़ी हिस्सेदारी है और उनकी अलग संस्कृति परंपराएं तथा सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। उनके मुताबिक इन्हीं कारणों से आदिवासियों को UCC से बाहर रखा गया है। उन्होंने सवाल किया कि यदि अलग संस्कृति और परंपराओं को आधार मानकर एक समुदाय को UCC से अलग रखा जा सकता है तो मुसलमानों को इसके दायरे में क्यों लाया जा रहा है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि UCC के जरिए RSS का एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है।

    सभा में ओवैसी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों की अपनी धार्मिक और सामाजिक पहचान है। उन्होंने UCC के जरिए हिंदू मैरिज एक्ट हिंदू सक्सेशन एक्ट और अडॉप्शन एंड कस्टडी से जुड़े प्रावधानों को गैर हिंदुओं पर लागू करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 25 26 और 29 का उल्लेख करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों की बात कही।

    ओवैसी ने केंद्र में भाजपा के सहयोगी दलों से भी UCC को लेकर अपना रुख स्पष्ट करने की अपील की। उन्होंने TDP JDU चिराग पासवान एचडी कुमारस्वामी और जयंत चौधरी का नाम लेते हुए कहा कि यदि इन दलों का भाजपा से कुछ वैचारिक अंतर अभी भी है तो उन्हें UCC का विरोध करना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब समान नागरिक संहिता को लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है।

    भोपाल की सभा में भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा का मुद्दा भी उठा। ओवैसी ने काजी कैंप से जुड़े उनके पुराने मिसाइल वाले बयान का जिक्र करते हुए उन्हें काजी कैंप आने की चुनौती दी। उन्होंने इस क्षेत्र से जुड़े स्वतंत्रता संग्राम के योगदानकर्ताओं के नाम भी गिनाए और कहा कि भोपाल की इस जमीन का अपना ऐतिहासिक महत्व है।

    ओवैसी ने भाजपा शासित राज्यों में मस्जिदों और कब्रिस्तानों को नुकसान पहुंचाए जाने के आरोप भी लगाए। हालांकि ये आरोप उनके राजनीतिक वक्तव्य के तौर पर सामने आए। उन्होंने सागर में जहरीली शराब के मामले का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री से कार्रवाई की मांग की। लव जिहाद से जुड़े सवाल पर ओवैसी ने कहा कि यदि दो बालिग अपनी इच्छा से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें रोकने का अधिकार सरकार या किसी अन्य व्यक्ति को नहीं होना चाहिए।

    सभा के दौरान ओवैसी ने सोवियत यूनियन का उदाहरण देते हुए RSS पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वहां कम्युनिस्ट शासन के दौरान मदरसों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद मुस्लिम परिवारों ने अपने बच्चों की पढ़ाई घर पर जारी रखी। भोपाल में हुई इस सभा के दौरान UCC के साथ धार्मिक स्वतंत्रता सामाजिक पहचान अल्पसंख्यक अधिकार और राजनीतिक मुद्दों पर ओवैसी ने अपनी पार्टी का पक्ष रखा।

  • ओवैसी के बाद टी राजा की एंट्री की मांग: मई में कैंसिल सभा के लिए फिर अनुमति लेने की तैयारी

    ओवैसी के बाद टी राजा की एंट्री की मांग: मई में कैंसिल सभा के लिए फिर अनुमति लेने की तैयारी


    भोपाल। भोपाल में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की सभा के बाद अब तेलंगाना के विधायक टी राजा की प्रस्तावित धर्मसभा को लेकर सियासत तेज होती दिखाई दे रही है। हिंदू उत्सव समिति ने प्रशासन से टी राजा की सभा के लिए अनुमति देने की मांग उठाने का फैसला किया है। समिति का कहना है कि जिस सेंट्रल लाइब्रेरी मैदान में ओवैसी की सभा आयोजित की गई है वहां टी राजा की सभा के लिए भी अनुमति पर विचार किया जाना चाहिए। समिति इस मुद्दे को लेकर पुलिस कमिश्नर संजय कुमार से मुलाकात करने की तैयारी में है।

    हिंदू उत्सव समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी के मुताबिक समिति इकबाल मैदान अग्रसेन चौक या सेंट्रल लाइब्रेरी मैदान में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगेगी। उनका कहना है कि मई में टी राजा की प्रस्तावित सभा को सुरक्षा कारणों का हवाला देकर रद्द किया गया था। अब ओवैसी की सभा आयोजित होने के बाद समिति ने प्रशासन के सामने समान नियमों के आधार पर अनुमति देने का सवाल उठाने की बात कही है।

    दरअसल मंगलवार रात भोपाल के सेंट्रल लाइब्रेरी मैदान में असदुद्दीन ओवैसी की सभा हुई थी। कार्यक्रम में ओवैसी ने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर मध्य प्रदेश सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने मुस्लिम समुदाय को यूसीसी से बाहर रखने की मांग रखी और सरकार पर आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया। ओवैसी ने लव जिहाद कानून का मुद्दा उठाते हुए भी सरकार से सवाल किए। सभा के दौरान उन्होंने हुजूर विधायक रामेश्वर शर्मा के बयानों और सागर शराब मामले को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा।

    इसी घटनाक्रम के बाद टी राजा की सभा का मुद्दा फिर सामने आया है। टी राजा की भोपाल के गांधीनगर क्षेत्र में 31 मई को धर्मसभा प्रस्तावित थी लेकिन पुलिस प्रशासन से अनुमति नहीं मिलने के कारण कार्यक्रम रद्द कर दिया गया था। कार्यक्रम निरस्त होने के बाद टी राजा ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों के जरिए नाराजगी जाहिर की थी। उनके कुछ बयानों को लेकर विवाद भी हुआ था।

    धर्मसभा को लेकर सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में भोपाल के तलैया थाने में शिकायत दर्ज हुई थी। शिकायत में दो इंस्टाग्राम अकाउंट संचालकों पर धमकी अभद्र भाषा और भड़काऊ टिप्पणियां करने के आरोप लगाए गए थे। मामले में सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका का भी उल्लेख किया गया था।

    टी राजा तेलंगाना के गोशामहल विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं और अपने आक्रामक बयानों को लेकर अक्सर राजनीतिक चर्चा में रहते हैं। उनकी प्रस्तावित भोपाल सभा की अनुमति का मामला पहले न्यायालय तक भी पहुंचा था। अब ओवैसी की सभा के बाद हिंदू उत्सव समिति की ओर से टी राजा के कार्यक्रम की अनुमति मांगने की तैयारी ने इस पूरे मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले दिनों में प्रशासन इस प्रस्ताव पर क्या फैसला करता है इस पर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की नजर रहेगी।

  • IIT दिल्ली के कार्यक्रम पर सियासी विवाद तेज, ओवैसी ने संविधान की धाराओं से जताई आपत्ति

    IIT दिल्ली के कार्यक्रम पर सियासी विवाद तेज, ओवैसी ने संविधान की धाराओं से जताई आपत्ति


    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के IIT दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में शामिल होने के बाद अब कार्यक्रम से जुड़े कथित निर्देशों को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। हैदराबाद से सांसद और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि कार्यक्रम में छात्रों को प्रधानमंत्री से मेडल या डिग्री लेते समय सिर झुकाने और वैदिक मंत्रोच्चार के दौरान खड़े रहने के निर्देश दिए गए थे। ओवैसी ने इन कथित निर्देशों पर सवाल उठाते हुए इसे संविधान की भावना और वैज्ञानिक सोच से जुड़े प्रावधानों के विपरीत बताया है। हालांकि इन आरोपों पर अभी तक सरकार या भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    ओवैसी ने कहा कि IIT दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित सरकारी तकनीकी संस्थान में छात्रों के लिए इस तरह के कथित निर्देश गंभीर सवाल खड़े करते हैं। उनका कहना है कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार छात्रों को यह तक बताया गया था कि प्रधानमंत्री से मेडल लेते समय उन्हें किस तरह और कितनी मात्रा में गर्दन झुकानी है। इसके साथ ही वैदिक मंत्रों के पाठ के दौरान सभी छात्रों के खड़े रहने की बात भी सामने आई। ओवैसी ने कहा कि अगर इस तरह के निर्देश वास्तव में दिए गए हैं तो इन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

    अपने बयान में ओवैसी ने संविधान के अनुच्छेद 28 का उल्लेख किया। उनका तर्क है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक गतिविधियों से जुड़े प्रावधानों को संविधान की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि IIT जैसे संस्थान केवल तकनीकी शिक्षा के केंद्र नहीं हैं बल्कि वैज्ञानिक सोच और तार्किक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 51A के वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने से जुड़े प्रावधान का भी हवाला दिया।

    ओवैसी ने प्रधानमंत्री के सामने छात्रों के कथित तरीके से अभिवादन करने के निर्देश पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि किसी सरकारी शिक्षण संस्थान में छात्रों को इस तरह के निर्देश देना उचित नहीं है। उन्होंने छात्रों से यह भी कहा कि राष्ट्रीय हित का मतलब केवल सरकार का समर्थन करना नहीं है बल्कि जब किसी सरकारी फैसले या कदम को गलत माना जाए तो उसके खिलाफ आवाज उठाना भी राष्ट्रीय हित का हिस्सा हो सकता है।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को IIT दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में शामिल हुए थे। कार्यक्रम में करीब 587 पीएचडी स्कॉलर्स और 3,000 से ज्यादा छात्रों को डिग्रियां प्रदान की गईं। प्रधानमंत्री ने इस दौरान छात्रों को उनके भविष्य और देश में नवाचार की भूमिका को लेकर संबोधित किया। उन्होंने युवाओं से जिज्ञासा बनाए रखने और बड़ी चुनौतियों को छोटे हिस्सों में बांटकर उनका समाधान खोजने की बात कही।

    प्रधानमंत्री ने छात्रों को जीवन में आगे बढ़ने के साथ अपने शिक्षकों और संस्थान से जुड़े रहने का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि देश का भविष्य युवाओं की प्रतिभा और नवाचार से जुड़ा है। ऐसे में IIT दिल्ली का यह कार्यक्रम शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।

    फिलहाल ओवैसी की आपत्ति मुख्य रूप से कथित प्रोटोकॉल और धार्मिक मंत्रोच्चार के दौरान दिए गए निर्देशों को लेकर है। इन निर्देशों की वास्तविक प्रकृति और उनका आधिकारिक आधार क्या था इस पर संस्थान या सरकार की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है। इसलिए इस पूरे मामले में अंतिम स्थिति आधिकारिक प्रतिक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही स्पष्ट होगी। राजनीतिक बयानबाजी के बीच IIT दिल्ली का दीक्षांत समारोह एक बार फिर शिक्षा संस्थानों में परंपरा प्रोटोकॉल संवैधानिक मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर बहस के केंद्र में आ गया है।

  • असम में यूसीसी बिल पर बढ़ा राजनीतिक विवाद, ओवैसी ने उठाए संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों के सवाल

    असम में यूसीसी बिल पर बढ़ा राजनीतिक विवाद, ओवैसी ने उठाए संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों के सवाल

    नई दिल्ली । असम में समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में संबंधित विधेयक पेश किए जाने के बाद अब इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इसी क्रम में हैदराबाद से सांसद और एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi ने प्रस्तावित व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इस कानून के कई प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए और कहा कि यह मुद्दा केवल कानून का नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संरचना से भी जुड़ा हुआ है। उनके बयान के बाद इस विषय पर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है।

    असम सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के तहत विवाह, तलाक, विरासत और पारिवारिक कानूनों से जुड़े कई प्रावधानों में समान व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार बहुविवाह और एक से अधिक विवाह को गैर-कानूनी बनाए जाने का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में महिलाओं को समान अधिकार देने की भी बात कही गई है। सरकार का मानना है कि ऐसे प्रावधान सामाजिक समानता और कानूनी स्पष्टता को बढ़ावा देंगे।

    हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी असहमति व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की व्यवस्था कुछ समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक परंपराओं को प्रभावित कर सकती है। उनके अनुसार कानून यदि समानता के उद्देश्य से लाया जा रहा है तो उसका दायरा और प्रभाव भी सभी वर्गों पर एक जैसा होना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कुछ वर्गों या समुदायों को विशेष छूट दी जाती है तो फिर समानता के सिद्धांत पर बहस स्वाभाविक हो जाती है।

    ओवैसी ने यह भी कहा कि संविधान के अंतर्गत विभिन्न समुदायों को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार प्राप्त है। उनके अनुसार किसी भी कानून को लागू करते समय संवैधानिक संतुलन और सामाजिक विविधता का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने विरासत और उत्तराधिकार के मामलों को लेकर भी अपनी चिंताएं सामने रखीं और कहा कि इन विषयों पर व्यापक चर्चा आवश्यक है।

    दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों को एक समान कानूनी ढांचे के अंतर्गत लाना और महिलाओं को अधिक सुरक्षा एवं अधिकार उपलब्ध कराना है। प्रस्ताव में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य करने और वैवाहिक नियमों को अधिक स्पष्ट बनाने जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। इस मुद्दे ने अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर और अधिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि यह मुद्दा केवल कानून तक सीमित नहीं बल्कि समाज और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • ओवैसी और कांग्रेस पर किरेन रिजिजू का तीखा बयान, अल्पसंख्यक राजनीति पर फिर छिड़ी बहस

    ओवैसी और कांग्रेस पर किरेन रिजिजू का तीखा बयान, अल्पसंख्यक राजनीति पर फिर छिड़ी बहस

    नई दिल्ली ।भारतीय राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी देखने को मिली है, जब केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री Kiren Rijiju ने एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi को लेकर एक बयान दिया, जिसने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। उनके बयान के केंद्र में न केवल ओवैसी रहे, बल्कि मुख्य विपक्षी दल Indian National Congress पर भी गंभीर आरोप लगाए गए।

    मामला तब सामने आया जब किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी करते हुए ओवैसी को देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में से एक बताया और साथ ही यह भी कहा कि वे लगातार मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की बात उठाते रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसे “मुस्लिम लीग पार्टी” जैसा बताने की बात कही, जिससे राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

    रिजिजू के इस बयान के बाद देश की राजनीति में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। उन्होंने अपने विचारों में यह भी संकेत दिया कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, अपनी जनसंख्या और स्थिति को लेकर किसी तरह की हीन भावना न रखें, क्योंकि देश का लोकतांत्रिक ढांचा सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है।

    अपने बयान के दौरान उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि देश में अलग-अलग धार्मिक समुदाय शांतिपूर्वक और सुरक्षित वातावरण में रहते हैं। उन्होंने पारसी समुदाय का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमित संख्या में होने के बावजूद यह समुदाय भी भारत में सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने यह तर्क देने की कोशिश की कि भारत में धार्मिक आधार पर भेदभाव की स्थिति नहीं है और सभी समुदायों को समान अवसर प्राप्त हैं।

    इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में विभिन्न दलों की ओर से प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। विपक्षी नेताओं ने इस टिप्पणी को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आलोचना की है, जबकि समर्थक इसे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं। इस मुद्दे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश में अल्पसंख्यक राजनीति की दिशा और परिभाषा क्या होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान चुनावी राजनीति के दौरान अक्सर चर्चा का केंद्र बन जाते हैं, जिससे जनमत पर भी प्रभाव पड़ता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इस तरह की बयानबाजी से राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है।

    फिलहाल, किरेन रिजिजू के इस बयान ने न केवल सोशल मीडिया पर बहस को तेज कर दिया है, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच भी नई बयानबाजी की शुरुआत कर दी है, जिसका असर आने वाले समय में और स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।

  • मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी शैली’ मस्जिद पर सियासी हलचल, हुमायूं कबीर का बड़ा दावा-65 फुट से ऊंची होगी इमारत

    मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी शैली’ मस्जिद पर सियासी हलचल, हुमायूं कबीर का बड़ा दावा-65 फुट से ऊंची होगी इमारत


    नई दिल्ली / मुर्शिदाबाद /पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक और सियासी मुद्दों का मेल चर्चा का विषय बन गया है। तृणमूल कांग्रेस TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद शैली की मस्जिद को लेकर कई अहम दावे किए हैं। उनका कहना है कि यह मस्जिद पहले से ज्यादा ऊंची चौड़ी और भव्य होगी जिसकी ऊंचाई 65 फुट से भी अधिक रखी जाएगी। कबीर के इन बयानों ने न केवल राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर नजरें टिक गई हैं।समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में हुमायूं कबीर ने कहा कि मस्जिद के निर्माण के लिए अब तक 5 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जुटाई जा चुकी है। इसके अलावा निर्माण सामग्री भी आ चुकी है जिसकी अनुमानित कीमत डेढ़ से दो करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है। उन्होंने दावा किया कि जिस मॉडल पर यह मस्जिद बनाई जा रही है वह पहले की तुलना में अधिक ऊंचा और चौड़ा होगा ताकि इसे एक भव्य धार्मिक संरचना के रूप में विकसित किया जा सके।

    हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर को मुर्शिदाबाद में इस मस्जिद की नींव रखी थी। इसके बाद से ही राजनीतिक विवाद तेज हो गया। माना जा रहा है कि इस कदम से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नाराज हुईं जिसके बाद टीएमसी ने कबीर को पार्टी से निलंबित कर दिया। हालांकि पार्टी की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। कबीर का कहना है कि उन्होंने यह कदम सामाजिक और धार्मिक भावना के तहत उठाया है न कि किसी राजनीतिक उकसावे के लिए।राजनीतिक भविष्य को लेकर हुमायूं कबीर ने यह भी ऐलान किया है कि वह 22 दिसंबर को अपनी नई पार्टी की घोषणा करेंगे। उनके अनुसार यह घोषणा दोपहर 12 से 1 बजे के बीच की जाएगी। माना जा रहा है कि नई पार्टी के जरिए कबीर राज्य की राजनीति में एक नया विकल्प पेश करने की कोशिश करेंगे खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों को लेकर।

    इसी बीच सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन AIMIM की पश्चिम बंगाल इकाई ने हुमायूं कबीर के साथ संभावित गठबंधन के संकेत दिए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने कहा कि कबीर से बातचीत चल रही है और आने वाले विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर तालमेल की संभावना तलाशी जा रही है। सोलंकी के अनुसार कबीर अल्पसंख्यकों की आवाज के रूप में उभरे हैं और AIMIM उनके साथ राजनीतिक सहयोग पर विचार कर रही है।हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया है कि गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला AIMIM के राष्ट्रीय नेतृत्व यानी असदुद्दीन ओवैसी द्वारा लिया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय स्तर पर AIMIM ने फिलहाल किसी भी औपचारिक गठबंधन से इनकार किया है जिससे सियासी तस्वीर और जटिल हो गई है।

    हुमायूं कबीर ने एसआईआर Special Intensive Revision जैसे मुद्दों पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि इसका मुर्शिदाबाद में कोई खास असर नहीं पड़ेगा। उनका दावा है कि स्थानीय स्तर पर जनता उनके साथ है और आने वाले समय में इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलेगा।कुल मिलाकर बाबरी मस्जिद शैली की इस प्रस्तावित मस्जिद ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। धार्मिक भावनाओं राजनीतिक गठजोड़ और आगामी चुनावों के बीच यह मुद्दा आने वाले दिनों में और भी तूल पकड़ सकता है।

  • पर्सनल लॉ बोर्ड ने किरेन रीजीजू से की मुलाकात, वक्फ संपत्तियों के 'उम्मीद' पोर्टल की दिक्कतों को दूर करने की मांग

    पर्सनल लॉ बोर्ड ने किरेन रीजीजू से की मुलाकात, वक्फ संपत्तियों के 'उम्मीद' पोर्टल की दिक्कतों को दूर करने की मांग


    नई दिल्‍ली । ऑल इंडिया (All India)मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बृहस्पतिवार (Thursday)को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रीजीजू(Kiren Rijiju) से मुलाकात कर आग्रह किया कि वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण से संबंधित ‘उम्मीद’ पोर्टल से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने के साथ ही दस्तावेजों के अपलोड की समयसीमा एक साल के लिए और बढ़ाई जाए। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ पदाधिकारियों के साथ ही सांसद असदुद्दीन ओवैसी, मोहम्मद जावेद और चंद्रशेखर भी रीजीजू से मिले।

    रीजीजू ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया कि आज मेरे कार्यालय में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत हुई। हमने उम्मीद पोर्टल में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की और विचारों का सुखद आदान-प्रदान किया।

    वहीं, बोर्ड ने एक बयान में कहा कि पंजीकृत वक्फ संपत्तियों को अपलोड करने के लिए निर्धारित छह महीने की समय सीमा बेहद कम थी। पोर्टल पर विवरण अपलोड करते समय कई तकनीकी समस्याओं और गड़बड़ियों का सामना करना पड़ा। इसलिए, सभी संपत्तियों को अपलोड करना बेहद कठिन और व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। नतीजतन, पंजाब वक्फ बोर्ड, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड, गुजरात वक्फ बोर्ड और राजस्थान वक्फ बोर्ड ने समय बढ़ाने की मांग करते हुए न्यायाधिकरण से संपर्क किया और न्यायाधिकरण ने समयसीमा बढ़ा दी।

    उसका कहना है कि इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वक्फ बोर्ड भी छह महीने की समयसीमा का पालन करने में असमर्थ थे और उन्हें अधिक समय का अनुरोध करना पड़ा। उसने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने अनुरोध किया कि मुतवल्लियों के सामने आने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए अपलोड करने की समयसीमा एक वर्ष और बढ़ा दी जाए।

    कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने बताया कि हमने मंत्री के समक्ष उम्मीद पोर्टल से जुड़ी समस्याओं को रखा और उन्होंने आश्चासन दिया कि दिक्कतों को दूर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पोर्टल से संबंधित दिक्कतों को दूर किया जाना बहुत जरूरी है क्योंकि अब तक लाखों वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण नहीं हो सका है।