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  • पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट: चुनाव से पहले राजनीतिक तूफ़ान तेज, एसआईआर और दस्तावेज़ विवाद से बढ़ी चिंता

    पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट: चुनाव से पहले राजनीतिक तूफ़ान तेज, एसआईआर और दस्तावेज़ विवाद से बढ़ी चिंता

    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन की अटकलों ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। राज्यपाल के अचानक बदलाव, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे पर विवाद और चुनाव आयोग की टीम के दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन ने इस संभावना को और गहरा कर दिया है।

    इतिहास और संवैधानिक पहलू
    पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू होने का इतिहास बहुत लंबा नहीं है। 30 अप्रैल 1977 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जो वाममोर्चा सरकार के शपथ ग्रहण तक 52 दिनों तक जारी रहा। अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या बंगाल एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है।

    चुनाव आयोग का दौरा और विरोध प्रदर्शन
    चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने कोलकाता दौरे के दौरान सभी राजनीतिक दलों और पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर चुनावी तैयारियों का जायजा लिया। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर सीधे जवाब देने से परहेज किया और कहा कि कानून-व्यवस्था की समीक्षा के बाद चुनाव की तारीख और चरण तय किए जाएंगे।

    तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने एक या दो चरणों में मतदान कराने की मांग की। आयोग को कोलकाता और आसपास बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। तृणमूल समर्थकों ने काले झंडे दिखाए और “लोकतंत्र का हत्यारा” जैसे पोस्टर भी लगाए।

    एसआईआर प्रक्रिया पर विवाद
    राज्य में नवंबर से चल रही एसआईआर (Special Summary Revision) प्रक्रिया के तहत लगभग 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज विचाराधीन हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दस्तावेजों की जांच में न्यायिक अधिकारियों को दो महीने का समय लगने की संभावना है। राजनीतिक दलों का कहना है कि इस स्थिति में चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण होगा।

    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने की साजिश की जा रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अचानक राज्यपाल सीवी आनंद बोस की जगह आर.एन. रवि को क्यों नियुक्त किया गया, जो तमिलनाडु में विवादित रहे हैं।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का दौरा और विवाद
    राष्ट्रपति का दौरा सिलीगुड़ी में आदिवासी सम्मेलन के लिए था। हालांकि मुख्यमंत्री ने इसे लेकर असंतोष जताया और कहा कि उन्हें न्यूनतम प्रोटोकॉल तक नहीं मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस पर राष्ट्रपति के अपमान का आरोप लगाया।

    राजनीतिक माहौल और भविष्य की चुनौतियां
    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एसआईआर के तहत विचाराधीन 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज समय पर जांच कर लिए जाएंगे। यदि यह कार्य पूरा नहीं हुआ, तो या तो चुनाव टालना पड़ सकता है या बिना पूरी सूची के चुनाव कराना पड़ सकता है। इससे राष्ट्रपति शासन की संभावना बढ़ सकती है।अगले कुछ दिनों में केंद्र और चुनाव आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा साफ होगी।

  • पश्चिम बंगाल: हुमायूं कबीर ने 11 फरवरी से बाबरी मस्जिद निर्माण का किया ऐलान, ओवैसी से बढ़ी नजदीकियां

    पश्चिम बंगाल: हुमायूं कबीर ने 11 फरवरी से बाबरी मस्जिद निर्माण का किया ऐलान, ओवैसी से बढ़ी नजदीकियां


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। ‘जनता उन्नयन पार्टी  के अध्यक्ष हुमायूं कबीर और एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष इमरान सोलंकी के बीच शुक्रवार शाम मुर्शिदाबाद में हुई मुलाकात ने नए गठबंधन की अटकलों को हवा दे दी है। इसी बैठक के दौरान कबीर ने बड़ा बयान देते हुए 11 फरवरी से बाबरी मस्जिद के निर्माण कार्य की शुरुआत होने की घोषणा की।

    हुमायूं कबीर के मुताबिक, 11 फरवरी को निर्माण स्थल पर करीब पांच हजार लोगों की मौजूदगी रहेगी। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 10 बजे पवित्र कुरान के पाठ से होगी, जो लगभग डेढ़ घंटे तक चलेगा। इसके बाद दोपहर 12 बजे राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए मुस्लिम बुद्धिजीवी, शिक्षाविद और ट्रस्ट के सदस्य मिलकर मस्जिद की नींव रखेंगे। कबीर ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम में केवल समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल होंगे और इसे राजनीति से अलग रखा जाएगा।

    ममता सरकार पर सीधा हमला

    बैठक के बाद हुमायूं कबीर ने तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ तीखा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि AIMIM और SDPI के साथ गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है। कबीर ने दावा किया कि मार्च महीने में कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक बड़ी रैली आयोजित की जाएगी, जिसमें AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की मौजूदगी तय मानी जा रही है। कबीर ने इसे ममता सरकार के पतन की शुरुआत बताया।

    पुरानी बातचीत, नई मजबूती
    गौरतलब है कि दिसंबर से ही हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी के बीच बढ़ती नजदीकियों के संकेत मिलते रहे हैं। अब मुर्शिदाबाद में इमरान सोलंकी के साथ हुई ताजा बैठक के बाद इन अटकलों को और बल मिला है। AIMIM की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि पार्टी पश्चिम बंगाल में मुस्लिम, दलित और वंचित समाज के अधिकारों के लिए पूरी ताकत के साथ संघर्ष करेगी।

  • इस साल 5 राज्यों में होंगे विधानसभा चुनाव….. असम से बंगाल तक विपक्षी गठबंधन तक अकेले घेरेगी BJP

    इस साल 5 राज्यों में होंगे विधानसभा चुनाव….. असम से बंगाल तक विपक्षी गठबंधन तक अकेले घेरेगी BJP


    नई दिल्ली।
    इस साल होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनावों (Five Legislative Assemblies Elections) के लिए भाजपा (BJP) के अधिकांश हमलों के निशाने पर कांग्रेस ही रहेगी, भले ही उसका मुकाबला विपक्ष के किसी भी दल के साथ क्यू न हो। दरअसल, भाजपा का मानना है कि देशभर में उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस (Congress) है और वही विपक्ष के गठबंधन (Opposition Alliance) की धुरी भी। इन चुनावों में असम में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है, जबकि केरल में उसे कांग्रेस और वामपंथी दलों के गठबंधनों से जूझना है। तमिलनाडु में कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन का अहम हिस्सा है। केवल पश्चिम बंगाल ही ऐसा है, जहां भाजपा व तृणमूल कांग्रेस में सीधा संघर्ष है।

    भाजपा के चुनाव रणनीतिकारों का मानना है कि विपक्ष के केंद्र में कांग्रेस है इसलिए भाजपा का निशाना भी कांग्रेस ही रहेगी। वैसे भी बीते 75 वर्षों में अधिकांश समय कांग्रेस के सत्ता में रहने से भाजपा को उस पर हमला करने के लिए काफी मुद्दे रहते हैं। पार्टी के एक प्रमुख नेता ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को देखें तो भाजपा कांग्रेस को हराकर ही केंद्र व अधिकांश राज्यों में सत्ता में है और भाजपा का बड़ा समर्थक वर्ग भी वही है, जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था। ऐसे में बड़े स्तर पर उसके लिए चुनौती भी कांग्रेस ही बन सकती है।

    सूत्रों के मुताबिक रणनीति के अनुसार भाजपा के केंद्रीय चुनाव प्रचारक सभी जगहों पर कांग्रेस को केंद्र में रखकर हमलावर रहेंगे। राज्य के नेता स्थानीय समीकरणों के अनुसार राज्य के विरोधी खेमे पर निशाना साध रहे हैं। गठबंधन की राजनीति में भाजपा अपने सहयोगी दलों की रणनीति का भी अनुसरण कर अपना ऐजेंडा भी उसी तरह से आगे बढ़ाएगी। चूंकि भाजपा राष्ट्रीय दल है इसलिए वह कई मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों के स्तर पर नहीं जा सकती है।

  • पश्चिम बंगाल में TMC की पकड़ मजबूत, BJP को 42% वोट शेयर के बावजूद बड़ा झटका?

    पश्चिम बंगाल में TMC की पकड़ मजबूत, BJP को 42% वोट शेयर के बावजूद बड़ा झटका?


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का माहौल गरम है और इसी बीच ताजे सर्वे ने राज्य की राजनीति का नया रुख सामने ला दिया है। सर्वे के अनुसार अगर आज लोकसभा चुनाव होते, तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) 2024 के अपने प्रदर्शन को दोहरा सकती है और लगभग सभी सीटें बरकरार रख सकती है। हालांकि भाजपा के लिए भी एक अच्छी खबर है, क्योंकि सर्वे में भाजपा के नेतृत्व वाले NDA का वोट शेयर 39% से बढ़कर 42% तक पहुंचने की संभावना दिखाई गई है। यह तीन प्रतिशत की बढ़त भाजपा के लिए सकारात्मक मानी जा रही है, लेकिन इस बढ़त के बावजूद बंगाल में बड़े स्तर पर सत्ता परिवर्तन की तस्वीर अभी साफ नहीं दिखती।

    विशेष रूप से यह सर्वे ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव सिर्फ दो महीने दूर हैं। ऐसे में यह सर्वे राज्य की जनता के मौजूदा राजनीतिक मूड का संकेत माना जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक चुनावी नतीजे कई कारकों पर निर्भर करते हैं। फिर भी, सर्वे यह साफ करता है कि बंगाल में अब मुकाबला पूरी तरह TMC और BJP के बीच द्विध्रुवीय होता जा रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण काफी तेज हुआ है और यह राज्य अब साफ तौर पर TMC और BJP के बीच टकराव की दिशा में बढ़ रहा है। अगर पिछले सर्वे को देखा जाए तो फरवरी 2024 में TMC को 22 सीटें और BJP को 19 सीटें मिलने का अनुमान था। बाद में अगस्त 2024 में TMC के 32 और BJP के 8 सीटें मिलने की संभावना जताई गई थी। अब ताजे सर्वे में भाजपा का वोट शेयर बढ़ा है, लेकिन फिर भी TMC की पकड़ मजबूत दिखती है और ममता बनर्जी की छवि बंगाल में एक प्रमुख राजनीतिक धुरी बनी हुई है।

    सर्वे के मुताबिक, BJP के वोट शेयर में बढ़ोतरी के बावजूद वह बंगाल में कोई बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में नहीं दिख रही। तृणमूल कांग्रेस की मजबूत सामाजिक और क्षेत्रीय जड़ों के कारण भद्रलोक और ग्रामीण इलाकों में उसकी पकड़ अभी भी टेढ़ी खाई बनी हुई है। वहीं BJP धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ा रही है, खासकर कुछ खास इलाकों में जहां पार्टी का संगठन मजबूत हो रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि यदि चुनाव तक इसी तरह का जनाधार बना रहता है तो बंगाल में कमल का फूल खिलाने का भाजपा का सपना अधूरा रह सकता है। वहीं, ममता बनर्जी के लिए यह सर्वे एक राहत भरा संकेत है कि उनकी पार्टी के प्रति लोगों की विश्वास की लहर अभी भी कायम है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि भाजपा की बढ़ती ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण और वोट शेयर के बदलाव भविष्य में किसी भी मोड़ पर निर्णायक साबित हो सकते हैं।

    अगले कुछ हफ्तों में चुनावी प्रचार, घोषणापत्र, गठबंधन रणनीति और स्थानीय मुद्दों का प्रभाव नतीजों को बदल सकता है। फिलहाल सर्वे यह संकेत दे रहा है कि बंगाल में TMC का प्रभाव अभी भी मजबूत है और BJP को बड़े स्तर पर सत्ता परिवर्तन के लिए अभी और मेहनत करनी होगी। ऐसे में बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य पर नजरें टिके हुए हैं, क्योंकि आने वाले चुनावी माहौल में हर छोटा-सा बदलाव भी बड़े नतीजे ला सकता है।

  • उद्धव गुट का कांग्रेस पर तंज: 'मुंबई में कांग्रेस एक पर्यटक की तरह आती हैहार कर चली जाती है'

    उद्धव गुट का कांग्रेस पर तंज: 'मुंबई में कांग्रेस एक पर्यटक की तरह आती हैहार कर चली जाती है'


    नई दिल्ली । महाराष्ट्र में आगामी बृहन्मुंबई महानगर पालिका बीएमसी चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। महाविकास अघाड़ी गठबंधन का हिस्सा कांग्रेस ने ऐलान किया है कि वह इस चुनाव को अकेले लड़ेगीजिसके बाद उद्धव गुट और कांग्रेस के बीच विवाद बढ़ गया है। उद्धव गुट के प्रवक्ता आनंद दुबे ने रविवार को कांग्रेस पर तीखा तंज करते हुए कहामुंबई में कांग्रेस पार्टी को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। वह पिछले तीन दशकों से लगातार मुंबई नगर निगम चुनाव हारती आ रही हैतो ऐसे में वह 2026 में कौन सा चमत्कार कर देंगे? कांग्रेस एक पर्यटक की तरह मुंबई आती हैहोर्डिंग्स लगाती हैचुनाव हारती है और फिर घर लौट जाती है।

    उद्धव गुट के प्रवक्ता ने यह बयान वीडियो के माध्यम से दियाजिसमें उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना का बीएमसी से गहरा रिश्ता रहा है और पार्टी पिछले 30 सालों से मुंबई नगर निगम पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को इस चुनाव में गंभीरता से लेने की कोई वजह नहीं हैक्योंकि वे हमेशा चुनाव हारते हैं। कांग्रेस ने इस तंज का जवाब देते हुए कहा कि पार्टी इस चुनाव में अकेले मैदान में उतरेगी और इसके पीछे वैचारिक विचार है। कांग्रेस नेता सचिव सावंत ने बयान दियाहम पहले ही अपनी स्थिति को स्पष्ट कर चुके हैं। कांग्रेस पार्टी चुनाव में अकेले बढ़ना चाहती है और उसके पीछे वैचारिक विचार है। हमें इस मामले पर कोई जल्दबाजी नहीं है। पूरी पार्टी ने सोच-समझ कर यह फैसला लिया है। हम उन सभी पार्टियों के खिलाफ लड़ेंगे जो धर्मजातिक्षेत्र और भाषा के आधार पर टकराव पैदा करती हैं।

    यह विवाद तब शुरू हुआ जब उद्धव गुट ने महाविकास अघाड़ी में राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मनसे को शामिल करने का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस इसके पक्ष में नहीं थीक्योंकि वह राज ठाकरे के साथ चुनाव लड़ने में असमंजस महसूस कर रही थी। इसके चलते महाविकास अघाड़ी के भीतर एकता बनी रहीलेकिन कांग्रेस और उद्धव गुट के बीच मतभेद उभर आए। बीएमसी पर पिछले कई सालों से शिवसेना का कब्जा रहा है। शुरूआत से ही शिवसेना भाजपा के साथ मिलकर यहां शासन चला रही थी

    । 2017 में हुए बीएमसी चुनाव में अविभाजित शिवसेना ने सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जीत दर्ज की थीजबकि भाजपा दूसरे नंबर पर रही थी। उद्धव गुट अब 2022 में विभाजन के बाद बीएमसी पर पुनः कब्जा करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैहालांकि इसे पहले से कहीं ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस का कहना है कि वह इस चुनाव में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए तैयार है और इस बार किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगीचाहे वह महाविकास अघाड़ी हो या कोई अन्य गठबंधन।

  • मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी शैली’ मस्जिद पर सियासी हलचल, हुमायूं कबीर का बड़ा दावा-65 फुट से ऊंची होगी इमारत

    मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी शैली’ मस्जिद पर सियासी हलचल, हुमायूं कबीर का बड़ा दावा-65 फुट से ऊंची होगी इमारत


    नई दिल्ली / मुर्शिदाबाद /पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक और सियासी मुद्दों का मेल चर्चा का विषय बन गया है। तृणमूल कांग्रेस TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद शैली की मस्जिद को लेकर कई अहम दावे किए हैं। उनका कहना है कि यह मस्जिद पहले से ज्यादा ऊंची चौड़ी और भव्य होगी जिसकी ऊंचाई 65 फुट से भी अधिक रखी जाएगी। कबीर के इन बयानों ने न केवल राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर नजरें टिक गई हैं।समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में हुमायूं कबीर ने कहा कि मस्जिद के निर्माण के लिए अब तक 5 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जुटाई जा चुकी है। इसके अलावा निर्माण सामग्री भी आ चुकी है जिसकी अनुमानित कीमत डेढ़ से दो करोड़ रुपये के बीच बताई जा रही है। उन्होंने दावा किया कि जिस मॉडल पर यह मस्जिद बनाई जा रही है वह पहले की तुलना में अधिक ऊंचा और चौड़ा होगा ताकि इसे एक भव्य धार्मिक संरचना के रूप में विकसित किया जा सके।

    हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर को मुर्शिदाबाद में इस मस्जिद की नींव रखी थी। इसके बाद से ही राजनीतिक विवाद तेज हो गया। माना जा रहा है कि इस कदम से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नाराज हुईं जिसके बाद टीएमसी ने कबीर को पार्टी से निलंबित कर दिया। हालांकि पार्टी की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। कबीर का कहना है कि उन्होंने यह कदम सामाजिक और धार्मिक भावना के तहत उठाया है न कि किसी राजनीतिक उकसावे के लिए।राजनीतिक भविष्य को लेकर हुमायूं कबीर ने यह भी ऐलान किया है कि वह 22 दिसंबर को अपनी नई पार्टी की घोषणा करेंगे। उनके अनुसार यह घोषणा दोपहर 12 से 1 बजे के बीच की जाएगी। माना जा रहा है कि नई पार्टी के जरिए कबीर राज्य की राजनीति में एक नया विकल्प पेश करने की कोशिश करेंगे खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों को लेकर।

    इसी बीच सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन AIMIM की पश्चिम बंगाल इकाई ने हुमायूं कबीर के साथ संभावित गठबंधन के संकेत दिए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने कहा कि कबीर से बातचीत चल रही है और आने वाले विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर तालमेल की संभावना तलाशी जा रही है। सोलंकी के अनुसार कबीर अल्पसंख्यकों की आवाज के रूप में उभरे हैं और AIMIM उनके साथ राजनीतिक सहयोग पर विचार कर रही है।हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया है कि गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला AIMIM के राष्ट्रीय नेतृत्व यानी असदुद्दीन ओवैसी द्वारा लिया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय स्तर पर AIMIM ने फिलहाल किसी भी औपचारिक गठबंधन से इनकार किया है जिससे सियासी तस्वीर और जटिल हो गई है।

    हुमायूं कबीर ने एसआईआर Special Intensive Revision जैसे मुद्दों पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि इसका मुर्शिदाबाद में कोई खास असर नहीं पड़ेगा। उनका दावा है कि स्थानीय स्तर पर जनता उनके साथ है और आने वाले समय में इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलेगा।कुल मिलाकर बाबरी मस्जिद शैली की इस प्रस्तावित मस्जिद ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। धार्मिक भावनाओं राजनीतिक गठजोड़ और आगामी चुनावों के बीच यह मुद्दा आने वाले दिनों में और भी तूल पकड़ सकता है।