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  • बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ऋतब्रत बनर्जी को मिली राहत; ममता खेमे को झटका

    बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ऋतब्रत बनर्जी को मिली राहत; ममता खेमे को झटका

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहे विवाद के बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। इस आदेश के साथ ही यह साफ हो गया है कि फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।

    यह मामला उस समय अदालत पहुंचा था जब विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रिया में मूल राजनीतिक दल की अनुशंसा और संगठनात्मक स्थिति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी आधार पर अदालत से मांग की गई थी कि अंतिम निर्णय आने तक इस नियुक्ति पर तत्काल रोक लगाई जाए।

    मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे। न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने उपलब्ध तथ्यों और कानूनी पक्षों पर विचार करने के बाद अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि वर्तमान परिस्थितियों में नियुक्ति पर रोक लगाने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता। इसके परिणामस्वरूप विधानसभा अध्यक्ष का पूर्व निर्णय प्रभावी बना रहेगा।

    अदालत के आदेश से ऋतब्रत बनर्जी को बड़ी राहत मिली है। अब वे अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक विपक्ष के नेता के रूप में सदन के भीतर अपनी भूमिका जारी रख सकेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला विधानसभा की शक्ति संरचना और विपक्ष की रणनीति दोनों पर प्रभाव डाल सकता है। साथ ही यह राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में नए समीकरण भी पैदा कर सकता है।

    हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए दोनों पक्षों को विस्तृत हलफनामे और लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि अगली सुनवाई से पहले सभी संबंधित पक्ष अपने तर्क, दस्तावेज और कानूनी आधार रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें। इसके बाद मामले के विभिन्न पहलुओं की विस्तार से समीक्षा की जाएगी और अंतिम निर्णय की दिशा तय होगी।

    इस फैसले के बाद विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र और उनके प्रशासनिक निर्णय को भी फिलहाल कानूनी संरक्षण मिला है। अदालत के रुख से यह संकेत मिला है कि संवैधानिक पदों से जुड़े मामलों में न्यायालय बिना विस्तृत सुनवाई के हस्तक्षेप करने से बचना चाहता है। यही कारण है कि अदालत ने अंतिम निर्णय से पहले यथास्थिति बनाए रखने को प्राथमिकता दी है।

    राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य की सत्तारूढ़ राजनीति और विपक्षी खेमे के बीच पहले से जारी टकराव के बीच यह मामला केवल एक पद की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियां, दलगत अधिकार, संसदीय परंपराएं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे कई संवैधानिक प्रश्न भी शामिल हो गए हैं।

    फिलहाल सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां दोनों पक्ष अपने विस्तृत कानूनी तर्क अदालत के सामने रखेंगे। तब तक ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में कार्य करते रहेंगे और विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय पूरी तरह लागू माना जाएगा।

  • असम में समान नागरिक संहिता की एंट्री से गरमाई सियासत, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का बड़ा फैसला

    असम में समान नागरिक संहिता की एंट्री से गरमाई सियासत, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का बड़ा फैसला


    नई दिल्ली । असम की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ उस समय देखने को मिला जब राज्य सरकार ने विधानसभा के विशेष सत्र में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी विधेयक को आधिकारिक रूप से सदन के पटल पर प्रस्तुत कर दिया। इस कदम के साथ असम नागरिक कानूनों में एकरूपता की दिशा में बढ़ने वाला तीसरा भाजपा शासित राज्य बन गया है। सरकार की ओर से इसे सामाजिक सुधार और समान अधिकारों की दिशा में एक मजबूत पहल बताया जा रहा है, जबकि विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए सदन के भीतर जोरदार विरोध दर्ज कराया। विधेयक पेश होते ही विधानसभा का माहौल गर्म हो गया और राजनीतिक बहस तेज हो गई।

    सरकार के दूसरे कार्यकाल में इस कानून को विशेष प्राथमिकता दी गई थी। लंबे समय से इस पर मंथन चल रहा था और कैबिनेट स्तर पर मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार इसे विधानसभा के सामने रखा गया। सरकार का दावा है कि इस कानून का उद्देश्य नागरिक जीवन से जुड़े विभिन्न नियमों में समानता स्थापित करना और समाज में मौजूद कुछ पुरानी व्यवस्थाओं को नए कानूनी ढांचे के अनुरूप ढालना है। हालांकि इस फैसले के सामने आते ही विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया और व्यापक चर्चा की मांग उठाई।

    विपक्षी दलों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले कानून पर राज्य के विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और अन्य संबंधित समूहों से विस्तृत बातचीत की जानी चाहिए थी। उनका मानना है कि समाज के अलग-अलग वर्गों की राय शामिल किए बिना ऐसे बड़े कानून को लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। इसी मुद्दे को लेकर सदन के भीतर तीखी बहस और विरोध का माहौल देखने को मिला। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं लगातार तेज हो गई हैं।

    इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह मानी जा रही है कि राज्य के मूल निवासी और आदिवासी समाज को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। माना जा रहा है कि इस फैसले के जरिए राज्य के पारंपरिक ढांचे और जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। सामाजिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में इसे एक रणनीतिक कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।

    विधेयक में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका सीधा संबंध नागरिक जीवन से है। इसमें बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक, विवाह के लिए समान कानूनी आयु, शादियों और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण, महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी के अधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए कानूनी प्रावधान जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं। सरकार इसे समाज में समानता और पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बता रही है।

    फिलहाल पूरे देश की नजरें अब इस विधेयक की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में सदन के भीतर इस पर चर्चा और राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। यह स्पष्ट है कि असम का यह कदम केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर भी इस विषय पर नई बहस को जन्म दे सकता है।

  • West Bengal Election 2026: क्या चौथी बार सत्ता में लौटेंगी ममता बनर्जी या BJP बदलेगी 15 साल का खेल?

    West Bengal Election 2026: क्या चौथी बार सत्ता में लौटेंगी ममता बनर्जी या BJP बदलेगी 15 साल का खेल?


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सियासी माहौल तेज हो गया है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं और इस बार उनकी नजर लगातार चौथी जीत पर है। अगर वह इस चुनाव में जीत हासिल करती हैं, तो वह राज्य की पहली ऐसी नेता बन जाएंगी जो लगातार चार बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाएंगी।

    15 साल की सत्ता और नया चुनावी इम्तिहान
    ममता बनर्जी ने साल 2011 में 34 साल पुराने वामपंथी शासन को खत्म कर सत्ता संभाली थी। इसके बाद 2016 और 2021 में भी उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने जीत दर्ज की। अब 2026 का चुनाव उनके लिए एक बड़ा इम्तिहान माना जा रहा है, क्योंकि इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद जनता के बीच असंतोष भी एक बड़ा फैक्टर बन सकता है। चुनाव आयोग के मुताबिक इस बार मतदान दो चरणों में होगा: 23 अप्रैल 29 अप्रैल जबकि नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। पिछली बार की तुलना में इस बार कम चरणों में चुनाव कराए जा रहे हैं। लगातार 15 साल से सत्ता में रहने के कारण एंटी-इनकम्बेंसी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। लोगों के बीच कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और विकास जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    वोटर लिस्ट विवाद
    इस चुनाव में वोटर लिस्ट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। करीब 63 लाख वोटरों के नाम हटाए गए लाखों नाम अभी भी जांच में यह मुद्दा चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। बीते कुछ सालों में TMC सरकार पर कई घोटालों के आरोप लगे हैं, जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन (PDS) घोटाला, तस्करी से जुड़े मामले इन मुद्दों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। राज्य में वक्फ कानून और अन्य मुद्दों को लेकर भी विवाद बढ़ा है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक माहौल प्रभावित हुआ है।

    BJP की बढ़ती चुनौती
    इस बार BJP ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देने की तैयारी में हैृ। 2021 के मुकाबले पार्टी इस बार ज्यादा आक्रामक रणनीति के साथ मैदान में उतरी है। चुनाव से पहले ममता सरकार ने कई बड़े फैसले लिए हैं लक्ष्मी भंडार योजना की राशि बढ़ाई बेरोजगार युवाओं के लिए आर्थिक मदद सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता (DA) पुजारियों और मुअज्जिनों के मानदेय में बढ़ोतरी इन योजनाओं के जरिए ममता बनर्जी अलग-अलग वर्गों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही हैं।

    क्या फिर बनेगी सरकार?
    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी अब भी राज्य की सबसे मजबूत नेता हैं, लेकिन इस बार मुकाबला पहले से ज्यादा कठिन है। शहरी इलाकों में नाराजगी और भ्रष्टाचार के आरोप चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। बंगाल चुनाव 2026 सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक भविष्य की बड़ी परीक्षा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह चौथी बार जीतकर इतिहास रचती हैं या इस बार बंगाल की सत्ता में बदलाव आता है।

  • छात्राओं के गर्भवती होने के मुद्दे पर विधानसभा में हंगामा, विपक्ष का वॉकआउट; सरकार पर आरोपों की बौछार

    छात्राओं के गर्भवती होने के मुद्दे पर विधानसभा में हंगामा, विपक्ष का वॉकआउट; सरकार पर आरोपों की बौछार


    रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में सोमवार को बीजापुर जिले के एक पोर्टा केबिन स्कूल हॉस्टल से जुड़ा मामला सियासी तूफान बन गया। तीन छात्राओं के गर्भवती होने के आरोपों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई, जो अंततः हंगामे और वॉकआउट में बदल गई।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल
    कांग्रेस विधायकों ने सदन में आरोप लगाया कि बीजापुर के हॉस्टल में रहने वाली तीन छात्राएं गर्भवती पाई गई हैं। इस मुद्दे पर जवाब की मांग करते हुए विक्रम मंडावी, चरण दास महंत और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार को घेरा।

    शिक्षा मंत्री का जवाब, लेकिन विवाद बरकरार
    राज्य के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिन तीन छात्राओं की बात की जा रही है, उनमें से दो हॉस्टल में रहती ही नहीं हैं, जबकि एक छात्रा दिवाली की छुट्टियों के बाद से वापस नहीं लौटी है।

    हालांकि मंत्री के इस जवाब से विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ और कांग्रेस विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

    ‘मामला दबाने की कोशिश’ का आरोप
    ‘शून्य काल’ के दौरान विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार इस गंभीर मामले को दबाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि जैसे ही छात्राओं के गर्भवती होने की बात सामने आई, उन्हें घर भेज दिया गया और अब प्रशासन यह कहकर मामले को कमजोर करने में जुटा है कि वे हॉस्टल में रह ही नहीं रही थीं।

    विपक्ष ने यह भी कहा कि मामला आदिवासी क्षेत्र से जुड़ा है, इसलिए इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है।

    आरोपियों को बचाने का आरोप
    विपक्षी विधायकों का आरोप है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें बचाया जा रहा है। इसी कारण सदन में इस विषय पर विस्तृत चर्चा की अनुमति भी नहीं दी जा रही।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने जताई चिंता
    पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि आवासीय स्कूल से जुड़ी ऐसी खबर बेहद चिंताजनक है। उन्होंने बताया कि तीन में से दो छात्राएं नाबालिग हैं और मामले की पूरी जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

    इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • महाराष्ट्र विधानसभा में ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ विधेयक पेश

    महाराष्ट्र विधानसभा में ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ विधेयक पेश


    मुंबई।
    महाराष्ट्र विधानसभा में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने शुक्रवार को ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ नामक विधेयक पेश किया। इस विधेयक का मकसद गैर-कानूनी धर्मांतरण पर रोक लगाना है।

    विधानसभा में यह विधेयक पेश करने वाले गृह राज्य मंत्री पंकज भोयर ने कहा, “बिल का मकसद धर्म की आज़ादी के अधिकार की रक्षा करना है। इसका मकसद ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, लालच या शादी के ज़रिए किए गए गैर-कानूनी धर्मांतरण पर भी रोक लगाना है। बिल में गैर-कानूनी धर्मांतरण को ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, गलत जानकारी, ज़बरदस्ती, गलत असर या लालच देकर किया गया धर्मांतरण बताया गया है। बिल के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी दूसरे व्यक्ति को तोहफ़े, कैश, नौकरी, मुफ़्त शिक्षा, शादी का वादा, बेहतर लाइफ़स्टाइल, या भगवान का का लालच देकर गैर-हिंदू धर्म में अन्य धर्म में बदलने की कोशिश नहीं कर सकती, जिसे लालच माना गया है। लालच, ज़बरदस्ती, धोखा या गलत जानकारी, ज़बरदस्ती या धमकी, धोखाधड़ी के तरीके और गलत असर डालना गैर-कानूनी होगा। विधेयक में ज़बरदस्ती किसी व्यक्ति या ग्रुप को उसकी मर्जी के खिलाफ़ धर्म बदलने के लिए मजबूर करने के काम गैरकानूनी धर्म परिवर्तन बतलाया गया है।

    यह विधेयक गैर-हिंदू धर्म में बदलने की प्रोसेस में शामिल लोगों के रिश्तेदारों या करीबी परिवार के सदस्यों को गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज करने की इजाज़त देता है, जिससे पुलिस जांच शुरू हो सकती है। कानून के तहत अपराध गैर-ज़मानती होंगे, जिससे पुलिस को ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन के आरोप में केस दर्ज करने और जांच शुरू करने की इजाज़त मिलेगी। विधेयक पुलिस स्टेशन के इंचार्ज के लिए किसी भी व्यक्ति की शिकायत दर्ज करना ज़रूरी बनाता है। बिल के सेक्शन 14 में गैर-हिंदू धर्मों में धर्म बदलने के लिए उकसाने वाले संगठनों पर बैन लगाने और उन्हें सज़ा देने के कानूनी प्रावधान हैं।

    दूसरे राज्यों में लागू ऐसे ही कानूनों के आधार पर बिल में शामिल कानूनी प्रावधानों में, जो लोग गैर-हिंदू धर्मों में धर्म बदलना चाहते हैं, उनके लिए एक तय सरकारी अथॉरिटी से पहले इजाज़त लेना, धर्म बदलने से 60 दिन पहले पहले से बताना और धर्म बदलने के बाद उसे रजिस्टर कराना शामिल है। महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2026 के ड्राफ्ट के प्रावधानों के अनुसार, धर्म बदलने को रजिस्टर न करने या प्रक्रियाओं का पालन न करने पर कोई भी धर्म बदलना अमान्य हो सकता है। विधेयक के अनुसार, शादी का झांसा देकर गैर-कानूनी धर्म बदलने में शामिल पाए जाने वालों को सात साल की जेल और 1 लाख रुपये का जुर्माना भी देना होगा। किसी नाबालिग, पागल व्यक्ति या महिला या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति का धर्म बदलने के लिए उकसाने की कोशिश करने पर सात साल की जेल और 5 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। विधेयक के मुताबिक, बड़े पैमाने पर धर्म बदलने के लिए उकसाने वालों को सात साल की जेल और 5 लाख रुपये का जुर्माना होगा, जबकि बार-बार ऐसा करने वालों को 10 साल की जेल और 5 लाख रुपये का जुर्माना होगा। विधेयक के मुताबिक, ज़बरदस्ती धर्म बदलने के दोषी पाए जाने वालों को 7 साल तक की जेल और 3 लाख रुपये का जुर्माना होगा।

    फडणवीस की महायुति सरकार का कहना है कि अल्पसंख्यकों के बनाए शिकारी धर्म बदलने के रैकेट से कमज़ोर बहुसंख्यक हिंदुओं को बचाने के लिए ऐसा धर्म बदलने के खिलाफ़ कानून ज़रूरी है। महाराष्ट्र धर्म की आज़ादी बिल, 2026 उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे दूसरे राज्यों के ऐसे ही धर्म बदलने के खिलाफ़ कानूनों पर आधारित है।

  • उत्तराखंड विधानसभा: 1.11 लाख करोड़ का बजट पास, सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित

    उत्तराखंड विधानसभा: 1.11 लाख करोड़ का बजट पास, सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित


    भराड़ीसैंण)।
    उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में चल रहा विधानसभा का बजट सत्र शुक्रवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सत्र के अंतिम दिन सदन ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर आ प्रस्तुत 1,11,703 करोड़ रुपये के विनियोग विधेयक को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही विभिन्न विभागों के लिए आवंटित बजट पर भी सदन ने मुहर लगा दी।

    बजट सत्र के पांचवें और अंतिम दिन की शुरुआत प्रश्नकाल से हुई। शून्यकाल में सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को उठाया। वहीं नियम 58 के तहत कृषि, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर कार्य स्थगन प्रस्ताव लाए गए।

    नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने नियम 310 के तहत भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया, जिसे बाद में नियम 58 के अंतर्गत सुना गया। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट पर सामान्य चर्चा हुई और संसदीय कार्य मंत्री ने विभागवार अनुदान मांगें प्रस्तुत कीं।

    विभागवार बजट पर चर्चा के दौरान विपक्ष की ओर से नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, विधायक प्रीतम सिंह और भुवन कापड़ी समेत अन्य सदस्यों ने कई विभागों के बजट में कटौती कर केवल एक रुपये का प्रावधान करने का प्रस्ताव रखा। हालांकि बहुमत के आधार पर ये सभी कटौती प्रस्ताव खारिज हो गए और सदन ने विभागवार बजट को पारित कर दिया।

    इसके बाद विनियोग विधेयक पर चर्चा हुई और देर रात करीब साढ़े बारह बजे इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। वित्त एवं नियोजन तथा शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण विभाग को सर्वाधिक बजट आवंटित किया गया है। विनियोग विधेयक पारित होने के बाद विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूडी भूषण ने सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी।

    नौ मार्च से शुरू हुए पांच दिवसीय बजट सत्र के दौरान राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया गया। इसके अलावा चार अध्यादेश सदन के पटल पर रखे गए और 11 विधेयक भी पारित किए गए।


    प्रमुख विभागों को आवंटित बजट (रुपये में):

    विधानसभा खर्च – 137 करोड़ 28 लाख 98 हजार
    मंत्रीपरिषद – 170 करोड़ 92 लाख 1 हजार
    न्याय प्रशासन – 483 करोड़ 15 लाख 61 हजार
    निर्वाचन – 223 करोड़ 81 लाख 17 हजार
    राजस्व एवं सामान्य प्रशासन – 2731 करोड़ 15 लाख 23 हजार
    वित्त, कर, नियोजन व सचिवालय – 20,361 करोड़ 2 लाख 46 हजार
    पुलिस एवं जेल – 3524 करोड़ 69 लाख 58 हजार
    शिक्षा, खेल, युवा कल्याण व संस्कृति – 13,552 करोड़ 11 लाख 77 हजार
    चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण – 4546 करोड़ 46 लाख 69 हजार
    जलापूर्ति, आवास एवं नगर विकास – 4243 करोड़ 34 लाख 68 हजार
    ग्राम्य विकास – 3860 करोड़ 21 लाख 70 हजार
    लोक निर्माण विभाग – 3580 करोड़ 57 लाख 61 हजार
    कृषि – 1495 करोड़ 81 लाख 93 हजार
    सिंचाई – 1591 करोड़ 48 लाख 29 हजार
    खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति – 1648 करोड़ 78 लाख 87 हजार
    समाज कल्याण – 2912 करोड़ 49 लाख 98 हजार
    पर्यटन – 504 करोड़ 4 लाख 50 हजार
    वन – 1149 करोड़ 88 लाख 43 हजार
    पशुपालन – 925 करोड़ 49 लाख 37 हजार
    अनुसूचित जाति कल्याण – 2468 करोड़ 88 लाख 48 हजार
    अनुसूचित जनजाति कल्याण – 746 करोड़ 76 लाख 91 हजार

  • MP: विधानसभा में कैलाश विजयवर्गीय की नेता प्रतिपक्ष पर असंसदीय टिप्पणी, भड़की कांग्रेस

    MP: विधानसभा में कैलाश विजयवर्गीय की नेता प्रतिपक्ष पर असंसदीय टिप्पणी, भड़की कांग्रेस


    भोपाल।
    मध्यप्रदेश विधानसभा (Madhya Pradesh Assembly) में गुरुवार को संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) द्वारा की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर विवाद हो गया, जिसके बाद उस पर विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर (Narendra Singh Tomar) ने अफसोस जताया और मुख्यमंत्री मोहन यादव (Chief Minister Mohan Yadav) ने माफी मांगी। दरअसल विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी, इसी दौरान विजयवर्गीय ने नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार (Umang Singhar.) के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे यह पूरा हंगामा खड़ा हो गया।


    सिंघार ने अदाणी का नाम लेकर सरकार पर लगाया आरोप

    चर्चा में हिस्सा लेते हुए सिंघार ने सिंगरौली में सरकार और अदाणी के बीच हुए करार का मुद्दा उठाया और दावा किया कि सरकार बिजली खरीद के नाम पर 25 साल में अदाणी की कंपनी को एक से सवा लाख करोड़ रुपए देने की तैयारी में है। इस पर मंत्री विश्वास सारंग ने आपत्ति जताई और कहा कि जो व्यक्ति सदन में मौजूद नहीं है, उसका नाम नहीं लिया जाना चाहिए जबकि विजयवर्गीय ने सिंघार पर गलत जानकारी देने का आरोप लगाया।


    विजयवर्गीय ने सिंघार के लिए किया आपत्तिजन शब्द का इस्तेमाल

    सिंघार ने कहा कि वह हर बात प्रमाण के साथ करते हैं और जरूरत पड़ने पर प्रमाण दे सकते हैं। इसी बात को लेकर दोनों के बीच तीखी बहस और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला और इसी दौरान विजयवर्गीय ने सिंघार के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर दिया। इसके बाद, विपक्षी कांग्रेस के सदस्य हंगामा करते हुए विजयवर्गीय के इस्तीफे की मांग करने लगे। इस दौरान दोनों पक्षों की ओर से हंगामा और नारेबाजी की गई।


    स्पीकर तोमर बोले- गुस्सा नहीं आना चाहिए लेकिन आज आ गया

    हंगामा बढ़ता देख तोमर ने सदन की कार्यवाही कुछ देर के लिए स्थगित कर दी। बाद में जब सदन की कार्यवाही आरंभ हुई तो विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि मध्यप्रदेश विधानसभा की एक गौरवशाली परंपरा रही है लेकिन आज असहज स्थिति बन गई, जिसका कि उन्हें अफसोस है। तोमर ने कहा, ‘गुस्सा आना नहीं चाहिए लेकिन आज आ गया, दोनों पक्षों की तरफ से। उसके कारण असहज स्थिति बनी। मुझे इसका रंज है इसके लिए पक्ष और प्रतिपक्ष जिम्मेदार हैं।’


    सीएम यादव ने जाने-अनजाने में निकले शब्द के लिए मांगी माफी

    तोमर ने कहा, ‘संसदीय कार्य मंत्री बहुत अनुभवी हैं फिर भी आज सीमा कैसे टूट गई यह हम सभी के लिए चिंता का विषय है।’ इसके बाद, विधानसभा अध्यक्ष ने दोनों पक्षों से विवाद का पटाक्षेप करने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री यादव ने कहा कि जाने-अनजाने में कुछ शब्द निकले हैं, इसके लिए वह सदन से माफी मांगते हैं।


    सिंघार ने भी खेद व्यक्त कर मामले का पटाक्षेप किया

    सिंघार ने कहा मुख्यमंत्री ने जो भाव दिखाया, वह उसका सम्मान करते हैं और संसदीय मर्यादा का ध्यान रखते हैं। उन्होंने कहा, ‘अगर मेरी ओर से कुछ हुआ है तो मैं भी खेद व्यक्त करता हूं।’


    विजयवर्गीय ने अपने व्यवहार पर जताई नाखुशी

    इस बीच, विजयवर्गीय ने कहा कि करीब 37 साल का उनका राजनीतिक अनुभव रहा है लेकिन आज के अपने व्यवहार से वह खुश नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अगर संसदीय मर्यादाओं का पालन नहीं करेंगे तो बाकी सदस्य कैसे करेंगे। उन्होंने कहा कि आज पता नहीं कैसे यह सब हो गया। विजयवर्गीय ने कहा, ‘उमंग के हाव-भाव थोड़े अलग थे… मैं उमंग को प्यार करता हूं… मैं अपने व्यवहार से दुखी हूं।’


    विजयवर्गीय बोले- किसी ज्योतिष से पूछना पड़ेगा

    वहीं विधानसभा की कार्यवाही खत्म होने के बाद मीडियाकर्मियों ने जब उनसे उनके गुस्से को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘कभी-कभी आ जाता है’। वहीं एक अन्य मीडियाकर्मी ने जब उनसे पूछा कि ऐसा नहीं लगता कि पिछले एक-डेढ़ महीने से आपकी जुबान पर शनि बैठा हुआ है, तो विजयवर्गीय ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा- ‘किसी ज्योतिष से पूछूंगा यार।’


    सिंघार बोले- मैं अपनी ‘औकात’ में ही हूं

    बाद में सिंघार ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर संविधान की फोटो के साथ एक पोस्ट करते हुए विजयवर्गीय पर निशाना साधा और कहा कि ‘माननीय कैलाश विजयवर्गीय जी, मैं अपनी औकात में हूँ।’ उन्होंने कहा, ‘मेरी औकात मध्यप्रदेश की 7.5 करोड़ जनता के सवालों को आपकी अहंकारी सत्ता के सामने मुखरता से रखने की है। मेरी इसी औकात ने आपको इतना बौना बना दिया कि आपके अंदर का असली चेहरा बाहर आ गया, मेरी इसी औकात ने आपको भगीरथपुरा पर बहस करने पर मजबूर किया।’

    उन्होंने कहा कि विजयवर्गीय द्वारा इस्तेमाल किए गए अपशब्द केवल उमंग सिंघार या किसी एक नेता प्रतिपक्ष के लिए नहीं थे, यह मध्यप्रदेश की 7.5 करोड़ जनता का अपमान है। उन्होंने कहा, ‘जनता को कीड़े-मकोड़े समझने की मानसिकता रखने वाले मंत्री विजयवर्गीय ने असल में अपने अहंकार का परिचय दिया है…।’ उन्होंने कहा, ‘सत्ता का मद इतना चढ़ गया है कि जनप्रतिनिधि खुद को जनता से ऊपर समझने लगे हैं।’


    पटवारी ने कहा- कांग्रेस पुतले जलाकर विरोध करेगी

    कांग्रेस की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने विजयवर्गीय के व्यवहार को सत्ता के अहंकार की पराकाष्ठा करार दिया और कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘नए भारत’ का नया परिचय है। उन्होंने घोषणा की‌ कि कांग्रेस विजयवर्गीय के पुतले जलाकर इसका विरोध करेगी। पटवारी की इस घोषणा के कुछ ही देर बाद राजधानी भोपाल में युवक कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने विजयवर्गीय के आवास के बाहर उनका एक पोस्टर जलाया।

  • 2026-27 के बजट प्रस्तावों में हर वर्ग के विकास पर फोकस: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, 18 फरवरी को विधानसभा में पेश होगा बजट

    2026-27 के बजट प्रस्तावों में हर वर्ग के विकास पर फोकस: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, 18 फरवरी को विधानसभा में पेश होगा बजट


    भोपाल । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट प्रस्तावों में राज्य के सभी क्षेत्रों और समाज के हर वर्ग के विकास तथा कल्याण का विशेष ध्यान रखा गया है। मुख्यमंत्री ने बजट प्रस्तावों को वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप और संतुलित बताते हुए उप मुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री श्री जगदीश देवड़ा के दृष्टिकोण की सराहना की।

    मंगलवार को मंत्रालय में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समक्ष वर्ष 2026-27 के बजट प्रस्तावों का विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने बजट निर्माण में लगे विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के परिश्रम की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं बल्कि यह प्रदेश के विकास की दिशा और सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाता है।

    बैठक में उप मुख्यमंत्री श्री जगदीश देवड़ा मुख्य सचिव श्री अनुराग जैन अपर मुख्य सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय श्री नीरज मंडलोई अपर मुख्य सचिव (वित्त) श्री मनीष रस्तोगी सहित वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। प्रेजेंटेशन के दौरान विभिन्न विभागों की योजनाओं विकास कार्यों सामाजिक कल्याण अधोसंरचना शिक्षा स्वास्थ्य कृषि और रोजगार से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा की गई।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सरकार का लक्ष्य प्रदेश के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना है। बजट में गरीब किसान महिला युवा और श्रमिक वर्ग के हितों को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही औद्योगिक विकास निवेश और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने वाले प्रस्तावों को भी इसमें शामिल किया गया है।

    मुख्यमंत्री के समक्ष प्रेजेंटेशन के बाद मंत्रि-परिषद के समक्ष भी बजट प्रस्तावों का प्रस्तुतीकरण किया गया जिसे कैबिनेट ने अनुमोदित कर दिया है। मंत्रि-परिषद से मंजूरी मिलने के बाद अब यह बजट 18 फरवरी को उप मुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री श्री जगदीश देवड़ा द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत किया जाएगा।

    सरकार का दावा है कि यह बजट विकासोन्मुख होने के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन को भी ध्यान में रखेगा। इसमें राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने आधारभूत ढांचे के विस्तार और जनकल्याणकारी योजनाओं को गति देने पर जोर रहेगा।

    प्रदेश सरकार के इस बजट को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में काफी उम्मीदें हैं। माना जा रहा है कि 2026-27 का बजट मध्य प्रदेश के विकास को नई दिशा देगा और राज्य को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।