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  • सतना से किसान कांग्रेस का बड़ा ऐलान, MSP और बिजली समेत मांगों को लेकर आंदोलन तेज करने की तैयारी

    सतना से किसान कांग्रेस का बड़ा ऐलान, MSP और बिजली समेत मांगों को लेकर आंदोलन तेज करने की तैयारी

    मध्य प्रदेश : में किसानों की विभिन्न समस्याओं और मांगों को लेकर किसान कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सतना में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह चौहान ने किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर निशाना साधा और जल्द समाधान नहीं होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि यदि किसानों की मांगों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो संगठन सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करेगा और विधानसभा का घेराव भी किया जाएगा।

    किसान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान किसानों से जुड़ी कई मांगें उठाईं। उन्होंने भारत-अमेरिका कृषि ट्रेड डील को किसानों के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की। उनका कहना था कि कृषि क्षेत्र से जुड़े फैसलों में किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और ऐसे समझौतों से पहले किसानों की चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

    उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को लेकर भी सरकार से ठोस कानून बनाने की मांग की। धर्मेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि किसानों की उपज को तय समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदने और बेचने की स्थिति को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने एमएसपी सुरक्षा कानून लागू करने की मांग को प्रमुख मुद्दा बताया।

    किसान कांग्रेस ने प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर भी सवाल उठाए। संगठन की मांग है कि सरकार किसानों से मूंग की शत-प्रतिशत खरीदी सुनिश्चित करे, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी का सामना न करना पड़े। इसके साथ ही खेती के लिए पर्याप्त बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई। किसान कांग्रेस ने कृषि कार्यों के लिए 24 घंटे थ्री-फेज बिजली देने की मांग की।

    इसके अलावा कृषि उपज मंडी और सहकारिता चुनावों को लेकर भी संगठन ने सरकार को घेरा। किसान कांग्रेस का कहना है कि पिछले कई वर्षों से लंबित इन चुनावों को जल्द कराया जाना चाहिए, ताकि किसानों से जुड़े संस्थानों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हो सके।

    धर्मेंद्र सिंह चौहान ने भाजपा सरकार पर किसानों से किए गए चुनावी वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान धान और गेहूं की खरीदी को लेकर जो घोषणाएं की गई थीं, सरकार अब उनसे पीछे हट रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि किसान महंगे डीजल, खाद की बढ़ती कीमतों, बिजली बिल और कर्ज जैसी समस्याओं से परेशान हैं।

    उन्होंने कहा कि प्रदेश में किसानों को मंडियों में उचित मूल्य नहीं मिल रहा है और सरकार की नीतियां किसानों की परेशानियां कम करने में सफल नहीं हो रही हैं। किसान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने सरकार पर किसान कल्याण के दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर होने का आरोप लगाया।

    किसान कांग्रेस ने साफ किया है कि यदि किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो संगठन प्रदेशभर में किसानों को एकजुट कर आंदोलन करेगा। इसके तहत राजधानी भोपाल में विधानसभा घेराव की चेतावनी भी दी गई है। फिलहाल किसान कांग्रेस के इस ऐलान के बाद प्रदेश में किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है।

  • 2027 के विधानसभा चुनावों में कितना असर दिखाएंगे Gen Z, युवाओं की बढ़ती ताकत पर टिकी राजनीतिक दलों की नजर

    2027 के विधानसभा चुनावों में कितना असर दिखाएंगे Gen Z, युवाओं की बढ़ती ताकत पर टिकी राजनीतिक दलों की नजर

    नई दिल्ली । हाल के वर्षों में देश में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने नई बहस को जन्म दिया है। विशेष रूप से हालिया छात्र आंदोलनों और सोशल मीडिया अभियानों के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनावों में Gen Z मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक दल भी इस वर्ग को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए अलग-अलग स्तर पर युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

    Gen Z में वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को शामिल किया जाता है। वर्ष 2026 के हिसाब से इस वर्ग की उम्र लगभग 14 से 29 वर्ष के बीच है। देश में इनकी आबादी करीब 37 करोड़ बताई जाती है, जबकि 18 वर्ष से अधिक आयु वाले मतदाताओं में भी इस वर्ग की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। यही कारण है कि आने वाले चुनावों में युवा मतदाता राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण समूह बनकर उभरे हैं।

    उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में वर्ष 2027 के दौरान विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इन राज्यों में बड़ी संख्या में युवा मतदाता चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। उत्तर प्रदेश में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग चार करोड़ मतदाता हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 30 प्रतिशत माने जा रहे हैं। इसके अलावा पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

    पंजाब में भी बड़ी संख्या में युवा मतदाताओं की मौजूदगी को देखते हुए राजनीतिक दल उन्हें साधने की तैयारी में हैं। कई दल युवा उम्मीदवारों को अधिक अवसर देने और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं उत्तराखंड में भी युवा मतदाता कुल मतदाताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिससे चुनावी मुकाबले में उनकी भूमिका अहम मानी जा रही है।

    गुजरात में भी युवा मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। राज्य में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल संगठन और नेतृत्व स्तर पर युवाओं को अधिक जिम्मेदारियां देने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। वहीं गोवा में भी नए मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे युवा वर्ग का चुनावी महत्व और बढ़ गया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि Gen Z की कार्यशैली पारंपरिक राजनीति से अलग है। यह वर्ग सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन संवाद के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करने में अधिक सक्रिय रहता है। कई सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर डिजिटल अभियानों में युवाओं की भागीदारी ने यह संकेत दिया है कि वे केवल ऑनलाइन चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि युवा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थन आधार नहीं माने जा सकते। यह वर्ग रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता, अवसर और शासन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देता है तथा परिस्थितियों के अनुसार अपना चुनावी निर्णय बदल सकता है। इसी कारण अधिकांश राजनीतिक दल युवाओं से जुड़े विषयों को अपने चुनावी एजेंडे में प्रमुख स्थान देने की तैयारी कर रहे हैं।

    हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि Gen Z अकेले चुनावी परिणाम तय कर देगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि कई राज्यों में युवा मतदाता मुकाबले को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव इस बात की महत्वपूर्ण परीक्षा होंगे कि युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी किस हद तक चुनावी नतीजों और राजनीतिक रणनीतियों को प्रभावित करती है।

  • अब मध्‍य प्रदेश के प्रत्येक विधानसभा में खुलेगी "कृषि यंत्र किराये की दुकान"

    अब मध्‍य प्रदेश के प्रत्येक विधानसभा में खुलेगी "कृषि यंत्र किराये की दुकान"


    भोपाल ! मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर किसानों की सहूलियत के लिये प्रत्येक विधानसभा में कम से कम एक “कृषि यंत्र किराये की दुकान” अनिवार्य रूप से खोलने की तैयारी चल रही है। कृषक कल्याण वर्ष में जल्दी ही इस पहल के परिणाम मिलेंगे। छोटे और सीमांत किसानों को अपने खेत तैयार करने आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग करना आसान हो जायेगा। वर्तमान में ऐसे 5260 केन्द्र संचालित है। अब हर साल 1060 कृषि यंत्र किराये की दुकानें स्थापित की जायेगी।

    मध्यप्रदेश अब तेजी से कृषि यंत्रों के निर्माण में आत्मनिर्भर हो रहा है। विदिशा जिले ने आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर उच्च गुणवत्ता के कृषि यंत्रों का निर्माण करना शुरू कर दिया है। ग्रेडर, लेवलर, हाइड्रालिक ट्रॉली, कल्टीवेटर, प्लाउ जैसे उपकरण जिले में ही बनाये जा रहे है। यहां लगभग 150 कृषि उपकरण निर्माण इकाइयाँ है। यहां बने कृषि यंत्रों की मांग अन्य राज्यों और विदेशों में भी हो रही है। मेडागास्कर, नाइजीरिया, सूडान, यूगांडा, घाना, अलजीरिया, ग्वाटेमाल, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश में यहां से निर्मित उपकरण भेजे जा रहे है।

    छोटे किसानों को न्यूनतम सेवा शुल्क पर अत्याधुनिक कृषि यंत्रों की सेवाएं मिल रही है। युवा उद्यमियों को भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है।

    उषा एग्रो के मानस गुप्ता बताते हैं किहम खेती में काम आने वाले यंत्र और उपकरण बनाते हैं, जैसे- लोडर, डिलोडर, कल्टीवेटर आदि। सभी उपकरण किसानों के लिए उपयोगी हैं। कब से ये काम शुरू किया? यह पूछने पर उन्होंने बताया किइस काम की शुरुआत पिताजी ने 1993 में की थी। शुरुआत छोटे पैमाने पर हुई, फिर धीरे-धीरे इसका विस्तार किया और अब तो हमारे उपकरण विदेशों में भी पहुंच रहे हैं।

    हमारे सबसे बड़े ग्राहक स्थानीय किसान हैं। हमारे उत्पादों का अधिकांश हिस्सा स्थानीय बाजार में ही खप जाता है, लेकिन हम देश के दूसरे राज्यों और विदेशों में भी सप्लाय करते हैं। आज हमारे बनाए यंत्र और उपकरण 10 से ज्यादा देशों तक पहुंच रहे हैं. इनमें नाइजीरिया, सूडान, केन्या, यूगांडा, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, घाना, अल्जीरिया, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं। हमारा दो-तिहाई बिजनेस देश के अंदर होता है और एक-तिहाई कारोबार विदेशों में है। पूरे साल में करीब 4 करोड़ रुपये का कारोबार होता है।

    शासन की मदद के संबंध में वे बताते है किहमें इस काम में डॉ. मोहन यादव जी की सरकार से बहुत मदद मिलती है। उत्पादन से लेकर व्यवसाय के विस्तार तक में सरकार की नीतियां हमारे लिए मददगार साबित हुई हैं। अपने उत्पादों को विदेशों तक पहुंचाने में भी हमें सरकारी सहायता मिलती है। सरकार की पहल पर मैं जी-20 सम्मेलन में भी शामिल हुआ और इसके खर्च का करीब 75 प्रतिशत सरकार ने वहन किया।

    विष्णु शर्मा, संजय उद्योगट्रैक्टर से संबंधित उपकरण बनाते हैं जैसे कल्टीवेटर, प्लाऊ आदि। ये उपकरण किसानों के लिए उपयोगी हैं। ट्रैक्टर से किसान अपने खेतों को आसानी से तैयार करते हैं। इसमें जिन उपकरणों की जरूरत होती है वो सब बनाते हैं।

    उत्पादों की सप्लाय के संबंध में उन्होंने बताया कि मुख्य रूप से विदिशा और उसके आसपास के जिलों में होती है। दूसरे राज्यों में भी पहुंचते हैं। हमारा सालाना व्यवसाय करीब 50 लाख रुपये का है।

    अपने काम की शुरुआत के संबंध में वे बताते है किहमने वर्ष 2020 में कोरोना संकट के दौरान इसकी शुरुआत की थी। शुरुआत में ही किसानों ने हमारे उत्पादों को हाथों हाथ लिया। इससे हमारा उत्साह बढ़ा और हम लगातार इसके विस्तार की कोशिश कर रहे हैं। सरकार की ओर से हमारे जैसे अन्य लोगों के लिए प्रशिक्षण की सुविधा मिलना चाहिए।

    विपिन रघुवंशी, मेसर्स किसान इंडस्ट्रीज मुख्य रूप से कल्टीवेटर, प्लाऊ, लोडर, डिलोडर बनाते हैं। उत्पादों का अधिकांश हिस्सा विदिशा और उसके आसपास के इलाकों में ही खप जाता है। आसपास के जिलों के किसान भी हमारे यंत्र और उपकरण खरीदते हैं।

    हमारे सभी उपकरण ऐसे हैं जो खेती के अलग-अलग स्तरों पर काम आते हैं। खेतों को तैयार करने से लेकर रोपनी, बोवनी और कटाई सभी कार्यों के लिए उपकरण बनाते हैं। किसानों का इनके बिना काम नहीं चलता। दीपक नरवरिया, मे. एग्रो स्मार्ट टेक्नोलॉजी ने बताया कि हमारा बाजार मध्य प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों तक फैला हुआ है। अधिकांश यंत्र और उपकरण विदिशा और आसपास के इलाकों के किसानों की मांग पूरी करने में ही खप जाते हैं।सालाना कारोबार करीब 3 करोड़ रुपयों का है। हमारे सारे ग्राहक किसान और खेती से जुड़ी संस्थाएं हैं।

  • विधानसभा पहुंचे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मॉनसून सत्र के पहले दिन कार्य मंत्रणा समिति से विधायक दल की बैठक तक व्यस्त रहेगा पूरा कार्यक्रम

    विधानसभा पहुंचे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मॉनसून सत्र के पहले दिन कार्य मंत्रणा समिति से विधायक दल की बैठक तक व्यस्त रहेगा पूरा कार्यक्रम

    मध्य प्रदेश विधानसभा का मॉनसून सत्र सोमवार से शुरू हो गया, जिसके साथ ही राज्य की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। सत्र के पहले दिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कार्यक्रम पूरी तरह विधानसभा और उससे जुड़ी बैठकों पर केंद्रित रहा। सरकार की ओर से कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की तैयारी है, वहीं विपक्ष भी विभिन्न जनहित और प्रशासनिक मामलों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति के साथ सदन में उतरा है।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह विधानसभा पहुंचे। इसके बाद कार्य मंत्रणा समिति की बैठक आयोजित हुई, जिसमें सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही, विभिन्न विधायी कार्यों और चर्चा के एजेंडे पर विचार किया गया। इसके उपरांत मुख्यमंत्री विधानसभा की कार्यवाही में शामिल हुए, जहां पहले दिन की गतिविधियों पर सभी की नजर बनी रही।

    इस मॉनसून सत्र की सबसे महत्वपूर्ण चर्चाओं में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित विधेयक को माना जा रहा है। मंत्रिपरिषद से मंजूरी मिलने के बाद सरकार इसे सदन में प्रस्तुत करने की तैयारी कर चुकी है। यदि विधेयक पेश होता है तो इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच व्यापक चर्चा होने की संभावना है। सरकार इसे महत्वपूर्ण विधायी पहल के रूप में देख रही है, जबकि विपक्ष इसके विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाने की तैयारी में है।

    मुख्यमंत्री के दिनभर के कार्यक्रम में दोपहर के समय जनप्रतिनिधियों और अन्य लोगों से मुलाकात का समय भी निर्धारित रहा। इसके बाद समिति कक्ष में गुरु पूर्णिमा महोत्सव से संबंधित बैठक आयोजित की गई, जिसमें आयोजन और अन्य व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई। आधिकारिक बैठकों के बाद मुख्यमंत्री के निवास लौटने का कार्यक्रम तय रहा। शाम को समत्व भवन में विधायक दल की बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें आगामी सदन की रणनीति और विभिन्न विधायी विषयों पर विचार-विमर्श किया जाना प्रस्तावित है।

    विधानसभा का यह मॉनसून सत्र 24 जुलाई तक चलेगा। इस दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयकों के साथ-साथ विभिन्न विभागों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। सरकार विकास योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और नई नीतियों को सदन के माध्यम से आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष राज्य से जुड़े अनेक मामलों को लेकर सरकार से जवाब मांगने की रणनीति बना चुका है।

    सत्र के दौरान केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित विस्थापितों के मुआवजे, उज्जैन में भूमि खरीद से जुड़े मामलों, नीट यूजी परीक्षा से संबंधित विवाद, सीबीएसई परीक्षा में कथित अनियमितताओं सहित कई अन्य विषयों के सदन में उठने की संभावना है। विपक्ष इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि सत्ता पक्ष अपने फैसलों और योजनाओं का पक्ष मजबूती से रखने का प्रयास करेगा।

    राजनीतिक दृष्टि से यह सत्र काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें राज्य सरकार की कई नीतियों और निर्णयों की परीक्षा भी होगी। सत्ता पक्ष जहां अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास करेगा, वहीं विपक्ष जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश करेगा। ऐसे में आने वाले दिनों में विधानसभा की कार्यवाही पर प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों की नजर बनी रहेगी।

  • बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम नहीं बदलेगा, कांग्रेस के सवाल पर उच्च शिक्षा मंत्री ने स्थिति की साफ की तस्वीर

    बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम नहीं बदलेगा, कांग्रेस के सवाल पर उच्च शिक्षा मंत्री ने स्थिति की साफ की तस्वीर

    मध्य प्रदेश विधानसभा के मॉनसून सत्र में राजधानी भोपाल स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाओं पर सरकार ने स्पष्ट रुख सामने रख दिया है। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने विधानसभा में कहा कि राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय का नाम बदलने का कोई निर्णय नहीं लिया है। उनके इस जवाब के बाद पिछले कुछ महीनों से जारी अटकलों और राजनीतिक बहस पर फिलहाल विराम लग गया है।

    बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने का मुद्दा उस समय चर्चा में आया था, जब विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने इसका नाम बदलकर “मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने का प्रस्ताव पारित किया था। यह प्रस्ताव राज्य सरकार और कुलाधिपति के पास भेजा गया था। प्रस्ताव सामने आने के बाद राजनीतिक स्तर पर इस विषय को लेकर विभिन्न दलों के बीच मतभेद भी देखने को मिले और इसे लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो गई थी।

    विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक आतिफ आरिफ अकील ने इस विषय पर सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। उन्होंने तारांकित प्रश्न के माध्यम से पूछा कि क्या शासन ने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने का निर्णय लिया है। साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव है तो नया नाम क्या होगा और लगभग तीन दशक से अधिक समय से स्थापित विश्वविद्यालय का नाम बदलने के पीछे सरकार की मंशा क्या है।

    विधायक ने अपने प्रश्न में यह मुद्दा भी उठाया कि डॉ. बरकतउल्ला भोपाली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या राज्य सरकार उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता देती है और यदि ऐसा है तो उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय का नाम बदलना किस आधार पर उचित माना जाएगा। इसके अलावा विश्वविद्यालय का नाम बदलने की वैधानिक प्रक्रिया और आवश्यक स्वीकृतियों के संबंध में भी जानकारी मांगी गई।

    उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने अपने लिखित उत्तर में स्पष्ट कहा कि सरकार ने विश्वविद्यालय का नाम बदलने का कोई निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में आगे कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। डॉ. बरकतउल्ला भोपाली से जुड़े प्रश्न पर मंत्री ने बताया कि संबंधित जानकारी एकत्रित की जा रही है। वहीं विश्वविद्यालय का नाम बदलने की प्रक्रिया के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तित करने के लिए उसे संचालित करने वाले अधिनियम में संशोधन करना आवश्यक होता है, जो विधेयक के माध्यम से किया जाता है। अन्य प्रक्रियात्मक जानकारी निर्धारित अभिलेखों में उपलब्ध है।

    सरकार के इस आधिकारिक जवाब के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान समय में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने की कोई सरकारी योजना नहीं है। इससे लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगने की संभावना है। हालांकि विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा पारित प्रस्ताव और उससे जुड़ी चर्चाओं को लेकर राजनीतिक विमर्श भविष्य में भी जारी रह सकता है। फिलहाल विधानसभा में सरकार के स्पष्ट बयान ने इस विषय पर अपनी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दी है।

  • मानसून सत्र की शुरुआत हंगामेदार, कांग्रेस विधायकों का विधानसभा परिसर में प्रदर्शन, किसानों की समस्याओं पर सरकार से जवाब की मांग

    मानसून सत्र की शुरुआत हंगामेदार, कांग्रेस विधायकों का विधानसभा परिसर में प्रदर्शन, किसानों की समस्याओं पर सरकार से जवाब की मांग

    मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत सोमवार को राजनीतिक गर्माहट के साथ हुई। सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस विधायक दल ने किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर विधानसभा परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया। खाद की कमी, सरकारी खरीद में कथित अनियमितताओं और किसानों को समय पर उचित मुआवजा नहीं मिलने के आरोपों के साथ विपक्ष ने राज्य सरकार को घेरते हुए इन मुद्दों पर तत्काल समाधान की मांग की। प्रदर्शन के दौरान विधानसभा परिसर में राजनीतिक माहौल काफी गर्म रहा।

    नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में कांग्रेस के विधायकों ने सरकार के खिलाफ सांकेतिक विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन के दौरान कुछ विधायकों ने मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश के कृषि मंत्री के मुखौटे पहनकर विरोध जताया। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार किसानों की समस्याओं के समाधान में गंभीरता नहीं दिखा रही है और कृषि क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की लगातार अनदेखी की जा रही है।

    कांग्रेस विधायकों का कहना है कि प्रदेश के कई हिस्सों में किसान खाद की उपलब्धता को लेकर परेशान हैं और उन्हें लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। साथ ही फसलों के उचित दाम, मुआवजे के भुगतान और सरकारी खरीद व्यवस्था को लेकर भी किसानों में असंतोष है। विपक्ष का आरोप है कि किसानों की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन सरकार प्रभावी कदम उठाने में असफल रही है। कांग्रेस ने दावा किया कि वह इन सभी मुद्दों को विधानसभा के भीतर मजबूती से उठाएगी और जरूरत पड़ने पर सदन के बाहर भी आंदोलन जारी रखेगी।

    विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के आवास पर कांग्रेस विधायक दल की बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में मानसून सत्र के दौरान उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनाई गई। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि किसानों की परेशानी के अलावा बेरोजगारी, युवाओं को रोजगार, अतिथि शिक्षकों की मांगें, पिछड़ा वर्ग से जुड़े विषय और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई मामलों पर भी सरकार से जवाब मांगा जाएगा। विपक्ष का कहना है कि राज्य के विभिन्न वर्गों से जुड़े मुद्दों को पूरी मजबूती के साथ सदन में रखा जाएगा।

    कांग्रेस ने यह भी कहा कि केन-बेतवा परियोजना, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विषय और अन्य जनहित के मामलों पर भी सरकार को घेरने की तैयारी की गई है। विपक्ष का मानना है कि प्रदेश के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिन पर गंभीर चर्चा और ठोस निर्णय की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से विधायक दल ने सत्र के दौरान समन्वित रणनीति अपनाने का फैसला किया है।

    वहीं, विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि आगामी दिनों में सदन के भीतर किसानों, कृषि, रोजगार, शिक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिल सकती है। विपक्ष ने सरकार से किसानों के हितों की रक्षा, खाद की पर्याप्त उपलब्धता, पारदर्शी खरीद व्यवस्था और लंबित मुआवजे के मामलों का शीघ्र समाधान करने की मांग दोहराई है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार इन आरोपों और मांगों पर सदन के भीतर क्या जवाब देती है और किसानों से जुड़े मुद्दों पर कौन से ठोस कदम सामने आते हैं।

  • बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ऋतब्रत बनर्जी को मिली राहत; ममता खेमे को झटका

    बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ऋतब्रत बनर्जी को मिली राहत; ममता खेमे को झटका

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहे विवाद के बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। इस आदेश के साथ ही यह साफ हो गया है कि फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।

    यह मामला उस समय अदालत पहुंचा था जब विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रिया में मूल राजनीतिक दल की अनुशंसा और संगठनात्मक स्थिति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी आधार पर अदालत से मांग की गई थी कि अंतिम निर्णय आने तक इस नियुक्ति पर तत्काल रोक लगाई जाए।

    मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे। न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने उपलब्ध तथ्यों और कानूनी पक्षों पर विचार करने के बाद अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि वर्तमान परिस्थितियों में नियुक्ति पर रोक लगाने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता। इसके परिणामस्वरूप विधानसभा अध्यक्ष का पूर्व निर्णय प्रभावी बना रहेगा।

    अदालत के आदेश से ऋतब्रत बनर्जी को बड़ी राहत मिली है। अब वे अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक विपक्ष के नेता के रूप में सदन के भीतर अपनी भूमिका जारी रख सकेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला विधानसभा की शक्ति संरचना और विपक्ष की रणनीति दोनों पर प्रभाव डाल सकता है। साथ ही यह राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में नए समीकरण भी पैदा कर सकता है।

    हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए दोनों पक्षों को विस्तृत हलफनामे और लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि अगली सुनवाई से पहले सभी संबंधित पक्ष अपने तर्क, दस्तावेज और कानूनी आधार रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें। इसके बाद मामले के विभिन्न पहलुओं की विस्तार से समीक्षा की जाएगी और अंतिम निर्णय की दिशा तय होगी।

    इस फैसले के बाद विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र और उनके प्रशासनिक निर्णय को भी फिलहाल कानूनी संरक्षण मिला है। अदालत के रुख से यह संकेत मिला है कि संवैधानिक पदों से जुड़े मामलों में न्यायालय बिना विस्तृत सुनवाई के हस्तक्षेप करने से बचना चाहता है। यही कारण है कि अदालत ने अंतिम निर्णय से पहले यथास्थिति बनाए रखने को प्राथमिकता दी है।

    राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य की सत्तारूढ़ राजनीति और विपक्षी खेमे के बीच पहले से जारी टकराव के बीच यह मामला केवल एक पद की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियां, दलगत अधिकार, संसदीय परंपराएं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे कई संवैधानिक प्रश्न भी शामिल हो गए हैं।

    फिलहाल सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां दोनों पक्ष अपने विस्तृत कानूनी तर्क अदालत के सामने रखेंगे। तब तक ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में कार्य करते रहेंगे और विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय पूरी तरह लागू माना जाएगा।

  • असम में समान नागरिक संहिता की एंट्री से गरमाई सियासत, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का बड़ा फैसला

    असम में समान नागरिक संहिता की एंट्री से गरमाई सियासत, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का बड़ा फैसला


    नई दिल्ली । असम की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ उस समय देखने को मिला जब राज्य सरकार ने विधानसभा के विशेष सत्र में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी विधेयक को आधिकारिक रूप से सदन के पटल पर प्रस्तुत कर दिया। इस कदम के साथ असम नागरिक कानूनों में एकरूपता की दिशा में बढ़ने वाला तीसरा भाजपा शासित राज्य बन गया है। सरकार की ओर से इसे सामाजिक सुधार और समान अधिकारों की दिशा में एक मजबूत पहल बताया जा रहा है, जबकि विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए सदन के भीतर जोरदार विरोध दर्ज कराया। विधेयक पेश होते ही विधानसभा का माहौल गर्म हो गया और राजनीतिक बहस तेज हो गई।

    सरकार के दूसरे कार्यकाल में इस कानून को विशेष प्राथमिकता दी गई थी। लंबे समय से इस पर मंथन चल रहा था और कैबिनेट स्तर पर मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार इसे विधानसभा के सामने रखा गया। सरकार का दावा है कि इस कानून का उद्देश्य नागरिक जीवन से जुड़े विभिन्न नियमों में समानता स्थापित करना और समाज में मौजूद कुछ पुरानी व्यवस्थाओं को नए कानूनी ढांचे के अनुरूप ढालना है। हालांकि इस फैसले के सामने आते ही विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया और व्यापक चर्चा की मांग उठाई।

    विपक्षी दलों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले कानून पर राज्य के विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और अन्य संबंधित समूहों से विस्तृत बातचीत की जानी चाहिए थी। उनका मानना है कि समाज के अलग-अलग वर्गों की राय शामिल किए बिना ऐसे बड़े कानून को लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। इसी मुद्दे को लेकर सदन के भीतर तीखी बहस और विरोध का माहौल देखने को मिला। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं लगातार तेज हो गई हैं।

    इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह मानी जा रही है कि राज्य के मूल निवासी और आदिवासी समाज को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। माना जा रहा है कि इस फैसले के जरिए राज्य के पारंपरिक ढांचे और जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। सामाजिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में इसे एक रणनीतिक कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।

    विधेयक में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका सीधा संबंध नागरिक जीवन से है। इसमें बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक, विवाह के लिए समान कानूनी आयु, शादियों और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण, महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी के अधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए कानूनी प्रावधान जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं। सरकार इसे समाज में समानता और पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बता रही है।

    फिलहाल पूरे देश की नजरें अब इस विधेयक की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में सदन के भीतर इस पर चर्चा और राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। यह स्पष्ट है कि असम का यह कदम केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर भी इस विषय पर नई बहस को जन्म दे सकता है।

  • West Bengal Election 2026: क्या चौथी बार सत्ता में लौटेंगी ममता बनर्जी या BJP बदलेगी 15 साल का खेल?

    West Bengal Election 2026: क्या चौथी बार सत्ता में लौटेंगी ममता बनर्जी या BJP बदलेगी 15 साल का खेल?


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सियासी माहौल तेज हो गया है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं और इस बार उनकी नजर लगातार चौथी जीत पर है। अगर वह इस चुनाव में जीत हासिल करती हैं, तो वह राज्य की पहली ऐसी नेता बन जाएंगी जो लगातार चार बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाएंगी।

    15 साल की सत्ता और नया चुनावी इम्तिहान
    ममता बनर्जी ने साल 2011 में 34 साल पुराने वामपंथी शासन को खत्म कर सत्ता संभाली थी। इसके बाद 2016 और 2021 में भी उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने जीत दर्ज की। अब 2026 का चुनाव उनके लिए एक बड़ा इम्तिहान माना जा रहा है, क्योंकि इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद जनता के बीच असंतोष भी एक बड़ा फैक्टर बन सकता है। चुनाव आयोग के मुताबिक इस बार मतदान दो चरणों में होगा: 23 अप्रैल 29 अप्रैल जबकि नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। पिछली बार की तुलना में इस बार कम चरणों में चुनाव कराए जा रहे हैं। लगातार 15 साल से सत्ता में रहने के कारण एंटी-इनकम्बेंसी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। लोगों के बीच कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और विकास जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    वोटर लिस्ट विवाद
    इस चुनाव में वोटर लिस्ट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। करीब 63 लाख वोटरों के नाम हटाए गए लाखों नाम अभी भी जांच में यह मुद्दा चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। बीते कुछ सालों में TMC सरकार पर कई घोटालों के आरोप लगे हैं, जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन (PDS) घोटाला, तस्करी से जुड़े मामले इन मुद्दों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। राज्य में वक्फ कानून और अन्य मुद्दों को लेकर भी विवाद बढ़ा है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक माहौल प्रभावित हुआ है।

    BJP की बढ़ती चुनौती
    इस बार BJP ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देने की तैयारी में हैृ। 2021 के मुकाबले पार्टी इस बार ज्यादा आक्रामक रणनीति के साथ मैदान में उतरी है। चुनाव से पहले ममता सरकार ने कई बड़े फैसले लिए हैं लक्ष्मी भंडार योजना की राशि बढ़ाई बेरोजगार युवाओं के लिए आर्थिक मदद सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता (DA) पुजारियों और मुअज्जिनों के मानदेय में बढ़ोतरी इन योजनाओं के जरिए ममता बनर्जी अलग-अलग वर्गों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही हैं।

    क्या फिर बनेगी सरकार?
    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी अब भी राज्य की सबसे मजबूत नेता हैं, लेकिन इस बार मुकाबला पहले से ज्यादा कठिन है। शहरी इलाकों में नाराजगी और भ्रष्टाचार के आरोप चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। बंगाल चुनाव 2026 सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक भविष्य की बड़ी परीक्षा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह चौथी बार जीतकर इतिहास रचती हैं या इस बार बंगाल की सत्ता में बदलाव आता है।

  • छात्राओं के गर्भवती होने के मुद्दे पर विधानसभा में हंगामा, विपक्ष का वॉकआउट; सरकार पर आरोपों की बौछार

    छात्राओं के गर्भवती होने के मुद्दे पर विधानसभा में हंगामा, विपक्ष का वॉकआउट; सरकार पर आरोपों की बौछार


    रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में सोमवार को बीजापुर जिले के एक पोर्टा केबिन स्कूल हॉस्टल से जुड़ा मामला सियासी तूफान बन गया। तीन छात्राओं के गर्भवती होने के आरोपों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई, जो अंततः हंगामे और वॉकआउट में बदल गई।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल
    कांग्रेस विधायकों ने सदन में आरोप लगाया कि बीजापुर के हॉस्टल में रहने वाली तीन छात्राएं गर्भवती पाई गई हैं। इस मुद्दे पर जवाब की मांग करते हुए विक्रम मंडावी, चरण दास महंत और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार को घेरा।

    शिक्षा मंत्री का जवाब, लेकिन विवाद बरकरार
    राज्य के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिन तीन छात्राओं की बात की जा रही है, उनमें से दो हॉस्टल में रहती ही नहीं हैं, जबकि एक छात्रा दिवाली की छुट्टियों के बाद से वापस नहीं लौटी है।

    हालांकि मंत्री के इस जवाब से विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ और कांग्रेस विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

    ‘मामला दबाने की कोशिश’ का आरोप
    ‘शून्य काल’ के दौरान विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार इस गंभीर मामले को दबाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि जैसे ही छात्राओं के गर्भवती होने की बात सामने आई, उन्हें घर भेज दिया गया और अब प्रशासन यह कहकर मामले को कमजोर करने में जुटा है कि वे हॉस्टल में रह ही नहीं रही थीं।

    विपक्ष ने यह भी कहा कि मामला आदिवासी क्षेत्र से जुड़ा है, इसलिए इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है।

    आरोपियों को बचाने का आरोप
    विपक्षी विधायकों का आरोप है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें बचाया जा रहा है। इसी कारण सदन में इस विषय पर विस्तृत चर्चा की अनुमति भी नहीं दी जा रही।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने जताई चिंता
    पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि आवासीय स्कूल से जुड़ी ऐसी खबर बेहद चिंताजनक है। उन्होंने बताया कि तीन में से दो छात्राएं नाबालिग हैं और मामले की पूरी जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

    इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।