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  • गैरसैंण में उत्तराखंड विधानसभा का दो दिवसीय सत्र आज से, सरकार पेश करेगी 7,412 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट

    गैरसैंण में उत्तराखंड विधानसभा का दो दिवसीय सत्र आज से, सरकार पेश करेगी 7,412 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट


    नई दिल्ली ।
    उत्तराखंड विधानसभा का दो दिवसीय सत्र मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को गैरसैंण में शुरू हो रहा है। सत्र के पहले दिन राज्य सरकार लगभग 7,412 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट पेश करेगी। इसके अलावा आठ विधेयक सदन में रखे जाने हैं। वित्तीय प्रस्तावों, विधायी कार्यों और जनहित से जुड़े विषयों पर चर्चा के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस होने की संभावना है।

    इस सत्र में राज्य की वित्तीय प्राथमिकताओं और विकास से जुड़े मुद्दों पर विशेष ध्यान रहने की उम्मीद है। सरकार अनुपूरक बजट के माध्यम से अतिरिक्त वित्तीय प्रावधानों से संबंधित प्रस्ताव सदन के सामने रखेगी। आठ विधेयकों की प्रस्तुति भी कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। इनके जरिए विभिन्न विधायी विषयों पर सदन में चर्चा और आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

    विधानसभा की कार्यवाही के दौरान उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट को श्रद्धांजलि भी दी जाएगी। सदन में दोनों नेताओं के योगदान को याद किया जाएगा। सत्र के दौरान वित्तीय मामलों के साथ-साथ राज्य के सामाजिक, प्रशासनिक और विकास संबंधी विषयों पर भी विधायकों की ओर से सवाल उठाए जाने की उम्मीद है।

    इस दो दिवसीय सत्र के लिए कुल 31 विधायकों ने 445 सवाल जमा किए हैं। इन सवालों के माध्यम से विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों और प्रदेश से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगेंगे। प्रश्नों में जनता की समस्याओं और राज्य के विकास से संबंधित विषयों के उठने की संभावना है। सदन में इन सवालों के जवाबों के जरिए सरकार की योजनाओं और संबंधित मामलों पर चर्चा हो सकती है।

    विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूड़ी ने सभी राजनीतिक दलों से सत्र के सुचारू संचालन में सहयोग करने की अपील की है। दो दिन की सीमित अवधि को देखते हुए सदन की कार्यवाही में वित्तीय प्रस्तावों, विधेयकों और विधायकों के सवालों को लेकर महत्वपूर्ण गतिविधियां रहने की उम्मीद है।

    सत्र से पहले सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस ने अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने के लिए बैठकें कीं। दोनों दलों ने उन विषयों पर चर्चा की, जिन्हें वे सदन में उठाना चाहते हैं। इन मुद्दों में शासन, जनकल्याण और राज्य की वित्तीय प्राथमिकताओं से जुड़े विषय शामिल हैं। कांग्रेस कार्य सलाहकार समिति की बैठक में शामिल नहीं हुई।

    सोमवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गैरसैंण में भाजपा विधायक दल की बैठक की अध्यक्षता की थी। बैठक में मंत्रियों और विधायकों ने सत्र की तैयारियों, सदन की कार्यवाही और संभावित मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। मुख्यमंत्री ने बताया कि बैठक में जनहित, राज्य के विकास और जनकल्याण से संबंधित विषयों पर चर्चा हुई।

    वहीं, कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था और स्थानीय समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। विपक्ष इन मुद्दों को सदन में उठाने के साथ विधानसभा के आसपास विरोध प्रदर्शन करने की योजना भी बना रहा है। ऐसे में सत्र के दौरान सरकार के वित्तीय प्रस्तावों के साथ विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले सवाल भी राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में रहेंगे।

    दो दिवसीय सत्र में अनुपूरक बजट की प्रस्तुति, आठ विधेयकों और 445 सवालों के बीच सरकार तथा विपक्ष की रणनीति पर नजर रहेगी। सदन की कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि निर्धारित समय में किन वित्तीय, विधायी और जनहित के मुद्दों पर चर्चा आगे बढ़ती है।

  • दिल्ली विधानसभा में बम धमकियों के बाद सुरक्षा सख्त, आठ वॉच टावर बनेंगे, सीआरपीएफ की गश्त और वाहन जांच व्यवस्था होगी मजबूत

    दिल्ली विधानसभा में बम धमकियों के बाद सुरक्षा सख्त, आठ वॉच टावर बनेंगे, सीआरपीएफ की गश्त और वाहन जांच व्यवस्था होगी मजबूत

    नई दिल्ली । दिल्ली विधानसभा परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यापक स्तर पर नए इंतजाम किए जा रहे हैं। बम धमकियों और सुरक्षा संबंधी घटनाओं को ध्यान में रखते हुए परिसर में आठ वॉच टावर बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही वाहनों की जांच के लिए आधुनिक तकनीक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों के लिए अलग गश्ती मार्ग और आगंतुकों की डिजिटल पहचान जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं। विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने सोमवार को सुरक्षा मजबूत करने के लिए चल रहे कार्यों की जानकारी दी।

    विधानसभा परिसर के सामने, पीछे और अन्य संवेदनशील स्थानों पर आठ वॉच टावर स्थापित किए जा रहे हैं। इन टावरों पर सीआरपीएफ के जवान तैनात रहेंगे, जिससे परिसर के अलग-अलग हिस्सों पर निगरानी रखने में मदद मिलेगी। अधिकारियों की योजना के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि परिसर की सीमा और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी अधिक प्रभावी हो सके। आठ वॉच टावरों में से एक का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि बाकी टावरों का काम जारी है।

    परिसर की सीमा पर एक छोर से दूसरे छोर तक गश्त करने के लिए सीआरपीएफ के जवानों के वास्ते अलग मार्ग भी बनाया जा रहा है। इस मार्ग का लगभग 70 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इसके तैयार होने से सुरक्षा कर्मियों को परिसर के बाहरी हिस्सों में नियमित गश्त करने के लिए निर्धारित रास्ता मिलेगा। वॉच टावरों और गश्ती मार्ग को सुरक्षा व्यवस्था के नए ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

    वाहनों की जांच को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विधानसभा के गेट नंबर दो और पांच पर अंडर व्हीकल सर्विलांस सिस्टम (यूवीएसएस) लगाए गए हैं। इस तकनीक के माध्यम से वाहनों की जांच की जा सकेगी। साथ ही संदिग्ध वाहनों और फर्जी नंबर प्लेट वाले वाहनों की पहचान करने में भी सहायता मिलेगी। इससे विधानसभा परिसर में प्रवेश करने वाले वाहनों की निगरानी को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

    गेट नंबर एक पर फोटो पहचान की सुविधा वाले फ्लैप बैरियर लगाए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) तकनीक का इस्तेमाल वाहनों की पहचान करने और उनकी आवाजाही का रिकॉर्ड रखने के लिए किया जाएगा। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य परिसर में आने-जाने वाले वाहनों पर नजर रखना और प्रवेश प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है। गेट नंबर एक से पांच तक स्वचालित स्लाइडिंग दरवाजे लगाने का काम भी किया जा रहा है।

    विधानसभा परिसर में फिलहाल करीब 120 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। निगरानी व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए ऐसे स्थानों की पहचान करने को दिल्ली पुलिस से कहा गया है, जहां अंधेरा रहता है या सुरक्षा की दृष्टि से अतिरिक्त निगरानी की आवश्यकता है। इन स्थानों की पहचान के बाद वहां सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुसार कदम उठाए जा सकेंगे।

    आगंतुकों के प्रवेश की प्रक्रिया में भी डिजिटल व्यवस्था लागू की जा रही है। विधानसभा के रिसेप्शन पर आने वाले लोगों की फोटो पहचान दर्ज की जाएगी। इसके साथ ही उनकी आवश्यक जानकारी और विधानसभा आने का उद्देश्य भी रिकॉर्ड किया जाएगा। इस तरह सुरक्षा व्यवस्था में प्रवेश से लेकर परिसर के भीतर निगरानी तक कई स्तरों पर बदलाव किए जा रहे हैं। वॉच टावर, वाहन जांच प्रणाली, सीसीटीवी कैमरे, गश्ती मार्ग और डिजिटल पहचान के जरिए विधानसभा परिसर की सुरक्षा को अधिक मजबूत बनाने की तैयारी है।

  • पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी, सरकार विधानसभा में लाएगी बिल

    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी, सरकार विधानसभा में लाएगी बिल


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ करने की तैयारी फिर तेज हो गई है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य सरकार जल्द विधानसभा में नाम परिवर्तन से जुड़ा विधेयक पेश करेगी। उन्होंने संकेत दिया कि यह बिल अगले विधानसभा सत्र में लाया जा सकता है।

    समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य का नाम ‘बंगाल’ या ‘वेस्ट बंगाल’ रखने के बजाय ‘पश्चिम बंग’ किया जाएगा। उनके मुताबिक, इस नाम का उद्देश्य राज्य को उसके इतिहास और पहचान से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि सरकार जल्द इस दिशा में विधायी प्रक्रिया शुरू करेगी।

    वाराणसी में बनेगा ‘पश्चिम बंग भवन’
    समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाने की योजना की भी जानकारी दी। उनके मुताबिक, यह भवन राज्य के संस्कृति और पर्यटन विभाग, केंद्र सरकार तथा कूचबिहार के पूर्व राजपरिवार के वंशजों के सहयोग से तैयार किया जाएगा।

    यह भवन केवल सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर ही नहीं, बल्कि बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भी उपयोग किया जाएगा। प्रस्ताव में सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ अन्य सुविधाएं विकसित करने की बात कही गई है।

    भाजपा नेता ने वाराणसी और बंगाल के बीच पुराने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कूचबिहार के राजपरिवार से जुड़े इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी और इसके बाद वहां दो मंदिरों का निर्माण कराया गया था।

    पहले भी कई बार उठा है नाम बदलने का मुद्दा
    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मुद्दा नया नहीं है। 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बाद में ‘बांग्ला’ नाम को लेकर भी चर्चा हुई और प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

    2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा दोबारा उठा। ममता बनर्जी सरकार ने भी ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में राज्य का नाम काफी नीचे आने के कारण राष्ट्रीय बैठकों में पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। सर्वदलीय बैठक में प्रस्ताव का समर्थन भी हुआ, लेकिन केंद्र की मंजूरी नहीं मिली।

    इसके बाद 2016 में नाम बदलने की प्रक्रिया फिर शुरू हुई। उस समय बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने का प्रस्ताव सामने आया। वर्ष 2018 में विधानसभा ने सर्वसम्मति से राज्य का नाम केवल ‘बांग्ला’ रखने का प्रस्ताव पारित किया था।

    हालांकि, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। नाम परिवर्तन के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी होने की बात सामने आई। साथ ही भाजपा के एक वर्ग ने ‘बांग्ला’ नाम की ‘बांग्लादेश’ से समानता को लेकर भी आपत्ति जताई थी।

    अब आगे क्या होगा?
    समिक भट्टाचार्य ने अब एक बार फिर ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव सामने रखा है। हालांकि, केवल राज्य विधानसभा में विधेयक पेश और पारित होने से नाम तुरंत नहीं बदलेगा। राज्य का नाम बदलने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे केंद्र और संसद की भूमिका भी होगी। मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव को विधानसभा स्तर से आगे बढ़कर केंद्र की प्रक्रिया और संसद की मंजूरी से गुजरना होगा। इसलिए फिलहाल पश्चिम बंगाल का आधिकारिक नाम ‘पश्चिम बंग’ नहीं हुआ है; यह नाम बदलने की प्रस्तावित प्रक्रिया का हिस्सा है।

  • जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य के प्रस्ताव पर हंगामा, नारेबाजी और धक्कामुक्की के बाद कार्यवाही स्थगित

    जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य के प्रस्ताव पर हंगामा, नारेबाजी और धक्कामुक्की के बाद कार्यवाही स्थगित


    नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर विधानसभा में शुक्रवार को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव को लेकर जोरदार हंगामा हुआ। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र शासित प्रदेश को तत्काल और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग वाला प्रस्ताव सदन में पेश किया। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भाजपा विधायकों ने इसका विरोध किया, जिसके बाद सदन का माहौल लगातार तनावपूर्ण होता गया। नारेबाजी, तीखी बहस, धक्कामुक्की और दस्तावेजों को फाड़ने की घटनाओं के बीच विधानसभा की कार्यवाही पहले कुछ समय और बाद में सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी गई।

    मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रस्ताव के जरिए जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग दोहराई। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया गया और इसे आगे भारत सरकार के पास भेजने की बात भी शामिल थी। हालांकि, प्रस्ताव की प्रस्तावना में वर्ष 2000 के स्वायत्तता संबंधी प्रस्ताव और नवंबर 2024 में पारित विशेष दर्जे से जुड़े प्रस्ताव के संदर्भ ने विवाद खड़ा कर दिया।

    भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव में स्वायत्तता के पुराने संदर्भ को शामिल किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि सदन में स्वायत्तता से संबंधित विषय पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्षी सदस्यों के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। देखते ही देखते कई विधायक अपनी सीटों से उठकर सदन के बीचोंबीच पहुंच गए और नारेबाजी करने लगे।

    हंगामे के दौरान प्रस्ताव की प्रतियां फाड़कर सदन के बीच में फेंके जाने की भी घटना सामने आई। स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब भाजपा विधायक विक्रम रंधावा ने सदन के बीच से एक कुर्सी उठाने का प्रयास किया। मार्शलों ने उन्हें रोकने की कोशिश की और बाद में उन्हें सदन से बाहर ले जाया गया।

    विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने कई बार सदस्यों से अपनी-अपनी सीटों पर लौटने और सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने देने की अपील की। लेकिन लगातार जारी नारेबाजी और हंगामे के कारण स्थिति सामान्य नहीं हो सकी। इसके बाद अध्यक्ष ने पहले करीब 30 मिनट के लिए कार्यवाही स्थगित की। दोबारा कार्यवाही शुरू होने पर भी हंगामा जारी रहा, जिसके बाद सदन की बैठक सोमवार तक स्थगित कर दी गई।

    इससे पहले कांग्रेस विधायकों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग को लेकर भी सदन में विरोध जताया था। इस दौरान नारेबाजी हुई और सदन का माहौल पहले से ही गरम रहा।

    मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पूर्ण राज्य के दर्जे के मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने सार्वजनिक बयान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक सार्वजनिक कार्यक्रम में, जहां नेता प्रतिपक्ष भी मौजूद थे, उन्होंने राज्य के दर्जे का मुद्दा उठाया था। उनके अनुसार, उस समय प्रधानमंत्री ने इसे सामान्य वादा नहीं बल्कि ‘मोदी की गारंटी’ बताया था। उमर ने सवाल उठाया कि यदि यह गारंटी थी, तो अब तक इसे पूरा क्यों नहीं किया गया।

    जम्मू-कश्मीर में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। विधानसभा में शुक्रवार की कार्यवाही ने इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और भाजपा के बीच मतभेद को एक बार फिर सामने ला दिया। फिलहाल प्रस्ताव पर आगे की चर्चा और सदन की अगली कार्रवाई सोमवार को होने की संभावना है।

  • सतना से किसान कांग्रेस का बड़ा ऐलान, MSP और बिजली समेत मांगों को लेकर आंदोलन तेज करने की तैयारी

    सतना से किसान कांग्रेस का बड़ा ऐलान, MSP और बिजली समेत मांगों को लेकर आंदोलन तेज करने की तैयारी

    मध्य प्रदेश : में किसानों की विभिन्न समस्याओं और मांगों को लेकर किसान कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सतना में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह चौहान ने किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर निशाना साधा और जल्द समाधान नहीं होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि यदि किसानों की मांगों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो संगठन सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करेगा और विधानसभा का घेराव भी किया जाएगा।

    किसान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान किसानों से जुड़ी कई मांगें उठाईं। उन्होंने भारत-अमेरिका कृषि ट्रेड डील को किसानों के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की। उनका कहना था कि कृषि क्षेत्र से जुड़े फैसलों में किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और ऐसे समझौतों से पहले किसानों की चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

    उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को लेकर भी सरकार से ठोस कानून बनाने की मांग की। धर्मेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि किसानों की उपज को तय समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदने और बेचने की स्थिति को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने एमएसपी सुरक्षा कानून लागू करने की मांग को प्रमुख मुद्दा बताया।

    किसान कांग्रेस ने प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर भी सवाल उठाए। संगठन की मांग है कि सरकार किसानों से मूंग की शत-प्रतिशत खरीदी सुनिश्चित करे, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी का सामना न करना पड़े। इसके साथ ही खेती के लिए पर्याप्त बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई। किसान कांग्रेस ने कृषि कार्यों के लिए 24 घंटे थ्री-फेज बिजली देने की मांग की।

    इसके अलावा कृषि उपज मंडी और सहकारिता चुनावों को लेकर भी संगठन ने सरकार को घेरा। किसान कांग्रेस का कहना है कि पिछले कई वर्षों से लंबित इन चुनावों को जल्द कराया जाना चाहिए, ताकि किसानों से जुड़े संस्थानों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हो सके।

    धर्मेंद्र सिंह चौहान ने भाजपा सरकार पर किसानों से किए गए चुनावी वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान धान और गेहूं की खरीदी को लेकर जो घोषणाएं की गई थीं, सरकार अब उनसे पीछे हट रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि किसान महंगे डीजल, खाद की बढ़ती कीमतों, बिजली बिल और कर्ज जैसी समस्याओं से परेशान हैं।

    उन्होंने कहा कि प्रदेश में किसानों को मंडियों में उचित मूल्य नहीं मिल रहा है और सरकार की नीतियां किसानों की परेशानियां कम करने में सफल नहीं हो रही हैं। किसान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने सरकार पर किसान कल्याण के दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर होने का आरोप लगाया।

    किसान कांग्रेस ने साफ किया है कि यदि किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो संगठन प्रदेशभर में किसानों को एकजुट कर आंदोलन करेगा। इसके तहत राजधानी भोपाल में विधानसभा घेराव की चेतावनी भी दी गई है। फिलहाल किसान कांग्रेस के इस ऐलान के बाद प्रदेश में किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है।

  • 2027 के विधानसभा चुनावों में कितना असर दिखाएंगे Gen Z, युवाओं की बढ़ती ताकत पर टिकी राजनीतिक दलों की नजर

    2027 के विधानसभा चुनावों में कितना असर दिखाएंगे Gen Z, युवाओं की बढ़ती ताकत पर टिकी राजनीतिक दलों की नजर

    नई दिल्ली । हाल के वर्षों में देश में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने नई बहस को जन्म दिया है। विशेष रूप से हालिया छात्र आंदोलनों और सोशल मीडिया अभियानों के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनावों में Gen Z मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक दल भी इस वर्ग को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए अलग-अलग स्तर पर युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

    Gen Z में वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को शामिल किया जाता है। वर्ष 2026 के हिसाब से इस वर्ग की उम्र लगभग 14 से 29 वर्ष के बीच है। देश में इनकी आबादी करीब 37 करोड़ बताई जाती है, जबकि 18 वर्ष से अधिक आयु वाले मतदाताओं में भी इस वर्ग की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। यही कारण है कि आने वाले चुनावों में युवा मतदाता राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण समूह बनकर उभरे हैं।

    उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में वर्ष 2027 के दौरान विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इन राज्यों में बड़ी संख्या में युवा मतदाता चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। उत्तर प्रदेश में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग चार करोड़ मतदाता हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 30 प्रतिशत माने जा रहे हैं। इसके अलावा पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

    पंजाब में भी बड़ी संख्या में युवा मतदाताओं की मौजूदगी को देखते हुए राजनीतिक दल उन्हें साधने की तैयारी में हैं। कई दल युवा उम्मीदवारों को अधिक अवसर देने और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं उत्तराखंड में भी युवा मतदाता कुल मतदाताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिससे चुनावी मुकाबले में उनकी भूमिका अहम मानी जा रही है।

    गुजरात में भी युवा मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। राज्य में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल संगठन और नेतृत्व स्तर पर युवाओं को अधिक जिम्मेदारियां देने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। वहीं गोवा में भी नए मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे युवा वर्ग का चुनावी महत्व और बढ़ गया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि Gen Z की कार्यशैली पारंपरिक राजनीति से अलग है। यह वर्ग सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन संवाद के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करने में अधिक सक्रिय रहता है। कई सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर डिजिटल अभियानों में युवाओं की भागीदारी ने यह संकेत दिया है कि वे केवल ऑनलाइन चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि युवा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थन आधार नहीं माने जा सकते। यह वर्ग रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता, अवसर और शासन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देता है तथा परिस्थितियों के अनुसार अपना चुनावी निर्णय बदल सकता है। इसी कारण अधिकांश राजनीतिक दल युवाओं से जुड़े विषयों को अपने चुनावी एजेंडे में प्रमुख स्थान देने की तैयारी कर रहे हैं।

    हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि Gen Z अकेले चुनावी परिणाम तय कर देगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि कई राज्यों में युवा मतदाता मुकाबले को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव इस बात की महत्वपूर्ण परीक्षा होंगे कि युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी किस हद तक चुनावी नतीजों और राजनीतिक रणनीतियों को प्रभावित करती है।

  • अब मध्‍य प्रदेश के प्रत्येक विधानसभा में खुलेगी "कृषि यंत्र किराये की दुकान"

    अब मध्‍य प्रदेश के प्रत्येक विधानसभा में खुलेगी "कृषि यंत्र किराये की दुकान"


    भोपाल ! मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर किसानों की सहूलियत के लिये प्रत्येक विधानसभा में कम से कम एक “कृषि यंत्र किराये की दुकान” अनिवार्य रूप से खोलने की तैयारी चल रही है। कृषक कल्याण वर्ष में जल्दी ही इस पहल के परिणाम मिलेंगे। छोटे और सीमांत किसानों को अपने खेत तैयार करने आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग करना आसान हो जायेगा। वर्तमान में ऐसे 5260 केन्द्र संचालित है। अब हर साल 1060 कृषि यंत्र किराये की दुकानें स्थापित की जायेगी।

    मध्यप्रदेश अब तेजी से कृषि यंत्रों के निर्माण में आत्मनिर्भर हो रहा है। विदिशा जिले ने आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर उच्च गुणवत्ता के कृषि यंत्रों का निर्माण करना शुरू कर दिया है। ग्रेडर, लेवलर, हाइड्रालिक ट्रॉली, कल्टीवेटर, प्लाउ जैसे उपकरण जिले में ही बनाये जा रहे है। यहां लगभग 150 कृषि उपकरण निर्माण इकाइयाँ है। यहां बने कृषि यंत्रों की मांग अन्य राज्यों और विदेशों में भी हो रही है। मेडागास्कर, नाइजीरिया, सूडान, यूगांडा, घाना, अलजीरिया, ग्वाटेमाल, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश में यहां से निर्मित उपकरण भेजे जा रहे है।

    छोटे किसानों को न्यूनतम सेवा शुल्क पर अत्याधुनिक कृषि यंत्रों की सेवाएं मिल रही है। युवा उद्यमियों को भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है।

    उषा एग्रो के मानस गुप्ता बताते हैं किहम खेती में काम आने वाले यंत्र और उपकरण बनाते हैं, जैसे- लोडर, डिलोडर, कल्टीवेटर आदि। सभी उपकरण किसानों के लिए उपयोगी हैं। कब से ये काम शुरू किया? यह पूछने पर उन्होंने बताया किइस काम की शुरुआत पिताजी ने 1993 में की थी। शुरुआत छोटे पैमाने पर हुई, फिर धीरे-धीरे इसका विस्तार किया और अब तो हमारे उपकरण विदेशों में भी पहुंच रहे हैं।

    हमारे सबसे बड़े ग्राहक स्थानीय किसान हैं। हमारे उत्पादों का अधिकांश हिस्सा स्थानीय बाजार में ही खप जाता है, लेकिन हम देश के दूसरे राज्यों और विदेशों में भी सप्लाय करते हैं। आज हमारे बनाए यंत्र और उपकरण 10 से ज्यादा देशों तक पहुंच रहे हैं. इनमें नाइजीरिया, सूडान, केन्या, यूगांडा, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, घाना, अल्जीरिया, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं। हमारा दो-तिहाई बिजनेस देश के अंदर होता है और एक-तिहाई कारोबार विदेशों में है। पूरे साल में करीब 4 करोड़ रुपये का कारोबार होता है।

    शासन की मदद के संबंध में वे बताते है किहमें इस काम में डॉ. मोहन यादव जी की सरकार से बहुत मदद मिलती है। उत्पादन से लेकर व्यवसाय के विस्तार तक में सरकार की नीतियां हमारे लिए मददगार साबित हुई हैं। अपने उत्पादों को विदेशों तक पहुंचाने में भी हमें सरकारी सहायता मिलती है। सरकार की पहल पर मैं जी-20 सम्मेलन में भी शामिल हुआ और इसके खर्च का करीब 75 प्रतिशत सरकार ने वहन किया।

    विष्णु शर्मा, संजय उद्योगट्रैक्टर से संबंधित उपकरण बनाते हैं जैसे कल्टीवेटर, प्लाऊ आदि। ये उपकरण किसानों के लिए उपयोगी हैं। ट्रैक्टर से किसान अपने खेतों को आसानी से तैयार करते हैं। इसमें जिन उपकरणों की जरूरत होती है वो सब बनाते हैं।

    उत्पादों की सप्लाय के संबंध में उन्होंने बताया कि मुख्य रूप से विदिशा और उसके आसपास के जिलों में होती है। दूसरे राज्यों में भी पहुंचते हैं। हमारा सालाना व्यवसाय करीब 50 लाख रुपये का है।

    अपने काम की शुरुआत के संबंध में वे बताते है किहमने वर्ष 2020 में कोरोना संकट के दौरान इसकी शुरुआत की थी। शुरुआत में ही किसानों ने हमारे उत्पादों को हाथों हाथ लिया। इससे हमारा उत्साह बढ़ा और हम लगातार इसके विस्तार की कोशिश कर रहे हैं। सरकार की ओर से हमारे जैसे अन्य लोगों के लिए प्रशिक्षण की सुविधा मिलना चाहिए।

    विपिन रघुवंशी, मेसर्स किसान इंडस्ट्रीज मुख्य रूप से कल्टीवेटर, प्लाऊ, लोडर, डिलोडर बनाते हैं। उत्पादों का अधिकांश हिस्सा विदिशा और उसके आसपास के इलाकों में ही खप जाता है। आसपास के जिलों के किसान भी हमारे यंत्र और उपकरण खरीदते हैं।

    हमारे सभी उपकरण ऐसे हैं जो खेती के अलग-अलग स्तरों पर काम आते हैं। खेतों को तैयार करने से लेकर रोपनी, बोवनी और कटाई सभी कार्यों के लिए उपकरण बनाते हैं। किसानों का इनके बिना काम नहीं चलता। दीपक नरवरिया, मे. एग्रो स्मार्ट टेक्नोलॉजी ने बताया कि हमारा बाजार मध्य प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों तक फैला हुआ है। अधिकांश यंत्र और उपकरण विदिशा और आसपास के इलाकों के किसानों की मांग पूरी करने में ही खप जाते हैं।सालाना कारोबार करीब 3 करोड़ रुपयों का है। हमारे सारे ग्राहक किसान और खेती से जुड़ी संस्थाएं हैं।

  • विधानसभा पहुंचे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मॉनसून सत्र के पहले दिन कार्य मंत्रणा समिति से विधायक दल की बैठक तक व्यस्त रहेगा पूरा कार्यक्रम

    विधानसभा पहुंचे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मॉनसून सत्र के पहले दिन कार्य मंत्रणा समिति से विधायक दल की बैठक तक व्यस्त रहेगा पूरा कार्यक्रम

    मध्य प्रदेश विधानसभा का मॉनसून सत्र सोमवार से शुरू हो गया, जिसके साथ ही राज्य की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। सत्र के पहले दिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कार्यक्रम पूरी तरह विधानसभा और उससे जुड़ी बैठकों पर केंद्रित रहा। सरकार की ओर से कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की तैयारी है, वहीं विपक्ष भी विभिन्न जनहित और प्रशासनिक मामलों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति के साथ सदन में उतरा है।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह विधानसभा पहुंचे। इसके बाद कार्य मंत्रणा समिति की बैठक आयोजित हुई, जिसमें सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही, विभिन्न विधायी कार्यों और चर्चा के एजेंडे पर विचार किया गया। इसके उपरांत मुख्यमंत्री विधानसभा की कार्यवाही में शामिल हुए, जहां पहले दिन की गतिविधियों पर सभी की नजर बनी रही।

    इस मॉनसून सत्र की सबसे महत्वपूर्ण चर्चाओं में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित विधेयक को माना जा रहा है। मंत्रिपरिषद से मंजूरी मिलने के बाद सरकार इसे सदन में प्रस्तुत करने की तैयारी कर चुकी है। यदि विधेयक पेश होता है तो इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच व्यापक चर्चा होने की संभावना है। सरकार इसे महत्वपूर्ण विधायी पहल के रूप में देख रही है, जबकि विपक्ष इसके विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाने की तैयारी में है।

    मुख्यमंत्री के दिनभर के कार्यक्रम में दोपहर के समय जनप्रतिनिधियों और अन्य लोगों से मुलाकात का समय भी निर्धारित रहा। इसके बाद समिति कक्ष में गुरु पूर्णिमा महोत्सव से संबंधित बैठक आयोजित की गई, जिसमें आयोजन और अन्य व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई। आधिकारिक बैठकों के बाद मुख्यमंत्री के निवास लौटने का कार्यक्रम तय रहा। शाम को समत्व भवन में विधायक दल की बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें आगामी सदन की रणनीति और विभिन्न विधायी विषयों पर विचार-विमर्श किया जाना प्रस्तावित है।

    विधानसभा का यह मॉनसून सत्र 24 जुलाई तक चलेगा। इस दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयकों के साथ-साथ विभिन्न विभागों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। सरकार विकास योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और नई नीतियों को सदन के माध्यम से आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष राज्य से जुड़े अनेक मामलों को लेकर सरकार से जवाब मांगने की रणनीति बना चुका है।

    सत्र के दौरान केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित विस्थापितों के मुआवजे, उज्जैन में भूमि खरीद से जुड़े मामलों, नीट यूजी परीक्षा से संबंधित विवाद, सीबीएसई परीक्षा में कथित अनियमितताओं सहित कई अन्य विषयों के सदन में उठने की संभावना है। विपक्ष इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि सत्ता पक्ष अपने फैसलों और योजनाओं का पक्ष मजबूती से रखने का प्रयास करेगा।

    राजनीतिक दृष्टि से यह सत्र काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें राज्य सरकार की कई नीतियों और निर्णयों की परीक्षा भी होगी। सत्ता पक्ष जहां अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास करेगा, वहीं विपक्ष जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश करेगा। ऐसे में आने वाले दिनों में विधानसभा की कार्यवाही पर प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों की नजर बनी रहेगी।

  • बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम नहीं बदलेगा, कांग्रेस के सवाल पर उच्च शिक्षा मंत्री ने स्थिति की साफ की तस्वीर

    बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम नहीं बदलेगा, कांग्रेस के सवाल पर उच्च शिक्षा मंत्री ने स्थिति की साफ की तस्वीर

    मध्य प्रदेश विधानसभा के मॉनसून सत्र में राजधानी भोपाल स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाओं पर सरकार ने स्पष्ट रुख सामने रख दिया है। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने विधानसभा में कहा कि राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय का नाम बदलने का कोई निर्णय नहीं लिया है। उनके इस जवाब के बाद पिछले कुछ महीनों से जारी अटकलों और राजनीतिक बहस पर फिलहाल विराम लग गया है।

    बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने का मुद्दा उस समय चर्चा में आया था, जब विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने इसका नाम बदलकर “मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने का प्रस्ताव पारित किया था। यह प्रस्ताव राज्य सरकार और कुलाधिपति के पास भेजा गया था। प्रस्ताव सामने आने के बाद राजनीतिक स्तर पर इस विषय को लेकर विभिन्न दलों के बीच मतभेद भी देखने को मिले और इसे लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो गई थी।

    विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक आतिफ आरिफ अकील ने इस विषय पर सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। उन्होंने तारांकित प्रश्न के माध्यम से पूछा कि क्या शासन ने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने का निर्णय लिया है। साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव है तो नया नाम क्या होगा और लगभग तीन दशक से अधिक समय से स्थापित विश्वविद्यालय का नाम बदलने के पीछे सरकार की मंशा क्या है।

    विधायक ने अपने प्रश्न में यह मुद्दा भी उठाया कि डॉ. बरकतउल्ला भोपाली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या राज्य सरकार उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता देती है और यदि ऐसा है तो उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय का नाम बदलना किस आधार पर उचित माना जाएगा। इसके अलावा विश्वविद्यालय का नाम बदलने की वैधानिक प्रक्रिया और आवश्यक स्वीकृतियों के संबंध में भी जानकारी मांगी गई।

    उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने अपने लिखित उत्तर में स्पष्ट कहा कि सरकार ने विश्वविद्यालय का नाम बदलने का कोई निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में आगे कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। डॉ. बरकतउल्ला भोपाली से जुड़े प्रश्न पर मंत्री ने बताया कि संबंधित जानकारी एकत्रित की जा रही है। वहीं विश्वविद्यालय का नाम बदलने की प्रक्रिया के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तित करने के लिए उसे संचालित करने वाले अधिनियम में संशोधन करना आवश्यक होता है, जो विधेयक के माध्यम से किया जाता है। अन्य प्रक्रियात्मक जानकारी निर्धारित अभिलेखों में उपलब्ध है।

    सरकार के इस आधिकारिक जवाब के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान समय में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने की कोई सरकारी योजना नहीं है। इससे लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगने की संभावना है। हालांकि विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा पारित प्रस्ताव और उससे जुड़ी चर्चाओं को लेकर राजनीतिक विमर्श भविष्य में भी जारी रह सकता है। फिलहाल विधानसभा में सरकार के स्पष्ट बयान ने इस विषय पर अपनी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दी है।

  • मानसून सत्र की शुरुआत हंगामेदार, कांग्रेस विधायकों का विधानसभा परिसर में प्रदर्शन, किसानों की समस्याओं पर सरकार से जवाब की मांग

    मानसून सत्र की शुरुआत हंगामेदार, कांग्रेस विधायकों का विधानसभा परिसर में प्रदर्शन, किसानों की समस्याओं पर सरकार से जवाब की मांग

    मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत सोमवार को राजनीतिक गर्माहट के साथ हुई। सत्र के पहले ही दिन कांग्रेस विधायक दल ने किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर विधानसभा परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया। खाद की कमी, सरकारी खरीद में कथित अनियमितताओं और किसानों को समय पर उचित मुआवजा नहीं मिलने के आरोपों के साथ विपक्ष ने राज्य सरकार को घेरते हुए इन मुद्दों पर तत्काल समाधान की मांग की। प्रदर्शन के दौरान विधानसभा परिसर में राजनीतिक माहौल काफी गर्म रहा।

    नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में कांग्रेस के विधायकों ने सरकार के खिलाफ सांकेतिक विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन के दौरान कुछ विधायकों ने मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश के कृषि मंत्री के मुखौटे पहनकर विरोध जताया। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार किसानों की समस्याओं के समाधान में गंभीरता नहीं दिखा रही है और कृषि क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की लगातार अनदेखी की जा रही है।

    कांग्रेस विधायकों का कहना है कि प्रदेश के कई हिस्सों में किसान खाद की उपलब्धता को लेकर परेशान हैं और उन्हें लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। साथ ही फसलों के उचित दाम, मुआवजे के भुगतान और सरकारी खरीद व्यवस्था को लेकर भी किसानों में असंतोष है। विपक्ष का आरोप है कि किसानों की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन सरकार प्रभावी कदम उठाने में असफल रही है। कांग्रेस ने दावा किया कि वह इन सभी मुद्दों को विधानसभा के भीतर मजबूती से उठाएगी और जरूरत पड़ने पर सदन के बाहर भी आंदोलन जारी रखेगी।

    विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के आवास पर कांग्रेस विधायक दल की बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में मानसून सत्र के दौरान उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनाई गई। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि किसानों की परेशानी के अलावा बेरोजगारी, युवाओं को रोजगार, अतिथि शिक्षकों की मांगें, पिछड़ा वर्ग से जुड़े विषय और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई मामलों पर भी सरकार से जवाब मांगा जाएगा। विपक्ष का कहना है कि राज्य के विभिन्न वर्गों से जुड़े मुद्दों को पूरी मजबूती के साथ सदन में रखा जाएगा।

    कांग्रेस ने यह भी कहा कि केन-बेतवा परियोजना, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विषय और अन्य जनहित के मामलों पर भी सरकार को घेरने की तैयारी की गई है। विपक्ष का मानना है कि प्रदेश के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिन पर गंभीर चर्चा और ठोस निर्णय की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से विधायक दल ने सत्र के दौरान समन्वित रणनीति अपनाने का फैसला किया है।

    वहीं, विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि आगामी दिनों में सदन के भीतर किसानों, कृषि, रोजगार, शिक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिल सकती है। विपक्ष ने सरकार से किसानों के हितों की रक्षा, खाद की पर्याप्त उपलब्धता, पारदर्शी खरीद व्यवस्था और लंबित मुआवजे के मामलों का शीघ्र समाधान करने की मांग दोहराई है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार इन आरोपों और मांगों पर सदन के भीतर क्या जवाब देती है और किसानों से जुड़े मुद्दों पर कौन से ठोस कदम सामने आते हैं।