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  • निवेश और तकनीक साझेदारी को मिलेगी नई रफ्तार, वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति होगी मजबूत

    निवेश और तकनीक साझेदारी को मिलेगी नई रफ्तार, वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति होगी मजबूत

    नई दिल्ली ।भारत, फ्रांस और अरब देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। देश के प्रमुख उद्योग संगठन एसोचैम ने अंतरराष्ट्रीय कारोबारी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बिजनेस फ्रांस और भारत एवं अरब देशों के वाणिज्य, उद्योग एवं कृषि मंडल के साथ रणनीतिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों का उद्देश्य व्यापार विस्तार, निवेश को प्रोत्साहन, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक बाजारों में भारतीय कंपनियों की पहुंच को मजबूत करना है।

    एसोचैम के अनुसार, इन समझौतों के माध्यम से विभिन्न देशों के उद्योगों और संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाएगा। इसके तहत व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों के आदान-प्रदान, निवेश के अवसरों की पहचान, नई तकनीकों के उपयोग और संयुक्त कारोबारी परियोजनाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा।

    बिजनेस फ्रांस के साथ हुए समझौते में भारत और फ्रांस की कंपनियों के बीच व्यापार एवं निवेश के नए अवसर विकसित करने की योजना बनाई गई है। दोनों संस्थाएं तकनीकी सहयोग, संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा देने, बाजार से जुड़ी जानकारियों के आदान-प्रदान और व्यापारिक आयोजनों के संयुक्त संचालन में सहयोग करेंगी।

    समझौते के तहत व्यापार मेलों, प्रदर्शनियों, सम्मेलनों और अन्य कारोबारी गतिविधियों के जरिए दोनों देशों के उद्यमों को एक-दूसरे के करीब लाने का प्रयास किया जाएगा। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों को भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

    एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि वैश्विक बाजारों में भारत की बढ़ती भागीदारी उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। उन्होंने कहा कि फ्रांस और अरब देशों के साथ हुई ये साझेदारियां मजबूत संस्थागत संबंध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे कंपनियों को नए बाजार तलाशने, निवेश बढ़ाने और लंबे समय तक टिकाऊ आर्थिक विकास को गति देने में मदद मिलेगी।

    बिजनेस फ्रांस के कृषि निर्यात प्रभाग के प्रमुख वियानी मेनिएर ने इस साझेदारी को भारत और फ्रांस के कारोबारी संबंधों को मजबूत करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि इससे दोनों देशों की कंपनियों, संस्थानों और निवेशकों के बीच सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे।

    भारत एवं अरब देशों के वाणिज्य, उद्योग एवं कृषि मंडल के कार्यवाहक महासचिव डॉ. वाइल एस. एच. अव्वाद ने कहा कि यह समझौता भारत और अरब क्षेत्र के बीच व्यापारिक संवाद को बढ़ाने में मदद करेगा। इसके जरिए निवेश साझेदारियों को प्रोत्साहन मिलेगा और दोनों क्षेत्रों के बीच आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलेगी।

    इस समझौते के तहत व्यापारिक सूचनाओं का साझा उपयोग, निवेश संबंधी अवसरों की पहचान, संयुक्त परियोजनाओं को बढ़ावा देना और तकनीकी हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जाएगा। इससे भारतीय कंपनियों को नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

    भारत, फ्रांस और अरब देशों के बीच यह पहल ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर व्यापारिक साझेदारियां तेजी से बदल रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के समझौते भारतीय उद्योगों को विदेशी बाजारों से जोड़ने, निवेश आकर्षित करने और नई तकनीकों तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • वैश्विक सप्लाई चेन के नए दौर में भारत की मजबूत छलांग, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेज हुई रफ्तार; निवेश और उत्पादन में बढ़त के संकेत

    वैश्विक सप्लाई चेन के नए दौर में भारत की मजबूत छलांग, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेज हुई रफ्तार; निवेश और उत्पादन में बढ़त के संकेत

    नई दिल्ली । वैश्विक सप्लाई चेन में लगातार हो रहे बदलाव के बीच भारत दुनिया के प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में अपनी स्थिति तेजी से मजबूत करता दिखाई दे रहा है। महामारी के बाद बदले अंतरराष्ट्रीय कारोबारी माहौल ने वैश्विक कंपनियों को उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है। इसका सबसे बड़ा लाभ भारत को मिलता दिखाई दे रहा है, जहां निवेश, उत्पादन क्षमता और औद्योगिक गतिविधियों में लगातार विस्तार दर्ज किया जा रहा है। उद्योग जगत का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क का और भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

    हालिया आकलन के अनुसार कोविड-19 के बाद दुनिया भर की कंपनियों ने केवल एक देश पर निर्भर रहने की रणनीति से दूरी बनानी शुरू की है। इसके स्थान पर चीन+1, फ्रेंडशोरिंग और नियरशोरिंग जैसी रणनीतियों को अपनाया जा रहा है, जिससे सप्लाई चेन अधिक सुरक्षित, लचीली और जोखिमों से कम प्रभावित रहे। इस वैश्विक बदलाव ने भारत को नए निवेश और उत्पादन अवसर उपलब्ध कराए हैं।

    रिपोर्ट में दुनिया की प्रमुख विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि महामारी के बाद भारत ने अपनी औसत विनिर्माण वृद्धि दर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। महामारी-पूर्व अवधि की तुलना में हाल के वर्षों में उत्पादन वृद्धि तेज हुई है और भारत वैश्विक औसत से बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय विनिर्माण क्षेत्र लगातार प्रतिस्पर्धी बन रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सफलता के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं। देश का विशाल घरेलू बाजार, तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में सुधार, डिजिटल परिवर्तन और निवेश के अनुकूल नीतियों ने उद्योगों का भरोसा बढ़ाया है। इसके साथ ही वैश्विक कंपनियां उत्पादन इकाइयों के विस्तार के लिए भारत को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रही हैं।

    औद्योगिक क्षेत्र को गति देने में सरकार की विभिन्न योजनाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना, औद्योगिक कॉरिडोर, पीएम गति शक्ति जैसी पहलों ने विनिर्माण क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के साथ उत्पादन क्षमता बढ़ाने का रास्ता तैयार किया है। इन पहलों के कारण कई क्षेत्रों में नई परियोजनाएं शुरू हुई हैं और रोजगार सृजन की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बने रहने के लिए भारत को लॉजिस्टिक्स लागत कम करने, औद्योगिक आधारभूत ढांचे को और मजबूत बनाने तथा घरेलू सप्लायर नेटवर्क का विस्तार करने पर लगातार काम करना होगा। कारोबार करने में आसानी को बेहतर बनाना, नई तकनीकों को उद्योगों में तेजी से अपनाना और मुक्त व्यापार समझौतों का प्रभावी उपयोग भी भविष्य की विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

    विश्लेषकों के अनुसार यदि वर्तमान सुधारों की गति बनी रहती है और वैश्विक निवेश का प्रवाह इसी तरह जारी रहता है, तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया के अग्रणी विनिर्माण केंद्रों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। इससे न केवल निर्यात क्षमता बढ़ेगी, बल्कि रोजगार, औद्योगिक विकास और आर्थिक वृद्धि को भी नई गति मिलेगी। बदलती वैश्विक सप्लाई चेन के इस दौर में भारत के सामने एक दीर्घकालिक अवसर मौजूद है, जिसे प्रभावी नीतियों और मजबूत औद्योगिक ढांचे के माध्यम से और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।