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  • शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से, 19 को अष्टमी-नवमी एक साथ, जानें घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

    शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से, 19 को अष्टमी-नवमी एक साथ, जानें घटस्थापना का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्र मां दुर्गा की आराधना का प्रमुख पर्व है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाले नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस दौरान व्रत, दुर्गा सप्तशती पाठ, पूजा-अर्चना और कन्या पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। साल 2026 में शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से होगी, जबकि अष्टमी और नवमी का पर्व 19 अक्टूबर को एक ही दिन मनाया जाएगा।

    11 अक्टूबर को होगी घटस्थापना

    पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल प्रतिपदा 11 अक्टूबर 2026 को रहेगी। इसी दिन घटस्थापना के साथ नवरात्र शुरू होंगे। प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात करीब 9:19 बजे शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात 9:30 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार नवरात्र का पहला दिन 11 अक्टूबर माना जाएगा।

    कलश स्थापना के लिए ये समय शुभ

    11 अक्टूबर को कलश स्थापना के लिए सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक शुभ मुहूर्त बताया गया है। इसकी अवधि करीब 3 घंटे 52 मिनट रहेगी। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। शहर के अनुसार सूर्योदय और स्थानीय पंचांग की गणना में थोड़ा अंतर होने के कारण मुहूर्त में बदलाव संभव है।

    नौ दिनों में किस देवी की पूजा होगी
    11 अक्टूबर – मां शैलपुत्री
    12 अक्टूबर – मां ब्रह्मचारिणी
    13 अक्टूबर – मां चंद्रघंटा
    14 अक्टूबर – मां कूष्मांडा
    15 अक्टूबर – मां स्कंदमाता
    16 अक्टूबर – मां कात्यायनी
    17 अक्टूबर – मां कालरात्रि
    18 अक्टूबर – मां महागौरी
    19 अक्टूबर – मां सिद्धिदात्री

    19 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी

    2026 में तिथियों के क्रम में बदलाव के कारण दुर्गा अष्टमी और महानवमी दोनों 19 अक्टूबर, सोमवार को पड़ेंगी। ऐसे में अष्टमी-नवमी के पूजन, कन्या पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान इसी दिन किए जाएंगे। संधि पूजा का भी विशेष महत्व रहेगा। श्रद्धालुओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना चाहिए।

    घर में ऐसे करें कलश स्थापना

    सबसे पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। मिट्टी के पात्र में जौ बोएं। इसके बाद कलश में जल भरकर उसमें अक्षत, सुपारी और सिक्का डाल सकते हैं। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाकर ऊपर नारियल स्थापित करें।

    इसके बाद मां दुर्गा का ध्यान कर पूजा का संकल्प लें और विधि-विधान से आराधना करें। जिन घरों में अखंड ज्योति जलाने की परंपरा है, वहां दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखना जरूरी है।

    नवरात्र में इन बातों का रखें ध्यान

    नवरात्र के दौरान पूजा स्थल को स्वच्छ रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों सात्विक भोजन किया जाता है और मांसाहार, शराब व अन्य तामसिक भोजन से परहेज रखा जाता है। व्रत रखने वाले लोग अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उपवास करें। अखंड ज्योति जलाने पर उसे सुरक्षित स्थान पर रखें, ताकि आग लगने का खतरा न रहे।

    20 अक्टूबर को विजयदशमी

    नवरात्र के समापन के अगले दिन 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। कई स्थानों पर इसी दिन दुर्गा प्रतिमा विसर्जन की परंपरा भी निभाई जाएगी।

    शारदीय नवरात्र 2026 की प्रमुख तारीखें

    पर्व – तारीख
    नवरात्र प्रारंभ/घटस्थापना – 11 अक्टूबर 2026
    दुर्गा अष्टमी – 19 अक्टूबर 2026
    महानवमी – 19 अक्टूबर 2026
    विजयदशमी – 20 अक्टूबर 2026

  • हरियाली तीज 2026: कब है व्रत? जानें शुभ तिथि, पूजा विधि, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम

    हरियाली तीज 2026: कब है व्रत? जानें शुभ तिथि, पूजा विधि, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम


    नई दिल्ली। सावन का महीना अपने साथ हरियाली, उमंग और धार्मिक आस्था लेकर आता है। इसी पावन माह में मनाई जाने वाली हरियाली तीज सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखती है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए पूजा-अर्चना करती हैं।

    कब है हरियाली तीज 2026?
    हिंदू पंचांग के अनुसार हरियाली तीज हर वर्ष सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में हरियाली तीज 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा का विधान है।
    पूजा मुहूर्त – सुबह 7.29 – सुबह 9.08
    दोपहर का मुहूर्त – दोपहर 12.25 – शाम 5.22

    हरियाली तीज का धार्मिक महत्व
    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। उनके अटूट समर्पण और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया। इसी कारण यह पर्व अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन महिलाएं माता गौरी से सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मांगती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं योग्य वर की कामना करती हैं।

    ऐसे करें हरियाली तीज की पूजा
    – ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले स्नान कर हरे या लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
    – मिट्टी से बनी भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
    – पूजा में मेहंदी, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, काजल सहित सुहाग का पूरा श्रृंगार अर्पित करें।
    – व्रत का संकल्प लेकर माता गौरी का ध्यान करें और सोलह श्रृंगार अर्पित करें।
    – भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग और अक्षत चढ़ाकर शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा करें।
    – पूजा के अंत में हरियाली तीज की व्रत कथा सुनना या पढ़ना आवश्यक माना गया है।

    त्योहार की रौनक
    हरियाली तीज पर महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और झूला झूलकर पर्व का आनंद लेती हैं। इस अवसर पर घेवर, मालपुआ और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। यह त्योहार मायके और ससुराल के रिश्तों में प्रेम और अपनापन बढ़ाने का भी प्रतीक माना जाता है।

    व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें

    क्या करें
    – सात्विक भोजन का पालन करें।
    – दान-पुण्य करें और बड़ों का आशीर्वाद लें।
    – घर में सकारात्मक और धार्मिक वातावरण बनाए रखें।

    क्या न करें
    – काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचें।
    – क्रोध, विवाद और किसी के प्रति द्वेष की भावना न रखें।
    – तामसिक भोजन का सेवन न करें और व्रत के नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करें।

  • देशभर में कल मनाई जाएगी आषाढ़ अमावस्या…. जानें स्नान-दान और पूजन का मुहूर्त

    देशभर में कल मनाई जाएगी आषाढ़ अमावस्या…. जानें स्नान-दान और पूजन का मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या (Ashadh Amavasya 2026) तिथि का विशेष महत्व है. इस वर्ष आषाढ़ अमावस्या (Ashadh Amavasya 2026) पर मंगलवार का संयोग होने के कारण इसे भौमवती अमावस्या (Bhaumvati Amavasya) भी कहा जा रहा है, जो इसके महत्व को दोगुना कर देता है. इस बार आषाढ़ अमावस्या 14 जुलाई को मनाई जाएगी. पितरों के तर्पण, कालसर्प दोष निवारण, मंगल दोष की शांति और दान-पुण्य के लिए यह दिन बेहद उत्तम माना गया है।


    आषाढ़ अमावस्या तिथि (Ashadh Amavasya Date)

    द्रिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ अमावस्या की तिथि 13 जुलाई को शाम 6 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 14 मिनट पर होगा। इस दिन स्नान व दान का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा और सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगा।


    आषाढ़ अमावस्या पूजन विधि (Ashadh Amavasya Pujan Vidhi)

    सुबह सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, जलाशय या गंगाजल मिले हुए पानी से स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें. फिर, तांबे के पात्र में पानी, गंगाजल, काले तिल, दूध और कुशा लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का तर्पण करें. इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाएं. भौमवती अमावस्या होने के कारण इस दिन हनुमान जी और मंगल देव की विशेष पूजा करें. हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करना शुभ रहेगा. पितरों के निमित्त घर में सात्विक भोजन बनाएं. अग्नि में गाय के कंडे (उपले) पर घी, गुड़ और भोजन का भोग लगाएं. भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कौए, कुत्ते, चींटियों और ब्राह्मण के लिए निकालें. मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या पर पितर कौए या अन्य रूपों में आकर अन्न ग्रहण करते हैं।


    इस दिन क्या दान करें?

    अमावस्या तिथि पर किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है. इस दिन अन्न और जल जैसे गेहूं, चावल, सत्तू, या मौसमी फल. काले तिल, छाता, चप्पल या सूती वस्त्र जैसे चीजें दान की जा सकती हैं।

    आषाढ़ अमावस्या का महत्व
    – पितृ दोष से मुक्तिः-
    जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए आषाढ़ अमावस्या पर पिंड दान, तर्पण और अन्नदान करना अमोघ उपाय माना गया है. इससे अतृप्त पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

    – ग्रह दोष शांति :- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अमावस्या के स्वामी शनि देव हैं. इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम होता है. साथ ही, मंगलवार का संयोग होने से राहू-केतु और मंगल के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है.

  • आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि

    आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली। आज नृसिंह जयंती पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन भगवान विष्णु के उग्र अवतार भगवान नृसिंह को समर्पित है, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अवतार लिया था। आधा मनुष्य और आधा सिंह के रूप में प्रकट होकर उन्होंने अधर्म का अंत किया और धर्म की स्थापना की।

    शुभ मुहूर्त और तिथि
    नृसिंह चतुर्दशी की तिथि 29 अप्रैल को शाम 7:51 बजे से शुरू होकर 30 अप्रैल को रात 9:12 बजे तक रहेगी। मध्याह्न संकल्प का समय सुबह 10:59 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा।
    वहीं, सायंकाल पूजा का शुभ समय शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक निर्धारित किया गया है।
    व्रत का पारण 1 मई को सुबह 5:41 बजे किया जाएगा।

    नृसिंह जयंती का महत्व
    वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह जयंती विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन संध्या समय खंभे से प्रकट होकर भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया था। यह पर्व भक्तों की रक्षा, शत्रुओं के नाश और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    भगवान नृसिंह की महिमा
    भगवान नृसिंह को शक्ति और संरक्षण के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनकी आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, विरोधियों से राहत मिलती है और भय व संकटों से सुरक्षा प्राप्त होती है। साथ ही मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

    पूजा विधि
    इस दिन सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई कर स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र धारण करें। चूंकि भगवान नृसिंह का प्राकट्य गोधूली बेला में हुआ था, इसलिए सूर्यास्त के समय पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है। पूजा के दौरान भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं, लाल फूल अर्पित करें और श्रद्धा से मंत्र जाप करते हुए अपनी मनोकामना व्यक्त करें।

    व्रत नियम
    व्रत रखने वाले भक्त इस दिन फलाहार या जलाहार ग्रहण करते हैं और संयम का पालन करते हैं। अगले दिन दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है। जो व्रत नहीं रखते, वे भी भक्ति भाव से पूजा कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

    विशेष उपाय
    यदि कोई व्यक्ति शत्रु या मुकदमे से परेशान है, तो भगवान नृसिंह को लाल फूल अर्पित कर लाल रेशमी धागा चढ़ाएं। इसके बाद घी का चौमुखी दीपक जलाकर “ऊं नृसिंहाय शत्रु भुजबल विधराय स्वाहा” मंत्र का 3, 5 या 11 माला जाप करें। पूजा के बाद उस धागे को दाहिने हाथ में बांधने से बाधाएं शांत होने की मान्यता है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त, विधि और मंत्र

    चैत्र नवरात्रि 2026: दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त, विधि और मंत्र


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन 20 मार्च 2026 को मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी तप संयम ज्ञान और वैराग्य की प्रतीक देवी हैं। उनका यह रूप हमें कठिन समय में भी संयम और साहस बनाए रखने की प्रेरणा देता है। कहते हैं कि मां ब्रह्मचारिणी की विधिपूर्वक पूजा और मंत्र जाप से मानसिक शांति आत्मविश्वास और जीवन में बाधाओं को दूर करने की शक्ति प्राप्त होती है।

    मां ब्रह्मचारिणी का नाम ही उनके स्वरूप का परिचायक है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। यही कारण है कि उनका पूजन साधना और संयम का अभ्यास करवा कर व्यक्ति को अडिग बनाता है। जीवन या व्यवसाय में अगर कोई बड़ी बाधा बार-बार आती है तो इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा आपकी इच्छाओं को पूरा करने में मदद कर सकती है और आत्मविश्वास को नया बल देती है।

    इस दिन का शुभ-मुहूर्त सुबह का समय माना गया है लेकिन विशेष रूप से अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 से 12:53 तक है। इस समय में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और सफेद या हल्के पीले वस्त्र धारण करना शुभ होता है। इससे मन और शरीर दोनों में शुद्धता आती है।

    पूजन विधि सरल है लेकिन प्रभावशाली। मां की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं और अपने कृतज्ञता भाव व्यक्त करें। मां को चमेली या कमल के फूल अर्पित करें क्योंकि ये उनके प्रिय माने जाते हैं। भोग में चीनी मिश्री या पंचामृत चढ़ाना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप करना आवश्यक है जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। अंत में आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।

    मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान मंत्र है:

    “या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
    दधना करपद्याभ्यांक्षमालाकमण्डलू।
    देवीप्रसीदतु मयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥”

    इस मंत्र का अर्थ है कि देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अद्भुत और दिव्य है। माता के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है। साधारण मंत्र भी है: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः जिसका जाप कर श्रद्धा और भक्ति से मां की आराधना की जाती है।

    इस प्रकार चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा न केवल आत्मविश्वास और संयम की शक्ति देती है बल्कि जीवन में सुख शांति और समृद्धि भी लाती है। इस दिन विधि-विधान और उचित मुहूर्त में पूजा करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

  • 08 फरवरी 2026 का पंचांग: फाल्गुन कृष्ण सप्तमी आज, जानें शुभ-अशुभ मुहूर्त और सूर्य-चंद्र का समय

    08 फरवरी 2026 का पंचांग: फाल्गुन कृष्ण सप्तमी आज, जानें शुभ-अशुभ मुहूर्त और सूर्य-चंद्र का समय


    नई दिल्ली । आज 08 फरवरी 2026, रविवार को फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन पूजा-पाठ, जप-तप और व्रत-अनुष्ठान के लिए विशेष महत्व रखता है। दिन की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त से होती है, जिसे आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। वहीं शुभ कार्यों की योजना बनाते समय अभिजीत और अमृत काल को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाता है।

    आज के पंचांग के अनुसार अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से 1 बजकर 03 मिनट तक रहेगा, जो किसी भी नए और शुभ कार्य की शुरुआत के लिए अनुकूल माना जाता है। वहीं अमृत काल शाम 7 बजकर 17 मिनट से 9 बजकर 03 मिनट तक रहेगा, इस दौरान किए गए कार्यों में सफलता की संभावना अधिक रहती है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त 5 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 18 मिनट तक रहेगा, जो ध्यान, योग और ईश्वर स्मरण के लिए सर्वोत्तम समय है।

    अशुभ काल की बात करें तो आज राहुकाल शाम 4 बजकर 51 मिनट से 6 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस दौरान किसी भी नए या महत्वपूर्ण कार्य से बचना चाहिए। यम गण्ड दोपहर 12 बजकर 41 मिनट से 2 बजकर 04 मिनट तक और कुलिक काल 3 बजकर 27 मिनट से 4 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। इसके अतिरिक्त दुर्मुहूर्त शाम 4 बजकर 45 मिनट से 5 बजकर 30 मिनट तक तथा वर्ज्यम् काल सुबह 8 बजकर 40 मिनट से 10 बजकर 26 मिनट तक रहेगा, जिसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है।

    खगोलीय दृष्टि से आज सूर्य का उदय सुबह 7 बजकर 07 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 14 मिनट पर होगा। चंद्रमा का उदय 9 फरवरी की रात 12 बजकर 18 मिनट पर होगा, जबकि चंद्रास्त 9 फरवरी को सुबह 11 बजकर 23 मिनट पर रहेगा। शुभ मुहूर्त में किए गए कार्य सकारात्मक फल प्रदान करते हैं, इसलिए दिन की योजना पंचांग के अनुसार बनाना लाभकारी माना जाता है।

    शुभ काल:
    अभिजीत मुहूर्त – 12:18 PM – 01:03 PM
    अमृत काल – 07:17 PM – 09:03 PM
    ब्रह्म मुहूर्त – 05:30 AM – 06:18 AM

    अशुभ काल:
    राहुकाल – 04:51 PM – 06:14 PM
    यम गण्ड – 12:41 PM – 02:04 PM
    कुलिक – 03:27 PM – 04:51 PM
    दुर्मुहूर्त – 04:45 PM – 05:30 PM
    वर्ज्यम् – 08:40 AM – 10:26 AM

    सूर्य और चंद्रमा का समय:
    सूर्योदय – 07:07 AM
    सूर्यास्त – 06:14 PM
    चन्द्रोदय – 09 फरवरी, 12:18 AM
    चन्द्रास्त – 09 फरवरी, 11:23 AM

  • आज का पंचांग 24 जनवरी 2026: धार्मिक कार्यों और पूजा के लिए विशेष शुभ दिन, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल

    आज का पंचांग 24 जनवरी 2026: धार्मिक कार्यों और पूजा के लिए विशेष शुभ दिन, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल


    नई दिल्ली।आज माघ मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि है। पंचांग के अनुसार चंद्रमा मीन राशि में संचार कर रहा है जिससे भक्ति ध्यान और मानसिक शांति के योग बन रहे हैं। शिव योग दोपहर 2:02 बजे तक प्रभाव में रहेगा इसके बाद सिद्ध योग का आरंभ होगा। यह योग धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है।

    षष्ठी तिथि रात्रि 12:40 बजे तक रहेगी इसके पश्चात सप्तमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। नक्षत्र की बात करें तो उत्तराभाद्रपद नक्षत्र दोपहर 2:16 बजे तक रहेगा इसके बाद रेवती नक्षत्र प्रभाव में आएगा। गंडमूल नक्षत्र का प्रारंभ दोपहर 2:16 बजे के बाद माना गया है इसलिए इस समय जन्म नामकरण या नए कार्यों में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।करण का विवरण इस प्रकार है। कौलव करण दोपहर 1:14 बजे तक रहेगा इसके बाद गर करण का प्रभाव होगा। सूर्य उत्तरायण स्थिति में है और ऋतु शिशिर चल रही है। सूर्योदय सुबह 7:12 बजे और सूर्यास्त शाम 5:53 बजे होगा।

    आज के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:11 से 6:04 बजे तक विजय मुहूर्त दोपहर 2:09 से 2:52 बजे तक और गोधूलि बेला शाम 5:42 से 6:09 बजे तक है। निशीथ काल रात 11:54 से 12:47 बजे तक रहेगा। इन समयों में पूजा ध्यान जप और मानसिक शुद्धि से जुड़े कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं।आज के अशुभ समय में राहुकाल सुबह 9:00 से 10:30 बजे गुलिक काल सुबह 6:00 से 7:30 बजे और यमगंड दोपहर 1:30 से 3:30 बजे तक रहेगा। दुर्मुहूर्त सुबह 6:57 से 7:40 बजे तक और पूरे दिन पंचक का प्रभाव रहेगा। इस अवधि में नए कार्य या शुभ निर्णय लेने से बचना चाहिए।

    आज का विशेष उपाय यह है कि जल में दूध और काले तिल मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। इसके साथ ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जप करने से मानसिक तनाव कम होता है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।सप्ताह का यह शनिवार धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए उपाय जीवन में स्थिरता शांति और सफलता के मार्ग प्रशस्त करते हैं।