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  • कच्चा माल महंगा होने से ऑटो इंडस्ट्रीज पर संकट… बढ़ सकती हैं कारों की कीमतें

    कच्चा माल महंगा होने से ऑटो इंडस्ट्रीज पर संकट… बढ़ सकती हैं कारों की कीमतें


    नई दिल्ली।
    ऑटोमोबाइल कंपनियों (Automobile Companies) के सामने लागत का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। मार्च 2026 से स्टील, मेटल और प्लास्टिक जैसे जरूरी कच्चे माल की कीमतों (Raw Materials Prices) में तेज उछाल आया है। इससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ेगा और गाड़ियों की मांग भी घट सकती है। यह जानकारी सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) (Society of Indian Automobile Manufacturers – SIAM) के ताजा आंकड़ों में सामने आई है।


    पश्चिम एशिया में जंग का सीधा असर

    एक खबर के मुताबिक पश्चिम एशिया में जंग के चलते स्टील के दाम बढ़े हैं। मार्च 2026 में स्टील का भाव करीब 10 प्रतिशत बढ़कर 60,000 रुपये प्रति टन पर पहुंच गया। वहीं, स्टेनलेस स्टील 16 प्रतिशत महंगा होकर 2 लाख रुपये प्रति टन से ऊपर निकल गया, जिससे गाड़ियों के बॉडी और दूसरे पुर्जों की लागत बढ़ गई।


    कोकिंग कोल से लेकर कीमती धातु तक, सब हुआ महंगा

    स्टील बनाने में इस्तेमाल होने वाले कोकिंग कोल की कीमत में 31 प्रतिशत का उछाल देखा गया। एल्युमीनियम (27 प्रतिशत) और कॉपर (28 प्रतिशत) के दाम लगभग एक-तिहाई बढ़ चुके हैं। गाड़ियों के इंटीरियर और पुर्जों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के दाम और भी तेजी से बढ़े हैं। पॉलीप्रोपाइलीन जैसे थर्मोप्लास्टिक 34 प्रतिशत महंगा होकर 136.2 रुपये प्रति किलो (पिछले साल 102 रुपये था) हो गया है, जबकि पॉलीकार्बोनेट 9 प्रतिशत बढ़कर 227 रुपये प्रति किलो पहुंच गया।


    एमिशन कंट्रोल पर भारी पड़ेगी कीमती धातुओं की महंगाई

    गाड़ियों में प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली में उपयोग होने वाली कीमती धातुओं के दामों में भी उछाल आया है। प्लैटिनम 124 प्रतिशत बढ़कर 6,196 रुपये प्रति ग्राम, रोडियम 121 प्रतिशत बढ़कर 33,000 रुपये प्रति ग्राम से अधिक और पैलेडियम 74 प्रतिशत बढ़कर 4,712 रुपये प्रति ग्राम हो गया है। इससे कारों में लगने वाले एमिशन कंट्रोल डिवाइस की लागत काफी बढ़ गई है।


    रुपये की कमजोरी से और बढ़ेगी मुश्किल

    एक्सपर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल इस कीमत बढ़ोतरी का तुरंत असर मांग पर नहीं दिखेगा, लेकिन अगर यह दबाव लंबा चला तो लोग गाड़ी खरीदने में देरी कर सकते हैं। एसएंडपी ग्लोबल मोबिलिटी के गौरव बांगर ने बताया कि धातुओं, पॉलिमर और कीमती धातुओं की बढ़ती कीमतें कार निर्माताओं के मुनाफे को निचोड़ रही हैं। कमजोर रुपये ने समस्या और बढ़ा दी है, जिससे कंपनियों को अपने मार्जिन बचाने के लिए गाड़ियों के दाम बढ़ाने होंगे।


    कुल इनपुट लागत का 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा स्टील का

    उद्योग के जानकारों का कहना है कि वैल्यू चेन पर इसका असर साफ दिख रहा है। अकेले स्टील ही गाड़ी की कुल इनपुट लागत का 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा होता है। टीओआई को एक कारोबारी ने बताया, “यह दबाव बिल्कुल असली है और कंपनियां इसकी मार झेल रही हैं।”

  • भारत में टेस्ला को नहीं मिला अपेक्षित रिस्पॉन्स, 2025 में सिर्फ 225 कारों की बिक्री..

    भारत में टेस्ला को नहीं मिला अपेक्षित रिस्पॉन्स, 2025 में सिर्फ 225 कारों की बिक्री..


    नई दिल्ली। दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति की अगुआ मानी जाने वाली अमेरिकी कार कंपनी टेस्ला को भारत में अब तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। इंडस्ट्री डेटा के अनुसार वर्ष 2025 में टेस्ला ने भारतीय बाजार में केवल 225 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की जो कंपनी की वैश्विक पहचान और भारत में तेजी से बढ़ते ईवी बाजार को देखते हुए बेहद कम मानी जा रही है।

    फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन FADA के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2025 में टेस्ला की 64 कारें बिकीं अक्टूबर में यह आंकड़ा 40 यूनिट्स रहा नवंबर में 48 यूनिट्स और दिसंबर में 73 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की गई। साल के अंतिम महीने में थोड़ी बढ़त जरूर देखने को मिली लेकिन कुल मिलाकर आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारतीय ग्राहक टेस्ला से अभी दूरी बनाए हुए हैं।

    टेस्ला ने भारत में अपने सफर की शुरुआत मुंबई में शोरूम खोलकर की थी। इसके बाद कंपनी ने गुरुग्राम मुंबई और दिल्ली में एक्सपीरियंस सेंटर्स भी शुरू किए जहां ग्राहकों को वाहन देखने टेस्ट ड्राइव और चार्जिंग सुविधाओं की जानकारी दी जाती है। कंपनी के पास फिलहाल भारत में करीब 12 सुपरचार्जर और 10 डेस्टिनेशन चार्जर मौजूद हैं लेकिन यह नेटवर्क अभी बड़े पैमाने पर ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा।

    वर्तमान में टेस्ला भारत में केवल एक मॉडल – मॉडल वाई – की बिक्री कर रही है। यह रियरव्हीलड्राइव RWD इलेक्ट्रिक एसयूवी है। इसके स्टैंडर्ड RWD वेरिएंट की एक्सशोरूम कीमत 59.89 लाख रुपये है जबकि लॉन्ग रेंज RWD वेरिएंट की कीमत 67.89 लाख रुपये रखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह से निर्मित वाहनों CBU पर लगने वाले भारी आयात शुल्क के कारण टेस्ला की कीमतें भारतीय बाजार में काफी ज्यादा हो गई हैं जिससे संभावित ग्राहक पीछे हट रहे हैं।

    हालांकि तकनीकी रूप से टेस्ला मॉडल वाई एक दमदार इलेक्ट्रिक वाहन है। कंपनी के अनुसार इसका स्टैंडर्ड वेरिएंट एक बार चार्ज करने पर करीब 500 किलोमीटर की रेंज देता है जबकि लॉन्ग रेंज वेरिएंट 622 किलोमीटर तक चल सकता है। स्टैंडर्ड मॉडल 0 से 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार महज 5.9 सेकंड में पकड़ लेता है जबकि लॉन्ग रेंज वेरिएंट 5.6 सेकंड में यह गति हासिल कर लेता है। दोनों मॉडलों की अधिकतम रफ्तार 201 किमी प्रति घंटे बताई गई है। फास्ट चार्जिंग के जरिए सिर्फ 15 मिनट में 238 से 267 किलोमीटर तक की अतिरिक्त रेंज मिलने का दावा भी किया जाता है।

    दिलचस्प बात यह है कि जहां टेस्ला को भारत में संघर्ष करना पड़ रहा है वहीं देश का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। वाहन पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार 2025 में कुल वाहन पंजीकरण में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 8 प्रतिशत तक पहुंच गई है और कुल ईवी बिक्री 23 लाख यूनिट्स का आंकड़ा पार कर चुकी है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि अगर टेस्ला भारत में स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग या किफायती मॉडल लाती है तो भविष्य में उसकी स्थिति बेहतर हो सकती है।