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  • नागपंचमी पर सांपों को दूध पिलाने से बचाएं जान, उज्जैन में भगतजी संस्थान चलाएगा विशेष जागरूकता अभियान

    नागपंचमी पर सांपों को दूध पिलाने से बचाएं जान, उज्जैन में भगतजी संस्थान चलाएगा विशेष जागरूकता अभियान

    उज्जैन धार्मिक नगरी उज्जैन में नागपंचमी के पावन अवसर पर जीवों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक अनोखा जागरूकता अभियान आयोजित किया जाएगा। अक्सर नागपंचमी के दौरान परंपराओं के नाम पर सांपों को दूध पिलाने का चलन देखा जाता है। हालांकि, जीव विशेषज्ञों के अनुसार जबरन तरल पदार्थ या दूध पिलाने से सांपों के फेफड़ों में संक्रमण हो सकता है, जिससे उनकी मृत्यु की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है। इसी भ्रम को दूर करने और लोगों में संवेदनशीलता जगाने के उद्देश्य से भगतजी सेवा संस्थान द्वारा एक विशेष कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई है।

    संस्थान द्वारा यह आयोजन पर्यावरण बचाओ – सरीसृप मुस्कुराओ थीम के तहत आयोजित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों को सांपों के प्रति पारंपरिक भ्रांतियों से दूर करना और उन्हें जीव संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनाना है। आयोजन में विशेषज्ञों की उपस्थिति रहेगी जो लोगों को विभिन्न प्रजातियों के सांपों को पहचानने, उनसे दूरी बनाए रखने, और दुर्भाग्यवश सर्पदंश की स्थिति में अपनाए जाने वाले प्राथमिक उपचार एवं बचाव के वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी देंगे।

    इस जागरूकता कार्यक्रम को आकर्षक और जन-सामान्य से जोड़ने के लिए एक अनूठी प्रतियोगिता का भी समावेशन किया गया है। सुबह के समय नियमित भ्रमण और व्यायाम करने वाले नागरिकों के लिए नागिन धुन पर एरोबिक्स एक्सरसाइज की स्पर्धा आयोजित की जाएगी। इस अनूठे प्रदर्शन के माध्यम से स्वास्थ्य जागरूकता के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण का संदेश दिया जाएगा। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले व्यायाम प्रेमियों को आयोजकों की ओर से सम्मानित भी किया जाएगा।

    पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि सांप पारिस्थितिकी तंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों और चूहों को नियंत्रित रखकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। अंधविश्वास और अज्ञानता के कारण हर साल कई बेजुबान जीवों की जान चली जाती है। ऐसे में इस प्रकार के नवाचार और जागरूकता कार्यक्रम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और बेजुबान जीवों की रक्षा करने में अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध हो सकते हैं।

  • बेटी के जन्म पर रिश्तों में आई दरार की कहानी बनी चर्चा, बुजुर्ग दंपति ने समाज को दिया समानता का संदेश

    बेटी के जन्म पर रिश्तों में आई दरार की कहानी बनी चर्चा, बुजुर्ग दंपति ने समाज को दिया समानता का संदेश

    नई दिल्ली । बेटी और बेटे के बीच भेदभाव को लेकर समाज में समय-समय पर बहस होती रही है। इसी विषय से जुड़ा एक अनुभव इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक बुजुर्ग दंपति ने अपने वीडियो के माध्यम से एक महिला की आपबीती साझा करते हुए समाज से बेटियों के प्रति समान और सम्मानजनक व्यवहार अपनाने की अपील की। वीडियो में साझा किए गए अनुभव ने परिवार, पालन-पोषण और सामाजिक सोच को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    वीडियो में बताया गया कि एक महिला ने बुजुर्ग दंपति से अपनी एक परिचित की कहानी साझा की। महिला के अनुसार, उसकी सहेली ने बेटी को जन्म दिया तो ससुराल पक्ष का व्यवहार अचानक बदल गया। कथित तौर पर परिवार के सदस्य नवजात बच्ची और उसकी मां से मिलने अस्पताल तक नहीं पहुंचे। इतना ही नहीं, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी उसे अपने ससुराल ले जाने के बजाय मायके भेज दिया गया।

    महिला ने यह भी दावा किया कि बेटी के जन्म के बाद कई वर्षों तक ससुराल पक्ष ने उससे कोई संपर्क नहीं रखा और न ही उसकी या बच्ची की कोई जानकारी ली। बाद में जब बच्ची के पालन-पोषण और खर्च से जुड़े अधिकारों के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया, तब कथित रूप से ससुराल पक्ष ने दोबारा संपर्क करने की इच्छा जताई। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस अनुभव ने सामाजिक सोच और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

    इस पूरे प्रसंग पर प्रतिक्रिया देते हुए बुजुर्ग दंपति ने कहा कि किसी भी बच्चे के जन्म को परिवार के लिए खुशी का अवसर माना जाना चाहिए, चाहे वह बेटा हो या बेटी। उन्होंने कहा कि बेटियां किसी भी दृष्टि से परिवार पर बोझ नहीं होतीं, बल्कि वे भी परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने और माता-पिता का सहारा बनने में समान रूप से सक्षम होती हैं। उनके अनुसार, बच्चे के लिंग के आधार पर व्यवहार बदलना न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है, बल्कि परिवारों में भावनात्मक दूरी भी पैदा करता है।

    दंपति ने यह भी कहा कि आधुनिक समाज में शिक्षा, रोजगार, खेल, विज्ञान, प्रशासन और अन्य अनेक क्षेत्रों में बेटियां लगातार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। ऐसे में केवल लिंग के आधार पर उनके साथ भेदभाव करना न तो सामाजिक रूप से उचित है और न ही मानवीय दृष्टि से स्वीकार्य। उनका मानना है कि बच्चों के प्रति समान अवसर और समान सम्मान ही स्वस्थ समाज की पहचान है।

    विशेषज्ञ भी समय-समय पर इस बात पर जोर देते रहे हैं कि परिवार का सहयोग और सकारात्मक वातावरण बच्चे के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि जन्म के समय ही भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाए, तो इसका प्रभाव केवल मां पर ही नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य और पूरे परिवार के संबंधों पर भी पड़ सकता है।

    सोशल मीडिया पर सामने आई यह कहानी एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में साझा की गई है, लेकिन इसने बेटियों के सम्मान, लैंगिक समानता और जिम्मेदार अभिभावक बनने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर फिर से चर्चा शुरू कर दी है। समाज में समान अवसर और समान सम्मान की भावना को मजबूत करना ही ऐसे संदेशों का मुख्य उद्देश्य माना जा रहा है।

  • दो महीने की मुश्किल रिकवरी के बाद लौटीं सुमोना चक्रवर्ती, बीमारी से जंग जीतकर महिलाओं के लिए बनीं नई उम्मीद

    दो महीने की मुश्किल रिकवरी के बाद लौटीं सुमोना चक्रवर्ती, बीमारी से जंग जीतकर महिलाओं के लिए बनीं नई उम्मीद

    नई दिल्ली । टीवी अभिनेत्री सुमोना चक्रवर्ती ने एंडोमेट्रियोसिस जैसी गंभीर बीमारी से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद अपनी सेहत को लेकर भावुक अनुभव साझा किया है। करीब दो महीने तक सार्वजनिक जीवन और सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने के बाद उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्होंने पूरी तरह अपनी रिकवरी पर ध्यान दिया। अभिनेत्री ने अपनी पोस्ट में बीमारी के कठिन दौर, सर्जरी, मानसिक संघर्ष और जीवन के प्रति बदले नजरिए का जिक्र करते हुए कहा कि अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रही हैं।

    सुमोना ने बताया कि 4 मई को उनकी एंडोमेट्रियोसिस की सर्जरी हुई थी। उन्होंने काफी समय तक दवाइयों और उपचार के जरिए बीमारी को नियंत्रित रखने की कोशिश की, लेकिन जब स्थिति अधिक जटिल हो गई तो ऑपरेशन कराना आवश्यक हो गया। सर्जरी के बाद डॉक्टरों की देखरेख और नियमित उपचार के कारण उनकी सेहत में लगातार सुधार हो रहा है।

    अभिनेत्री ने कहा कि पिछले दो महीनों ने उन्हें जीवन को बेहद करीब से समझने का अवसर दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि बीमारी के दौरान कई ऐसे पल आए जब उन्हें लगा कि शायद अब जिंदगी का सबसे कठिन मोड़ सामने है। हालांकि उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी और सकारात्मक सोच के साथ इलाज और रिकवरी की प्रक्रिया को अपनाया। उनके अनुसार मानसिक मजबूती ने इस कठिन समय से बाहर निकलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    सुमोना ने अपनी पोस्ट में मेडिकल टीम और डॉक्टरों का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों की देखरेख और परिवार तथा करीबी लोगों के सहयोग ने उन्हें इस चुनौतीपूर्ण दौर से उबरने का आत्मविश्वास दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अब वह पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ और ऊर्जावान महसूस कर रही हैं।

    उन्होंने यह भी साझा किया कि शुरुआत में उनका मन सोशल मीडिया से हमेशा के लिए दूर हो जाने का था। लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि उनके अनुभव कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन सकते हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने तय किया कि वह अपने मंच का उपयोग महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस और महिलाओं से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए करेंगी। उनका उद्देश्य ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार करना है, जहां महिलाएं बिना झिझक अपने अनुभव साझा कर सकें और एक-दूसरे का मनोबल बढ़ा सकें।

    रिकवरी के दौरान सुमोना ने अपने 38वें जन्मदिन को भी बेहद सादगी से मनाया। उन्होंने आखिरी समय में इस्तांबुल की यात्रा का निर्णय लिया और बिना किसी बड़े समारोह के अपना जन्मदिन बिताया। उन्होंने बताया कि इस बार उन्होंने यात्रा, पसंदीदा जापानी भोजन और एक साधारण चीज़केक के साथ इस खास दिन को यादगार बनाया। उनके लिए यह यात्रा मानसिक रूप से नई शुरुआत का प्रतीक रही।

    गौरतलब है कि सुमोना चक्रवर्ती ने वर्ष 2021 में पहली बार सार्वजनिक रूप से बताया था कि वह स्टेज-4 एंडोमेट्रियोसिस से जूझ रही हैं। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने इस बीमारी के कारण कई शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना किया था। अब सफल सर्जरी और बेहतर स्वास्थ्य के बाद उन्होंने अपने अनुभव साझा कर इस बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाने का संदेश दिया है। अभिनय के क्षेत्र में सुमोना कई लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों, कॉमेडी शोज और फिल्मों का हिस्सा रह चुकी हैं तथा उनके प्रशंसक जल्द ही उन्हें नए प्रोजेक्ट्स में देखने की उम्मीद कर रहे हैं।

  • तेज बुखार और ठंड लगने को न करें नजरअंदाज जानिए मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय और जरूरी जांच

    तेज बुखार और ठंड लगने को न करें नजरअंदाज जानिए मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय और जरूरी जांच


    नई दिल्ली । मानसून के साथ हर साल मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। इनमें मलेरिया सबसे गंभीर संक्रामक रोगों में शामिल है। कई लोग तेज बुखार ठंड लगना और शरीर दर्द जैसी शुरुआती परेशानियों को सामान्य वायरल संक्रमण समझकर घरेलू इलाज करते रहते हैं। यही लापरवाही बीमारी को गंभीर रूप दे सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार मलेरिया से होने वाली जटिलताओं को काफी हद तक रोक सकता है।

    मलेरिया संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह संक्रमण शरीर में प्लाज्मोडियम नामक परजीवी के कारण होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं इसलिए कई बार मरीज सही समय पर जांच नहीं करा पाते। यदि किसी व्यक्ति को बार बार तेज बुखार आ रहा हो ठंड लग रही हो अत्यधिक पसीना आ रहा हो सिर और शरीर में तेज दर्द हो या लगातार कमजोरी महसूस हो रही हो तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि बुखार 24 से 48 घंटे के भीतर ठीक नहीं हो रहा है या बुखार की दवा लेने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है तो मलेरिया की जांच कराना जरूरी हो जाता है। खासकर ऐसे लोग जो मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं या हाल ही में ऐसे स्थानों की यात्रा करके लौटे हैं उन्हें किसी भी तरह की देरी नहीं करनी चाहिए।

    समय पर जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ मामलों में प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम नामक परजीवी से होने वाला मलेरिया बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इलाज में देरी होने पर संक्रमण दिमाग किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है। गंभीर एनीमिया सांस लेने में परेशानी और मल्टी ऑर्गन फेलियर जैसी जानलेवा स्थितियां भी विकसित हो सकती हैं। इसलिए बिना जांच के स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह पर ही उपचार शुरू करना चाहिए।

    मलेरिया की पुष्टि के लिए कई तरह की जांच उपलब्ध हैं। सबसे सामान्य जांच माइक्रोस्कोपी है जिसमें रक्त की स्लाइड के माध्यम से परजीवी की पहचान की जाती है। जहां यह सुविधा उपलब्ध नहीं होती वहां रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट यानी आरडीटी का उपयोग किया जाता है जो कम समय में परिणाम दे देता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में क्वांटिटेटिव बफी कोट टेस्ट और पीसीआर जांच भी कराई जाती है जो संक्रमण की अधिक सटीक पहचान करने में मदद करती हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच होने से मरीज को सही दवा जल्दी मिल जाती है और बीमारी के गंभीर रूप लेने की संभावना काफी कम हो जाती है। साथ ही बिना जरूरत एंटीबायोटिक या मलेरिया की दवा लेने से भी बचा जा सकता है जिससे दवा प्रतिरोध जैसी समस्याएं नहीं बढ़तीं।

    मलेरिया से बचाव के लिए घर और आसपास पानी जमा न होने दें। कूलर गमले और टंकियों की नियमित सफाई करें। पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें मच्छरदानी का उपयोग करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। यदि परिवार में किसी को लगातार बुखार आ रहा हो तो घरेलू इलाज में समय गंवाने के बजाय तुरंत जांच कराना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

  • एक्शन हीरो की असली कमजोरी सामने टाइगर श्रॉफ को उड़ान से डर नींद तक हो रही खराब

    एक्शन हीरो की असली कमजोरी सामने टाइगर श्रॉफ को उड़ान से डर नींद तक हो रही खराब


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के एक्शन स्टार टाइगर श्रॉफ जिन्हें बड़े पर्दे पर खतरनाक स्टंट और जबरदस्त फिटनेस के लिए जाना जाता है हाल ही में अपनी एक निजी समस्या को लेकर चर्चा में आ गए हैं। पर्दे पर हर मुश्किल को आसानी से पार करते नजर आने वाले टाइगर ने खुलासा किया है कि वह असल जिंदगी में एक ऐसे डर से जूझ रहे हैं जो उन्हें अंदर तक परेशान कर देता है। यह डर है एयरोफोबिया यानी हवाई जहाज में उड़ान भरने का डर। उन्होंने बताया कि इस समस्या से निजात पाने के लिए अब वह प्रोफेशनल थेरेपी लेने पर विचार कर रहे हैं।

    टाइगर ने एक बातचीत के दौरान बताया कि कुछ साल पहले उन्हें एक फ्लाइट में बेहद खराब टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा था। उस अनुभव ने उनके मन पर गहरा असर डाला और तभी से उनके अंदर उड़ान को लेकर डर बैठ गया। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें पूरी तरह से असहाय महसूस हुआ क्योंकि स्थिति पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। यही वजह है कि अब जब भी उन्हें फ्लाइट से यात्रा करनी होती है तो दो दिन पहले से ही बेचैनी और घबराहट शुरू हो जाती है।

    उन्होंने यह भी बताया कि पायलट अक्सर उन्हें समझाते हैं कि टर्बुलेंस कोई बड़ी बात नहीं होती और यह सड़क पर लगने वाले हल्के झटकों की तरह ही होता है लेकिन उनके दिमाग को यह बात स्वीकार नहीं होती। टाइगर का कहना है कि उन्हें हर चीज पर नियंत्रण रखना पसंद है लेकिन फ्लाइट के दौरान वह खुद को पूरी तरह बेबस महसूस करते हैं और यही उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण है।

    सिर्फ एयरोफोबिया ही नहीं टाइगर ने अपनी एक और समस्या का जिक्र किया। उन्होंने माना कि वह कई बार छोटी छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचने लगते हैं और इससे वह काफी कंफ्यूजन में पड़ जाते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार उन्हें अपने दिनभर के काम तय करने में भी काफी मुश्किल होती है क्योंकि वह हर चीज को लेकर ज्यादा सोचने लगते हैं। यह स्थिति उनके लिए मानसिक रूप से थकाने वाली हो जाती है।

    वर्क फ्रंट की बात करें तो टाइगर श्रॉफ ने हीरोपंती वॉर और बागी जैसी फिल्मों के जरिए खुद को एक सफल एक्शन हीरो के रूप में स्थापित किया है लेकिन उनकी हालिया फिल्म बागी 4 बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। भारी बजट में बनी इस फिल्म का कलेक्शन निराशाजनक रहा और इसे फ्लॉप माना गया। हालांकि टाइगर अपनी फिटनेस और एक्शन स्टाइल के कारण फैंस के बीच अब भी काफी लोकप्रिय हैं।

    टाइगर का यह खुलासा इस बात की ओर इशारा करता है कि चमक दमक से भरी फिल्मी दुनिया के सितारे भी मानसिक और भावनात्मक चुनौतियों से अछूते नहीं हैं। एयरोफोबिया एक आम लेकिन गंभीर समस्या हो सकती है जिसमें व्यक्ति को उड़ान के दौरान अत्यधिक डर और घबराहट महसूस होती है। विशेषज्ञों के अनुसार सही काउंसलिंग और थेरेपी से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।

    टाइगर का अपने डर को खुले तौर पर स्वीकार करना कई लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है क्योंकि यह दिखाता है कि मदद लेना कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी का कदम है। अब देखना दिलचस्प होगा कि वह इस डर पर कैसे काबू पाते हैं और आगे अपनी जिंदगी और करियर में किस तरह आगे बढ़ते हैं।