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  • उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे मामले में सात छात्रों को जमानत, दो पर कोर्ट की सख्ती

    उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे मामले में सात छात्रों को जमानत, दो पर कोर्ट की सख्ती


    नई दिल्ली ।
    टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस से जुड़े एक मामले में मुंबई की अदालत ने नौ आरोपी छात्रों में से सात को अग्रिम जमानत दे दी, जबकि दो छात्रों की याचिकाएं खारिज कर दी गईं। मामला पिछले वर्ष संस्थान परिसर में हुई एक सभा के दौरान कथित तौर पर उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में नारे लगाए जाने से जुड़ा है।

    मुंबई सेशंस कोर्ट के न्यायाधीश वीबी बोहरा ने दो छात्रों को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि छात्र होने के नाते आरोपियों से देश के कानून का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है। जिन दो छात्रों की याचिकाएं खारिज हुई हैं, उनमें एक 32 वर्षीय गोवंडी निवासी और दूसरा 23 वर्षीय देवनार निवासी बताया गया है।

    मामला 12 अक्टूबर 2025 को TISS में आयोजित एक सभा से जुड़ा है। यह कार्यक्रम दिवंगत पूर्व प्रोफेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित किया गया था। सभा के दौरान छात्रों ने उनकी तस्वीर लगाई, मोमबत्तियां जलाईं और उनकी कविताएं पढ़ीं। कुछ प्लेकार्ड पर रेस्ट इन पावर जैसे संदेश भी लिखे थे।

    अदालत ने माना कि जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देना अपने आप में कोई गैरकानूनी गतिविधि नहीं है। विशेष रूप से अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि उन्हें 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी थी। हालांकि, अदालत के अनुसार सभा के दौरान कथित तौर पर लगाए गए कुछ नारे इसे केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखते।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, सभा में करीब 10 से 12 छात्र शामिल हुए थे और आरोप है कि वहां उमर खालिद तथा शरजील इमाम की रिहाई की मांग को लेकर नारे लगाए गए। पुलिस के अनुसार, इस सभा के लिए संस्थान प्रशासन से पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। शुरुआती प्राथमिकी में नौ लोगों के नाम दर्ज किए गए थे और बाद में जांच ट्रॉम्बे पुलिस से अपराध जांच विभाग को सौंप दी गई।

    मामले की जांच के दौरान कुछ आरोपियों के लैपटॉप और मोबाइल फोन भी जब्त किए गए। अभियोजन पक्ष का दावा है कि इन उपकरणों में माओवादी संगठनों से संबंधित किताबें और अन्य सामग्री मिली। जांचकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ डिजिटल जानकारी हटाई गई थी।

    अदालत ने जांच में मिली सामग्री के आधार पर कहा कि आरोपियों में से कुछ के माओवादी विचारधारा से प्रभावित होने के संकेत मिलते हैं। अदालत ने यह संभावना भी जताई कि सभा के जरिए संस्थान के अन्य छात्रों को प्रभावित करने का प्रयास किया गया हो सकता है। हालांकि, न्यायाधीश ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि केवल माओवादी संगठनों का साहित्य डाउनलोड करना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि कैंपस में बिना अनुमति रेस्ट इन पावर जैसे शब्दों का इस्तेमाल अकेले कोई अपराध नहीं है। लेकिन कथित नारे, सभा की परिस्थितियां और जांच के दौरान सामने आई सामग्री को एक साथ देखने पर आरोपियों के कथित इरादों की जांच जरूरी हो जाती है।

    जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आपराधिक कार्रवाई में हुई देरी का मुद्दा भी उठाया गया। अदालत ने कहा कि मुकदमों में देरी के पीछे कई प्रशासनिक और न्यायिक कारण हो सकते हैं, जिनमें लंबित मामलों की संख्या और न्यायाधीशों की उपलब्धता शामिल है। न्यायाधीश ने कहा कि इन अर्जियों पर भी दाखिल होने के नौ महीने से अधिक समय बाद आदेश दिया जा रहा है।

    फिलहाल मामले की जांच जारी है। सात छात्रों को अग्रिम जमानत मिलने से उन्हें अंतरिम कानूनी राहत मिली है, जबकि दो छात्रों को अदालत से यह संरक्षण नहीं मिला। आगे की कार्रवाई जांच में सामने आने वाले तथ्यों और मामले की न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर तय होगी।

  • Twisha Sharma Case: गिरिबाला सिंह की जमानत पर हुई सुनवाई, कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

    Twisha Sharma Case: गिरिबाला सिंह की जमानत पर हुई सुनवाई, कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला


    भोपाल।
    राजधानी भोपाल (Bhopal) के बहुचर्चित त्विषा शर्मा संदिग्ध मृत्यु मामले (Twisha Sharma case) में जेल में बंद सेवानिवृत्त प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरिबाला सिंह (Giribala Singh) की जमानत अर्जी पर शुक्रवार को जिला न्यायालय में तीखी बहस हुई। सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत और परिजनों के अधिवक्ताओं का पक्ष सुनने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।

    शनिवार को इस पर फैसला आने की संभावना है। मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे पहले तीन न्यायाधीश अलग-अलग व्यक्तिगत कारणों से इस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर चुके हैं। शुक्रवार को सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ने भी यह कहते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया कि उन्होंने आरोपी गिरिबाला सिंह के अधीन न्यायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है। इसके पश्चात मामला प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रामप्रताप मिश्र की अदालत में स्थानांतरित किया गया, जहां विस्तृत सुनवाई हुई।


    बचाव पक्ष ने दिया बुजुर्ग मां का हवाला

    बचाव पक्ष के वक्ताओं ने तर्क दिया कि गिरिबाला सिंह की मां लगभग 100 वर्ष की हैं और वे पूरी तरह अपनी बेटी की देखभाल पर निर्भर हैं। याचिकाकर्ता स्वयं भी कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं और जेल में उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। इसके अलावा, आरोपी को नियमित पेंशन एवं युद्ध वीरांगना पेंशन मिलती है। आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम होने के कारण उन पर दहेज प्रताड़ना का आरोप स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता। बचाव पक्ष ने दावा किया कि आरोपी जांच में पूरा सहयोग कर रही हैं और उनके जेल में रहने के दौरान उनके घर पर चोरी भी हो चुकी है।


    सीबीआई और त्विषा के परिजनों ने किया विरोध

    सीबीआई की ओर से उपस्थित अधिवक्ता अंकुर पांडेय ने जमानत याचिका का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि केवल महिला होना या आर्थिक रूप से संपन्न होना जमानत का आधार नहीं बन सकता। सीबीआई ने अदालत में जेल प्रशासन की मेडिकल रिपोर्ट पेश कर आरोपी के स्वास्थ्य को सामान्य बताया। साथ ही ध्यान दिलाया कि उच्च न्यायालय पहले ही उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर चुका है और जांच के दौरान आरोपी ने अपना वॉइस सैंपल देने से भी साफ इनकार कर दिया था।

    सीबीआई ने खुलासा किया कि आरोपी ने सीसीटीवी तकनीशियन और एक सैलून संचालक से संपर्क कर निजी प्रतिनिधि के माध्यम से फुटेज हासिल करने का प्रयास किया था। जमानत मिलने पर गवाहों और साक्ष्यों को प्रभावित करने की प्रबल संभावना है। त्विषा शर्मा के परिजनों के अधिवक्ता ने मां की देखभाल वाले तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आरोपी की बुजुर्ग मां कभी उनके साथ नहीं रही हैं। वे केवल जेल से बाहर निकलने के लिए मां का सहारा ले रही हैं ताकि बाहर आकर मामले की निष्पक्ष जांच को प्रभावित कर सकें। अदालत ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के उपरांत अदालत ने मामले का फैसला सुरक्षित रख लिया है। संभावना है कि शनिवार को जमानत याचिका पर अदालत अपना फैसला सुनाएगी।

  • सोनम रघुवंशी की जमानत पर बढ़ा इंतजार, मेघालय सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 21 जुलाई को

    सोनम रघुवंशी की जमानत पर बढ़ा इंतजार, मेघालय सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 21 जुलाई को

    इंदौर के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में एक बार फिर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले इंतजार बढ़ गया है। सोनम रघुवंशी को मिली जमानत के खिलाफ मेघालय सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित सुनवाई फिलहाल टल गई है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी। इस कारण मामले से जुड़े सभी पक्षों की निगाहें अब अगली निर्धारित तारीख पर टिक गई हैं।

    मेघालय सरकार ने अपनी याचिका में मेघालय हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत सोनम रघुवंशी को जमानत प्रदान की गई थी। सरकार का पक्ष है कि मामले की गंभीरता और जांच से जुड़े तथ्यों को देखते हुए जमानत आदेश पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से जमानत रद्द करने की मांग की गई है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पहले भी कई बार सूचीबद्ध हो चुकी है, लेकिन विभिन्न कारणों से अंतिम निर्णय नहीं हो सका। अब सुनवाई आगे बढ़ने के बाद 21 जुलाई की तारीख तय की गई है। इस बीच, हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत से संबंधित कानूनी स्थिति यथावत बनी हुई है। अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।

    राजा रघुवंशी हत्याकांड देशभर में उस समय चर्चा का विषय बना था, जब इंदौर निवासी राजा रघुवंशी की शादी के कुछ समय बाद मेघालय यात्रा के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। बाद में उनका शव बरामद हुआ और जांच एजेंसियों ने इसे सुनियोजित हत्या का मामला बताया। जांच के दौरान पुलिस ने उनकी पत्नी सोनम रघुवंशी सहित कई अन्य लोगों को आरोपी बनाया और विभिन्न आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, मामले में हत्या और आपराधिक साजिश सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र भी प्रस्तुत किया गया। इसी दौरान सोनम रघुवंशी ने जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसे मेघालय हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।

    मामले में लगातार हो रही न्यायिक कार्यवाही पर पीड़ित परिवार की भी नजर बनी हुई है। परिवार का कहना है कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा है और वे चाहते हैं कि सभी तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लिया जाए। दूसरी ओर, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इस मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    फिलहाल इस चर्चित मामले में अंतिम निर्णय आना बाकी है। 21 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट मेघालय सरकार की याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुन सकता है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत बरकरार रहेगी या उस पर कोई नया आदेश जारी किया जाएगा। तब तक मामले की न्यायिक प्रक्रिया पूर्व निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुसार जारी रहेगी।

  • 2020 दिल्ली दंगा साजिश केस में अदालत का बड़ा फैसला, UAPA मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी नामंजूर

    2020 दिल्ली दंगा साजिश केस में अदालत का बड़ा फैसला, UAPA मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी नामंजूर

    नई दिल्ली। वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा साजिश मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। दोनों आरोपियों ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले में ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की प्रकृति को देखते हुए फिलहाल उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया।

    यह मामला दिल्ली दंगा साजिश केस की एफआईआर संख्या 59/2020 से संबंधित है। इस प्रकरण की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है। जांच एजेंसी का आरोप है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों की आड़ में व्यापक स्तर पर हिंसा भड़काने की कथित साजिश रची गई थी। इन्हीं आरोपों के आधार पर UAPA तथा भारतीय दंड संहिता की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

    अदालत के समक्ष दायर जमानत याचिकाओं में दोनों आरोपियों की ओर से नियमित जमानत देने का अनुरोध किया गया था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने मामले की गंभीरता, आरोपों की प्रकृति और जांच से जुड़े विभिन्न पहलुओं का उल्लेख करते हुए जमानत का विरोध किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने जमानत याचिकाएं स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

    दिल्ली दंगा साजिश मामला पिछले कई वर्षों से देश के चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल रहा है। इस मामले में कई आरोपियों के खिलाफ विस्तृत जांच की गई है और विभिन्न चरणों में अदालत के समक्ष आरोपपत्र भी प्रस्तुत किए जा चुके हैं। कानूनी प्रक्रिया के दौरान कई बार जमानत और अन्य याचिकाओं पर सुनवाई होती रही है, जिससे यह मामला लगातार न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ है।

    फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के दौरान 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। हिंसा के दौरान अनेक मकान, दुकानें, वाहन और अन्य संपत्तियां भी क्षतिग्रस्त हुई थीं। इसके बाद पुलिस ने घटनाक्रम की विस्तृत जांच शुरू की और कथित बड़ी साजिश के पहलू को भी जांच के दायरे में शामिल किया।

    कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि UAPA के तहत दर्ज मामलों में जमानत संबंधी प्रावधान सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में अधिक कठोर होते हैं। ऐसे मामलों में अदालत उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपों की गंभीरता और कानून में निर्धारित शर्तों के आधार पर निर्णय लेती है। इसलिए प्रत्येक जमानत याचिका का मूल्यांकन मामले के तथ्यों और न्यायिक मानकों के अनुरूप किया जाता है।

    अदालत के ताजा फैसले के बाद दोनों आरोपियों के लिए फिलहाल ट्रायल कोर्ट से राहत का रास्ता बंद हो गया है। हालांकि भारतीय न्यायिक व्यवस्था के तहत उनके पास उच्च न्यायालय अथवा अन्य सक्षम न्यायिक मंचों पर कानूनी उपाय अपनाने का विकल्प उपलब्ध रहेगा। मामले की आगे की सुनवाई और ट्रायल निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगा।

  • MP: राजा रघुवंशी हत्याकांड…. सोनम की जमानत रद्द कराने के लिए SC जाएगा परिवार

    MP: राजा रघुवंशी हत्याकांड…. सोनम की जमानत रद्द कराने के लिए SC जाएगा परिवार


    इंदौर।
    मेघालय हाई कोर्ट (Meghalaya High Court) द्वारा सोनम रघुवंशी (Sonam Raghuvanshi) की जमानत बरकरार रखने के एक दिन बाद राजा रघुवंशी (Raja Raghuvanshi) के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का रुख करने का फैसला किया है. राजा के बड़े भाई विपिन रघुवंशी ने मंगलवार को कहा कि परिवार जल्द ही सोनम की जमानत रद्द कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगा।

    विपिन रघुवंशी ने कहा कि उन्हें अभियोजन पक्ष की पैरवी से संतुष्टि नहीं है. इसलिए अब उनका परिवार न्याय की लड़ाई अपने दम पर लड़ेगा और इसके लिए निजी वकील नियुक्त करेगा. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि मेघालय पुलिस ने गिरफ्तारी के समय सोनम को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी क्यों नहीं दी. उनके मुताबिक, इसी कानूनी चूक का फायदा सोनम को जमानत मिलने में मिला।

    दरअसल, सोमवार को मेघालय हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें निचली अदालत द्वारा 27 अप्रैल को दी गई सोनम की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया का सही ढंग से पालन नहीं किया और सोनम को प्रभावी तरीके से गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए. अदालत ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47(1) का उल्लंघन माना।


    क्या है पूरा मामला?

    गौरतलब है कि राजा रघुवंशी और सोनम की शादी 11 मई 2025 को इंदौर में हुई थी. दोनों 20 मई को हनीमून मनाने मेघालय गए थे. 23 मई को सोनम के लापता होने की खबर सामने आई, जबकि 2 जून को राजा का शव पूर्वी खासी हिल्स जिले के सोहरा (चेरापूंजी) स्थित एक झरने के पास गहरी खाई में मिला था.


    किसे हई थी सजा?

    इस मामले में पुलिस ने सोनम रघुवंशी, उसके कथित प्रेमी राज कुशवाहा और उसके तीन दोस्तों को हत्या की साजिश और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था. सोनम करीब 10 महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद जमानत पर रिहा हुई है।

  • रद्द हो सकती है सोनम रघुवंशी की जमानत…. मेघालय सरकार ने HC में दी चुनौती

    रद्द हो सकती है सोनम रघुवंशी की जमानत…. मेघालय सरकार ने HC में दी चुनौती


    इंदौर।
    राजा रघुवंशी (Raja Raghuvanshi) की हत्या की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी (Main accused Sonam Raghuvanshi) की जमानत अब कानूनी मुश्किलों में फंसती नजर आ रही है। मेघालय सरकार (Government of Meghalaya) ने इस जमानत को हाई कोर्ट (High Court) में चुनौती देते हुए इसे रद्द करने की मांग की है। राज्य सरकार का तर्क है कि मामला अत्यंत गंभीर है और सेशंस कोर्ट का फैसला न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इससे पहले, निचली अदालत ने गिरफ्तारी प्रक्रिया में तकनीकी खामियों और दस्तावेजों में स्पष्टता की कमी के आधार पर सोनम रघुवंशी को जमानत दी थी। अब मेघालय हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सोनम रघुवंशी को नोटिस जारी किया है।


    सरकार बोली- सख्त रुख अपनाए कोर्ट

    मेघालय सरकार ने अपनी अर्जी में कहा है कि ईस्ट खासी हिल्स की सेशंस कोर्ट ने जो जमानत दी है। वह जुर्म की प्रकृति के हिसाब से सही नहीं है। इससे इंसाफ मिलने में दिक्कत आ सकती है। मेघालय सरकार का मानना है कि आरोप बहुत ही संगीन हैं और ऐसे मामलों में अदालत को सख्त रुख अपनाना चाहिए।

    गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कुछ गलतियां
    27 अप्रैल को शिलॉन्ग में एडिशनल डिप्टी कमिश्नर (ज्यूडिशियल) ने सोनम रघुवंशी को जमानत दे दी क्योंकि उनकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कुछ गलतियां थीं। लगभग एक साल बाद मिली इस जमानत के दौरान अदालत ने यह पाया कि गिरफ्तारी से जुड़े कागजों में जरूरी नियमों का पालन नहीं किया गया था।


    नहीं भरे गए थे चेक बॉक्स

    दस्तावेजों में चेकबॉक्स तक नहीं भरे गए थे और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के बारे में भी साफ तौर पर कुछ नहीं लिखा गया था। अदालत ने यह भी कहा था कि आरोपी को यह स्पष्ट रूप से अवगत नहीं कराया गया कि उसे किस गंभीर धारा में गिरफ्तार किया जा रहा है।


    सोनम रघुवंशी को नोटिस

    इसके अलावा, प्रारंभिक पेशी के दौरान विधिक सहायता की उपलब्धता को लेकर भी रिकॉर्ड में स्पष्ट जानकारी नहीं मिली। मेघालय हाई कोर्ट ने मंगलवार को इस मामले में सोनम रघुवंशी को नोटिस जारी किया है। राज्य सरकार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के लिए अगली तारीख निर्धारित की गई है।

    तकनीकी आधार पर दी गई बेल को बरकरार रखना उचित नहीं
    मेघालय सरकार का पक्ष है कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी थी और संबंधित दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए जा चुके हैं। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर दी गई जमानत को बरकरार रखना उचित नहीं होगा।

  • गोवा हादसे में पिता की मौत, बेटी का दर्द छलका: बदला नहीं, इंसाफ चाहिए

    गोवा हादसे में पिता की मौत, बेटी का दर्द छलका: बदला नहीं, इंसाफ चाहिए


    नई दिल्ली। 23 फरवरी को जन्मदिन मनाने गोवा पहुंची रुचिका शर्मा के लिए यह तारीख हमेशा का जख्म बन गई। तेज रफ्तार थार की टक्कर में उनके पिता भगतराम शर्मा की मौत हो गई, मां लीला शर्मा गंभीर रूप से घायल हैं और तीन महीने की मासूम बच्ची भी चोटिल हुई। रुचिका का आरोप है कि हादसे के बाद आरोपी मदद करने के बजाय वीडियो बनाता रहा और एंबुलेंस बुलाने की जगह अपने पिता को फोन किया। परिवार का कहना है कि अगर उस वक्त संवेदनशीलता दिखाई जाती, तो शायद दर्द कुछ कम होता।

    परिजन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि भगतराम शर्मा की गर्दन टूटने और अंदरूनी रक्तस्राव से मौत हुई, जबकि मां की पेल्विस, पसलियों और कंधे में फ्रैक्चर है। गोवा पुलिस के मुताबिक गाड़ी शौर्य नामक युवक चला रहा था, उसे गिरफ्तार कर जमानत मिल चुकी है। परिवार का कहना है कि यह सिर्फ सड़क हादसा नहीं, बल्कि एक पूरा परिवार टूटने की कहानी है। रुचिका ने कहा, “हमें बदला नहीं, इंसाफ चाहिए, ताकि कोई और बेटी अपने पिता को इस तरह न खोए।

  • दिल्ली दंगों में SC का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, 5 आरोपियों को मिली राहत

    दिल्ली दंगों में SC का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, 5 आरोपियों को मिली राहत


    नई दिल्ली । 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हिंसा में 53 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। दंगों के बाद दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद शरजील इमाम समेत सात अन्य लोगों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने दंगे पूर्व-योजना के तहत आयोजित किए थे। पुलिस ने इन पर भारतीय दंड संहिता और की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस का कहना था कि यह हिंसा एक सोची-समझी साजिश का परिणाम थी न कि एक आकस्मिक घटना।

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला 5 जनवरी 2026

    5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के मामले में जमानत याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया शामिल थे ने 7 आरोपियों में से 5 को जमानत दे दी जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी।

    क्यों नहीं मिली जमानत

    अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका को मामले में केंद्रीय और गंभीर बताया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक जेल में रहने के कारण जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने प्रत्येक आरोपी के मामले को अलग-अलग आधार पर तौला और फिर अपना फैसला सुनाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत देने के मामले में अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार का हवाला केवल तभी दिया जा सकता है, जब इसका आधार ठोस साक्ष्य और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा हो। यदि आरोप गंभीर हैं और साक्ष्य मजबूत हैं तो जीवन के अधिकार के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

    अतीत के फैसले का संदर्भ

    उमर खालिद शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के खिलाफ यह मामला काफी लंबा खींच चुका है। इन आरोपियों को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है और वे पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं। 10 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने इस मामले में जमानत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने भी इन आरोपियों को जमानत देने से मना कर दिया था। 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी जिसके बाद इन आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    अन्य आरोपियों की जमानत

    सुप्रीम कोर्ट ने बाकी 5 आरोपियों को जमानत देने का फैसला सुनाया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इन आरोपियों की जमानत से ट्रायल प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा और मामले की सुनवाई जारी रहेगी।

    फैसले का महत्व

    यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका गंभीर साजिशों और सामूहिक हिंसा के मामलों में जमानत देने में बेहद सावधान रहती है, विशेष रूप से जब आरोप UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक अधिकारों को हमेशा कानूनी ढांचे और साक्ष्यों के संदर्भ में समझा जाएगा न कि केवल व्यक्तिगत कठिनाई या जेल में लंबे समय तक रहने के आधार पर।

    आगे क्या होगा

    उमर खालिद और शरजील इमाम अब ट्रायल कोर्ट में फिर से जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। ट्रायल की प्रक्रिया अभी भी जारी रहेगी और अदालत भविष्य में साक्ष्यों और मामलों की गंभीरता के आधार पर निर्णय लेगी। यह मामला अब भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और अदालत के फैसले ही इन आरोपियों के भविष्य का निर्धारण करेंगे।

  • 148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला

    148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने ‘जेल नहीं, जमानत'(Bail) के सिद्धांत में अपवाद को जोड़ते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal freedom) का अधिकार संरक्षित तो है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। विशेषकर गैरकानूनी(illegal) गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालत को व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना होगा।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला 9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल में हुई भीषण रेल दुर्घटना से जुड़ा है, जब रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ किए जाने के कारण ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और एक मालगाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी। निर्दोष लोगों की मौतों के अलावा, सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

    राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
    पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और देश की अखंडता जैसे उच्चतर उद्देश्यों के अधीन है। अदालत ने कहा कि न्याय की तराजू को एक ओर संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 21 के अधिकार और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ‘न्यायसंगत अपवादों’ के बीच संतुलन बनाना होता है।

    फैसले को लिखते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कुछ मामले अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण व्यापक दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जहां मुद्दा केवल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का होता है।

    माओवादी साजिश और भारी नुकसान
    अदालत के अनुसार, यह रेल हादसा माओवादी कैडरों द्वारा अंजाम दी गई साजिश का नतीजा था। इसका उद्देश्य झारग्राम क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संयुक्त तैनाती को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था। इस घटना में न केवल बड़ी संख्या में निर्दोष यात्रियों की जान गई और लोग घायल हुए, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी करीब 25 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा।

    विरोध का अधिकार, लेकिन हिंसा नहीं
    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रेन पटरियों से छेड़छाड़ कर लगभग 150 यात्रियों की मौत का कारण बनने वाले कृत्य को किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    12 साल की कैद पर भी जमानत नहीं
    आरोपियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि वे 12 साल से अधिक समय से जेल में हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल आरोपी किसी अपराध की अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय तक जेल में रह चुका हो, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्यों जैसे अपराधों में संभावित सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। ऐसे में 12 साल की कैद को धारा 436A के तहत जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    UAPA में उलटा बोझ और निष्पक्ष सुनवाई
    अदालत ने UAPA के तहत आरोपियों पर डाले गए ‘रिवर्स बर्डन’ (उलटे बोझ) का भी उल्लेख किया, जिसमें आरोपी को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सभी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे अपनी रक्षा की तैयारी कर सकें और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

    शीघ्र सुनवाई के निर्देश
    15 साल से अधिक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया है, ताकि न्याय में और देरी न हो। इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और ‘बेल, नॉट जेल’ के व्यापक सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा जा रहा है।

  • जबलपुर हाईकोर्ट में आज होगी कोल्डड्रिंक कफ सिरप मामले की सुनवाई, डॉ. सोनी का दावा – बच्चों की मौत विभाग की जांच न होने से हुई

    जबलपुर हाईकोर्ट में आज होगी कोल्डड्रिंक कफ सिरप मामले की सुनवाई, डॉ. सोनी का दावा – बच्चों की मौत विभाग की जांच न होने से हुई


    जबलपुर । छिंदवाड़ा और बैतूल में कोल्डड्रिंक कफ सिरप पीने से 25 बच्चों की मौत के मामले में आरोपी शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी ने जबलपुर हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखा है।

    डॉ. सोनी ने अदालत में दस्तावेज पेश करते हुए दावा किया कि बच्चों की मौत उसी सॉल्वेंट के कारण हुई, जो श्रीसन फार्मा कंपनी ने बैच नंबर 13 में मिलाया था। उन्होंने कहा कि यदि औषधि विभाग समय पर उस बैच की जांच करता, तो यह दुखद घटना नहीं होती।

    डॉ. सोनी ने यह भी बताया कि वह पिछले 20 सालों से यह दवा लिख रहे हैं और कभी किसी दवा से प्रतिकूल प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। उनका कहना है कि कंपनी द्वारा हुई गलती की सजा उन्हें भुगतनी पड़ रही है।

    सुनवाई और जमानत का मामला
    जस्टिस प्रमोद अग्रवाल की अदालत ने डॉ. सोनी की जमानत अर्जी पर गुरुवार को सुनवाई के निर्देश दिए हैं। छिंदवाड़ा के परासिया निवासी डॉ. प्रवीण सोनी को परासिया पुलिस ने 5 अक्टूबर को गिरफ्तार किया था। ये वही शिशु रोग विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने मृत बच्चों को कफ सिरप लिखी थी।

    पहले परासिया कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2025 को उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद डॉ. सोनी ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए आवेदन किया। डॉ. सोनी अभी भी जेल में हैं। पुलिस ने उनकी पत्नी ज्योति सोनी को भी गिरफ्तार किया है। उनकी पत्नी के नाम पर वह मेडिकल स्टोर संचालित हो रहा था, जहां से विवादित कफ सिरप बेची गई थी।

    डॉ. सोनी की ओर से सीनियर एडवोकेट शशांक शेखर और एडवोकेट समरेश कटारे, तथा राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता सीएम तिवारी अदालत में मौजूद थे।