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  • सोनम रघुवंशी को फिर जाना होगा जेल, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गंभीर आरोपों में जमानत का आधार नहीं बन सकती तकनीकी गलती

    सोनम रघुवंशी को फिर जाना होगा जेल, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गंभीर आरोपों में जमानत का आधार नहीं बन सकती तकनीकी गलती

    नई दिल्ली । राजा रघुवंशी हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द कर दी है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में केवल गिरफ्तारी मेमो में हुई तकनीकी त्रुटि के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने सोनम को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। इस फैसले के बाद उसे दोबारा न्यायिक हिरासत में जाना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को यह पूरी जानकारी थी कि उसे किस मामले में हिरासत में लिया जा रहा है। यदि गिरफ्तारी मेमो में किसी धारा का उल्लेख टाइपिंग या मानवीय भूल के कारण गलत हुआ है, तो इसे संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आधार मानकर जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई अभी महत्वपूर्ण चरण में है और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित किए बिना आगे बढ़ना आवश्यक है।

    हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मुकदमे की सुनवाई असामान्य रूप से लंबी खिंचती है और छह महीने के भीतर पूरी नहीं होती, तो आरोपी को परिस्थितियों के आधार पर दोबारा जमानत के लिए आवेदन करने का अधिकार रहेगा। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत जारी रखना उचित नहीं माना गया।

    यह मामला वर्ष 2025 में सामने आया था, जब इंदौर के कारोबारी राजा रघुवंशी अपनी शादी के कुछ दिनों बाद पत्नी सोनम के साथ मेघालय घूमने गए थे। यात्रा के दौरान राजा अचानक लापता हो गए और बाद में उनका शव गहरी खाई से बरामद हुआ। जांच एजेंसियों ने विस्तृत जांच के बाद सोनम, उसके कथित प्रेमी राज कुशवाहा तथा अन्य आरोपियों के खिलाफ हत्या की साजिश और हत्या का मामला दर्ज किया। इसके बाद सोनम को उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार किया गया था।

    इससे पहले निचली अदालत ने गिरफ्तारी मेमो में भारतीय न्याय संहिता की गलत धारा दर्ज होने को आधार मानते हुए सोनम को सशर्त जमानत दे दी थी। बाद में उच्च न्यायालय ने भी उस आदेश को बरकरार रखा। राज्य सरकार ने इस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती देते हुए कहा कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों की पूरी जानकारी थी और रिकॉर्ड में हुई मानवीय त्रुटि को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि आरोपी लंबे समय तक फरार रही और उसे पूरे घटनाक्रम की जानकारी थी। अदालत ने इन तर्कों पर सहमति जताते हुए कहा कि मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए आरोपी को जमानत पर बनाए रखना न्यायहित में नहीं होगा। बचाव पक्ष ने यह दलील दी कि सोनम सभी शर्तों का पालन कर रही है और दोबारा जेल भेजने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया।

    सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने समाज में बढ़ते वैवाहिक अपराधों पर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि नई पीढ़ी के पास जानकारी के अनेक साधन हैं, लेकिन मानसिक और भावनात्मक चुनौतियों से निपटने की क्षमता कमजोर होती दिखाई दे रही है। न्यायाधीशों ने परिवारों की भूमिका पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि संवाद और भावनात्मक सहयोग की कमी कई बार गंभीर सामाजिक समस्याओं को जन्म देती है। अदालत की इन टिप्पणियों के साथ यह मामला अब दोबारा निचली अदालत में नियमित सुनवाई के लिए आगे बढ़ेगा।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर रद्द की शिंदे समर्थक की जमानत, आपराधिक रिकॉर्ड को किया रेखांकित

    बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर रद्द की शिंदे समर्थक की जमानत, आपराधिक रिकॉर्ड को किया रेखांकित


    नई दिल्ली ।
    चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर न्यायपालिका ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। मुंबई के डोंबिवली स्थित एक सरकारी अस्पताल में महिला डॉक्टर से कथित बदसलूकी और मारपीट के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपी शिवसेना नेता रमेश म्हात्रे को निचली अदालत से मिली जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने आरोपी को 20 जुलाई 2026 तक संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। इस फैसले को डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा के मामलों में न्यायपालिका के कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    मामला उस समय सामने आया जब डोंबिवली के सरकारी अस्पताल में भर्ती के लिए पहुंचे एक मरीज को तत्काल बेड उपलब्ध कराने की मांग को लेकर विवाद हो गया। ड्यूटी पर मौजूद महिला डॉक्टर ने अस्पताल के नियमों और बेड की उपलब्धता का हवाला देते हुए तत्काल व्यवस्था करने में असमर्थता जताई। आरोप है कि इसी बात से नाराज होकर रमेश म्हात्रे ने डॉक्टर के साथ अभद्र व्यवहार किया और उनके साथ मारपीट की। घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया और पुलिस ने डॉक्टर की शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया। बाद में स्थानीय अदालत ने आरोपी को जमानत दे दी थी।

    निचली अदालत के इस फैसले के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए जमानत आदेश पर गंभीर आपत्ति जताई। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष आरोपी के आपराधिक रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय किसी भी आरोपी के आपराधिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कुछ मामलों में आरोपी को राहत मिली हो, लेकिन उसके विरुद्ध दर्ज मामलों की प्रकृति और संख्या पर विचार करना आवश्यक है। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में न्यायिक विवेक का उपयोग पूरी सावधानी और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।

    अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर और अन्य चिकित्सा कर्मी समाज को आवश्यक सेवाएं प्रदान करते हैं तथा ड्यूटी के दौरान उनके साथ हिंसा या अभद्रता किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय ने टिप्पणी की कि अस्पतालों में सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय है और इस प्रकार की घटनाओं पर कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने आरोपी को निर्धारित समय सीमा के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि कानून सभी के लिए समान है और किसी भी व्यक्ति की सामाजिक या राजनीतिक पहचान न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकती।

    इस घटनाक्रम के बाद डॉक्टर संगठनों में भी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली। पहले जमानत दिए जाने के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन और हड़ताल की घोषणा की गई थी। हालांकि हाई कोर्ट के फैसले के बाद अदालत ने डॉक्टर समुदाय से अपील की कि वे अपने प्रस्तावित आंदोलन पर पुनर्विचार करें और स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित होने से बचाएं। चिकित्सा समुदाय का कहना है कि अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था और सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है, ताकि वे बिना किसी भय के मरीजों की सेवा कर सकें।