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  • भाजपा युवा मोर्चा की नियुक्तियों से संगठन में मचा घमासान, परिवारिक विवाद से लेकर निष्कासन तक के मामले आए सामने

    भाजपा युवा मोर्चा की नियुक्तियों से संगठन में मचा घमासान, परिवारिक विवाद से लेकर निष्कासन तक के मामले आए सामने


    भोपाल । मध्यप्रदेश में भारतीय जनता युवा मोर्चा के 19 जिलों के अध्यक्षों और महामंत्रियों की नियुक्तियों के बाद संगठन के भीतर विवाद गहराने लगे हैं। 29 अक्टूबर को घोषित की गई नियुक्तियों के एक-दो दिन के भीतर ही कई नवनियुक्त पदाधिकारी सवालों के घेरे में आ गए। बालाघाट में नए जिलाध्यक्ष की भाभी ने मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के आरोप लगाते हुए पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई है। मंडला में जिलाध्यक्ष बनाए गए उत्कर्ष यादव की पत्नी ने दहेज में थार गाड़ी मांगने के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। वहीं नर्मदापुरम में छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित किए गए नेता को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपे जाने पर सवाल उठ रहे हैं। सिवनी और इंदौर ग्रामीण में भी नियुक्तियों को लेकर असंतोष सामने आया है।

    बालाघाट में अमन गांधी को भाजयुमो जिलाध्यक्ष बनाए जाने के बाद पारिवारिक विवाद चर्चा में आ गया। नियुक्ति की घोषणा वाली रात ही विवाद सामने आया था। इसके बाद 30 अक्टूबर को उनकी भाभी पूजा गांधी ने कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि शराब के नशे में अमन गांधी उनके ससुर और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनके और उनके पति के साथ मारपीट की। साथ ही जान से मारने की धमकी भी दी गई। पूजा गांधी ने पुलिस से खुद अपने पति और छह वर्षीय बच्चे की सुरक्षा की मांग की है। बताया गया है कि इसी परिवार के खिलाफ अगस्त में भी शिकायत दर्ज कराई गई थी। हालांकि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच पुलिस स्तर पर की जानी है।

    मंडला में उत्कर्ष यादव की नियुक्ति भी विवादों में है। उनकी पत्नी ने आरोप लगाया है कि शादी के बाद ससुराल पक्ष की ओर से थार गाड़ी की मांग की जाने लगी और इसके लिए उन्हें प्रताड़ित किया गया। इस मामले में जून 2026 में लखनादौन थाने में उत्कर्ष यादव और उनके परिवार के तीन सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। ऐसे मामले के बीच जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने से नियुक्ति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

    नर्मदापुरम में कुलदीप रघुवंशी को जिलाध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के पुराने फैसले की चर्चा फिर शुरू हो गई है। वर्ष 2023 में इटारसी नगर मंडल अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद के दौरान कुलदीप और उनके साथियों पर मारपीट का आरोप लगा था। पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद तत्कालीन जिला अध्यक्ष माधवदास अग्रवाल ने उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। यह निष्कासन वर्ष 2029 तक बताया गया था। अब करीब साढ़े तीन साल में ही उनकी वापसी और सीधे जिलाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिलने पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि कुलदीप रघुवंशी का कहना है कि एक घटना में उनका नाम जुड़वा दिया गया था और डेढ़ महीने में ही वे उस मामले में दोषमुक्त हो गए थे। इसके बाद पार्टी में उनकी वापसी हुई थी।

    सिवनी में योगेश शिवहरे को जिलाध्यक्ष बनाए जाने पर संगठन के भीतर नाराजगी की बात सामने आई है। आरोप है कि जिला स्तर पर कोर ग्रुप की सहमति से तैयार पैनल को नजरअंदाज कर नियुक्ति की गई। पैनल में नाम नहीं होने के बावजूद जिम्मेदारी मिलने से कुछ युवा नेताओं में असंतोष है। वहीं इंदौर ग्रामीण में अजय सिंह पंवार की नियुक्ति को लेकर सामाजिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया गया है। लगातार तीसरी बार राजपूत समाज से अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा के बीच कुछ नेताओं ने आपत्ति जताई। उम्र सीमा और अलग-अलग क्षेत्रों के दावेदारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आई हैं।

    सागर में नवनियुक्त जिलाध्यक्ष जसवंत राठौर की नियुक्ति के बाद उनके परिवार से जुड़ी पुरानी आयकर विभाग की कार्रवाई भी चर्चा में है। 5 जनवरी 2025 को आयकर विभाग ने पूर्व भाजपा विधायक हरवंश सिंह राठौर के आवास सहित तीन ठिकानों पर छापेमारी की थी। यह कार्रवाई बीड़ी कारोबार संपत्तियों और वित्तीय लेन-देन की जांच से जुड़ी थी। हालांकि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जसवंत राठौर के खिलाफ इस कार्रवाई में सीधे तौर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।

    इन घटनाओं के बाद भाजयुमो की नियुक्ति प्रक्रिया और संगठन के फैसलों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अलग-अलग जिलों में सामने आए विवादों ने नए पदाधिकारियों के चयन और संगठन के भीतर सामाजिक तथा राजनीतिक संतुलन पर बहस तेज कर दी है। अब इन मामलों में संबंधित शिकायतों और संगठन की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया पर सबकी नजर रहेगी।

  • बालाघाट में 17 साल तक फर्जी डॉक्टर बनकर करता रहा इलाज, बीएमओ भी बना, FIR होते ही फरार

    बालाघाट में 17 साल तक फर्जी डॉक्टर बनकर करता रहा इलाज, बीएमओ भी बना, FIR होते ही फरार


    बालाघाट । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा एक गंभीर फर्जीवाड़ा सामने आया है। आरोप है कि एक व्यक्ति दूसरे डॉक्टर के नाम और दस्तावेजों का इस्तेमाल कर करीब 17 साल तक सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज करता रहा। इतना ही नहीं वह ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर यानी बीएमओ जैसे जिम्मेदार पद पर भी काम करता रहा। जांच में उसकी पहचान रीवा निवासी शिवकुमार पांडे के रूप में सामने आई है जो कथित तौर पर डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम से नौकरी कर रहा था। मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी फरार बताया जा रहा है और पुलिस उसकी तलाश में जुटी है।

    दूसरे डॉक्टर के नाम पर हासिल की सरकारी नौकरी

    विभागीय आदेश और बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के प्रतिवेदन के मुताबिक असली डॉ. सुनील कुमार चिकित्सा अधिकारी के पद पर देवास जिले में पदस्थ हैं। वहीं शिवकुमार पांडे पर आरोप है कि उसने डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल कर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और स्वास्थ्य विभाग में संविदा चिकित्सक की नौकरी हासिल कर ली। वह कई वर्षों तक बिरसा और दमोह क्षेत्र में काम करता रहा। इस दौरान उसे प्रभारी बीएमओ की जिम्मेदारी भी मिली। इतने लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था में काम करने के बावजूद उसकी वास्तविक पहचान सामने नहीं आ सकी।

    इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक ही डॉक्टर के नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल कर दो अलग-अलग व्यक्तियों के सरकारी सेवा में होने का मामला लंबे समय तक विभागीय निगरानी से बाहर रहा। अब जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि नियुक्ति के समय दस्तावेजों का सत्यापन किस तरह हुआ और आरोपी इतने वर्षों तक जांच से कैसे बचा रहा।

    2024 में शिकायत के बाद भी नहीं खुला मामला

    रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में भी बिरसा में पदस्थ डॉ. सुनील सिंह की डिग्री को लेकर शिकायत की गई थी। उस समय जांच के बाद आरोपी को क्लीनचिट दे दी गई थी। तत्कालीन बालाघाट सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडे ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए बताया था कि शिकायत मिलने पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर रीवा मेडिकल कॉलेज से संपर्क किया गया था। उनके अनुसार कॉलेज की ओर से बताया गया था कि सुनील सिंह नाम का व्यक्ति वहां पढ़ा था और उसने पढ़ाई पूरी की थी। इसी जानकारी के आधार पर उस समय कार्रवाई की गई थी।

    हालांकि अब सामने आए मामले ने पिछली जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि क्या मूल डॉक्टर के दस्तावेजों और आरोपी की पहचान का आपस में मिलान किया गया था। क्या मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर की स्वतंत्र रूप से जांच हुई थी और क्या देवास में पदस्थ असली डॉक्टर के रिकॉर्ड से तुलना की गई थी। इन सवालों के जवाब विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएंगे।

    भास्कर की खबर के बाद राज्य स्तर पर जांच

    दैनिक भास्कर डिजिटल पर दस्तावेजों के साथ खबर प्रकाशित होने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने राज्य स्तर पर जांच समिति गठित की। जांच में बालाघाट में डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम से नौकरी करने वाले व्यक्ति की पहचान शिवकुमार पांडे के रूप में किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद बिरसा थाने में उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई।

    पुलिस आरोपी की तलाश में रीवा जिले के बड़ागांव और खुटेही क्षेत्र तक पहुंची। पुलिस के मुताबिक स्थानीय लोगों ने तस्वीर देखकर व्यक्ति की पहचान शिवकुमार पांडे के रूप में की। खुटेही स्थित मकान पर पहुंचने पर उसके बेटे और बेटी ने भी तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति को अपना पिता बताया। हालांकि पुलिस की दबिश के दौरान आरोपी घर पर नहीं मिला।

    पुलिस को आरोपी की तलाश और संपत्ति की जांच

    प्रभारी बीएमओ डॉ. नरेश मारन की शिकायत पर शिवकुमार पांडे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) 340(2) और 336(3) के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अब आरोपी की गिरफ्तारी के साथ उसकी चल और अचल संपत्ति का विवरण भी जुटा रही है। इसके लिए रीवा की गुढ़ और हुजूर तहसीलों को पत्र भेजे गए हैं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार आरोपी की तलाश के लिए टीमें बनाई गई हैं और उस पर इनाम भी घोषित किया गया है।

    यह मामला केवल कथित फर्जी नियुक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में दस्तावेजों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। मरीजों के इलाज से जुड़े पदों पर नियुक्ति के दौरान शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल रजिस्ट्रेशन की सही जांच बेहद जरूरी है। अब जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि कथित फर्जीवाड़ा कैसे हुआ और इतने वर्षों तक संबंधित विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल सकी।

  • आदिवासी बच्चों की मौत के बीच बालाघाट पहुंचे राहुल गांधी जगला में पीड़ित परिवारों से मुलाकात पर सबकी नजर

    आदिवासी बच्चों की मौत के बीच बालाघाट पहुंचे राहुल गांधी जगला में पीड़ित परिवारों से मुलाकात पर सबकी नजर


    बालाघाट । मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी एक अक्टूबर को बालाघाट के बिरसा ब्लॉक के जगला गांव पहुंचे हैं जहां वे बीमारी से जान गंवाने वाले बैगा आदिवासी बच्चों के परिवारों से मुलाकात कर रहे हैं। राहुल गांधी गोंदिया से सड़क मार्ग के जरिए बालाघाट पहुंचे। उनके कार्यक्रम को लेकर स्थानीय स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है और कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने वाले लोगों की जांच के बाद प्रवेश दिया जा रहा है। इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी मौके पर मौजूद हैं।

    बालाघाट के आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौत का मामला पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य व्यवस्था और पोषण से जुड़े सवालों के बीच सामने आया है। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में बीमारी से 32 बच्चों की मौत दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। वहीं कांग्रेस की ओर से इससे अधिक मौतों का दावा किया गया है। बैहर विधायक संजय उइके ने 43 बच्चों की मौत की बात कही है। ऐसे में सरकारी आंकड़े और विपक्ष की ओर से बताए जा रहे आंकड़ों में अंतर भी इस पूरे मामले का अहम पहलू बन गया है। इन अलग अलग आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि को लेकर स्थिति को अलग से देखना जरूरी है।

    राहुल गांधी के दौरे का मुख्य उद्देश्य प्रभावित परिवारों से सीधे मुलाकात करना और उनकी स्थिति को समझना बताया गया है। वे जगला गांव में उन परिवारों से मिलेंगे जिन्होंने बीमारी के दौरान अपने बच्चों को खोया है। रिपोर्टों के मुताबिक प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की मौत के पीछे एक ही कारण सामने नहीं आया है। स्वास्थ्य जांच में मलेरिया खसरा कुपोषण एनीमिया डिहाइड्रेशन और सांस से जुड़ी परेशानियों जैसे कई स्वास्थ्य कारकों की जानकारी सामने आई है। इसलिए पूरे मामले को किसी एक बीमारी से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।

    इस मामले में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और दूरदराज के आदिवासी इलाकों में चिकित्सा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त चिकित्सा अधिकारियों की तैनाती और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार जैसे कदमों की जानकारी दी गई है। सरकार की ओर से प्रभावित परिवारों के लिए सहायता और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की बात भी सामने आई है। वहीं कांग्रेस इस पूरे मामले को लेकर सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठा रही है।

    बालाघाट का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य प्रदेश में आदिवासी आबादी का हिस्सा काफी बड़ा है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल आबादी में अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी 21.1 प्रतिशत थी। विधानसभा की 230 सीटों में 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा कई सामान्य सीटों पर भी आदिवासी मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती है। लोकसभा में मध्य प्रदेश की 29 सीटों में से 6 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।

    विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2018 में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 47 सीटों में कांग्रेस ने 30 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को 16 सीटें मिली थीं। 2023 के चुनाव में बीजेपी ने 24 एसटी आरक्षित सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को 22 और भारत आदिवासी पार्टी को एक सीट मिली। ये आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों का राजनीतिक महत्व लगातार बना हुआ है।

    राहुल गांधी का बालाघाट दौरा ऐसे समय हो रहा है जब बच्चों की मौत का मामला स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ राजनीतिक बहस का विषय भी बन चुका है। बीजेपी ने इस दौरे को राजनीतिक लाभ से जोड़कर सवाल उठाए हैं जबकि कांग्रेस प्रभावित परिवारों से मुलाकात को जमीनी स्थिति समझने का माध्यम बता रही है। अब राहुल गांधी की परिवारों से मुलाकात और उनके बाद सामने आने वाली प्रतिक्रियाओं पर पूरे प्रदेश की नजर रहेगी।

  • बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम

    बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में पिछले ढाई महीने से बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने पूरे प्रदेश को चिंता में डाल दिया है। जून के आखिरी सप्ताह से बैहर और बिरसा ब्लॉक के कई बैगा और गोंड बहुल गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने का सिलसिला शुरू हुआ था जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बड़ा सवाल मौतों की संख्या को लेकर है। शुरुआत में प्रशासन की ओर से केवल 8 बच्चों की मौत की बात सामने आई लेकिन गांवों में पहुंची जमीनी पड़ताल और स्थानीय लोगों के दावों के बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया। अलग अलग रिपोर्टों में अब 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की बात सामने आ रही है जबकि प्रशासन की ओर से अभी तक मौतों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    सोनगुड्डा बोंदारी कुंडेकसा कोरका गठिया मछूलदा और मातला जैसे गांवों से बच्चों के बीमार होने और मौत की खबरें सामने आईं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं हुईं। अडोरी पंचायत के सरपंच ने तो अपनी पंचायत में ही 9 बच्चों की मौत का दावा किया है। दूसरी ओर सरकार की मेडिकल स्क्रीनिंग में बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई है। केंद्रीय टीम ने इलाके में 32433 लोगों की जांच की जिसमें 7711 बच्चे गंभीर कुपोषित पाए गए। इनमें 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करना पड़ा। वहीं 13406 बच्चे डायरिया से पीड़ित मिले जबकि 274 बच्चों में गंभीर निमोनिया के लक्षण पाए गए। जुलाई से अब तक 431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया जिनमें से 379 बच्चों को उपचार के बाद छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 52 बच्चे अब भी इलाजरत हैं।

    इन मौतों के पीछे किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। कई बच्चों में मलेरिया डायरिया खसरा और चर्म रोग जैसी समस्याएं सामने आईं लेकिन लगभग सभी मामलों में कुपोषण एक बड़ी साझा समस्या बनकर उभरा। यही कुपोषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है और सामान्य दिखने वाली बीमारियों को भी गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का शरीर संक्रमण से मुकाबला नहीं कर पाता। जिंक विटामिन ए और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियां भी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

    बालाघाट पहले से ही मलेरिया के लिहाज से संवेदनशील जिला रहा है। पिछले वर्ष प्रदेश में दर्ज 2126 मलेरिया मामलों में 685 मामले अकेले बालाघाट से सामने आए थे। इस वर्ष जुलाई तक प्रदेश में मिले 583 मामलों में भी 174 मामले बालाघाट के थे। इसके साथ ही बैगा समुदाय की बस्तियां जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में होने के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। साफ पानी की कमी और लंबे समय तक पोषण आहार नहीं मिलने की समस्या ने हालात को और गंभीर किया है।

    सबसे चिंता की बात यह है कि इलाज के बाद घर लौटने वाले कुछ बच्चे दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों के पोषण और गांव के स्वास्थ्य वातावरण पर भी लगातार निगरानी जरूरी है। डायरिया होने पर तत्काल ओआरएस देना जिंक की खुराक पूरी करना और बच्चे की हालत बिगड़ने पर बिना देरी स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी बताया गया है।

    मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। गलत आंकड़े बताए जाने के आरोपों के बाद तत्कालीन सीएमएचओ को हटाया गया। एक बच्चे की मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराए जाने के ग्रामीण आरोपों ने भी विवाद बढ़ाया। अस्पतालों में फोटो और मीडिया कवरेज पर रोक लगाने का आदेश जारी होने और कुछ ही घंटों में वापस लिए जाने से भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हुए।

    सरकार ने स्थिति संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रभावित बैगा गांव पहुंचे और मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात कर आर्थिक सहायता की घोषणा की। जिला अस्पताल के बच्चों के वार्ड की क्षमता बढ़ाई गई है। छह मोबाइल मेडिकल यूनिट तैनात की गई हैं और निगरानी का दायरा बढ़ाया गया है। गांवों में सफाई अभियान और कीटनाशक छिड़काव भी कराया गया है।

    इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि आखिर इन बच्चों की मौतों की वास्तविक संख्या कितनी है और बीमारी की जड़ क्या है। कुपोषण मलेरिया संक्रमण दूषित पानी और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था सभी एक साथ जिम्मेदार हैं या इसके पीछे कोई और कारण भी है यह स्पष्ट होना बाकी है। ऐसे में जरूरी है कि मौतों के आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए और हर प्रभावित गांव की स्वतंत्र जांच कराई जाए। क्योंकि बालाघाट की इन आदिवासी बस्तियों में सवाल सिर्फ बीमार बच्चों का नहीं बल्कि उन परिवारों के भरोसे का भी है जो अपने बच्चों को बचाने के लिए अब भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

  • अस्पताल दूर टीकाकरण अधूरा और कुपोषण का संकट, बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल

    अस्पताल दूर टीकाकरण अधूरा और कुपोषण का संकट, बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत ने खोली सिस्टम की पोल


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक में बैगा आदिवासी परिवारों के बच्चों की मौत का मामला स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। प्रभावित गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने और मौतों की खबर सामने आने के बाद सरकारी टीमें सक्रिय हुईं लेकिन बीमारी के कारण और मृतकों की संख्या को लेकर सरकारी दावे और स्थानीय स्तर पर किए जा रहे दावों में अंतर दिखाई दे रहा है। जिला प्रशासन के अनुसार आठ बच्चों की मौत हुई है जबकि स्थानीय कांग्रेस विधायक संजय उइके ने 20 बच्चों की मौत का दावा किया है। उन्होंने मृत बच्चों की सूची होने और कई परिवारों को लंबे समय तक राशन नहीं मिलने की बात भी कही है।

    बिरसा ब्लॉक के बैगा बहुल इलाकों में कुंडेकसा अडोरी कोरका और बांदरी समेत कई गांवों में बड़ी संख्या में बच्चे बीमार हुए। बच्चों में बुखार सर्दी खांसी दस्त त्वचा संबंधी समस्या और मिजल्स जैसे लक्षण सामने आए। स्वास्थ्य विभाग ने बाद में घर घर सर्वे शुरू किया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक 140 प्रभावित बच्चों में से 100 स्वस्थ होकर घर लौट चुके थे जबकि 40 बच्चों का उपचार चल रहा था। स्वास्थ्य टीमों ने बच्चों को विटामिन ए ओआरएस आयरन सिरप और अन्य जरूरी दवाएं भी दीं।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच को लेकर उठ रहा है। प्रभावित आदिवासी गांव बेहद दुर्गम इलाकों में स्थित हैं और कई जगह अस्पताल तथा स्वास्थ्य केंद्र काफी दूर हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ इलाकों में निकटतम अस्पताल करीब 70 किलोमीटर दूर है। ऐसे में गंभीर हालत में बच्चों को समय पर अस्पताल पहुंचाना परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कई परिवार पारंपरिक उपचार और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साधनों पर निर्भर रहते हैं जिससे अस्पताल पहुंचने में और देरी हो सकती है।

    दूसरी बड़ी चिंता कुपोषण की है। प्रभावित क्षेत्र के आंगनवाड़ी केंद्रों में किए गए वजन परीक्षण में बड़ी संख्या में बच्चे सामान्य से कम वजन के पाए गए। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जुलाई में 28 आंगनवाड़ी केंद्रों में छह साल से कम उम्र के 1149 बच्चों का वजन किया गया। इनमें 213 बच्चे मध्यम रूप से कम वजन वाले और 18 बच्चे गंभीर रूप से कम वजन वाले पाए गए। यानी पोषण संकट बीमारी के साथ बच्चों की स्थिति को और गंभीर बना रहा था।

    टीकाकरण को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। मिजल्स से बचाव के लिए टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन दूरदराज के गांवों में वैक्सीनेशन कवरेज और स्वास्थ्य कर्मियों की नियमित पहुंच को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें सामने आई हैं। स्वास्थ्य विभाग ने बाद में प्रभावित इलाकों में सर्वेक्षण टीमों की संख्या बढ़ाई और घर घर जाकर बच्चों की जांच शुरू की। 14 अगस्त तक 20 सर्वेक्षण टीमें सक्रिय थीं और सैकड़ों लोगों की जांच की जा चुकी थी।

    सरकार की ओर से बीमारी को किसी रहस्यमयी बीमारी के बजाय मौसमी संक्रमणों से जोड़कर देखा गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि कई मामलों में मलेरिया और मिजल्स जैसे लक्षण पाए गए हैं। आईसीएमआर और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की टीमें भी क्षेत्र में पहुंचकर स्थिति का आकलन कर चुकी हैं। प्रशासन ने पानी के स्रोतों को सैनिटाइज करने सफाई अभियान चलाने और मच्छरों के नियंत्रण के लिए फॉगिंग तथा एंटी लार्वा गतिविधियां शुरू की हैं।

    प्रशासन ने अब प्रभावित गांवों में निगरानी बढ़ा दी है। घर घर स्वास्थ्य जांच के साथ बीमार बच्चों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा है और पोषण तथा राशन की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जा रहा है। प्रशासन की ओर से यह भी बताया गया है कि कई बच्चों को उपचार के बाद स्वस्थ होने पर घर भेजा जा चुका है।

    हालांकि मौतों की वास्तविक संख्या और उनके कारण को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होने तक किसी एक बीमारी को सभी मौतों का निश्चित कारण बताना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह मामला सिर्फ बीमारी का नहीं बल्कि दूरदराज आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पोषण टीकाकरण और समय पर निगरानी की व्यवस्था का भी बड़ा सवाल बन चुका है। बैगा जैसे विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह के बच्चों तक सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाना इस संकट से निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है।

  • दूषित पानी और संक्रमण से बच्चों की मौत का मामला गरमाया, दिग्विजय बोले- दोषियों पर हो कड़ी कार्रवाई

    दूषित पानी और संक्रमण से बच्चों की मौत का मामला गरमाया, दिग्विजय बोले- दोषियों पर हो कड़ी कार्रवाई


    भोपाल। बालाघाट जिले के आदिवासी विकासखंड बिरसा में बच्चों की मौत और बड़ी संख्या में बच्चों के बीमार होने का मामला गंभीर होता जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस पूरे मामले पर चिंता जताते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखा है। उन्होंने कथित दूषित पानी और संक्रमण से पैदा हुई बीमारियों की राज्य स्तर पर जांच कराने तथा लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग की है। दिग्विजय सिंह ने मृत बच्चों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने और गंभीर रूप से बीमार बच्चों को बेहतर इलाज के लिए एयरलिफ्ट कराने की भी मांग रखी है।

    दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में दावा किया है कि बिरसा क्षेत्र में पिछले एक सप्ताह के दौरान 11 आदिवासी बच्चों की बीमारी से मौत हुई है। हालांकि जिला प्रशासन की ओर से अब तक सात बच्चों की मौत की पुष्टि किए जाने की बात पत्र में कही गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि चार अन्य बच्चों की मौत की जानकारी सामने नहीं लाई जा रही है। उनके मुताबिक बालाघाट जिला चिकित्सालय में 100 से अधिक बच्चों को भर्ती कराया गया है और इनमें कई बच्चों की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है।

    बिरसा क्षेत्र के कई गांवों में बुखार और संक्रमण से लोग परेशान बताए जा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने पत्र में कहा है कि मलेरिया, निमोनिया, सर्दी-खांसी और चर्म रोग जैसी बीमारियों का असर कई गांवों में देखने को मिल रहा है। जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित बोंदारी, कुंडेकसा और कोरका से जुड़े टोले-मजरों में बीमारी को लेकर डर का माहौल बताया गया है। पत्र के मुताबिक कई परिवारों में बच्चे तेज बुखार से जूझ रहे हैं।

    दिग्विजय सिंह ने आदिवासी नेता शुभम उईके के हवाले से जिला अस्पताल की स्थिति का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार अस्पताल का बच्चा वार्ड बीमार बच्चों से भर गया है। उन्होंने बोंदारी गांव के समारू धुर्वे के बच्चों साहिल और नामिन की निमोनिया से मौत का जिक्र करते हुए कहा कि बीमारी ने कई गरीब परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है। वहीं अन्य प्रभावित परिवारों के बच्चों की मौत का भी पत्र में उल्लेख किया गया है।

    इस मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के प्रभावित परिवारों से मिलने और उपचार की व्यवस्था को लेकर अधिकारियों से चर्चा करने की बात भी सामने आई है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि विशेष पिछड़ी जनजाति में शामिल बैगा आदिवासी परिवारों के सामने बीमारी ने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। उन्होंने इसे केवल स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और साफ पानी की उपलब्धता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि स्वास्थ्य मंत्री और प्रमुख सचिव के साथ चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम प्रभावित गांवों का दौरा करे। उन्होंने संक्रमित क्षेत्रों में मेडिकल कैंप लगाकर बच्चों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने की मांग की है। साथ ही प्रत्येक मृत बच्चे के परिवार को मुख्यमंत्री सहायता कोष से 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग रखी है।

    दिग्विजय सिंह ने गंभीर रूप से बीमार बच्चों को जरूरत पड़ने पर एयरलिफ्ट कर नागपुर, रायपुर या भोपाल के बेहतर चिकित्सा केंद्रों में भर्ती कराने और उनका पूरा इलाज राज्य सरकार की ओर से कराने की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष और राज्य स्तरीय जांच के बाद यदि किसी विभाग या अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

  • परिवार शादी में गया था, पीछे हुआ दर्दनाक हादसा: बालाघाट में महिला की मौत

    परिवार शादी में गया था, पीछे हुआ दर्दनाक हादसा: बालाघाट में महिला की मौत


    नई दिल्ली। बालाघाट जिले के परसवाड़ा थाना क्षेत्र में एक दुखद घटना सामने आई है, जहां कीटनाशक खाने के बाद इलाज के दौरान 55 वर्षीय महिला की मौत हो गई। मृतका की पहचान चटरीटोला निवासी श्यावती पति धीरसिंह मर्सकोले के रूप में हुई है। घटना के बाद पूरे इलाके में शोक का माहौल है और पुलिस मामले की जांच में जुट गई है।
    जानकारी के अनुसार, महिला ने मंगलवार रात खेत में उपयोग होने वाला कीटनाशक खा लिया था। हालत बिगड़ने पर परिजनों ने उन्हें पहले परसवाड़ा अस्पताल पहुंचाया, जहां से गंभीर स्थिति देखते हुए जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। देर रात करीब 12:30 बजे उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन बुधवार को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
    अस्पताल चौकी पुलिस ने डॉक्टर की सूचना पर शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया और उसके बाद अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया। अब आगे की जांच परसवाड़ा थाना पुलिस द्वारा की जा रही है।
    मृतका के बेटे यशवंत मर्सकोले ने बताया कि घटना के समय परिवार के कुछ सदस्य एक शादी समारोह में गए हुए थे, जबकि घर पर उनकी मां और छोटी बहन मौजूद थीं। बहन ने ही सूचना दी कि मां ने कीटनाशक खा लिया है। इसके बाद परिजन तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे।
    परिजनों के अनुसार, श्यावती लंबे समय से शरीर दर्द और कमजोरी की समस्या से परेशान थीं और उनका इलाज भी चल रहा था। आशंका जताई जा रही है कि शारीरिक पीड़ा और मानसिक तनाव के चलते उन्होंने यह कदम उठाया हो सकता है, हालांकि पुलिस सभी पहलुओं से जांच कर रही है।
    पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और परिजनों के बयान के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
  • बड़ी कार्रवाईः डेढ़ करोड़ का अनियमित व्यापारः करणी ज्वेलर्स में रातभर चली जीएसटी की छापेमारी

    बड़ी कार्रवाईः डेढ़ करोड़ का अनियमित व्यापारः करणी ज्वेलर्स में रातभर चली जीएसटी की छापेमारी


    बालाघाट । बालाघाट से बड़ी खबर सामने आई है जहां जिला मुख्यालय के मां अन्नपूर्णा मंदिर के निकट संचालित करणी ज्वेलर्स में जीएसटी टीम ने छापेमारी कर डेढ़ करोड़ रुपये की टैक्स चोरी का खुलासा किया है। यह कार्रवाई रातभर चली और इसके दौरान सोने और चांदी के स्टॉक में अभिलेखों के मुकाबले भारी अंतर पाया गया।

    जानकारी के मुताबिक इस छापेमारी में जीएसटी की 8 सदस्यीय टीम ने भाग लिया। इस टीम का मार्गदर्शन लोकेश कुमार लिल्हारे आयुक्त केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर जबलपुर ने किया। टीम ने ज्वेलर्स में जेवरात की खरीदी और बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच की और साथ ही स्टॉक का भौतिक सत्यापन भी किया।

    निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने परिसर में उपलब्ध सोने और चांदी के स्टॉक की गणना की और इसे करदाता द्वारा अभिलेखों में दर्शाए गए स्टॉक से तुलना की। इस तुलना में स्पष्ट रूप से देखा गया कि अभिलेखों की तुलना में स्टॉक में महत्वपूर्ण कमी है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार इस कमी का मूल्य लगभग 1.5 करोड़ रुपये है। यह संकेत करता है कि करदाता ने लेखांकन और कर देयता के निर्धारण में गंभीर अनियमितताएं की हैं।

    सूत्रों के अनुसार यह कार्रवाई विश्वसनीय सूचनाओं के आधार पर की गई थी। छापेमारी के दौरान टीम ने रिटर्न फाइलों की भी जाँच की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कर गणना में कोई गड़बड़ी न हुई हो। अधिकारियों ने बताया कि मामले की विस्तृत जांच जारी है और आवश्यकतानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस दौरान जो भी अनियमितताएं सामने आएंगी उनके खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे।

    यह मामला न सिर्फ कर चोरी का है बल्कि यह ज्वेलरी व्यवसाय में होने वाली संभावित वित्तीय अनियमितताओं पर भी रोशनी डालता है। अब यह देखना बाकी है कि आगे जांच में और क्या खुलासा होता है और इस कार्रवाई का प्रभाव अन्य व्यवसायों पर कैसे पड़ता है।इस तरह की कार्रवाई यह संदेश देती है कि जीएसटी विभाग हर स्तर पर कर अनुपालन पर नजर रख रहा है और किसी भी अनियमित गतिविधि को बख्शा नहीं जाएगा।