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  • नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द

    नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द


    नई दिल्ली। नेपाल की राजनीति में एक बड़े फैसले ने हलचल मचा दी है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने एक झटके में देशभर में की गई 1594 राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द कर दिया है। कैबिनेट की मंजूरी और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की स्वीकृति के बाद यह फैसला लागू होते ही करीब 150 सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में बैठे पदाधिकारी तत्काल प्रभाव से पदमुक्त हो गए।

    सरकार ने इस कदम को “सिस्टम सुधार” और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा बदलाव बताया है। अध्यादेश के जरिए करीब 110 कानूनों में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया गया कि पहले की सभी राजनीतिक नियुक्तियां, चाहे उनकी अवधि या शर्त कुछ भी रही हो, स्वतः समाप्त मानी जाएं। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, एविएशन, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थानों समेत कई अहम क्षेत्रों पर पड़ा है।

    सबसे बड़ा झटका देश के विश्वविद्यालयों को लगा है, जहां उपकुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी हटाए गए हैं। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिकल कॉलेजों, काउंसिल्स और रिसर्च संस्थानों के प्रमुख पदाधिकारी भी पदमुक्त कर दिए गए हैं। नेपाल मेडिकल काउंसिल, नेपाल पर्यटन बोर्ड और नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण जैसे बड़े संस्थान भी इस फैसले की जद में आए हैं।

    यह कार्रवाई केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं रही, बल्कि शांति प्रक्रिया से जुड़े आयोगों तक पहुंच गई। माओवादी संघर्ष के बाद गठित सत्य निरूपण और बेपत्ता व्यक्तियों की जांच से जुड़े निकायों के पदाधिकारी भी हटा दिए गए हैं, जिससे इस फैसले की व्यापकता और भी साफ हो जाती है।

    सरकार का दावा है कि इससे राजनीतिक दखल कम होगा और संस्थानों की कार्यप्रणाली अधिक पेशेवर बनेगी। हालांकि विपक्ष इसे सत्ता का केंद्रीकरण और संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश बता रहा है। ऐसे में यह फैसला नेपाल की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बनने की पूरी संभावना है।

  • कैलाश यात्रा पर भारत-चीन साथ, लिपुलेख फिर बना विवाद का केंद्र; नेपाल में सियासी हलचल तेज

    कैलाश यात्रा पर भारत-चीन साथ, लिपुलेख फिर बना विवाद का केंद्र; नेपाल में सियासी हलचल तेज


    नई दिल्ली। कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत सरकार के ऐलान के बाद जहां श्रद्धालुओं में उत्साह है, वहीं इस फैसले ने एक बार फिर भारत-नेपाल संबंधों में खटास की आशंका बढ़ा दी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह यात्रा जून से अगस्त 2026 के बीच आयोजित की जाएगी और इसमें दो प्रमुख मार्ग उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से होकर Lipulekh Pass और सिक्किम के Nathu La का इस्तेमाल होगा।

    भारत और चीन के सहयोग से इस यात्रा का संचालन होना कूटनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है, लेकिन नेपाल के लिए यह मुद्दा संवेदनशील है। दरअसल, लिपुलेख दर्रा भारत, चीन (तिब्बत) और नेपाल के त्रिकोणीय जंक्शन पर स्थित है, जिस पर नेपाल अपना दावा करता है। ऐसे में इस मार्ग से यात्रा और व्यापार गतिविधियों को लेकर काठमांडू में असंतोष बढ़ सकता है।

    मामला सिर्फ धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं है। खबर है कि भारत और चीन इस मार्ग से व्यापार गतिविधियां भी फिर शुरू करने की तैयारी में हैं। यदि ऐसा होता है, तो नेपाल इसे अपनी संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा मान सकता है। नेपाल के कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों ने अपनी सरकार से इस पर सख्त रुख अपनाने की मांग की है।

    नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि नई सरकार के सामने यह एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा बनकर उभरा है। Balen Shah जैसे नेताओं पर दबाव बढ़ सकता है कि वे इस मुद्दे पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाएं। इससे पहले भी नेपाल की सरकारें इस मामले को लेकर भारत के साथ टकराव की स्थिति में आ चुकी हैं।

    लिपुलेख विवाद की जड़ 1816 की Treaty of Sugauli में मानी जाती है। इस संधि के तहत काली नदी को भारत-नेपाल सीमा तय किया गया था। नेपाल का दावा है कि काली नदी का स्रोत लिम्पियाधुरा से निकलता है, जिससे कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र उसके हिस्से में आते हैं। वहीं भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत कालापानी क्षेत्र के पास है, जिससे यह इलाका भारत के उत्तराखंड राज्य में आता है।

    बीते वर्षों में यह विवाद कई बार तूल पकड़ चुका है। नेपाल ने अपने नए नक्शे और करेंसी नोट में भी कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को अपना हिस्सा दिखाया था, जिस पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी।

    अब कैलाश मानसरोवर यात्रा और संभावित व्यापार गतिविधियों के साथ यह विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर संवाद नहीं बढ़ा, तो यह तनाव क्षेत्रीय कूटनीति को प्रभावित कर सकता है।

    धार्मिक आस्था से जुड़ी कैलाश मानसरोवर यात्रा इस बार सिर्फ श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन की भी परीक्षा बन गई है।

    अब नजर इस बात पर है कि क्या भारत, चीन और नेपाल इस संवेदनशील मुद्दे को बातचीत से सुलझा पाते हैं, या लिपुलेख फिर एक बड़े विवाद का कारण बनेगा।

  • नेपाल में बदलाव की बयार बालेन शाह का नया राजनीतिक अध्याय और हिंदुत्व बहस की नई दिशा

    नेपाल में बदलाव की बयार बालेन शाह का नया राजनीतिक अध्याय और हिंदुत्व बहस की नई दिशा


    नई दिल्ली
    : नेपाल की राजनीति इन दिनों एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है हाल ही में हुए आम चुनावों ने देश के सत्ता समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है अब 35 वर्ष के युवा नेता बालेंद्र शाह देश के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं उनकी शपथ को लेकर खास चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि वे 27 मार्च को राम नवमी के दिन पद की शपथ लेंगे यह तारीख केवल एक औपचारिक निर्णय नहीं मानी जा रही बल्कि इसे गहरे राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है

    बालेंद्र शाह जिन्हें लोग बालेन के नाम से भी जानते हैं पहले एक रैपर के रूप में लोकप्रिय हुए थे उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से भ्रष्टाचार और सिस्टम की खामियों पर खुलकर सवाल उठाए थे इसके बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव जीतकर अपनी अलग पहचान बनाई अब वही युवा नेता प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं और यह नेपाल की राजनीति में एक नया अध्याय माना जा रहा है

    उनका राजनीतिक सफर केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं है बल्कि यह एक बड़े बदलाव का संकेत भी देता है वे मधेशी समुदाय से आते हैं और इस समुदाय से प्रधानमंत्री बनने वाले पहले नेता हैं यह उपलब्धि नेपाल की सामाजिक संरचना में समावेशिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने हालिया चुनावों में भारी बहुमत हासिल किया है और 275 सदस्यीय संसद में 182 सीटें जीतकर स्पष्ट जनादेश प्राप्त किया है

    विशेषज्ञों का मानना है कि राम नवमी के दिन शपथ लेने का निर्णय एक रणनीतिक संदेश है यह जनता की आस्था से जुड़ने का प्रयास माना जा रहा है और इसे राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण समझा जा रहा है कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम यह दर्शाता है कि नया नेतृत्व धार्मिक भावनाओं को स्वीकार करता है लेकिन वह पारंपरिक राजनीति से अलग दिशा में आगे बढ़ना चाहता है

    यह भी माना जा रहा है कि बालेंद्र शाह का यह निर्णय नेपाल की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाने का प्रयास है नेपाल हमेशा से अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने का पक्षधर रहा है ऐसे में राम नवमी जैसे पवित्र दिन पर शपथ लेना उस परंपरा को आगे बढ़ाने जैसा है

    दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि इसे भारत के संदर्भ में सीधे तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए नेपाल की अपनी राजनीतिक और धार्मिक पहचान है और वहां की राजनीति अपनी परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती है बालेन शाह की सोच पुराने राजशाही मॉडल से अलग है जहां राजा को भगवान का अवतार माना जाता था इसके विपरीत वे आधुनिक और लोकतांत्रिक सोच के समर्थक माने जाते हैं

    उनके समर्थक मुख्य रूप से युवा वर्ग से हैं जो परिवर्तन की मांग कर रहे थे यह युवा नेतृत्व नेपाल की राजनीति में नई ऊर्जा और नई सोच लेकर आया है अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री के रूप में बालेंद्र शाह किस तरह देश की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हैं

  • Nepal: बालेन शाह ने किया बड़ा उलटफेर….., चार बार PM रह चुके केपी ओली को हराया

    Nepal: बालेन शाह ने किया बड़ा उलटफेर….., चार बार PM रह चुके केपी ओली को हराया


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) के झापा-5 निर्वाचन क्षेत्र (Jhapa-5 Constituency) में आरएसपी नेता और रैपर से नेता बने बालेन शाह (Balen Shah) ने चार बार प्रधानमंत्री (Prime Minister) रह चुके के.पी. शर्मा ओली (K.P. Sharma Oli) को लगभग 50,000 मतों के भारी अंतर से हराया। निर्वाचन आयोग ने यहां यह जानकारी दी। राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी (आरएसपी) के नेता और काठमांडू के पूर्व महापौर, जिन्हें लोकप्रिय रूप से केवल बालेन के नाम से जाना जाता है, अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

    निर्वाचन आयोग (ईसी) ने बताया कि 35 वर्षीय बालेन को 68,348 मत मिले, जबकि 74 वर्षीय ओली को 18,734 मत मिले। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) – (सीपीएन-यूएमएल) ने ओली को पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था। नेपाल में पिछले साल हुए हिंसक ‘जेन जेड’ विरोध प्रदर्शनों के बाद बृहस्पतिवार को पहला आम चुनाव हुआ, जिसमें हिमालयी देश में राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की मांग की गई थी।

    बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी (आरएसपी) बड़ा बहुमत हासिल कर नेपाल की सत्ता पर काबिज़ होने जा रही है। शाह ने झापा-5 सीट पर ओली को चुनौती दी और अपने फैसले को सही साबित कर दिखाया। इस सीट पर कुल 1,06,372 वोट डाले गए। पूरे देश में आरएसपी के पक्ष में चल रही तेज लहर के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री दहल 10,240 मतों के साथ रुकुम पूर्व-1 सीट जीतने में सफल रहे हैं।

    नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, आरएसपी ने 60 से अधिक सीटों पर जीत हासिल कर ली है। दूसरी ओर, नेपाली कांग्रेस ने जहां सिर्फ नौ पर जीत हासिल की है। ओली की पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) 3, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी 2 सीटें जीत चुकी हैं। इन आंकड़ों के आने के बाद शाह का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है।

    जेनरेशन-जेड के आंदोलन से पहले नेपाल की सत्ता पर काबिज़ रही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को मौजूदा आम चुनाव में करारी शिकस्त मिली है। पार्टी के उपाध्यक्ष बिष्णु पौडेल, गोकर्ण बिस्टा, महासचिव शंकर पोखरेल, सचिव महेश बसनेत, भानुभक्त ढकाल और राजन भट्टराई को हार का सामना करना पड़ा है। नेपाल की संसद (प्रतिनिधि सभा) की कुल 275 सीटों के लिए पांच मार्च को मतदान संपन्न हुआ था। इनमें से 165 सीटों पर प्रत्यक्ष मतदान के जरिए और शेष 110 सीटों पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से चुनाव कराए गए। निर्वाचन आयोग के अनुसार, इस बार लगभग 60 प्रतिशत मतदान हुआ है।

    उल्लेखनीय है कि सितंबर 2025 में हुए व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी छात्र आंदोलनों के बाद ओली सरकार गिर गई थी और संसद भंग कर दी गई थी। इसके बाद गठित अंतरिम सरकार की देखरेख में ये चुनाव संपन्न हुए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल के युवा मतदाताओं ने पारंपरिक नेतृत्व को नकारते हुए एक नए और आधुनिक राजनीतिक दृष्टिकोण को चुना है। शाह अगर सत्ता संभालते हैं तो न केवल नेपाल की आंतरिक राजनीति बल्कि भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों के लिए भी एक नए युग की शुरुआत हो सकती है।

  • नेपाल चुनाव में बालेन शाह की RSP ने मारी बाजी: केपी ओली अपने ही गढ़ में 43,000 वोटों से हार गए

    नेपाल चुनाव में बालेन शाह की RSP ने मारी बाजी: केपी ओली अपने ही गढ़ में 43,000 वोटों से हार गए


    नई दिल्ली। नेपाल में आम चुनाव का परिणाम राजनीतिक इतिहास में एक नया मोड़ लेकर आया है। रैपर और काठमांडू के मेयर रह चुके बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) इस बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। शुरुआती रुझानों के अनुसार RSP ने अब तक 58 सीटें जीत ली हैं और 63 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। यह पार्टी सिर्फ चार साल पहले पत्रकार रहे रबि लामिछाने के प्रयासों से बनाई गई थी और अब यह युवा नेतृत्व नेपाल की राजनीति में अपनी मजबूती दिखा रहा है।

    पूर्व प्रधानमंत्री और भारत विरोधी रवैये के लिए जाने जाने वाले केपी शर्मा ओली को झापा-5 सीट पर बालेन शाह के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा। यहां ओली को केवल 16,350 वोट मिले, जबकि बालेन शाह को 59,568 वोट मिले, यानी 43,000 से अधिक मतों की भारी अंतर से वे पिछड़ गए। इससे यह स्पष्ट हो गया कि ओली का अपना गढ़ भी अब उन्हें समर्थन नहीं दे रहा। ओली ने 2017 और 2022 में इसी सीट से जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार युवा नेतृत्व और जनता की बदलती पसंद ने उनकी चुनौती को बढ़ा दिया।

    नेपाल की चुनाव प्रणाली मिश्रित मॉडल पर आधारित है। संसद की कुल 275 सीटों में से 165 सीटों पर सीधे चुनाव होते हैं, जहां निर्वाचन क्षेत्र के वोटरों का पसंदीदा उम्मीदवार जीतता है। बाकी 110 सीटें पार्टियों को कुल वोट प्रतिशत के आधार पर दी जाती हैं। इस प्रणाली का उद्देश्य छोटे दलों और विभिन्न सामाजिक समूहों को भी संसद में प्रतिनिधित्व देना है। इस बार भी Balen Shah की RSP ने 54.8 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं, जो उसे संसद में मजबूत स्थिति प्रदान करता है।

    पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद नेपाल में 5 मार्च को हुए चुनाव में लगभग 58% मतदाताओं ने हिस्सा लिया। चुनाव आयोग के अनुसार वोटों की गिनती पूरी करने में 3-4 दिन लग सकते हैं और 9 मार्च तक परिणाम आने की संभावना है।

    इस चुनाव के नतीजे नेपाल की राजनीति में युवा नेतृत्व के उदय और पुराने नेताओं के प्रभाव में गिरावट को दर्शाते हैं। बालेन शाह की RSP ने युवा और अलग सोच रखने वाले मतदाताओं का समर्थन हासिल किया, वहीं केपी ओली जैसी स्थापित पार्टी और नेता अब नए राजनीतिक परिदृश्य में चुनौती का सामना कर रहे हैं। इससे नेपाल की संसद में बदलाव की उम्मीद और नए गठबंधनों की संभावनाएं भी सामने आ रही हैं।

    कुल मिलाकर, नेपाल के इस चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि जनता अब युवा और नए दृष्टिकोण वाले नेताओं को प्राथमिकता दे रही है, और पारंपरिक, पुराने नेताओं को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों की आवश्यकता है।

  • नेपाल में बड़े राजनीतिक उलटफेर की आहट, चुनाव नतीजों से पहले सबकी धड़कनें तेज, PM की रेस में बालेन शाह….

    नेपाल में बड़े राजनीतिक उलटफेर की आहट, चुनाव नतीजों से पहले सबकी धड़कनें तेज, PM की रेस में बालेन शाह….


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) चुनाव के नतीजे (Election Results) आने से पहले सबकी धड़कनें तेज हैं. जारी मतगणना से साफ है कि वहां राजनीति में बड़ा उलटफेर (Big Political Ppheaval) दहलीज पर है. 5 मार्च को हुए चुनाव में काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन्द्र (बालेन) शाह (Balendra (Balen) Shah) की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) भारी बढ़त के साथ आगे चल रही है. वहीं पारंपरिक दलों को करारी हार का सामना करना पड़ रहा है।

    ताजा रुझानों के मुताबिक, 275 सदस्यीय संसद के लिए हुए चुनाव में प्रत्यक्ष चुनाव की 165 सीटों में से शुक्रवार देर रात तक RSP 117 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. इससे बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है. जहां RSP प्रचंड बहुमत की ओर आगे बढ़ रही है, वहीं नेपाल के पारंपरिक दल जैसे- नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल को जनता ने पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिया है.

    117 सीटों पर RSP आगे है तो दूसरे नंबर पर नेपाली कांग्रेस सिर्फ 15 सीटों पर और के पी ओली के नेतृत्व में रहे यूएमएल सिर्फ 13 सीटों पर जीत के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वहीं, पुष्प कमल दहाल प्रचंड के नेतृत्व वाली पार्टी की हालत इनसे भी बदतर हैं।


    बालेन शाह को Gen-Z का सपोर्ट, ओली बुरी तरह हार रहे

    विश्लेषकों का कहना है कि युवाओं और “Gen-Z” मतदाताओं का भारी समर्थन बालेन शाह की जीत का सबसे बड़ा कारण बना है, जिसने दशकों से सत्ता में रहे पारंपरिक दलों की पकड़ को कमजोर कर दिया है।

    पूर्व प्रधानमंत्री के पी ओली अपने निर्वाचन क्षेत्र से बुरी तरह से पिछड़ गए हैं. झापा जिले के जिस संसदीय क्षेत्र से एक बार छोड़कर वो लगातार सात बार चुनाव जीतते आए थे आज उसी निर्वाचन क्षेत्र से बालेन शाह उनको पटखनी देने वाले हैं। देर रात तक चल रहे मतगणना में जहां बालेन को करीब 17 हजार वोट मिल चुके थे, वहीं ओली को सिर्फ 4 हजार वोट ही मिल पाए. यानी ओली अभी बालेन से 13 हजार वोट से पीछे चल रहे हैं।

    सिर्फ ओली ही नहीं उनकी पार्टी के एक भी पदाधिकारी या उनकी सरकार के एक भी मंत्री मतगणना में आगे नहीं है. पार्टी के सभी दिग्गज चुनाव में हार की कगार पर हैं. उधर नेपाली कांग्रेस का भी कुछ यही हाल है. इस पार्टी के अध्यक्ष गगन थापा भी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी से पीछे चल रहे हैं जबकि पार्टी के कई दिग्गज चुनाव हार चुके हैं।


    उलटफेर के तीन बड़े कारण

    – भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से जनता की नाराजगी
    – युवा मतदाताओं का ओली सहित पुराने नेताओं से नफरत
    – बालेन शाह का नई राजनीति का वादा करना

    नेपाल में कुल 1 करोड़ 89 लाख मतदाता हैं. कुल 275 सीटों के लिए मतदान हुआ. First Past The Post (FPTP) या प्रत्यक्ष मतदान की 165 सीटों में ही RSP को दो तिहाई का बहुमत मिलता दिख रहा है. वहीं, Proportional Representation (PR) या समानुपातिक सिस्टम की 110 सीटों के लिए गिनती जारी है जिसका परिणाम आखिर में बताया जाएगा. प्रत्यक्ष में RSP के पक्ष में सुनामी को देखते हुए इस पार्टी को समानुपातिक में भी 50 से ज्यादा सीट मिलने की उम्मीद है. यानि नेपाल के इतिहास में 36 सालों के बाद किसी एक पार्टी को न सिर्फ पूर्ण बहुमत बल्कि प्रचंड बहुमत मिलेगा. लोगों को राजनीतिक स्थायित्व की उम्मीद है और इस सरकार से अपेक्षा भी बहुत है।