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  • ‘हिंदू कार्ड’ या सियासी पाखंड? बांग्लादेश में चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता पर सवाल

    ‘हिंदू कार्ड’ या सियासी पाखंड? बांग्लादेश में चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता पर सवाल


    नई दिल्‍ली । बांग्लादेश की राजनीति इन दिनों एक गंभीर विरोधाभास से गुजर रही है। एक तरफ देश में हिंदू समुदाय पर हमलों, हिंसा और कथित नरसंहार की खबरें सामने आ रही हैं, तो दूसरी ओर कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी खुद को “समावेशी” और “धर्मनिरपेक्ष” दिखाने की कोशिश कर रही है। इस कोशिश का ताजा उदाहरण खुलना-1 संसदीय सीट से हिंदू प्रकोष्ठ के नेता कृष्ण नंदी को उम्मीदवार बनाए जाने के रूप में सामने आया है। हालांकि, कई रिपोर्ट्स और खुद पार्टी के संविधान की धाराएं इस कदम को महज एक सियासी दिखावा और ‘हिंदू कार्ड’ करार दे रही हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी का यह कदम वास्तविक समावेशिता से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अल्पसंख्यकों को गुमराह करने की रणनीति है। पार्टी के संविधान में निहित प्रावधान यह साफ करते हैं कि कोई भी हिंदू या गैर-मुस्लिम कभी भी जमात-ए-इस्लामी का पूर्ण सदस्य नहीं बन सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसी समुदाय को संगठन के भीतर बराबरी का अधिकार ही नहीं दिया जा सकता, तो उसे चुनावी उम्मीदवार बनाना कितना ईमानदार कदम कहा जा सकता है।

    संविधान की सख्त शर्तें, गैर-मुस्लिमों को बराबरी नहीं

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी के संविधान की धारा 11 स्पष्ट रूप से कहती है कि कोई भी गैर-मुस्लिम केवल “एसोसिएट सदस्य” ही बन सकता है। इसका मतलब यह है कि हिंदू या अन्य गैर-मुस्लिम नेताओं को पार्टी की कोर कमिटी, नीति-निर्माण या अहम फैसलों में कोई भूमिका नहीं मिलेगी। पूर्ण सदस्यता केवल मुसलमानों के लिए आरक्षित है। ऐसे में कृष्ण नंदी जैसे नेताओं को उम्मीदवार बनाना प्रतीकात्मक कदम से ज्यादा कुछ नहीं लगता।

    यही नहीं, पार्टी के संविधान की धारा 7 और 9 में पूर्ण सदस्य बनने के लिए जिन शर्तों का उल्लेख है, वे किसी भी स्वाभिमानी हिंदू या गैर-मुस्लिम के लिए स्वीकार्य नहीं मानी जा सकतीं। इन धाराओं के तहत पार्टी सदस्य को अल्लाह, पैगंबर मोहम्मद और कुरान को एकमात्र आदर्श मानना अनिवार्य है। साथ ही, सदस्य को शरिया कानून के अनुसार जीवन जीने और इस्लामी कर्तव्यों का पालन करने की शपथ लेनी होती है। इसके अलावा, “इस्लाम से भटके हुए लोगों” से दूरी बनाए रखने की शर्त भी संविधान में दर्ज है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी ने वर्ष 2008 में अपने संविधान में कुछ सीमित बदलाव किए थे, लेकिन ये बदलाव भी कथित तौर पर चुनाव आयोग और जनप्रतिनिधित्व आदेश के नियमों से बचने के लिए किए गए थे, ताकि पार्टी का पंजीकरण रद्द न हो। मूल विचारधारा और कट्टर इस्लामी सोच में कोई ठोस बदलाव नहीं किया गया। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि बिना बुनियादी सुधार के समावेशिता की बात करना महज राजनीतिक अवसरवाद है।

    चुनाव का माहौल और बदली हुई सियासी तस्वीर

    बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद यह देश का पहला आम चुनाव है। अब तक बांग्लादेश की राजनीति मुख्य रूप से अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे वह चुनाव नहीं लड़ पा रही है।

    इस राजनीतिक खालीपन का फायदा उठाकर जमात-ए-इस्लामी खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि हिंदू उम्मीदवार उतारना इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पार्टी पर लगने वाले कट्टरपंथी और अल्पसंख्यक विरोधी छवि के आरोपों को कमजोर किया जा सके।

    महिलाओं को लेकर भी कट्टर रुख

    जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता की पोल महिलाओं के मुद्दे पर भी खुलती है। पार्टी ने इस चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा है। पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान का साफ कहना है कि जमात-ए-इस्लामी की कभी कोई महिला प्रमुख नहीं बन सकती। उनके अनुसार, “अल्लाह ने पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग बनाया है” और महिलाएं पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं।

    शफीकुर रहमान का एक और बयान काफी विवादित रहा, जिसमें उन्होंने कामकाजी महिलाओं की तुलना वेश्यावृत्ति से कर दी। इस बयान के बाद ढाका समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए और जमात-ए-इस्लामी की सोच पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। उल्‍लेखनीय है कि बांग्लादेश में जहां एक ओर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं, वहीं जमात-ए-इस्लामी का ‘हिंदू उम्मीदवार’ उतारना वास्तविक बदलाव से ज्यादा राजनीतिक दिखावा प्रतीत होता है। पार्टी का संविधान, उसकी विचारधारा और नेताओं के बयान यह संकेत देते हैं कि बिना ठोस वैचारिक और संरचनात्मक सुधार के यह समावेशिता केवल एक चुनावी रणनीति है, जिसका उद्देश्य सत्ता की दौड़ में अपनी छवि को चमकाना भर है।

  • बांग्लादेश की लोकतंत्र की जननी खालिदा जिया का निधन, तारिक रहमान बोले ‘अल्लाह की पुकार’

    बांग्लादेश की लोकतंत्र की जननी खालिदा जिया का निधन, तारिक रहमान बोले ‘अल्लाह की पुकार’


    नई दिल्ली। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी (Bangladesh Nationalist Party) प्रमुख बेगम खालिदा जिया का मंगलवार, 30 दिसंबर 2025 को 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर ने देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोक की लहर दौड़ा दी। बेटे तारिक रहमान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा, मेरी मां और BNP की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया अल्लाह की पुकार सुनकर आज हमें छोड़कर चली गईं।

    तारिक ने अपने पोस्ट में कहा कि उनकी मां केवल राजनीतिक नेता नहीं थीं, बल्कि लोकतंत्र की जननी और बांग्लादेश की मां के रूप में जानी जाती थीं।

    उन्होंने जीवनभर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए संघर्ष किया और तानाशाही व राजनीतिक उत्पीड़न के खिलाफ मजबूती से खड़ी रहीं। इसके अलावा, तारिक ने खालिदा जिया के मातृत्व और करुणा की भी तारीफ की, बताया कि राजनीतिक संघर्षों के बीच उन्होंने हमेशा अपने परिवार को संभाला और कठिन परिस्थितियों में भी साहस नहीं खोया।

    गिरफ्तारी, बीमारी और संघर्ष भरा जीवन
    खालिदा जिया का जीवन संघर्षों और चुनौतियों से भरा रहा।

    उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया, इलाज से वंचित रखा गया और लगातार राजनीतिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। बावजूद इसके उनका व्यक्तित्व शांत, अडिग और मजबूत रहा। निजी जीवन में उन्हें अपने पति और बच्चों को खोने का दर्द भी सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने देश की सेवा को अपना सर्वोच्च उद्देश्य बनाया और जनता को अपने परिवार की तरह अपनाया।

    लोकतांत्रिक विरासत और योगदान
    खालिदा जिया ने तीन बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की और महिलाओं की भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल की।

    उनके नेतृत्व में BNP ने बांग्लादेश में राष्ट्रीयता, लोकतंत्र और विकास के मुद्दों को मजबूती से उठाया। उनके राजनीतिक जीवन और संघर्षों की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

    पारिवारिक जीवन और BNP में योगदान
    खालिदा जिया के पति, जियाउर रहमान, बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति थे, जिनकी हत्या 1981 में हुई। इस व्यक्तिगत और राजनीतिक सदमे के बावजूद, खालिदा जिया ने पार्टी और देश की सेवा जारी रखी। उनके बेटे तारिक रहमान भी BNP में सक्रिय भूमिका निभाते रहे और उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। BNP, बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी, 1978 में जियाउर रहमान द्वारा स्थापित की गई थी और यह राष्ट्रीयता, लोकतंत्र और विकास के मुद्दों पर सक्रिय रही है।

    देश और दुनिया के प्रति आभार
    तारिक रहमान ने परिवार की ओर से देश और दुनिया भर से मिले प्रेम, सम्मान और संवेदनाओं के लिए आभार जताया। खालिदा जिया का निधन बांग्लादेश की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उनका जीवन, संघर्ष और लोकतांत्रिक सिद्धांत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।

    खालिदा जिया का जीवन केवल बीएनपी या बांग्लादेश तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में लोकतंत्र और महिलाओं की राजनीति में उनकी पहचान अमिट रही। उनकी मातृत्व, नेतृत्व क्षमता और लोकतंत्र के प्रति समर्पण उन्हें हमेशा यादगार बनाए रखेंगे।