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  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू को झटका, 53 सीटों पर सिमटा गठबंधन, बहुमत के लिए 8 सीटें कम

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू को झटका, 53 सीटों पर सिमटा गठबंधन, बहुमत के लिए 8 सीटें कम


    नई दिल्ली। इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन सबसे आगे रहने के बावजूद बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर सका है। सभी वोटों की गिनती के बाद नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन के खाते में 48 और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिली हैं। 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। ऐसे में किसी भी गठबंधन के बहुमत तक नहीं पहुंचने से नई सरकार के गठन को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।

    लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, फिर भी सरकार बनाना चुनौती
    चुनाव में प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हालांकि, गठबंधन के पास बहुमत से आठ सीटें कम हैं। इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति ने विशेष मतपत्रों की गिनती भी पूरी कर ली है। इन्हें डबल-एनवेलप वोट कहा जाता है। इसमें सैनिकों, कैदियों, विदेशों में तैनात राजनयिकों और अस्पतालों में भर्ती उन मतदाताओं के वोट शामिल होते हैं, जो अपने निर्धारित मतदान केंद्रों पर वोट नहीं डाल सके थे।

    अन्य दलों में गादी आइजनकोट की याशार पार्टी को 21 सीटें मिली हैं। बी’याचाद ने 12 और जॉइंट लिस्ट ने 11 सीटें हासिल की हैं। डेमोक्रेट्स और राअम को आठ-आठ सीटें मिली हैं। यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म, इजरायल बेइतेनु और ओत्जमा येहुदित के खाते में सात-सात सीटें आई हैं। वहीं, शास और रिलिजियस जियोनिज्म ने छह-छह सीटें जीती हैं।

    केंद्रीय चुनाव समिति के मुताबिक, विशेष मतपत्रों की गिनती पूरी हो चुकी है, लेकिन अंतिम आधिकारिक नतीजे बाद में जारी किए जाएंगे। मतगणना के बाद भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों की सीटों के वितरण में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

    चुनाव में विदेशी दखल और वोट खरीदने के आरोप
    चुनाव नतीजों के बाद इजरायल में विदेशी हस्तक्षेप और अरब मतदाताओं की भागीदारी को लेकर विवाद शुरू हो गया है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने आरोप लगाया है कि अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को कथित वोट खरीदने और अवैध तरीके से मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करने का फायदा मिला। पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया को ‘चोरी’ तक करार दिया है।

    इजरायल की घरेलू सुरक्षा एजेंसी शिन बेट उन आशंकाओं की जांच कर रही है, जिनमें कतर और तुर्की से कथित तौर पर जुड़े विदेशी फंड के जरिए अरब मतदाताओं की भागीदारी को प्रभावित करने की बात कही गई है। वहीं, इजरायल पुलिस की लाहव 433 यूनिट चुनाव में कथित रिश्वतखोरी के मामलों की अलग से जांच कर रही है।

    आरोप साबित नहीं, कतर ने भी किया इनकार
    विदेशी हस्तक्षेप और चुनावी गड़बड़ी से जुड़े आरोपों की अभी पुष्टि नहीं हुई है। केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष नोआम सोलबर्ग ने शिन बेट से संभावित विदेशी हस्तक्षेप की जांच करने को कहा है। हालांकि, चुनाव समिति के कार्यवाहक महानिदेशक ने कहा है कि चुनाव की निष्पक्षता को व्यवस्थित तरीके से प्रभावित किए जाने के आरोपों का कोई आधार नहीं है। कतर ने भी इजरायली चुनाव में किसी तरह के हस्तक्षेप से इनकार किया है।

    इस विवाद के बीच अरब पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इन दलों ने कुल 19 सीटें हासिल की हैं और सरकार गठन की प्रक्रिया में उनका समर्थन निर्णायक साबित हो सकता है। हालांकि, अरब पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने का विकल्प कई यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियों के लिए राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। विपक्षी नेताओं ने भी चेतावनी दी है कि बिना पुष्टि वाले आरोपों के आधार पर चुनाव नतीजों या अरब मतदाताओं की भागीदारी पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।

    अब कैसे बनेगी इजरायल में सरकार?
    चुनाव के बाद नेतन्याहू के गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत के लिए जरूरी आठ सीटें जुटाने की है। विपक्षी गठबंधन के पास भी केवल 48 सीटें हैं। ऐसे में उसे सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों के समर्थन या सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

    अंतिम नतीजों को आधिकारिक रूप से प्रमाणित किए जाने के बाद इजरायल के राष्ट्रपति सरकार गठन की प्रक्रिया की निगरानी करेंगे। इस दौरान किसी सांसद को गठबंधन तैयार कर सरकार बनाने का प्रयास करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। यदि कोई भी पक्ष 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल नहीं होता है, तो देश में एक बार फिर चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।

  • इजरायल चुनाव के रुझानों में फंसा बहुमत का पेंच, नेतन्याहू गठबंधन को सरकार के लिए 2 सीटों की जरूरत

    इजरायल चुनाव के रुझानों में फंसा बहुमत का पेंच, नेतन्याहू गठबंधन को सरकार के लिए 2 सीटों की जरूरत


    नई दिल्ली। इजरायल के राष्ट्रीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर पकड़ को चुनौती मिलती दिख रही है। मंगलवार को मतदान खत्म होने के बाद आए एग्जिट पोल में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को मामूली बढ़त दिखाई गई है। हालांकि, दोनों खेमे बहुमत के जरूरी आंकड़े से दूर हैं। इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। ऐसे में छोटे दलों का समर्थन और गठबंधन की बातचीत अगली सरकार का फैसला कर सकती है।

    एग्जिट पोल में दोनों गठबंधन बहुमत से दूर
    इजरायल के चुनाव में नेतन्याहू के लिकुड गठबंधन और विपक्षी खेमे के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। विभिन्न टीवी चैनलों के एग्जिट पोल में नेतन्याहू के समर्थक गठबंधन को करीब 50 सीटें, जबकि आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 52 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया। अरब दलों को मिलाकर करीब 18 सीटें मिलने का अनुमान है।

    ये आंकड़े एग्जिट पोल के अनुमान हैं, आधिकारिक अंतिम नतीजे नहीं। मतगणना और विशेष श्रेणी के मतों की गिनती के बाद सीटों का वितरण बदल सकता है। फिलहाल किसी भी मुख्य गठबंधन के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं हैं।

    लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन सरकार बनाना आसान नहीं
    प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिखाई दे रही है। दूसरी ओर, गादी आइजनकोट की याशर पार्टी विपक्ष के प्रमुख दलों में शामिल है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी नेतन्याहू के सामने विपक्षी खेमे के प्रमुख चेहरों में हैं।

    हालांकि, इजरायल की संसदीय व्यवस्था में सबसे बड़ी पार्टी बनना अपने आप सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। किसी भी नेता को संसद में बहुमत का समर्थन जुटाना होगा। यदि छोटे दलों के साथ समझौता नहीं हो पाया, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।

    77.7 प्रतिशत मतदान, 25 साल में सबसे ज्यादा
    इजरायल के केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार, इस बार मतदान 77.7 प्रतिशत रहा। यह 1999 के बाद मतदान समाप्त होने के समय दर्ज सबसे ऊंचे आंकड़ों में से एक है और 2022 के चुनाव की तुलना में करीब सात प्रतिशत अंक अधिक है।

    7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान से जुड़े संघर्षों के बाद यह पहला राष्ट्रीय चुनाव था। इस वजह से देश की सुरक्षा, सैन्य रणनीति और नेतन्याहू के नेतृत्व को लेकर मतदाताओं की राय चुनाव के केंद्र में रही।

    अरब दलों के समर्थन पर नेतन्याहू का विरोध
    नेतन्याहू ने अरब दलों के समर्थन से सरकार बनाने की संभावना का विरोध किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने विपक्ष पर अरब पार्टियों के सहारे सरकार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया और इजरायल में एकजुट जायोनी बहुमत की वकालत की।

    दूसरी ओर, अरब दलों को मिलने वाली संभावित सीटें सरकार गठन में अहम भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, विपक्षी खेमे के लिए भी इन दलों का समर्थन हासिल करना आसान नहीं है। इस मुद्दे पर अलग-अलग दलों के रुख से गठबंधन बनाने की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।

    अंतिम नतीजों के बाद शुरू होगी सरकार बनाने की कवायद
    मतदान के बाद सामने आए एग्जिट पोल किसी स्पष्ट विजेता की तस्वीर पेश नहीं करते। अंतिम मतगणना के बाद भी यदि कोई गठबंधन 61 सीटों तक नहीं पहुंचता है, तो राजनीतिक दलों को समर्थन जुटाने और साझा सरकार बनाने के लिए बातचीत करनी होगी।

    इस चुनाव का नतीजा केवल सबसे बड़ी पार्टी तय करने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती संसद में बहुमत का समर्थन हासिल करना है। इसलिए नेतन्याहू और आइजनकोट, दोनों के लिए आने वाले दिन निर्णायक होंगे।

  • वॉशिंगटन में हाई लेवल बैठक इजरायल और अमेरिका ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में बढ़ाए कदम

    वॉशिंगटन में हाई लेवल बैठक इजरायल और अमेरिका ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में बढ़ाए कदम


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक और रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल तेज होती दिखाई दे रही है। वॉशिंगटन दौरे पर पहुंचे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर दोनों देशों के साझा सुरक्षा हितों और भविष्य की रक्षा रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान लगभग 16 अरब डॉलर के संभावित संयुक्त रक्षा फंड के गठन का प्रस्ताव भी प्रमुख विषय रहा। माना जा रहा है कि इस फंड का उपयोग अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों के अनुसंधान विकास और नई रक्षा तकनीकों को तैयार करने के लिए किया जाएगा जिससे दोनों देशों की सैन्य क्षमता और अधिक मजबूत हो सके।

    बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ भी अलग अलग मुलाकात की। इन बैठकों में पश्चिम एशिया की मौजूदा सुरक्षा स्थिति ईरान की गतिविधियों लेबनान से जुड़े हालात और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर विचार विमर्श किया गया। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और अधिक प्रभावी बनाने तथा साझा सुरक्षा चुनौतियों का मिलकर सामना करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने बैठक के बाद सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि इजरायल के साथ अमेरिका की रक्षा साझेदारी बेहद मजबूत है और दोनों देश साझा सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए लगातार साथ काम करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि उनकी टीम के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी बैठक में भाग लिया और भविष्य की रणनीतिक योजनाओं पर सकारात्मक चर्चा हुई।

    सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित 16 अरब डॉलर का संयुक्त रक्षा फंड नई पीढ़ी की रक्षा प्रणालियों मिसाइल तकनीक और उन्नत सैन्य अनुसंधान को गति देने के उद्देश्य से तैयार किया जा सकता है। यदि इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है तो यह अमेरिका और इजरायल के रक्षा सहयोग के इतिहास में सबसे बड़े संयुक्त निवेशों में शामिल होगा।

    बैठक के दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उससे जुड़े सुरक्षा जोखिमों पर भी गंभीर चर्चा हुई। बताया गया कि नेतन्याहू ने अमेरिकी पक्ष को कुछ खुफिया जानकारियों से अवगत कराया जिनका संबंध कथित तौर पर ईरान की भूमिगत परमाणु गतिविधियों से है। हालांकि इस विषय पर दोनों देशों के बीच रणनीतिक समन्वय बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

    व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार दोनों देशों के नेताओं के बीच अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाने और पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने के प्रयासों पर भी बातचीत हुई। अमेरिका क्षेत्र में कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना चाहता है जबकि इजरायल सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर सख्त रुख बनाए हुए है। इसके बावजूद दोनों देशों ने अपने संबंधों को और मजबूत करने तथा साझा चुनौतियों का मिलकर समाधान निकालने की इच्छा व्यक्त की।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती भू राजनीतिक परिस्थितियों में अमेरिका और इजरायल की संयुक्त रणनीति को भी नई दिशा दे सकती है। आने वाले समय में इस प्रस्तावित रक्षा फंड और सुरक्षा सहयोग से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं जो वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर भी असर डाल सकते हैं।

  • ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल

    ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल


    नई दिल्ली ।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ एक नई शांति संधि की कोशिशों के बीच मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा वैचारिक टकराव उभरकर सामने आया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत की सुगबुगाहटों के बीच इजरायल ने अपने रुख को बेहद आक्रामक बनाए रखा है। वाशिंगटन के लिए जहां यह युद्ध वैश्विक कूटनीति और हितों का एक हिस्सा मात्र हो सकता है, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वहां की एक बड़ी आबादी के लिए यह देश के वजूद और अस्तित्व को बचाए रखने की एक अनिवार्य लड़ाई बन चुकी है।

    यरुशलम की रणनीतिक सोच और वाशिंगटन के नजरिए में बुनियादी फर्क यह है कि अमेरिका इस सैन्य संघर्ष की शुरुआत को हालिया तारीखों से जोड़कर देखता है, जबकि इजराइली अवाम के लिए यह लड़ाई अक्टूबर दो हजार तेईस के उस काले दिन से शुरू हो चुकी है जब उनकी सीमाओं के भीतर घुसकर बर्बरता को अंजाम दिया गया था। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन जब भी शांति और समझौते की बात आगे बढ़ाता है, इजरायली रक्षा बल अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पड़ोसी मुल्कों में बने आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई और तेज कर देते हैं।

    बेंजामिन नेतन्याहू का पूरा राजनीतिक जीवन और उनकी दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी की विचारधारा इस बात पर टिकी है कि दुश्मनों के सामने रियायतें देना आत्मघाती साबित होता है। संयुक्त राष्ट्र में देश के सबसे युवा राजदूत के रूप में काम कर चुके नेतन्याहू के पास सुरक्षा मामलों का लंबा व्यावहारिक अनुभव है, जिसके दम पर वे कई बार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दबाव को भी खारिज कर चुके हैं। इजरायल में यह माना जाता है कि जब भी किसी कमजोर सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कदम पीछे खींचे हैं, देश को और बड़े संकटों का सामना करना पड़ा है।

    इजरायल की अंदरूनी राजनीति भले ही बेहद जटिल और मिली-जुली सरकारों के दौर से गुजरती रही हो, लेकिन बाहरी खतरों के समय वहां का समाज पूरी तरह एकजुट हो जाता है। वर्तमान में देश की साठ फीसदी से अधिक जनता राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर सरकार की इस सैन्य नीति के साथ मजबूती से खड़ी है कि ईरान समर्थित उग्रवादी संगठनों का पूरी तरह सफाया किया जाए। गाजा पट्टी से वर्ष दो हजार पांच में सेना हटाने के बाद जिस तरह वहां हमास का गढ़ तैयार हुआ, उसने इजरायली सुरक्षा तंत्र को यह सबक सिखाया है कि जमीन के बदले शांति की नीति हमेशा बेअसर रहती है।

    सैन्य मोर्चे पर इजरायल इस समय चारों तरफ से खतरनाक हथियारों से लैस गैर-राज्य अभिकर्ताओं से घिरा हुआ है। एक तरफ गाजा में सक्रिय नेटवर्क है, तो दूसरी तरफ लेबनान की सीमा पर आधुनिक मिसाइलों से लैस हिजबुल्लाह मौजूद है, जिसने उत्तरी इजरायल के नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर रखा है। इजरायली सेना की रणनीति अब बिल्कुल साफ है कि वे किसी भी मोर्चे पर कमजोरी नहीं दिखाएंगे और उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए लितानी नदी तक के पूरे क्षेत्र को हमेशा के लिए पूरी तरह खामोश कर देंगे ताकि भविष्य में रॉकेट हमलों का खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो सके।

    कूटनीतिक स्तर पर यरुशलम इस बात को भली-भांति समझता है कि महाशक्तियों की नीतियां उनके तात्कालिक राजनीतिक फायदों के हिसाब से बदलती रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए युद्ध को बीच में रोकना एक कूटनीतिक जीत हो सकती है, लेकिन इजरायल के लिए युद्ध को अधूरा छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। यदि यह जंग बिना किसी ठोस नतीजे के रुकती है, तो तेहरान से हथियारों की आपूर्ति दोबारा शुरू हो जाएगी और सीमावर्ती इलाकों से विस्थापित हुए लाखों इजरायली नागरिक कभी भी अपने घरों को सुरक्षित वापस नहीं लौट पाएंगे।

  • ट्रंप का बड़ा दावा: ईरान से डील लगभग तय, खुल सकता है होर्मुज़ स्ट्रेट; मिडिल ईस्ट में शांति की उम्मीद बढ़ी

    ट्रंप का बड़ा दावा: ईरान से डील लगभग तय, खुल सकता है होर्मुज़ स्ट्रेट; मिडिल ईस्ट में शांति की उम्मीद बढ़ी

    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित शांति समझौते को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच डील “काफी हद तक तय” हो चुकी है और जल्द ही इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि अमेरिका, ईरान और मध्य-पूर्व के कई सहयोगी देशों के बीच शांति को लेकर महत्वपूर्ण बातचीत हुई है। उन्होंने बताया कि इस प्रस्तावित समझौते में होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा पूरी तरह खोलने का मुद्दा भी शामिल है, जिससे वैश्विक तेल और गैस सप्लाई पर पड़ा दबाव कम हो सकता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि उनकी इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू  से फोन पर सकारात्मक बातचीत हुई है।
    हालांकि ट्रंप ने समझौते की पूरी डिटेल साझा नहीं की, लेकिन साफ कहा कि किसी भी डील के तहत ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से पूरी तरह रोका जाएगा। दूसरी ओर ईरान ने संकेत दिए हैं कि बातचीत में कुछ नरमी जरूर आई है, लेकिन अभी मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच 14 बिंदुओं वाले एक ढांचे पर चर्चा चल रही है, जिसे अगले 30 से 60 दिनों में अंतिम समझौते की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने अमेरिका पर विरोधाभासी बयान देने का आरोप भी लगाया।
    गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर बड़े हमलों के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ गया था, जिसके जवाब में ईरान ने इजराइल और अमेरिकी सहयोगी देशों को निशाना बनाया था। अप्रैल की शुरुआत में युद्धविराम के बाद से दोनों देशों के बीच बैकडोर बातचीत जारी है और अब ट्रंप के ताजा बयान ने संभावित डील और होर्मुज़ स्ट्रेट खुलने की अटकलों को और तेज कर दिया है।
  • ईरान पर फिर वार की आहट! इजरायल सतर्क, ट्रंप–नेतन्याहू रणनीति से मिडिल ईस्ट में बढ़ी हलचल

    ईरान पर फिर वार की आहट! इजरायल सतर्क, ट्रंप–नेतन्याहू रणनीति से मिडिल ईस्ट में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। Israel और Iran के बीच बढ़ती तल्खी ने क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इजरायल ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आवश्यकता पड़ने पर वह ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है।इजरायल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने कहा है कि उनके देश को ईरान के खिलाफ “फिर से सैन्य कार्रवाई” करनी पड़ सकती है। उनका तर्क है कि यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि ईरान भविष्य में इजरायल, अमेरिका और सहयोगी देशों के लिए खतरा न बन सके।
    काट्ज ने यह भी संकेत दिया कि इस रणनीति पर Donald Trump और Benjamin Netanyahu के साथ समन्वय में काम हो रहा है। इससे साफ है कि यह केवल एक देश की रणनीति नहीं, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग का हिस्सा हो सकता है।
    इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान को “बहुत जल्द समझदार” बनना होगा और गैर-परमाणु समझौते की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका अब इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने के मूड में है।

    लेबनान सीमा पर बढ़ा तनाव
    दूसरी ओर, दक्षिण लेबनान में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। Israel Defense Forces ने स्पष्ट किया है कि Hezbollah के साथ जमीनी स्तर पर कोई युद्धविराम नहीं है।आईडीएफ प्रमुख Eyal Zamir ने सैनिकों को निर्देश दिए हैं कि वे ऑपरेशन जारी रखें और उत्तरी इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि जब तक खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक सुरक्षा बफर जोन नहीं हटाया जाएगा।

    हालांकि, अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन सीमा पर झड़पें, ड्रोन हमले और सैन्य गतिविधियां लगातार जारी हैं। इजरायली सेना ने हाल ही में हिज्बुल्लाह के एक रॉकेट लॉन्चर को नष्ट करने और दो ड्रोन मार गिराने का दावा किया है।

    लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियां और सख्त बयानबाजी इस बात का संकेत दे रही हैं कि मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ सकते हैं।अब सबसे बड़ा सवाल यही हैक्या इजरायल ईरान पर फिर हमला करेगा?और यदि ऐसा होता है, तो क्या यह टकराव एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकता है?

  • नेतन्याहू को लेकर अटकलें तेज, डोनाल्ड ट्रंप की पहल के बाद सामने आया नया वीडियो

    नेतन्याहू को लेकर अटकलें तेज, डोनाल्ड ट्रंप की पहल के बाद सामने आया नया वीडियो


    नई दिल्ली।
     मौत की अटकलों के बीच इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का एक और वीडियो सामने आया है। इस बार नेतन्याहू ने अपने जीवित होने का सबूत पेश करते हुए दिलचस्प वीडियो शेयर किया। मंगलवार को पोस्ट किए गए इस वीडियो में वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूत के साथ नजर आ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक अमेरिकी दूत को यह सुनिश्चित करने के लिए ही भेजा गया था कि नेतन्याहू जिंदा हैं। इजरायली प्रधानमंत्री ने खुद इसकी जानकारी दी।

    इस वीडियो में नेतन्याहू और अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी साथ साथ नजर आ रहे हैं। सबसे पहले नेतन्याहू मुस्कुराते हुए कहते हैं, “मैं जिंदा हूं।” और फिर मौत की अटकलों पर तंज कसते हुए कहते हैं, “हम हर हाथ की पांच उंगलियों से हाथ मिलाते हैं।” इससे वह उन खबरों पर प्रतिक्रिया दे रहे थे जिनमें यह दावा किया गया था कि नेतन्याहू का AI जनरेटेड वीडियो शेयर किया जा रहा है और उनके हाथों पर छह उंगलियां दिखाई देने की बात कही गई थी।

    नए वीडियो पर भी उठे थे सवाल
    इसके बाद नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई वीडियो साझा कर इस बात को साबित करने की कोशिश की है वे पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने बीते दिनों एक कॉफी हाउस का वीडियो भी पोस्ट किया जिसमें वे अपने जिंदा होने की पुष्टि करने की कोशिश करते दिखे। हालांकि इंटरनेट पर लोगों ने इस वीडियो की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठा दिए। वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के चैट बॉट Grok ने इसे डीपफेक वीडियो बता दिया।

    अमेरिकी दूत से क्या बोले नेतन्याहू?
    अब नेतन्याहू ने अमेरिकी दूत के साथ वीडियो पोस्ट किया है। वीडियो में वह हकाबी के साथ बातचीत करते हुए देखे जा सकते हैं। इस बीच हकाबी मजाक मजाक में कहते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उन्हें इजरायली नेता का हालचाल जानने के लिए भेजा था। हकाबी ने कहा, “मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, मैं चाहता हूं कि आप यह जानें कि राष्ट्रपति ने मुझे यहाँ आकर यह पक्का करने के लिए कहा था कि आप ठीक हैं।” इस पर नेतन्याहू जवाब देते हैं “हां, माइक। हां मैं ज़िंदा हूं।वीडियो में नेतन्याहू ने ईरान के सिक्योरिटी चीफ अली लारीजानी आहे बासिज प्रमुख गुलाम रजा सुलेमानी की मौत को लेकर भी ईरान पर तंज कसा। नेतन्याहू ने कहा, “आज, मैंने पंच कार्ड से दो नाम मिटा दिए।” बता दें कि मंगलवार को इजरायल ने इन दोनों नेताओं के मारे जाने का दावा किया था। बुधवार को ईरान ने भी इसकी पुष्टि की है और बदला लेने की कसम खाई है।

  • इजराइली राजदूत का दावा पीएम मोदी को हमले की जानकारी नहीं थी, 28 फरवरी को दी गई मंजूरी

    इजराइली राजदूत का दावा पीएम मोदी को हमले की जानकारी नहीं थी, 28 फरवरी को दी गई मंजूरी


    नई दिल्ली । प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी के हालिया इजराइल दौरे के बाद ईरान पर हुए हमलों को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। पीएम मोदी 25 और 26 फरवरी को इजराइल के दौरे पर थे और ठीक दो दिन बाद 28 फरवरी को इजराइल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर स्ट्राइक की। ऐसे में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या भारत को पहले से इस ऑपरेशन की जानकारी थी।

    भारत में इजराइल के राजदूतरूवेन अजार ने इन सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पीएम मोदी को इस हमले की पूर्व जानकारी नहीं थी। उनके मुताबिक ऑपरेशन की मंजूरी 28 फरवरी की सुबह दी गई तब तक प्रधानमंत्री मोदी अपना दौरा पूरा कर भारत लौट चुके थे।

    न्यूक्लियर खतरे को खत्म करना लक्ष्य
    राजदूत अजार ने कहा कि इजराइल का मुख्य उद्देश्य ईरान के सैन्य परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना है। उनका आरोप है कि ईरान दशकों से मिलिट्री न्यूक्लियर प्रोग्राम विकसित करने की कोशिश कर रहा है और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को बढ़ा रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि ईरान क्षेत्र में अपने प्रॉक्सी समूहों को फंडिंग हथियार और तकनीक मुहैया कराता है। इजराइल के अनुसार ईरान ने 2027 तक इजराइल को खत्म करने की धमकी दी थी। जून में भी इजराइल ने ईरान पर हमले किए थे और अब सहयोग से इनकार के बाद फिर ऑपरेशन शुरू किया गया।

    भारत से हुई बातचीत

    राजदूत ने बताया कि इजराइल के विदेश मंत्री ने भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर से फोन पर बात की थी। भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए संवाद और स्थिरता का समर्थन किया।

    भारत लगातार कूटनीतिक समाधान की वकालत करता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके हैं कि मौजूदा संकट का हल केवल बातचीत और डिप्लोमेसी से ही संभव है।

    नेतन्याहू की भूमिका
    इस पूरे घटनाक्रम के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका भी चर्चा में है। इजराइल ने इन हमलों को प्रिएंपटिव स्ट्राइक बताया है। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इन हमलों में अमेरिका की भागीदारी की पुष्टि की।

    इजराइल में माहौल
    राजदूत अजार के मुताबिक इजराइल में सुरक्षा को लेकर गंभीर माहौल है। उनका कहना है कि देश लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना कर रहा है। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई को लेकर भी इजराइल में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। भारत ने साफ किया है कि वह शांति और स्थिरता का पक्षधर है तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पश्चिम एशिया में हालात किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।

  • इजराइल अमेरिका और ईरान तनाव पर पीएम Narendra Modi का बड़ा बयान, बोले हालात बेहद चिंताजनक

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    नई दिल्ली । मिडिल ईस्ट में इजराइल अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीर चिंता है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ द्विपक्षीय वार्ता के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया के हालात बेहद चिंताजनक हैं और मौजूदा संकट का समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से ही संभव है।

    प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि भारत शांति और स्थिरता का पक्षधर है और विश्व में बढ़ते तनाव को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है। उन्होंने कहा जब दो लोकतंत्र एक साथ खड़े होते हैं तो शांति की आवाज और भी मजबूत हो जाती है। वर्तमान संकट का हल संवाद और कूटनीतिक प्रयासों से ही निकलेगा इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

    पीएम मोदी ने दोहराया कि भारत सभी देशों के साथ मिलकर शांति बहाली के प्रयासों में सहयोग करेगा। उन्होंने कहा कि भारत का प्राथमिक उद्देश्य क्षेत्र में स्थिरता कायम रखना और वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

    नेतन्याहू से फोन पर बातचीत

    इससे पहले सोमवार देर रात प्रधानमंत्री मोदी ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच मौजूदा क्षेत्रीय हालात पर चर्चा हुई और उन्होंने दुश्मनी को जल्द समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    भारतीयों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

    केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी ने भी कहा कि केंद्र सरकार खाड़ी देशों में फंसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्रालय और भारतीय मिशन लगातार संपर्क में हैं और हालात पर नजर बनाए हुए हैं।

    जोशी ने चिंतित परिवारों को आश्वस्त करते हुए कहा कि सरकार पहले भी संकटग्रस्त देशों से भारतीयों को सुरक्षित निकाल चुकी है जैसे यूक्रेन संकट के दौरान किया गया था। उन्होंने कहा जहां भी भारतीय नागरिक हैं उनकी सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। घबराने की जरूरत नहीं है सरकार हर संभव कदम उठा रही है।

    मिडिल ईस्ट में जारी इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच भारत का रुख स्पष्ट है संवाद कूटनीति और शांति का मार्ग। अब वैश्विक समुदाय की नजर इस बात पर टिकी है कि क्षेत्र में हालात कब सामान्य होते हैं और तनाव किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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    नई दिल्ली । ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित बोंडी बीच पर हनुका उत्सव के दौरान हुई गोलीबारी की घटना ने इजरायल सरकार को गंभीर सुरक्षा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया है। इस घटना में अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने अपने नागरिकों को विदेश यात्रा करते समय खास सुरक्षा दिशानिर्देश जारी किए हैं।

    इन दिशानिर्देशों में मुख्य रूप से सामूहिक आयोजनों से बचने की सलाह दी गई है विशेषकर उन स्थानों पर जहां सुरक्षा व्यवस्था ठीक से लागू नहीं हो पाती। इसके अलावा यहूदी और इजरायली स्थलों के आसपास सतर्कता बढ़ाने का आह्वान किया गया है और यात्रियों को संदिग्ध व्यक्तियों या वस्तुओं की जानकारी तुरंत स्थानीय सुरक्षा बलों को देने की सलाह दी गई है।

    इस बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने यहूदी-विरोधी भावना को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए और इसके परिणामस्वरूप यहूदियों पर हमले हुए। नेतन्याहू ने यह भी कहा कि तुष्टीकरण की बजाय कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है।

    सिडनी में हुई इस गोलीबारी के बाद ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने बंदूक कानूनों को सख्त करने की योजना बनाई है। राष्ट्रीय बंदूक समझौते पर फिर से चर्चा की जाएगी और नए कानून पारित करने के लिए एनएसडब्ल्यू संसद को जल्द बुलाया जा सकता है। प्रमुख सुधारों में बंदूकों की अधिकतम संख्या को सीमित करना कानूनी बंदूकों के प्रकारों पर प्रतिबंध लगाना और बंदूक लाइसेंस के लिए ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता अनिवार्य करना शामिल है। यह घटनाक्रम न केवल इजरायल और ऑस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा संबंधों को प्रभावित कर रहा है बल्कि इसने दुनिया भर में आतंकवादी हमलों और बंदूक नियंत्रण पर नए सिरे से बहस शुरू कर दी है।