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  • घर में धार्मिक ग्रंथ रखने से पहले जान लें वास्तु के ये अहम नियम सही दिशा बदल सकती है जीवन की सकारात्मक ऊर्जा

    घर में धार्मिक ग्रंथ रखने से पहले जान लें वास्तु के ये अहम नियम सही दिशा बदल सकती है जीवन की सकारात्मक ऊर्जा


    नई दिल्ली। सनातन परंपरा में रामायण भगवत गीता हनुमान चालीसा और अन्य धार्मिक ग्रंथों को केवल पुस्तक नहीं बल्कि आस्था और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इन्हें घर में सम्मानपूर्वक रखने की सलाह दी जाती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि इन पवित्र ग्रंथों को सही दिशा और उचित स्थान पर रखा जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है और परिवार के सदस्यों के जीवन में सुख शांति तथा समृद्धि का वास होता है।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार धार्मिक ग्रंथों को रखने के लिए घर की पूर्व दिशा सबसे शुभ मानी जाती है। पूर्व दिशा को ज्ञान प्रकाश और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है क्योंकि इसी दिशा से सूर्य का उदय होता है। वहीं यदि घर में पूजा का स्थान बनाया गया है तो उसका सबसे उपयुक्त स्थान ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व दिशा माना जाता है। ऐसे में धार्मिक पुस्तकों को भी पूजा स्थल के आसपास सम्मानपूर्वक रखना शुभ माना जाता है।

    धार्मिक ग्रंथों को रखते समय इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें भगवान की मूर्ति या तस्वीर के बाईं ओर रखा जाए। कई लोग सुविधा के लिए इन्हें मंदिर की शेल्फ या मंदिर के ऊपर रख देते हैं लेकिन वास्तु के अनुसार ऐसा करना उचित नहीं माना जाता। इन पुस्तकों के लिए अलग स्थान या अलग शेल्फ बनाना अधिक शुभ माना जाता है ताकि उनका सम्मान बना रहे।

    वास्तु शास्त्र यह भी कहता है कि धार्मिक ग्रंथों को कभी भी ऐसी जगह नहीं रखना चाहिए जहां गंदगी रहती हो या जहां उनका अनादर होने की संभावना हो। बेडरूम में भी इन पवित्र पुस्तकों को रखने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि किसी कारण से इन्हें दूसरे कमरे में रखना पड़े तो साफ सुथरी और शांत जगह का चयन करना चाहिए।

    एक और महत्वपूर्ण नियम यह है कि धार्मिक पुस्तकों को एक दूसरे के ऊपर ढेर बनाकर नहीं रखना चाहिए। प्रत्येक पुस्तक को अलग स्थान देना चाहिए ताकि उनका सम्मान बना रहे। साथ ही इन पुस्तकों को खड़ी अवस्था में रखने के बजाय समतल स्थिति में रखना बेहतर माना जाता है।

    धार्मिक ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें लाल या पीले रंग के स्वच्छ कपड़े में लपेटकर रखने की परंपरा भी बताई गई है। लाल और पीला रंग शुभता तथा आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। वहीं काले या नीले रंग के कपड़े में धार्मिक ग्रंथों को रखने से बचने की सलाह दी जाती है।

    इन छोटे छोटे वास्तु नियमों का पालन करने से न केवल धार्मिक ग्रंथों का सम्मान बना रहता है बल्कि घर का वातावरण भी सकारात्मक और शांत बना रहता है। हालांकि इन मान्यताओं का आधार धार्मिक और पारंपरिक विश्वास हैं। इनका पालन व्यक्ति अपनी आस्था और श्रद्धा के अनुसार कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पवित्र ग्रंथों को हमेशा स्वच्छता सम्मान और श्रद्धा के साथ रखा जाए क्योंकि यही उनकी वास्तविक मर्यादा मानी जाती है।

  • पीएम मोदी की गिफ्ट डिप्लोमेसी में सबसे खास बनी ‘भगवद गीता’, कई राष्ट्राध्यक्षों को उनकी भाषा में दी सौगात

    पीएम मोदी की गिफ्ट डिप्लोमेसी में सबसे खास बनी ‘भगवद गीता’, कई राष्ट्राध्यक्षों को उनकी भाषा में दी सौगात


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएं अक्सर राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं के साथ-साथ उनकी अनोखी ‘गिफ्ट डिप्लोमेसी’ को लेकर भी सुर्खियों में रहती हैं। हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को दिया गया खास उपहार चर्चा का विषय बना, लेकिन इसके पीछे एक और ऐसी सांस्कृतिक सोच है जिसे प्रधानमंत्री मोदी वर्षों से वैश्विक मंच पर मजबूती से प्रस्तुत करते आए हैं। यह सोच भारतीय संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक विरासत को दुनिया तक पहुंचाने की है, जिसमें ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ सबसे अहम भूमिका निभाती रही है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में देश की कमान संभालने के बाद से कई अंतरराष्ट्रीय दौरों पर विदेशी नेताओं को भारतीय संस्कृति से जुड़े विशेष उपहार भेंट किए हैं। इनमें ‘भगवद गीता’ सबसे ज्यादा खास रही। खास बात यह रही कि उन्होंने जिस भी देश के राष्ट्राध्यक्ष को गीता भेंट की, वह उसी देश की भाषा में प्रकाशित प्रति थी। इससे न केवल भारतीय संस्कृति का सम्मान बढ़ा, बल्कि दूसरे देशों के नेताओं के साथ भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी मजबूत हुआ।

    प्रधानमंत्री मोदी जब अपने पहले अमेरिकी दौरे पर गए थे, तब उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को ‘भगवद गीता’ की एक विशेष प्रति भेंट की थी। यह उपहार केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत और दर्शन का प्रतीक माना गया। उस दौरान यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को दुनिया के सामने गर्व के साथ प्रस्तुत करना चाहता है।

    इसके बाद जापान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के सम्राट अकिहितो और तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे को जापानी भाषा में लिखी ‘भगवद गीता’ भेंट की थी। इस कदम को भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में बेहद खास माना गया। प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल दिखाती है कि वे केवल राजनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि संस्कृति और विचारों के जरिए भी देशों के बीच गहरे संबंध बनाना चाहते हैं।

    रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी प्रधानमंत्री मोदी रूसी भाषा में लिखी ‘भगवद गीता’ की प्रति भेंट कर चुके हैं। उस दौरान उन्होंने कहा था कि गीता के विचार और संदेश पूरी दुनिया के लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी कई मंचों से यह बात दोहरा चुके हैं कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन प्रबंधन, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला ग्रंथ है।

    प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि ‘भगवद गीता’ के संदेश केवल व्यक्ति के जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण और नीतियों की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कई मौकों पर गीता के श्लोकों और विचारों का उल्लेख करते हुए कहा है कि अन्याय और असत्य के खिलाफ खड़े होना ही सच्चे धर्म का मार्ग है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की यह सांस्कृतिक कूटनीति भारत की सॉफ्ट पावर को दुनिया में मजबूत करने का प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। गिफ्ट डिप्लोमेसी के जरिए भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को जिस तरह वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया गया है, उसने भारत की छवि को नई मजबूती दी है।