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  • लोकसभा से उपराष्ट्रपति चुनाव तक आजमा चुके हैं किस्मत, अब मध्यप्रदेश से राज्यसभा पहुंचना चाहते हैं कांते सायन्ना

    लोकसभा से उपराष्ट्रपति चुनाव तक आजमा चुके हैं किस्मत, अब मध्यप्रदेश से राज्यसभा पहुंचना चाहते हैं कांते सायन्ना


    भोपाल । मध्यप्रदेश में राज्यसभा की एक सीट के लिए होने वाला उपचुनाव इस बार दिलचस्प होता दिखाई दे रहा है। भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी उम्मीदवार हैं। वहीं हैदराबाद के कांते सायन्ना ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी शुरू कर दी है। खास बात यह है कि सायन्ना कोई नए चुनावी चेहरे नहीं हैं। वे अब तक लोकसभा विधानसभा विधान परिषद और राज्यसभा के चुनावों में कई बार अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। यहां तक कि वे उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी दावेदारी पेश कर चुके हैं। अब उनकी नजर मध्यप्रदेश की राज्यसभा सीट पर है।

    तेलंगाना के हैदराबाद से भोपाल पहुंचे कांते सायन्ना ने विधानसभा से नामांकन फॉर्म लिया है। उनका कहना है कि वे चुनाव लड़ने के लिए जरूरी दस्तावेज और शपथ पत्र लेकर आए हैं। हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नामांकन के लिए जरूरी 10 विधायकों के प्रस्तावकों के हस्ताक्षर जुटाना है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रस्तावकों का समर्थन अनिवार्य है। सायन्ना के मुताबिक मध्यप्रदेश के कुछ विधायक उनके समर्थन में हस्ताक्षर करने से हिचक रहे हैं। उनका आरोप है कि राजनीतिक दलों के नेताओं को डर है कि उनके समर्थन में हस्ताक्षर करने से उन्हें राजनीतिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    सायन्ना ने उम्मीद जताई है कि सोमवार तक वे जरूरी हस्ताक्षर जुटा लेंगे और नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि कुछ विधायकों ने समर्थन देने की बात कही है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वे निर्धारित समय तक सभी 10 प्रस्तावकों के हस्ताक्षर जुटा पाएंगे या नहीं। ऐसे में उनकी उम्मीदवारी का भविष्य विधायकों के समर्थन पर निर्भर करेगा।

    कांते सायन्ना ने अपने चुनावी सफर के बारे में बताते हुए कहा कि वे अब तक पांच बार लोकसभा और आठ बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। इसके अलावा छह बार विधान परिषद के चुनाव में भी अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। राज्यसभा के लिए वे 10 से 12 बार प्रयास करने का दावा करते हैं। उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी उन्होंने अपनी दावेदारी पेश की थी। उनका कहना है कि वे किसी एक राजनीतिक दल से बंधे हुए नहीं हैं और चुनाव लड़ने का खर्च भी खुद उठाते हैं।

    यह पहला मौका नहीं है जब सायन्ना को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इसी साल मार्च में तेलंगाना की दो राज्यसभा सीटों के चुनाव के दौरान भी उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल किया था। उस समय भी प्रस्तावकों के जरूरी हस्ताक्षर नहीं मिलने के कारण उनकी उम्मीदवारी पर संकट खड़ा हो गया था। अब मध्यप्रदेश में भी उनके सामने वैसी ही स्थिति बनती नजर आ रही है।

    सायन्ना ने 2018 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए दावा किया कि उस चुनाव में वे तीसरे स्थान पर रहे थे। उनके मुताबिक उस चुनाव में केसीआर पहले और वंटेरू प्रताप रेड्डी दूसरे स्थान पर थे। उन्होंने बताया कि वे अलग-अलग राज्यों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और अपने स्तर पर प्रचार करते हैं।

    अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर सायन्ना का कहना है कि देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है। उनके मुताबिक राजनीतिक दलों के बी-फॉर्म और पार्टी आधारित व्यवस्था का प्रभाव बहुत ज्यादा है। लोकतंत्र में जनता का वोट सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए। वे ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक व्यवस्था की वकालत करते हैं जिसमें उम्मीदवारों की पहचान केवल राजनीतिक दलों के आधार पर न हो। उनका दावा है कि इस विषय पर उन्होंने काफी अध्ययन और लेखन भी किया है। अब देखना होगा कि हरदीप सिंह पुरी के सामने चुनाव लड़ने की उनकी कोशिश कितनी आगे बढ़ पाती है और क्या वे जरूरी विधायकों का समर्थन जुटाकर अपनी उम्मीदवारी कायम रख पाते हैं।

  • वोट बचाओ रैली में MP से एक लाख लोगों को ले जाने का लक्ष्य, कांग्रेस नेताओं से तैयारियों का हिसाब मांग रहे पटवारी

    वोट बचाओ रैली में MP से एक लाख लोगों को ले जाने का लक्ष्य, कांग्रेस नेताओं से तैयारियों का हिसाब मांग रहे पटवारी


    भोपाल। मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली वोट बचाओ देश बचाओ जन मार्च और महारैलीJitu Patwari, Madhya Pradesh Congress, Delhi Rally, Vote Chori Protest, Bhopal Political News की तैयारियां तेज कर दी हैं। एसआईआर और कथित वोट चोरी के विरोध में आयोजित होने वाली इस रैली में मध्यप्रदेश से एक लाख लोगों को ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए जिला अध्यक्षों जिला प्रभारियों और विधानसभा प्रभारियों के साथ लगातार समीक्षा बैठकें कर रहे हैं। इन बैठकों में केवल लोगों की संख्या ही नहीं बल्कि बसों की बुकिंग रेल टिकटों के आरक्षण और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाओं की भी जानकारी ली जा रही है।

    कांग्रेस की योजना के मुताबिक प्रदेश के अलग अलग जिलों से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक दिल्ली पहुंचेंगे। इसके लिए पार्टी पदाधिकारियों को जिलेवार जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। जीतू पटवारी समीक्षा के दौरान यह पूछ रहे हैं कि किस जिले से कितने लोग दिल्ली जाने के लिए तैयार हैं और अब तक कितनी बसें तथा चार पहिया वाहन बुक किए जा चुके हैं। इसके अलावा रेलवे में कितने टिकट आरक्षित कराए गए हैं और यात्रा करने वालों की सूची कितनी तैयार हुई है इसकी भी जानकारी मांगी जा रही है। पार्टी का जोर समय रहते परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं को पूरा करने पर है।

    ग्वालियर चंबल संभाग में रैली की तैयारियों को लेकर विशेष लक्ष्य तय किया गया है। यहां जिला अध्यक्षों विधायकों पूर्व विधायकों विधानसभा प्रभारियों और जिला प्रभारियों को दो दो हजार लोगों को दिल्ली ले जाने की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं प्रदेश के अन्य जिलों में संबंधित पदाधिकारियों को एक एक हजार लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने का लक्ष्य दिया गया है। समीक्षा बैठकों में इन निर्धारित लक्ष्यों के मुकाबले अब तक हुई तैयारियों का आकलन किया जा रहा है। पदाधिकारियों से यह भी पूछा जा रहा है कि वे अपने क्षेत्र में लोगों से संपर्क कर रहे हैं या नहीं और यात्रा की व्यवस्था किस स्तर तक पहुंची है।

    दिल्ली महारैली की तैयारियों के साथ प्रदेश कांग्रेस संगठन के कामकाज की समीक्षा भी की जा रही है। जीतू पटवारी विधानसभा प्रभारियों से उनके क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियों का विस्तृत ब्योरा मांग रहे हैं। इसमें बूथ लेवल एजेंट यानी बीएलए दो के गठन और उनके भौतिक सत्यापन की स्थिति प्रमुख है। इसके साथ ही मंडलम के गठन और सत्यापन तथा वार्ड और पंचायत समितियों के गठन से जुड़ी जानकारी भी जुटाई जा रही है। पार्टी यह देखना चाहती है कि संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए निर्धारित काम कितनी प्रगति पर हैं।

    विधानसभा प्रभारियों से यह भी पूछा जा रहा है कि उन्होंने अपने जिम्मेदारी वाले क्षेत्र का कितनी बार दौरा किया और हर महीने कितने दिन वहां प्रवास किया। इन जानकारियों के जरिए संगठन की वास्तविक स्थिति और स्थानीय स्तर पर पदाधिकारियों की सक्रियता का आकलन किया जा रहा है। पार्टी की रणनीति में बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक संगठन को सक्रिय रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    कांग्रेस की इन बैठकों में अब दो मोर्चों पर जवाबदेही तय होती दिखाई दे रही है। एक तरफ दिल्ली की महारैली में अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए परिवहन और यात्रियों की व्यवस्था पर जोर है तो दूसरी तरफ संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने के काम की समीक्षा की जा रही है। निर्धारित लक्ष्य के अनुसार लोगों को दिल्ली पहुंचाना और संगठन की गतिविधियों को जमीन पर आगे बढ़ाना जिला तथा विधानसभा स्तर के पदाधिकारियों के लिए अहम जिम्मेदारी बन गई है।

    एक नवंबर को होने वाली महारैली में मध्यप्रदेश से वास्तविक भागीदारी कितनी रहती है यह आयोजन के दिन स्पष्ट होगा। फिलहाल प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश है कि तैयारियों में कोई कमी न रहे और जिलेवार जिम्मेदारियों के अनुसार परिवहन तथा संगठन से जुड़े काम समय पर पूरे कर लिए जाएं।

  • SIR और चुनाव आयोग के मुद्दे पर कांग्रेस का दिल्ली मार्च, जीतू पटवारी-उमंग सिंघार पहुंचे दिल्ली, एमपी में नेताओं पर कार्रवाई से बढ़ा विवाद

    SIR और चुनाव आयोग के मुद्दे पर कांग्रेस का दिल्ली मार्च, जीतू पटवारी-उमंग सिंघार पहुंचे दिल्ली, एमपी में नेताओं पर कार्रवाई से बढ़ा विवाद


    नई दिल्ली ।  राहुल गांधी के नेतृत्व में सोमवार को दिल्ली में प्रस्तावित कांग्रेस मार्च से पहले मध्य प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मार्च में शामिल होने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित कई वरिष्ठ नेता और विधायक दिल्ली पहुंच चुके हैं। इसी बीच दिल्ली रवाना होने की तैयारी कर रहे मुरैना ग्रामीण जिला कांग्रेस अध्यक्ष मधुराज सिंह तोमर और भिंड शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष धर्मेंद्र भदौरिया को रविवार रात पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इसके अलावा श्योपुर से कांग्रेस विधायक बाबू जंडेल के घर भी पुलिस पहुंची। इन घटनाओं के बाद कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि पार्टी नेताओं को दिल्ली मार्च में शामिल होने से रोकने की कोशिश की जा रही है।
    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुरैना ग्रामीण जिला कांग्रेस अध्यक्ष मधुराज सिंह तोमर और भिंड शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष धर्मेंद्र भदौरिया दिल्ली जाने के लिए मुरैना में एक ही स्थान पर ठहरे हुए थे। इसी दौरान पुलिस ने दोनों को हिरासत में लिया। कांग्रेस नेताओं ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे मार्च में शामिल होने की तैयारी से जोड़कर देखा है। हालांकि पुलिस की ओर से हिरासत में लिए जाने के कारण और कार्रवाई की अवधि को लेकर आधिकारिक पक्ष की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ऐसे में इस मामले में पुलिस का पक्ष सामने आने के बाद ही कार्रवाई की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
    इसी घटनाक्रम के बीच श्योपुर से कांग्रेस विधायक बाबू जंडेल के घर पुलिस पहुंचने की जानकारी सामने आई है। बताया गया है कि विधायक के घर पहुंची पुलिस से जुड़ा सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है। कांग्रेस की ओर से इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि पुलिस विधायक को हिरासत में लेने में सफल हुई या नहीं इस बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस वजह से पूरे घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है।
    दूसरी ओर मध्य प्रदेश कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता दिल्ली में प्रस्तावित मार्च में शामिल होने के लिए पहुंच चुके हैं। इनमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के अलावा पूर्व मंत्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ विधायक आरिफ मसूद झूमा सोलंकी सेना पटेल फुंदेलाल मार्को और केशव देसाई सहित कई नेता और पूर्व विधायक शामिल हैं। दिल्ली स्थित मध्य प्रदेश भवन में भी कांग्रेस के विधायक और नेता मौजूद हैं। पार्टी की ओर से इस मार्च के जरिए अपनी मांगों को आगे रखने की तैयारी की गई है।
    कांग्रेस का यह मार्च मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है। पार्टी निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस की योजना मार्च के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर अपनी मांगें रखने की है। इस मुद्दे को लेकर पार्टी पहले भी अपनी आपत्तियां सामने रख चुकी है।
    मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिए जाने और विधायक के घर पुलिस पहुंचने की घटनाओं ने दिल्ली मार्च से पहले राजनीतिक विवाद को बढ़ा दिया है। कांग्रेस इसे अपने नेताओं को रोकने की कोशिश बता रही है जबकि पुलिस की कार्रवाई के आधार पर आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है। ऐसे में मार्च के दौरान पार्टी की गतिविधियों और इस पूरे घटनाक्रम पर आगे होने वाले घटनाक्रम पर नजर रहेगी।
  • कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में

    कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में


    भोपाल । मध्य प्रदेश में राजनीति और नौकरशाही की ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिनमें कहीं आम और खास के बीच का फर्क दिखाई देता है तो कहीं जनता और जनप्रतिनिधि के बीच सीधे संवाद की एक उम्मीद नजर आती है। शिवपुरी में जनसुनवाई के दौरान भाजपा नेता के पहुंचते ही कलेक्टर का कुर्सी से उठकर उनसे मिलना और फिर उन्हें अपने केबिन में लेकर जाना चर्चा का विषय बन गया। दूसरी ओर गुना में एक बुजुर्ग महिला कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह का हाथ पकड़कर उन्हें अपने आधे अधूरे घर तक ले गई। इन दोनों घटनाओं ने लोकतंत्र और प्रशासन की प्राथमिकताओं पर अपने अपने तरीके से सवाल खड़े किए हैं।

    शिवपुरी में कलेक्टर जनसुनवाई कर रहे थे और आम लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे हुए थे। इसी दौरान भाजपा जिला अध्यक्ष वहां पहुंचे। बताया गया कि कलेक्टर ने उनसे मुलाकात की और फिर जनसुनवाई के बीच ही उन्हें अपने केबिन में लेकर चले गए। कुछ देर बाद कलेक्टर वापस लौटे और लोगों की समस्याएं सुनने का सिलसिला फिर शुरू हुआ लेकिन तब तक यह दृश्य चर्चा में आ चुका था। सवाल यह उठने लगा कि यदि कोई आम व्यक्ति अपनी समस्या लेकर जनसुनवाई में पहुंचता है तो उसे अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है लेकिन किसी राजनीतिक पदाधिकारी के आने पर प्राथमिकता बदल क्यों जाती है। यह घटना भले कुछ मिनटों की रही हो लेकिन आम और खास के बीच व्यवहार के अंतर को लेकर बहस जरूर छेड़ गई।

    इसके विपरीत गुना जिले में राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह के सामने एक बुजुर्ग महिला ने अपनी परेशानी सीधे रखी। महिला विधायक का हाथ पकड़कर उन्हें अपने घर तक ले गई और अपना अधूरा मकान दिखाया। उसने बताया कि घर में प्लास्टर और पुताई का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। विधायक ने महिला को मदद और घर का काम पूरा कराने का भरोसा दिया। यह दृश्य राजनीति की तस्वीर के रूप में चर्चा में रहा लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश भी छिपा है कि जनता को अपने प्रतिनिधियों तक बिना डर और संकोच पहुंचने का अधिकार होना चाहिए। लोकतंत्र की असली खूबसूरती तभी है जब कोई आम नागरिक बेझिझक अपने जनप्रतिनिधि का हाथ पकड़कर अपनी परेशानी बता सके।

    उधर इंदौर जिले के महू में अधूरे रेलवे ओवरब्रिज को लेकर राजनीतिक विरोध का अलग तरीका देखने को मिला। ब्रिज निर्माण में हो रही देरी से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी बाउंड्री पर सरकार नेता और ठेकेदार को निशाने पर लेते हुए नारे लिखवा दिए। काम की धीमी रफ्तार और विकास के नाम पर सवाल उठाते इन स्लोगन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गईं। इसके बाद प्रशासन ने बाउंड्री पर लिखे नारों को सफेद रंग से पुतवा दिया। कांग्रेस ने इसी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन और कीर्तन भी किया। विपक्ष का तर्क है कि यदि निर्माण कार्य पूरा करने में भी उतनी ही तेजी दिखाई जाती जितनी नारों को मिटाने में दिखाई गई तो शायद विरोध की जरूरत ही नहीं पड़ती।

    राजनीति के इन खुले दृश्यों के बीच भोपाल की अंदरूनी सियासत से जुड़ी चर्चा भी सुर्खियों में रही। खबर में एक ऐसे भाजपा नेता का जिक्र है जिन्हें पंडितजी के नाम से संबोधित किया गया है और जो विधायक या मंत्री न होने के बावजूद अपना सरकारी बंगला 2028 तक बचाने में सफल रहे हैं। चर्चा है कि बंगले को लेकर बदलाव की तैयारी थी लेकिन दिल्ली स्तर पर हस्तक्षेप के बाद मामला बदल गया। बंगला समाज सेवा के नाम पर आवंटित बताया जा रहा है जबकि राजनीतिक गलियारों में इसे भविष्य की सियासत के केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कुल मिलाकर मध्य प्रदेश की इन घटनाओं ने सत्ता राजनीति और प्रशासन की कई परतें खोल दी हैं। कहीं आम आदमी इंतजार करता दिखाई देता है और खास व्यक्ति को प्राथमिकता मिलती नजर आती है तो कहीं एक बुजुर्ग महिला सीधे अपने विधायक तक पहुंचकर अपनी समस्या बताती है। अधूरे विकास कार्यों पर विपक्ष नारे लिखकर सरकार को घेरता है और दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में बंगले बचाने की सियासत चलती है। यही राजनीति और व्यवस्था की वह तस्वीर है जिसमें सवाल भी हैं और उम्मीदें भी।

  • IPS को धमकी मामले में सियासत गरमाई जीतू पटवारी ने पुलिस की चुप्पी पर साधा निशाना


    भोपाल । भोपाल में बीजेपी विधायक प्रीतम सिंह लोधी द्वारा एक आईपीएस अधिकारी को कथित धमकी दिए जाने के मामले ने अब सियासी तूल पकड़ लिया है। इस घटना को लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मध्यप्रदेश पुलिस की भूमिका और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने पुलिस तंत्र को एक खुला पत्र लिखते हुए न केवल मौजूदा व्यवस्था पर टिप्पणी की है बल्कि कानून व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता को लेकर भी तीखी चिंता जताई है।

    अपने पत्र में जीतू पटवारी ने लिखा कि यह घटना केवल किसी एक व्यक्ति की भाषा या व्यवहार का मामला नहीं है, बल्कि यह उस खतरनाक माहौल का संकेत है जिसमें सत्ता का अहंकार कानून और संविधान पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि बार-बार ऐसे मामले सामने आते हैं जहां सत्ताधारी दल से जुड़े लोग पुलिस अधिकारियों पर दबाव बनाने या उन्हें अपमानित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इन घटनाओं के बाद पुलिस की प्रतिक्रिया अक्सर सीमित और संयमित रह जाती है।

    पटवारी ने पुलिस अधिकारियों से सवाल करते हुए पूछा कि आखिर कौन सी परिस्थितियां हैं जिनके कारण देश के सबसे प्रशिक्षित और अनुशासित अधिकारी भी रक्षात्मक स्थिति में नजर आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब अन्याय के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की जरूरत होती है तब पुलिस की आवाज कमजोर क्यों पड़ जाती है और आम नागरिकों के मामलों में वही तंत्र इतना कठोर कैसे हो जाता है।

    अपने पत्र में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यदि पुलिस निष्पक्ष होकर और संविधान के दायरे में काम करे तो किसी भी नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की हिम्मत नहीं होगी कि वह कानून पर दबाव डाल सके। लेकिन जब पुलिस को दबाव में काम करना पड़ता है तो उसकी स्वतंत्रता और कार्यक्षमता दोनों प्रभावित होती हैं।

    जीतू पटवारी ने IPS एसोसिएशन के पत्र का भी उल्लेख किया और कहा कि उसमें आक्रोश कम और विवशता अधिक नजर आती है। उनके अनुसार यह स्थिति केवल पुलिस के लिए नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है क्योंकि यदि कानून लागू करने वाली संस्था ही कमजोर दिखाई देगी तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था पर कैसे कायम रहेगा।

    हालांकि उन्होंने अपने पत्र में यह भी स्पष्ट किया कि यह आलोचना पुलिस बल के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के लाखों पुलिसकर्मी दिन रात अपनी जान जोखिम में डालकर सेवा करते हैं और उनके साहस और मेहनत का पूरा देश सम्मान करता है। उनका संदेश उन परिस्थितियों के खिलाफ है जो पुलिस को उसकी मूल भूमिका से दूर कर रही हैं।

    पटवारी ने कहा कि पुलिस को अपने भीतर के साहस को याद रखना चाहिए और संविधान को अपना सबसे बड़ा संरक्षक मानना चाहिए न कि किसी व्यक्ति या सत्ता को। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कानून की रक्षा करने वाले ही चुप हो जाएंगे तो समाज में अन्याय को बढ़ावा मिलेगा और कानून का शासन कमजोर पड़ जाएगा।

    यह पूरा मामला अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है जहां एक तरफ कांग्रेस पुलिस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक बयानबाजी बता रहा है। फिलहाल इस पत्र ने मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में नई चर्चा जरूर छेड़ दी है।