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  • मेरे लिए पहले से सोच चुके थे प्रधानमंत्री’, शिवराज सिंह चौहान की किताब से निकले राजनीतिक सफर के अहम खुलासे

    मेरे लिए पहले से सोच चुके थे प्रधानमंत्री’, शिवराज सिंह चौहान की किताब से निकले राजनीतिक सफर के अहम खुलासे

    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद हुए बड़े बदलावों ने उस समय व्यापक राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया था। लंबे समय तक राज्य की कमान संभालने के बाद सत्ता परिवर्तन और नए नेतृत्व के चयन को लेकर कई तरह की अटकलें सामने आई थीं। अब इन घटनाओं से जुड़ी कई अहम बातें सामने आई हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने अपनी नई पुस्तक में विस्तार से साझा किया है। राजनीतिक घटनाक्रमों से जुड़े इन अनुभवों ने एक बार फिर उस दौर की चर्चाओं को ताजा कर दिया है।

    अपनी पुस्तक में शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद से केंद्रीय राजनीति तक के सफर का जिक्र करते हुए कई व्यक्तिगत और राजनीतिक अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने लिखा कि विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत के बाद पार्टी ने राज्य में नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था। उन्होंने इस बदलाव को संगठन का निर्णय मानते हुए पूरी सहजता के साथ स्वीकार किया। उनके अनुसार राजनीति में पद से अधिक महत्वपूर्ण संगठन और जिम्मेदारी होती है।

    पुस्तक में एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi ने उनसे दिल्ली आने और बातचीत करने की बात कही थी। उस समय राजनीतिक चर्चा का केंद्र नए मुख्यमंत्री थे, लेकिन बाद में जब उन्होंने केंद्रीय मंत्री पद की शपथ ली तो उन्हें एहसास हुआ कि उनके भविष्य को लेकर पहले से एक सोच तैयार की जा चुकी थी। उन्होंने लिखा कि बाद में यह स्पष्ट हुआ कि उनके लिए नई भूमिका को लेकर योजना पहले से तय थी।

    शिवराज सिंह चौहान ने अपने राजनीतिक जीवन के उस महत्वपूर्ण दौर का भी उल्लेख किया, जब मध्य प्रदेश में नए मुख्यमंत्री के रूप में Mohan Yadav के नाम की घोषणा हुई। उन्होंने लिखा कि स्वाभाविक रूप से ऐसी परिस्थितियों में भावनात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती थीं, लेकिन संगठन के संस्कार और पारिवारिक सीख ने उन्हें संयम बनाए रखने की प्रेरणा दी। उन्होंने इसे एक कार्यकर्ता की वास्तविक परीक्षा बताया।

    उन्होंने अपनी पुस्तक में यह भी लिखा कि उनकी पार्टी अनुशासन और त्याग के सिद्धांतों पर आधारित है और वह किसी पद से जुड़े रहने की मानसिकता में विश्वास नहीं करते। उनके अनुसार संगठन जो जिम्मेदारी देता है, उसे स्वीकार करना ही एक कार्यकर्ता का कर्तव्य होता है। यही सोच उन्हें नए दायित्व की ओर आगे बढ़ाने में सहायक बनी।

    मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव को नई जिम्मेदारी की तरह लिया। उन्होंने लिखा कि उन्होंने पूरे समर्पण के साथ चुनावी अभियान में काम किया और उन क्षेत्रों तक पहुंचे जहां पहले संगठन को सीमित सफलता मिली थी। चुनाव परिणामों को उन्होंने सामूहिक प्रयास और संगठन की शक्ति का परिणाम बताया।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पुस्तक केवल व्यक्तिगत संस्मरण नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दौर की अंदरूनी झलक भी पेश करती है। इससे सत्ता परिवर्तन, संगठनात्मक निर्णयों और नेतृत्व की प्रक्रिया को समझने का एक नया दृष्टिकोण सामने आता है।

  • पॉवर गॉशिप: नेताजी ने बदले ‘देवता’, ‘गौभक्त’ की आड़ में उलझी जांच और उत्तरायण से बचते सियासी दावेदार

    पॉवर गॉशिप: नेताजी ने बदले ‘देवता’, ‘गौभक्त’ की आड़ में उलझी जांच और उत्तरायण से बचते सियासी दावेदार


    भोपाल । प्रदेश की सियासत में इन दिनों चर्चाओं का बाजार गर्म है। सत्ता और संगठन के गलियारों में ऐसी कई कहानियां तैर रही हैं जिनमें नाम कम और इशारे ज्यादा हैं। राजनीतिक नियुक्तियों से लेकर जांच एजेंसियों की चाल और आगामी विधानसभा चुनाव की दावेदारी तक हर मोर्चे पर असमंजस और समीकरणों की नई पटकथा लिखी जा रही है।

    नेताजी के बदले देवता नई भक्ति नई उम्मीद

    राजनीतिक नियुक्तियों की सूची में अपनी जगह पक्की कराने के लिए प्रदेश के एक चर्चित नेताजी पिछले काफी समय से ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी निर्णायककर्ताओं के चक्कर लगाते नजर आ रहे थे। नेताजी को पूरा भरोसा था कि नया साल शुरू होते ही उनके सितारे बुलंदी पर होंगे और मनचाही जिम्मेदारी उनके नाम लिखी जाएगी। लेकिन साल बदला, कैलेंडर पलटा, पर किस्मत ने अब तक उनका साथ नहीं दिया। इधर राष्ट्रीय स्तर पर समीकरणों में हलचल बढ़ी तो नेताजी ने भी अपनी रणनीति बदल ली। पुराने निर्णायककर्ता से दूरी बनाकर अब उन्होंने नए निर्णायककर्ता की शरण लेना शुरू कर दिया है। सत्ता की राजनीति में ‘देवता’ बदलना कोई नई बात नहीं, लेकिन इस बार नेताजी को पूरी उम्मीद है कि यह बदलाव उनके राजनीतिक भविष्य के लिए संजीवनी साबित होगा। फिलहाल नेताजी पूरी तरह आश्वस्त हैं कि देर-सवेर उनका नंबर जरूर आएगा।

    गौभक्त नेताजी की तलाश तेज जांच धीमी सच्चाई

    भोपाल के बहुचर्चित गौकशी मामले में जांच की रफ्तार कागजों पर भले ही तेज दिखाई दे रही हो, लेकिन जमीनी सच्चाई अब भी धुंध में है। हैरानी की बात यह है कि जांच एजेंसियां अब तक यह साफ नहीं कर पाई हैं कि गायें आखिर स्लॉटर हाउस तक पहुंचीं कैसे। सियासी गलियारों में चर्चा है कि इस पूरे मामले के पीछे एक प्रभावशाली ‘गौभक्त’ नेताजी की भूमिका बताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक जांच दल कार्रवाई तो कर रहा है, लेकिन असली मुलजिमों तक पहुंचते-पहुंचते कदम ठिठक जा रहे हैं। ऐसा तंत्र बनाया गया है कि जांच भी चलती रहे और प्रभावशाली चेहरों पर आंच भी न आए। नतीजा यह है कि फाइलें आगे बढ़ रही हैं, बयान दर्ज हो रहे हैं, लेकिन सच्चाई तक पहुंचने का रास्ता अब भी टेढ़ा बना हुआ है। गौभक्ति और राजनीति के इस मेल में जांच की दिशा पर सवाल उठने लगे हैं।

    उत्तरायण होने को कोई नेता तैयार नहीं

    इधर मकर संक्रांति के साथ भगवान सूर्य भले ही दक्षिणायन से उत्तरायण हो गए हों, लेकिन राजनीति में कुछ नेता अब भी उत्तरायण होने से बचते नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान जब बीजेपी नेताओं की अनौपचारिक जमावट हुई तो चर्चा का रुख भोपाल उत्तर विधानसभा सीट की ओर मुड़ गया। सवाल सीधा था 2028 में इस सीट से दावेदारी कौन करेगा सवाल सुनते ही नेताओं के बीच खामोशी छा गई। सब एक-दूसरे की ओर देखते रहे, लेकिन किसी ने भी खुलकर यह कहने की हिम्मत नहीं की कि वह चुनावी मैदान में उतरने को तैयार है। इसी बीच एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने माहौल को हल्का करते हुए तंज कस दिया 2028 में उत्तरायण होने को कोई नेता तैयार नहीं है। यह बात भले ही मजाक में कही गई हो, लेकिन इसके पीछे का सियासी डर और असमंजस साफ झलक रहा था। कुल मिलाकर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों देवता बदलने की कवायद, गौभक्ति की आड़ में उलझी जांच और कुछ सीटों पर चुनावी उत्तरायण से बचने की रणनीति, तीनों ही पॉवर गॉशिप का बड़ा हिस्सा बनी हुई हैं।