Tag: BNP

  • बांग्लादेश की राजनीति में फिर उबाल, जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की मांग तेज, शेख हसीना की वापसी के ऐलान से बढ़ी सियासी हलचल

    बांग्लादेश की राजनीति में फिर उबाल, जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की मांग तेज, शेख हसीना की वापसी के ऐलान से बढ़ी सियासी हलचल

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में एक बार फिर राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। संसद में कट्टरपंथी राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी पर दोबारा पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग ने देश की सियासत को गरमा दिया है। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इसी वर्ष बांग्लादेश लौटने का सार्वजनिक ऐलान कर राजनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। इन दोनों घटनाक्रमों ने देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और भविष्य के सत्ता समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

    संसद में यह मुद्दा उस समय प्रमुखता से उठा जब सत्तारूढ़ गठबंधन से जुड़े सांसद ने जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका तर्क था कि जिन संगठनों या राजनीतिक दलों का संबंध 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के विरोध से रहा है अथवा जो धर्म का राजनीतिक उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं, उन्हें लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बने रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने धार्मिक स्थलों को भी राजनीतिक गतिविधियों से पूरी तरह अलग रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    इस मांग के सामने आते ही जमात-ए-इस्लामी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। पार्टी के नेताओं ने संसद के भीतर सरकार पर विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यदि प्रमुख विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जाएगी तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी और देश में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी। पार्टी ने यह भी सवाल उठाया कि क्या सरकार एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था की दिशा में बढ़ रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब वर्ष 2024 के राजनीतिक आंदोलन के बाद बने नए सत्ता संतुलन की लगातार परीक्षा हो रही है। पूर्व सरकार के पतन के बाद जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटाया गया था, जिसके बाद हुए आम चुनाव में पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए संसद में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद से वह सरकार के सामने प्रभावी विपक्ष के रूप में उभरी है।

    विवाद के बीच जमात-ए-इस्लामी ने सरकार पर अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का भी आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि सरकार प्रशासनिक और संवैधानिक चुनौतियों का समाधान करने के बजाय राजनीतिक टकराव को बढ़ावा दे रही है। वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा के लिए ऐसे मुद्दों पर स्पष्ट नीति अपनाना आवश्यक है।

    इसी दौरान पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के हालिया बयान ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह इसी वर्ष अपने देश लौटेंगी और राजनीतिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाएंगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा सरकार के साथ किसी प्रकार की गुप्त बातचीत या समझौते की खबरों में कोई सच्चाई नहीं है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक अधिकार किसी भी राजनीतिक सौदेबाजी का विषय नहीं हो सकते।

    शेख हसीना की संभावित वापसी और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की मांग ने बांग्लादेश की राजनीति को एक नए दौर में पहुंचा दिया है। आने वाले समय में संसद के भीतर होने वाली बहस, सरकार के निर्णय और विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति यह तय करेगी कि देश की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन घटनाक्रमों पर नजर बनी हुई है, क्योंकि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता का प्रभाव पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर पड़ सकता है।

  • बांग्लादेश में नई सरकार के बाद तुर्की की सक्रियता, बिलाल एर्दोगन का ढाका दौरा चर्चा में

    बांग्लादेश में नई सरकार के बाद तुर्की की सक्रियता, बिलाल एर्दोगन का ढाका दौरा चर्चा में

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में तारिक रहमान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद तुर्की के राष्ट्रपतिरेसेप तैयप एर्दोगन के बेटे Bilal Erdogan का अचानक ढाका दौरा क्षेत्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की पृष्ठभूमि में हुए इस दौरे को रणनीतिक नजर से देखा जा रहा है।

    बिलाल एर्दोगन एक निजी विमान से ढाका पहुंचे। उनके साथ तुर्की के पूर्व फुटबॉलर मेसुट ओज़िल और तुर्की की सरकारी सहायता एजेंसी तुर्की सहयोग और समन्वय एजेंसी TIKA के चेयरमैन अब्दुल्ला आरोन भी मौजूद थे। ढाका पहुंचने के बाद प्रतिनिधिमंडल ने ढाका विश्वविद्यालय में TIKA द्वारा वित्तपोषित एक मेडिकल सेंटर का उद्घाटन किया। बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट की पहल जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई ने की थी।

    बांग्लादेश के हालिया चुनावों मेंबांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने गठबंधन के जरिए 77 सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की है और वह अब संसद में प्रभावशाली विपक्ष के रूप में उभरी है। हालांकि सरकार BNP के नेतृत्व में बनी है, लेकिन माना जा रहा है कि नीतिगत फैसलों पर जमात का असर बढ़ सकता है।

    विश्लेषकों के अनुसार, दक्षिण एशिया में TIKA की बढ़ती मौजूदगी और तुर्की की सक्रियता को भारत की सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माना जा रहा है। खासकर रोहिंग्या कैंपों की यात्राओं और इस्लामिक संगठनों के साथ संपर्क को क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    इस संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी Inter-Services Intelligence (ISI) पर पहले भी बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में दखल के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में पाकिस्तान, तुर्की और बांग्लादेश के बीच बढ़ती नजदीकियों को भारत के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

    फिलहाल, बिलाल एर्दोगन का यह दौरा तुर्की और बांग्लादेश के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक संकेत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि इस कूटनीतिक सक्रियता का दक्षिण एशिया की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

  • बांग्लादेश में BNP की ऐतिहासिक विजय…. जमात-ए-इस्लामी की जीत से बढ़ी भारत की चिंता, सीमावर्ती राज्यों में अलर्ट

    बांग्लादेश में BNP की ऐतिहासिक विजय…. जमात-ए-इस्लामी की जीत से बढ़ी भारत की चिंता, सीमावर्ती राज्यों में अलर्ट


    ढाका।
    बांग्लादेश (Bangladesh) में पिछले दो दशकों के राजनीतिक गतिरोध (Political Deadlock) को तोड़ते हुए, तारिक रहमान (Tariq Rahman.) के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) (Bangladesh Nationalist Party – BNP) ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आम चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। 297 घोषित सीटों में से 212 पर कब्जा कर BNP ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है। इस जीत के साथ ही 20 साल बाद देश में BNP की वापसी हुई है। हालांकि, इस चुनावी परिणाम ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। इसका मुख्य कारण जमात-ए-इस्लामी और उसके 11 सहयोगियों द्वारा 77 सीटों पर दर्ज की गई शानदार जीत है।

    भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि जमात-ए-इस्लामी ने जिन सीटों पर जीत हासिल की है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल और असम की सीमा से लगे बांग्लादेशी जिलों में स्थित है। सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम ने इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि शेख हसीना की अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद मुकाबला मूल रूप से जमात और BNP के बीच था।

    प्रोफेसर इस्लाम ने कहा, “BNP की जीत यह संकेत देती है कि बांग्लादेश में स्वतंत्र पहचान और राष्ट्रवाद का मुद्दा अभी भी जनता के लिए महत्वपूर्ण है। जमात ने 1971 के मुक्ति संग्राम के इतिहास को चुनौती देने की कोशिश की, जो व्यर्थ साबित हुई। हालांकि, जनमत संग्रह यह भी संकेत देता है कि अब 1972 के संविधान में संशोधन के प्रयास किए जाएंगे।”


    भारत के सीमावर्ती राज्य हाई अलर्ट पर

    जमात की चुनावी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने पश्चिम बंगाल के छह जिलों जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना से लगी सीमा के साथ-साथ असम के सिलचर से लगे क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व फिर से स्थापित कर लिया है। सुरक्षा जानकारों का मानना है कि यह स्थिति भारत के सीमा सुरक्षा बल (BSF) और खुफिया एजेंसियों के लिए चुनौती बन सकती है। सीमा के वे हिस्से जहां कंटीली तारें नहीं लगी हैं, वे लंबे समय से मानव तस्करी और तस्करी के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं। इस फैसले के बाद भारत को हाई अलर्ट पर रखा गया है।


    अल्पसंख्यकों की चिंता

    राजनीतिक विज्ञान की प्रोफेसर पांचाली सेन ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी ने भारत के प्रति अपनी सार्वजनिक मुद्रा को नरम किया है और पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों के लिए खुलापन दिखाया है, लेकिन भारत के लिए सुरक्षा और आतंकवाद एक प्रमुख चिंता बनी रहनी चाहिए। प्रोफेसर सेन ने जोर देकर कहा, “बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा, जिन पर पहले ही हमले हो चुके हैं, भारतीय सरकार की प्राथमिकता सूची में होनी चाहिए। चूंकि भारत ने इस फैसले का स्वागत किया है, दिल्ली ढाका के साथ राजनयिक संबंध बनाए रखने और क्षेत्र में शक्ति संतुलन सुनिश्चित करने के लिए एक सतर्क नीति अपना सकती है।”


    आतंकवाद का खतरा

    खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) जैसे आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों पर अभी कोई भी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। JMB ने भारत में भी अपना नेटवर्क स्थापित किया है। अधिकारी ने कहा, “भारत में आतंकवादी समूहों के रूप में सूचीबद्ध छह बांग्लादेशी संगठनों में से JMB ने हाल के वर्षों में सबसे अधिक वृद्धि दिखाई है। 2020 और 2025 के बीच पश्चिम बंगाल और कोलकाता में एक दर्जन से अधिक JMB ऑपरेटरों को गिरफ्तार किया गया है। ये तत्व उन संगठनों की ओर देखते हैं जो जमात का समर्थन करते हैं।”

    दिसंबर 2025 में पश्चिम बंगाल और असम के विभिन्न हिस्सों से 2016 में गिरफ्तार किए गए JMB के पांच सदस्यों को कोलकाता की एक अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उनके पास से भारी मात्रा में विस्फोटक और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (IED) के घटक जब्त किए गए थे।