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  • अकेले फिल्म देखने पर मिलते थे 10 हजार रुपये, फिर भी कोई नहीं जुटा पाया हिम्मत

    अकेले फिल्म देखने पर मिलते थे 10 हजार रुपये, फिर भी कोई नहीं जुटा पाया हिम्मत

    नई दिल्ली ।  बॉलीवुड में जब भी हॉरर फिल्मों की बात होती है, रामसे ब्रदर्स का नाम जरूर लिया जाता है। दो भाइयों की जोड़ी ने बॉलीवुड की बहुत सारी हॉरर फिल्में दीं। रामसे ब्रदर्स की पहली फिल्म हॉरर फिल्म थी दो गज जमीन के नीचे। पर आज हम आपको इस फिल्म के बारे में नहीं बता रहे हैं। हम आपको रामसे ब्रदर्स की उस फिल्म के बारे में बता रहे हैं जो इतनी डरावनी थी कि थिएटर्स के बाहर एंबुलेंस खड़ी रहती थी।
    सिनेमाहॉल के बाहर रहती थी एंबुलेंस
    तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में बताया कि ये बात सच है कि जब फिल्म रिलीज हुई थी तो सिनेमाहॉल के बाहर एंबुलेंस रहती थी कि अगर कोई बहुत ज्यादा डर जाए फिल्म देखकर तो उसे अस्पताल ले जाया जा सके।

    अकेले देखने वाले को मिलते 10 हजार रुपये

    हिंदी रश से खास बातचीत में दीपक से सवाल हुआ कि क्या ये बात सच है कि रामसे ब्रदर्स की एक ऐसी फिल्म थी जिसके लिए कहा गया था कि अकेले देखने वाले को 10 हजार रुपये मिलेंगे? इसपर दीपक ने हां में जवाब दिया। फिल्म के बारे में बात करते हुए दीपक ने बताया कि जो फिल्म के ट्रायल शोज हुए थे, उसमें फिल्म देखकर बहुत से लोग घबरा गए थे।
    फिल्म की पब्लिसिटी के लिए तुलसी रामसे ने निकाला था ये तोड़
    दीपक ने बताया फिल्म की पब्लिसिटी के लिए तुलसी रामसे का आइडिया था कि एक चैलेंज रखा जाएगा कि जो भी दीवार को सिनेमाघर में अकेले बैठकर देखेगा, उसे 10 हजार रुपये मिलेंगे। दीपक ने बताया कि उन लोगों ने एक एंबुलेस भी हॉल के बाहर रखी थी कि अगर आप देख रहे हैं फिल्म और आप घबरा जाते हैं, और आपको कुछ हो जाता है तो सुरक्षा के लिए एंबुलेंस बाहर रहे। हालांकि, दीपक ने बताया किसी ने भी दरवाजा को अकेले देखने का प्रयास नहीं किया।
    फिल्म में नजर आए थे ये कलाकार
    दरवाजा आज से 48 साल पहले रिलीज हुई थी। इस फिल्म में अनिल धवन, श्यामली, इम्तियाज खान, अंजू महेंद्रू, शक्ति कपूर, त्रिलोक कपूर और कृष्ण धवन जैसे कलाकार नजर आए थे। फिल्म को श्याम रामसे और तुलसी रामसे ने डायरेक्ट किया था।दरवाजा अपने समय की सबसे डरावनी फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस फिल्म का बहुत तगड़ा बज बन गया था और फिल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई थी। दरवाजा एक क्रिएचर हॉरर फिल्म थी।
  • कर्ज, टूटन और मौत के बीच लिखा गया अमर गीत, बेटे ने पूरा किया पिता का सपना

    कर्ज, टूटन और मौत के बीच लिखा गया अमर गीत, बेटे ने पूरा किया पिता का सपना


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसे गीत बने हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि इंसानी भावनाओं की गहराई को भी छूते हैं। ऐसा ही एक गीत है जीना यहां मरना यहां जो मेरा नाम जोकर का हिस्सा है। यह गीत आज भी लोगों के दिलों में बसता है और हर बार सुनने पर आंखें नम कर देता है। लेकिन इस गीत के पीछे की कहानी जितनी भावुक है उतनी ही दर्दनाक भी है।

    इस अमर गीत को आवाज दी थी मुकेश ने और इसके संगीतकार थे शंकर जयकिशन। लेकिन इस गीत की आत्मा थे इसके गीतकार शैलेंद्र जिन्होंने अपने जीवन के सबसे कठिन दौर में इसे लिखा। कहा जाता है कि यह गीत उनके निजी दर्द और संघर्ष का आईना है।

    दरअसल शैलेंद्र ने अपने करियर में एक फिल्म तीसरी कसम बनाई थी जिसे लेकर उन्हें काफी उम्मीदें थीं। लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इस असफलता ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और मानसिक तनाव ने उन्हें घेर लिया। इसी दौर में उनके करीबी दोस्त राज कपूर ने उनसे अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का आग्रह किया।

    जब शैलेंद्र राज कपूर से मिलने पहुंचे तो वे बेहद शांत और टूटे हुए नजर आए। राज कपूर ने फिल्म की कहानी और भावनाएं साझा कीं। उसी समय शैलेंद्र ने कागज पर गीत की शुरुआती पंक्तियां लिखीं। यह वही पंक्तियां थीं जो आगे चलकर इतिहास बन गईं। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। गीत पूरा होने से पहले ही शैलेंद्र की तबीयत बिगड़ गई और उनका निधन हो गया। उनके जाने से न केवल फिल्म जगत बल्कि राज कपूर भी गहरे सदमे में आ गए।

    राज कपूर इस गीत को अधूरा नहीं छोड़ना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने शैलेंद्र के बेटे शैली शैलेंद्र को यह जिम्मेदारी सौंपी। बेटे ने पिता के अधूरे शब्दों को पूरा किया और इस गीत को एक मुकाम तक पहुंचाया। यह सिर्फ एक गीत नहीं रहा बल्कि पिता-पुत्र के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया।

    फिल्म खुद भी संघर्ष की कहानी रही। राज कपूर ने इसे बनाने में अपनी पूरी पूंजी लगा दी यहां तक कि अपना घर भी गिरवी रख दिया। फिल्म बनने में करीब छह साल लगे लेकिन रिलीज के बाद यह बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो पाई। हालांकि समय के साथ यह फिल्म और इसका संगीत क्लासिक बन गया। आज जीना यहां मरना यहां सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि जीवन की सच्चाई और संघर्ष की कहानी बन चुका है। यह हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी सबसे खूबसूरत कला सबसे गहरे दर्द से जन्म लेती है।

  • फिल्म ‘गाइड’ की शूटिंग के दौरान सांप वाले सीन की मांग पर उठे सवाल और अभिनेत्री का स्पष्ट इनकार

    फिल्म ‘गाइड’ की शूटिंग के दौरान सांप वाले सीन की मांग पर उठे सवाल और अभिनेत्री का स्पष्ट इनकार

    नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री वहीदा रहमान ने अपने लंबे और सफल करियर में कई यादगार फिल्मों में काम किया है, लेकिन फिल्म ‘गाइड’ से जुड़ा एक पुराना किस्सा आज भी सबसे ज्यादा चर्चित घटनाओं में शामिल माना जाता है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है, जिसमें उनके अभिनय और डांस परफॉर्मेंस ने दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान सामने आया एक प्रसंग आज भी फिल्म जगत में दिलचस्प उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

    बताया जाता है कि फिल्म के अंग्रेजी संस्करण की शूटिंग के दौरान एक दृश्य को लेकर निर्देशक की ओर से एक असामान्य मांग सामने रखी गई थी। इस दृश्य में अभिनेत्री से अपेक्षा की गई थी कि डांस करते समय वह एक सांप के साथ ऐसा सीन करें जिसमें उसे चूमने जैसा भाव दिखाया जाए। यह सुझाव उस समय के हिसाब से काफी अप्रत्याशित और असहज करने वाला माना गया, जिससे सेट पर एक अलग तरह की स्थिति बन गई थी।

    वहीदा रहमान ने इस प्रस्ताव पर तुरंत अपनी असहमति व्यक्त की थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह उनके लिए सहज नहीं है और वह इस तरह का दृश्य करने में असमर्थ हैं। उनका मानना था कि केवल प्रभाव पैदा करने के लिए इस तरह की मांग उचित नहीं है और कलाकार की अपनी सीमाएं और सम्मान भी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने इस सीन को करने से साफ इनकार कर दिया था।

    इस घटना के बावजूद फिल्म की शूटिंग जारी रही और ‘गाइड’ को बाद में भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित फिल्मों में स्थान मिला। फिल्म में वहीदा रहमान के अभिनय और नृत्य को बेहद सराहा गया और यह फिल्म उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। दर्शकों ने उनके प्रदर्शन को काफी पसंद किया और यह फिल्म आज भी एक क्लासिक मानी जाती है।

    यह पूरा प्रसंग इस बात को दर्शाता है कि सिनेमा में रचनात्मकता के साथ कलाकार की सहमति और सहजता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। वहीदा रहमान का यह निर्णय यह साबित करता है कि एक कलाकार अपने सिद्धांतों पर कायम रहते हुए भी महान प्रदर्शन कर सकता है और अपने करियर में ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।

  • राज कपूर ने विरोध के बावजूद अपने रचनात्मक निर्णय पर कायम रहते हुए दिया बड़ा अवसर

    राज कपूर ने विरोध के बावजूद अपने रचनात्मक निर्णय पर कायम रहते हुए दिया बड़ा अवसर


    नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी कहानियां दर्ज हैं जो केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि पर्दे के पीछे के फैसलों और रचनात्मक सोच की मिसाल बन गईं। वर्ष 1982 में रिलीज हुई फिल्म प्रेम रोग भी ऐसी ही एक यादगार फिल्म रही, जिसने सामाजिक विषय को बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। विधवा विवाह जैसे मुद्दे पर आधारित इस फिल्म ने न केवल दर्शकों का ध्यान खींचा बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी मजबूत प्रदर्शन किया। फिल्म में ऋषि कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे की प्रमुख भूमिकाओं के साथ साथ रजा मुराद द्वारा निभाया गया ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह का किरदार भी गहरी छाप छोड़ने में सफल रहा।

    फिल्म के निर्माण से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए रजा मुराद का चयन शुरुआती दौर में पूरी तरह सहज नहीं था। उस समय वह इंडस्ट्री में स्थापित नाम नहीं थे और उनका करियर शुरुआती संघर्ष के दौर से गुजर रहा था। फिल्म के दायरे और किरदार की गंभीरता को देखते हुए कुछ लोगों को यह निर्णय उपयुक्त नहीं लगा और इसके खिलाफ मतभेद सामने आए। यहां तक कि कपूर परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से भी इस चयन को लेकर असहमति जताई गई थी।

    हालांकि इन सभी विरोधों के बीच फिल्म के प्रमुख रचनात्मक निर्णयों में राज कपूर का दृष्टिकोण सबसे मजबूत रहा। उन्होंने बिना पूर्वाग्रह के प्रतिभा को पहचानने की अपनी सोच पर भरोसा किया और रजा मुराद को इस किरदार के लिए अंतिम रूप से चुनने का निर्णय लिया। माना जाता है कि उन्होंने एक पुराने प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी और प्रभाव को देखते हुए यह निर्णय लिया था और उसी आधार पर उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त माना गया।

    फिल्म के सेट पर शुरुआत में माहौल औपचारिक और चुनौतीपूर्ण था, लेकिन जैसे जैसे शूटिंग आगे बढ़ी, रजा मुराद ने अपने अभिनय से सभी संदेहों को धीरे धीरे खत्म कर दिया। उनका किरदार न केवल कहानी का एक मजबूत स्तंभ बना बल्कि दर्शकों के बीच भी एक प्रभावशाली छवि छोड़ने में सफल रहा। उनके अभिनय की गंभीरता और संवादों की पकड़ ने इस भूमिका को और अधिक प्रभावी बना दिया।

    सबसे खास बात यह रही कि फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद वही लोग जिन्होंने शुरुआत में इस चयन पर सवाल उठाए थे, उन्होंने भी रजा मुराद के प्रदर्शन को सराहा। यह बदलाव इस बात का संकेत था कि सिनेमा में अंतिम मूल्यांकन हमेशा कलाकार के प्रदर्शन पर आधारित होता है, न कि शुरुआती धारणाओं पर। प्रेम रोग ने यह भी साबित किया कि एक सही निर्णय किसी कलाकार के करियर की दिशा पूरी तरह बदल सकता है।

    यह फिल्म उस दौर की उन चुनिंदा फिल्मों में शामिल हो गई जिसने न केवल सामाजिक विषय को गहराई से उठाया बल्कि पर्दे के पीछे की रचनात्मक सोच और साहसिक निर्णयों को भी उजागर किया। राज कपूर का यह निर्णय आज भी फिल्म निर्माण की दुनिया में एक प्रेरक उदाहरण के रूप में देखा जाता है जहां प्रतिभा को अवसर देना सबसे महत्वपूर्ण माना गया।

  • जब शूटिंग बनी हकीकत 1988 की इस फिल्म में सचमुच चाकू लगने पर भी एक्टिंग करते रहे नाना पाटेकर

    जब शूटिंग बनी हकीकत 1988 की इस फिल्म में सचमुच चाकू लगने पर भी एक्टिंग करते रहे नाना पाटेकर


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि समय के साथ एक मिसाल बन जाती हैं। साल 1988 में रिलीज हुई सलाम बॉम्बे! ऐसी ही एक कल्ट क्लासिक फिल्म है जिसने न सिर्फ दर्शकों का दिल जीता बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई। बेहद कम बजट में बनी इस फिल्म ने अपनी सशक्त कहानी और दमदार अभिनय के दम पर तीन राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए और ऑस्कर तक का सफर तय किया।

    इस फिल्म का निर्देशन मीरा नायर ने किया था और इसमें नाना पाटेकर रघुबीर यादव और बाल कलाकार शफीक सैयद जैसे कलाकार नजर आए थे। फिल्म का रनटाइम करीब 1 घंटा 35 मिनट था लेकिन इसकी कहानी और प्रभाव लंबे समय तक दर्शकों के दिलो दिमाग में बना रहा।

    इस फिल्म से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जो आज भी लोगों को हैरान कर देता है। दरअसल फिल्म के क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग के दौरान एक खतरनाक हादसा हो गया था। सीन के मुताबिक शफीक सैयद का किरदार कृष्णा नाना पाटेकर के किरदार पर चाकू से हमला करता है। इस सीन को फिल्माने के लिए पूरी तैयारी की गई थी और सुरक्षा के तौर पर नाना पाटेकर के पेट पर टायर बांधा गया था ताकि चाकू उन्हें नुकसान न पहुंचा सके।

    लेकिन शूटिंग के दौरान एक छोटी सी चूक भारी पड़ गई। जब शफीक सैयद ने सीन के अनुसार चाकू मारा तो वह टायर को पार करते हुए सच में नाना पाटेकर के पेट में जा लगा। इससे उनके पेट से खून बहने लगा लेकिन हैरानी की बात यह रही कि नाना पाटेकर ने सीन को बीच में नहीं रोका और अभिनय जारी रखा। सेट पर मौजूद लोगों को लगा कि यह सब उनकी शानदार एक्टिंग का हिस्सा है और वे उनकी तारीफ करने लगे।

    कुछ देर बाद जब स्थिति स्पष्ट हुई तब सभी को एहसास हुआ कि यह कोई अभिनय नहीं बल्कि असली हादसा था। इसके बाद तुरंत उनका इलाज कराया गया। यह घटना नाना पाटेकर की प्रोफेशनलिज्म और अपने काम के प्रति समर्पण को दर्शाती है। फिल्म की बात करें तो करीब 20 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने लगभग 45 लाख की कमाई की थी और बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुई थी। आज भी इसकी IMDb रेटिंग 7.9 के आसपास बनी हुई है जो इसकी गुणवत्ता को दर्शाती है।

    पुरस्कारों की बात करें तो सलाम बॉम्बे! ने 1989 में तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। शफीक सैयद को बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला जबकि मीरा नायर को बेस्ट रीजनल फिल्म के लिए सम्मानित किया गया। इसके अलावा फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।इस फिल्म ने एक और बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। मदर इंडिया के बाद यह दूसरी भारतीय फिल्म बनी जिसे ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट किया गया।

    कुल मिलाकर सलाम बॉम्बे सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा का एक ऐसा अध्याय है जिसमें संघर्ष, यथार्थ और सिनेमा की ताकत का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। आज भी यह फिल्म और इससे जुड़ी कहानियां लोगों को उतना ही प्रभावित करती हैं जितना इसके रिलीज के समय करती थीं।

  • सलीम खान की सबसे हाई IMDb रेटिंग वाली फिल्में, नंबर वन पर शोले नहीं बल्कि साउथ की यह फिल्म

    सलीम खान की सबसे हाई IMDb रेटिंग वाली फिल्में, नंबर वन पर शोले नहीं बल्कि साउथ की यह फिल्म


    नई दिल्ली । सलीम खान ने भारतीय सिनेमा जगत को एक अलग ही स्तर पर लेकर जाने का काम किया है। उन्होंने बॉलीवुड को बेशुमार हिट फिल्में दी हैं, लेकिन अगर आपने उनकी सभी फिल्में नहीं देखी हैं, तो कम से कम ये 7 फिल्में तो जरूर देखनी चाहिए।
    त्रिशूल
    साल 1978 में आई अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की यह फिल्म सुपरहिट थी। फिल्म की कहानी काफी इंगेजिंग है और इसे IMDb पर 7.6 रेटिंग मिली हुई है। यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी यह फिल्म आज भी लोगों की पहली पसंद है। टॉप 7 की लिस्ट में यह फिल्म सातवें नंबर पर है।

    काला पत्थर

    एक बड़ा इत्तेफाक यह है कि सलीम खान की ज्यादातर हिट फिल्में अमिताभ बच्चन के साथ ही रही हैं। साल 1978 में आई इस फिल्म की IMDb रेटिंग 7.6 है। फिल्म की कहानी कोयला खदानों में होने वाली सच्ची घटनाओं पर आधारित थी और इसने लोगों को झकझोर कर रख दिया था। टॉप 7 लिस्ट में यह छठवें नंबर पर है।

    डॉन

    सलीम खान की सबसे आइकॉनिक फिल्मों में इसे 5वें नंबर पर रखा जाता है। इसमें भी अमिताभ बच्चन ने लीड रोल प्ले किया था। फिल्म की कहानी एक अंडरवर्ल्ड डॉन को काफी हीरोइक अंदाज में पेश करती है। इसकी IMDb पर रेटिंग 7.7 है।

    मिस्टर इंडिया

    उस दौर में जब लोग सीधी-साधी कहानियों पर जान छिड़कते थे, सलीम खान ने एक ऐसे शख्स की कहानी लेकर आए जो एक जादुई घड़ी पहनकर गायब हो सकता था। साल 1978 में आई इस फिल्म की IMDb रेटिंग 7.7 है और टॉप 7 की लिस्ट में यह चौथे नंबर पर है।

    दीवार

    अमिताभ बच्चन को उनकी कुछ सबसे आइकॉनिक फिल्में सलीम खान की मेहरबानी से ही मिली हैं। सलीम खान की लिखी ‘दीवार’ साल 1975 में रिलीज हुई थी। फिल्म की IMDb पर रेटिंग 8.0 है और टॉप 7 की लिस्ट में यह तीसरे नंबर पर काबिज है।

    शोले

    अब बात करें टॉप 2 की तो बेशक इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर है साल 1975 में आई फिल्म ‘शोले’। इस फिल्म की IMDb पर रेटिंग 8.1 है और इसमें अमिताभ बच्चन के साथ धर्मेंद्र लीड रोल प्ले करते नजर आए थे।

    प्रेमड़ा कईके

    शायद ही आपने यह सोचा हो, लेकिन सलीम खान की सबसे हाई IMDb रेटिंग वाली फिल्म हिंदी में नहीं है। साल 1976 में आई फिल्म ‘प्रेमड़ा कईके’ सलीम खान की सबसे हाई IMDb रेटिंग (8.7) वाली फिल्म है। सलीम खान की टॉप 7 फिल्मों की लिस्ट में यह नंबर 1 पर है।