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  • जानिए रुपहले पर्दे पर राज करने वाले कपूर परिवार के 8 सदस्यों की मौत की असली वजह

    जानिए रुपहले पर्दे पर राज करने वाले कपूर परिवार के 8 सदस्यों की मौत की असली वजह

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा जगत में दशकों तक एकछत्र राज करने वाले और भारतीय फिल्म उद्योग को वैश्विक पहचान दिलाने वाले प्रतिष्ठित कपूर परिवार का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, स्वास्थ्य के मोर्चे पर इस परिवार का संघर्ष उतना ही त्रासद रहा है। पृथ्वीराज कपूर से लेकर वर्तमान पीढ़ी के रणबीर कपूर तक, इस कुनबे ने भारतीय सिनेमा को कई नायाब फिल्ममेकर और अभिनेता दिए हैं। हालांकि, पर्दे पर करोड़ों दिलों को जीतने वाले इस परिवार के कई दिग्गज सदस्यों को बेहद कम उम्र में गंभीर बीमारियों के कारण दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। इस परिवार के आठ प्रमुख सदस्यों की जीवन यात्रा और उनकी मृत्यु के कारणों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि कैंसर, हृदय घात और क्रॉनिक बीमारियां इस प्रतिष्ठित परिवार के लिए बेहद घातक साबित हुईं।

    कपूर खानदान की नींव रखने वाले महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर, जिन्होंने ऐतिहासिक फिल्म मुगल-ए-आजम में सम्राट अकबर की भूमिका निभाकर अभिनय के नए मापदंड स्थापित किए थे, वह अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित हो गए थे। वर्ष 1972 में मात्र 65 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। इस त्रासदी का सबसे संवेदनशील पहलू यह रहा कि उनकी पत्नी रामसरनी मेहरा भी इसी घातक बीमारी से ग्रसित थीं और अपने पति के निधन के ठीक 16 दिन बाद उन्होंने भी दम तोड़ दिया। इसी तरह, पृथ्वीराज कपूर के छोटे भाई और अपने दौर के बेहद सफल अभिनेता त्रिलोक कपूर का निधन वर्ष 1988 में 76 वर्ष की आयु में अचानक आए तीव्र हृदय घात के कारण हुआ था।

    भारतीय सिनेमा के ‘शोमैन’ कहे जाने वाले राज कपूर का अंतिम समय बेहद कष्टदायक रहा। गंभीर अस्थमा से पीड़ित राज कपूर को मई 1988 में एक पुरस्कार समारोह के दौरान दिल्ली में सांस का तीव्र दौरा पड़ा था। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराने के बाद चिकित्सकों को ज्ञात हुआ कि उनका निमोनिया बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच चुका था। लगभग एक महीने तक वेंटिलेटर और कोमा में रहने के बाद आखिरकार 2 जून 1988 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके नक्शेकदम पर चलते हुए सिनेमा को नई ऊर्जा देने वाले उनके भाई शम्मी कपूर अपने अंतिम वर्षों में गुर्दे की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, जिसके कारण 14 अगस्त 2011 को उनका निधन हो गया। वहीं, अपनी उत्कृष्ट संवाद अदायगी के लिए विख्यात शशि कपूर का वर्ष 2017 में सीने में संक्रमण और लंबे समय से चल रही अस्वस्थता के चलते मुंबई के एक अस्पताल में निधन हुआ था।

    राज कपूर की अगली पीढ़ी भी इन गंभीर आनुवंशिक और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से अछूती नहीं रही। उनकी बड़ी बेटी रितु नंदा का निधन वर्ष 2020 में कैंसर के कारण हुआ था। इसके कुछ ही समय बाद, हिंदी सिनेमा के सबसे रोमांटिक और ऊर्जावान अभिनेताओं में शुमार ऋषि कपूर भी ल्यूकेमिया यानी ब्लड कैंसर की चपेट में आ गए। अमेरिका में लंबे समय तक चले उपचार के बाद वह ठीक होकर भारत लौटे थे, किंतु संक्रमण और बीमारी के दोबारा उभरने के कारण 30 अप्रैल 2020 को उनका देहावसान हो गया। इस सिलसिले में सबसे कम उम्र में दुनिया छोड़ने वाले सदस्य राजीव कपूर रहे, जो राज कपूर के सबसे छोटे बेटे थे। फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ से लोकप्रियता हासिल करने वाले राजीव कपूर वर्ष 2021 में मात्र 58 वर्ष की आयु में तीव्र हृदय घात का शिकार हो गए और 60 की उम्र भी पार नहीं कर सके। इस प्रकार, इस महान कलात्मक परिवार के स्वास्थ्य इतिहास में कैंसर और हृदय संबंधी बीमारियां सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरीं।

  • अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की सफल जोड़ी दशकों पुराने इस कल्ट क्लासिक शीर्षक के साथ बड़े पर्दे पर वापसी कर रही है।

    अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की सफल जोड़ी दशकों पुराने इस कल्ट क्लासिक शीर्षक के साथ बड़े पर्दे पर वापसी कर रही है।

    नई दिल्ली:   भारतीय सिनेमा के विकास क्रम में साठ का दशक एक ऐसा समय था जब मनोरंजन की नई विधाएं जन्म ले रही थीं। उस दौर में जब दर्शक मुख्य रूप से सामाजिक और रूमानी फिल्मों को पसंद करते थे तब दिग्गज कलाकार महमूद ने एक बड़ा जोखिम उठाया। उन्होंने वर्ष 1965 में फिल्म भूत बंगला के जरिए दर्शकों को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराया जहां डर के साये में हंसी के ठहाके गूंजते थे।
    लगभग दो घंटे पच्चीस मिनट की यह फिल्म न केवल उस समय की सफलतम फिल्मों में शामिल हुई बल्कि इसने आने वाले समय के लिए एक नई शैली की नींव भी रखी। यह फिल्म आज भी उन सिने प्रेमियों के लिए एक मिसाल है जो सस्पेंस और हास्य के सटीक संतुलन को समझना चाहते हैं। उस समय के सीमित संसाधनों के बावजूद इस फिल्म ने जो प्रभाव पैदा किया वह आज के आधुनिक तकनीक वाले दौर में भी दुर्लभ प्रतीत होता है।

    महमूद ने इस फिल्म में न केवल मुख्य भूमिका निभाई बल्कि इसके निर्देशन की जिम्मेदारी भी बहुत कुशलता से संभाली। उनकी रचनात्मक दृष्टि का ही परिणाम था कि फिल्म का हर दृश्य दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल रहा। फिल्म में अभिनेत्री तनुजा और महान संगीतकार आरडी बर्मन की उपस्थिति ने इसमें चार चांद लगा दिए थे।

    आरडी बर्मन के संगीत ने उस समय की फिल्म संगीत की दिशा बदल दी थी और आज भी वे धुनें लोगों के कानों में रस घोलती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म के जरिए ही पंचम दा के नाम से मशहूर इस महान संगीतकार ने अभिनय की दुनिया में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। उनकी जादुई धुनों और महमूद की शानदार कॉमेडी ने मिलकर एक ऐसा सिनेमाई अनुभव प्रदान किया जो छह दशक बीत जाने के बाद भी भारतीय दर्शकों के जेहन में ताजा है।

    वर्तमान समय में जब भारतीय सिनेमा एक बार फिर अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है तो साठ के दशक की उन यादों का ताजा होना स्वाभाविक है। हाल ही में फिल्म जगत में एक बड़ी घोषणा ने हलचल मचा दी है जब अक्षय कुमार और निर्देशक प्रियदर्शन की जोड़ी के एक नए प्रोजेक्ट की जानकारी सामने आई।

    इस प्रोजेक्ट का शीर्षक भी वही रखा गया है जिसने साठ के दशक में अपनी अनूठी कहानी से तहलका मचाया था। अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी ने पहले भी दर्शकों को कई बेहतरीन कॉमेडी फिल्में दी हैं जिससे प्रशंसकों के बीच उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। यह देखना वास्तव में दिलचस्प है कि तकनीक के इस आधुनिक युग में पुराने दौर की उस सादगी और स्वाभाविक डर को किस तरह नए कलेवर में पेश किया जाएगा ताकि वह नई पीढ़ी को भी उसी तरह प्रभावित कर सके।

    हॉरर कॉमेडी एक ऐसी कठिन विधा है जिसमें संतुलन बनाना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि कहानी में डर की मात्रा अधिक हो जाए तो वह शुद्ध हॉरर फिल्म बन जाती है और यदि हंसी ज्यादा हो जाए तो वह केवल एक साधारण कॉमेडी बनकर रह जाती है। महमूद ने 1965 में इस बारीक अंतर को बहुत संजीदगी से पकड़ा था और एक संतुलित पटकथा तैयार की थी।

    उस समय की तकनीकी सीमाओं के बावजूद उन्होंने छायांकन और ध्वनि के प्रभावी उपयोग से एक ऐसा रहस्यमयी माहौल बनाया जिसने लोगों को अपनी कुर्सियों से उछलने पर मजबूर कर दिया। आज के दौर में जब फिल्म निर्माण की प्रक्रिया बहुत महंगी और जटिल हो गई है तब भी उन पुरानी फिल्मों की कहानी और उनके पात्रों की गहराई अतुलनीय लगती है। नई फिल्म से दर्शकों को यही अपेक्षा है कि वह उस ऐतिहासिक विरासत का सम्मान करते हुए मनोरंजन का एक नया मानदंड स्थापित करेगी।

    भारतीय दर्शक हमेशा से ही विविधतापूर्ण और मौलिक कहानियों के प्रति आकर्षित रहे हैं। साठ के दशक की उस फिल्म ने न केवल व्यावसायिक सफलता हासिल की बल्कि उसने भविष्य के फिल्मकारों को यह साहस भी दिया कि वे लीक से हटकर प्रयोग कर सकें। आज की पीढ़ी के लिए वह पुरानी फिल्म एक ऐसे अध्याय की तरह है जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ सिनेमाई बारीकियों का अद्भुत समावेश था।

    अक्षय कुमार का इस शैली में वापस आना और उसी ऐतिहासिक शीर्षक का चयन करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अच्छी कहानियों और प्रभावशाली विषयों की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होती। आने वाले समय में यह नया प्रोजेक्ट निश्चित रूप से सिनेमा प्रेमियों के बीच व्यापक चर्चा का विषय बना रहेगा और यह साबित करेगा कि कला का कोई अंत नहीं होता बल्कि वह समय के साथ और भी निखरती जाती है।