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  • 20 साल बाद इस्माइल दरबार का दमदार कमबैक, बेटे जैद ने लौटाई खोई पहचान; इंडियन आइडल के मंच पर छलके आंसू

    20 साल बाद इस्माइल दरबार का दमदार कमबैक, बेटे जैद ने लौटाई खोई पहचान; इंडियन आइडल के मंच पर छलके आंसू


    नई दिल्ली। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर संगीतकार Ismail Darbar एक बार फिर सुर्खियों में हैं। अपने मधुर संगीत और यादगार धुनों से लाखों दिलों पर राज करने वाले इस्माइल दरबार ने करीब 20 साल बाद संगीत की दुनिया में शानदार वापसी की है। इस खास वापसी के पीछे किसी निर्माता, निर्देशक या बड़ी म्यूजिक कंपनी का हाथ नहीं, बल्कि उनके बेटे Zaid Darbar का अटूट विश्वास और मेहनत है।

    बीते कई वर्षों से इस्माइल दरबार फिल्मी दुनिया और संगीत के मुख्यधारा मंचों से दूर थे। हालांकि उनके प्रशंसक आज भी उनकी रचनाओं को उतना ही पसंद करते हैं, लेकिन निजी कारणों और फिल्म निर्माताओं के साथ रचनात्मक मतभेदों के चलते उन्होंने धीरे-धीरे काम करना कम कर दिया था। ऐसे में उनके करियर का यह नया अध्याय न सिर्फ उनके लिए बल्कि उनके चाहने वालों के लिए भी बेहद खास बन गया है।

    हाल ही में लोकप्रिय टीवी शो Indian Idol के मंच पर इस्माइल दरबार और उनके बेटे जैद दरबार ने इस खुशखबरी को साझा किया। इस दौरान इस्माइल दरबार ने खुलकर बताया कि लंबे समय से जैद उन्हें फिर से संगीत की दुनिया में सक्रिय होने के लिए प्रेरित कर रहे थे।

    उन्होंने कहा कि जैद अक्सर उनसे पूछते थे कि वे काम क्यों नहीं कर रहे हैं। इस्माइल ने बताया कि उन्हें लगता था कि वे जिस तरह का संगीत बनाना चाहते हैं, उसे वह स्वतंत्र रूप से नहीं कर पा रहे थे। इसी वजह से उन्होंने खुद को काम से दूर कर लिया था। लेकिन बेटे ने हार नहीं मानी।

    इस्माइल दरबार के अनुसार, जैद ने उनके नाम से एक यूट्यूब चैनल तैयार किया और उनसे कहा कि अब वे किसी के दबाव या नियंत्रण के बिना अपनी पसंद का संगीत बना सकते हैं। यही बात उन्हें दोबारा संगीत रचना के लिए प्रेरित कर गई। अब इस प्लेटफॉर्म के जरिए इस्माइल दरबार अपना स्वतंत्र संगीत सीधे दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं।

    कार्यक्रम के दौरान इस्माइल दरबार ने अपने बेटे की जमकर तारीफ की। उन्होंने भावुक होकर कहा कि जिस तरह एक पिता अपने बेटे के लिए मेहनत करता है, वैसा ही काम यहां बेटा अपने पिता के लिए कर रहा है। यह सुनकर जैद दरबार भावुक हो गए और मंच पर ही उनकी आंखें नम हो गईं।

    पिता-पुत्र के इस भावनात्मक पल ने दर्शकों और सोशल मीडिया यूजर्स का दिल जीत लिया। फैंस जैद दरबार की सराहना करते हुए उन्हें एक आदर्श बेटे का उदाहरण बता रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि आज के दौर में जहां रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं, वहां जैद ने अपने पिता के सपनों को फिर से जीवित कर एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है।

    इस्माइल दरबार की वापसी संगीत प्रेमियों के लिए किसी खुशखबरी से कम नहीं है। अब उनके प्रशंसक उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले समय में वे एक बार फिर अपनी जादुई धुनों से संगीत जगत में नया इतिहास रचेंगे।

  • गाने ने बदल दिया इतिहास, किशोर कुमार की बात आखिरकार साबित हुई सही

    गाने ने बदल दिया इतिहास, किशोर कुमार की बात आखिरकार साबित हुई सही


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज पार्श्वगायक किशोर कुमार अपनी बेहतरीन आवाज और बहुआयामी प्रतिभा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हजारों गीत गाए, जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं। उनके एक खास गाने “मेरे ये गीत याद रखना” को लेकर एक बेहद भावुक किस्सा जुड़ा है, जिसे फिल्म चलते-चलते के लिए रिकॉर्ड किया गया था।

    गाते-गाते भावुक हो उठे थे किशोर कुमार
    कहा जाता है कि जब किशोर कुमार इस गाने को रिकॉर्ड कर रहे थे, तब वह बार-बार भावुक हो जाते थे। गीत के बोल और संगीत ने उनकी निजी यादों को ताजा कर दिया, जिससे उनकी आंखें नम हो जाती थीं। रिकॉर्डिंग के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि उन्हें खुद को संभालना पड़ा, क्योंकि गाने की भावनात्मक गहराई उन्हें भीतर तक छू रही थी।

    ‘ये गाना हिट होगा’ किशोर कुमार की भविष्यवाणी
    इस गाने को लेकर एक दिलचस्प बात यह भी कही जाती है कि किशोर कुमार ने इसके रिकॉर्डिंग के दौरान ही कह दिया था कि यह गीत दर्शकों के दिलों में जगह बनाएगा। उनकी यह बात आगे चलकर सही साबित हुई और यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय माना जाता है।

    संगीत और फिल्म की यादगार टीम
    यह गीत फिल्म चलते-चलते का हिस्सा था, जिसमें कलाकारों की भूमिका भी बेहद यादगार रही। इसके बोल लेखक अमित खन्ना ने लिखे थे, जबकि संगीत निर्देशन बप्पी लाहिड़ी ने किया था। बप्पी लाहिड़ी ने इस गीत के लिए ऐसी धुन तैयार की थी जो सीधे दिल को छू जाए, और यही इसकी सफलता का बड़ा कारण बनी।

    किशोर कुमार की विरासत
    किशोर कुमार सिर्फ गायक ही नहीं, बल्कि अभिनेता, निर्देशक और निर्माता भी थे। उन्होंने अपने करियर में हजारों गाने गाए और कई सुपरस्टार्स के लिए अपनी आवाज दी। उनकी गायकी की खासियत यह थी कि वह हर तरह के गीत रोमांटिक, दर्दभरे, भजन या मस्तीभरे सबमें समान रूप से जान डाल देते थे।

    एक अमर कलाकार की अमर कहानी
    किशोर कुमार का नाम भारतीय संगीत इतिहास में हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उनकी आवाज, उनका अंदाज और उनके गीत आज भी लोगों को भावनाओं से जोड़ते हैं। यह किस्सा उनके उसी जादू को याद दिलाता है, जो उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाता है।

  • मोहम्मद रफी का वो किस्सा, रीटेक से इनकार कर फिर गाया अमर गीत

    मोहम्मद रफी का वो किस्सा, रीटेक से इनकार कर फिर गाया अमर गीत


    नई दिल्ली । बॉलीवुड की क्लासिक फिल्म जंजीर का गाना “दीवाने हैं दीवानों को” आज भी श्रोताओं के दिलों में बसा हुआ है। इस गाने को संगीत दिया था मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने, जबकि इसके बोल लिखे थे गीतकार गुलशन बावरा ने। रिकॉर्डिंग के दौरान जब यह गाना पहली बार तैयार हुआ, तो इसे सभी ने पसंद किया। खासकर लता मंगेशकर का गाया हिस्सा बेहद प्रभावशाली माना गया। लेकिन लता जी अपने काम में पूर्णता की पक्षधर थीं, इसलिए उन्होंने एक और रीटेक की मांग रख दी।

    स्टूडियो में बढ़ा तनाव, लेकिन रफ़ी ने क्यों किया इनकार?
    रीटेक की बात जब मोहम्मद रफ़ी तक पहुंची, तो उन्होंने शुरुआत में साफ इनकार कर दिया। वजह बेहद इंसानी थी-वे उस समय रोज़े में थे और सुबह से उन्होंने न तो खाना खाया था और न ही पानी पिया था। उनकी हालत ऐसी थी कि दोबारा उसी ऊर्जा और भाव के साथ गाना उनके लिए कठिन हो रहा था। इसी कारण उन्होंने स्टूडियो छोड़ने का फैसला कर लिया।

    अचानक बदला माहौल, और फिर लौटे स्टूडियो
    जैसे ही रफ़ी साहब स्टूडियो से बाहर निकले, उनकी मुलाकात गीतकार गुलशन बावरा से हुई। उन्होंने उत्साहित होकर बताया कि फिल्म में यह गाना वही गा रहे हैं। यह सुनकर रफ़ी साहब चौंक गए, क्योंकि उन्होंने गाना अमिताभ बच्चन के हावभाव और व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर गाया था। यह एहसास उन्हें वापस स्टूडियो खींच लाया। उन्होंने बिना देर किए फिर से रिकॉर्डिंग करने का फैसला किया।

    भूखे-प्यासे फिर गूंज उठी आवाज़ और बन गया इतिहास
    इसके बाद मोहम्मद रफ़ी ने उसी हालत में, बिना कुछ खाए-पिए, दोबारा गाना रिकॉर्ड किया। इस बार उनकी आवाज में और भी गहराई, भाव और दर्द महसूस किया गया। रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना रिलीज़ होते ही सुपरहिट साबित हुआ। यह किस्सा आज भी संगीत जगत में अनुशासन, समर्पण और कला के प्रति जुनून की मिसाल के रूप में याद किया जाता है।

    संगीत की दुनिया का अमर सबक
    यह घटना सिर्फ एक गाने की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के कलाकारों की संवेदनशीलता और प्रोफेशनलिज्म का प्रतीक है। लता मंगेशकर की परफेक्शन की चाह और रफ़ी साहब की भावनात्मक प्रतिबद्धता ने इस गाने को अमर बना दिया। आज भी जब यह गीत बजता है, तो श्रोता सिर्फ संगीत नहीं सुनते, बल्कि उस संघर्ष और समर्पण को महसूस करते हैं जो इसके पीछे छिपा है।

  • संगीत की साधना: बचपन से शुरू हुआ सफर और फिल्मी दुनिया में नाम का अनोखा रहस्य

    संगीत की साधना: बचपन से शुरू हुआ सफर और फिल्मी दुनिया में नाम का अनोखा रहस्य


    नई दिल्ली। भारतीय संगीत जगत में ऐसे कलाकार कम ही होते हैं जिनकी साधना और मेहनत जीवनभर चमकती रहती है। साधना सरगम भी ऐसे ही संगीत की साधक हैं, जिनकी आवाज ने फिल्म और शास्त्रीय संगीत में खास जगह बनाई। उनके नाम और संगीत सफर से जुड़े कई मजेदार किस्से कम ही लोग जानते हैं।

    प्लेबैक सिंगर साधना सरगम का असली नाम साधना घाणेकर है। उन्होंने अपने नाम के पीछे की कहानी बताते हुए कहा कि माता-पिता ने उन्हें साधना इसलिए नाम दिया ताकि जीवन भर संगीत की साधना याद रहे। जब वे शिमला प्रोग्राम के लिए कल्याणजी-आनंदजी के पास गईं, तो उन्होंने सुझाव दिया कि नाम में सरगम जोड़ दें। साधना ने तुरंत हां कर दी और तब से उनका नाम साधना सरगम फिल्मी दुनिया में मशहूर हो गया।

    साधना ने अपने शुरुआती संगीत सफर के बारे में बताया कि चार साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था। घर में शास्त्रीय संगीत का माहौल था क्योंकि उनकी मां नीला घाणेकर संगीत सिखाती थीं। शुरुआत में उनका सपना केवल शास्त्रीय गायिका बनने का था। उन्हें सेंट्रल गवर्नमेंट स्कॉलरशिप मिली और पंडित जसराज के पास शास्त्रीय शिक्षा का अवसर मिला। लेकिन बाद में प्लेबैक सिंगिंग की ओर उनका रुझान बढ़ा। साधना ने बताया कि तीन मिनट में गाने की परफेक्शन पाने की चुनौती उतनी ही कठिन है जितनी तीन घंटे का शास्त्रीय गायन।

    उनकी पहली रिकॉर्डिंग महज पांच साल की उम्र में वसंत देसाई के साथ हुई थी। मराठी कविता पर आधारित गीत में उन्होंने अपनी गुड़िया साथ रखी थी। फिल्म ‘गुड्डी’ के गाने “हमको मन की शक्ति देना” के जरिए उन्होंने कल्याणजी-आनंदजी को प्रभावित किया और अपना पहला मौका पाया।

    साधना सरगम ने अपने प्रेरणा स्रोतों का भी जिक्र किया। उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार, मुकेश और मोहम्मद रफी का नाम लिया। उनका कहना है कि इन कलाकारों की आवाज सुनकर लगता है कि संगीत कितनी ऊंचाई छू सकता है। लता जी ने उन्हें सिखाया कि सुर सही जगह पर लगना ही असली एक्सप्रेशन है।

    मराठी परिवार से होने के बावजूद उन्होंने हिंदी-उर्दू उच्चारण पर ध्यान दिया। मौलवी सैय्यद अहमद सैय्यद से उर्दू पढ़-लिखी, जिससे फिल्म ‘कलिंगा’ में दिलीप कुमार के सामने गाने का आत्मविश्वास मिला।

    साधना सरगम का लक्ष्य हमेशा साफ रहा है: संगीत के जरिए लोगों को सुकून देना। वह कहती हैं कि अच्छा इंसान बनना अच्छे सिंगर बनने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। आज भी वे रोज रियाज करती हैं और संगीत की साधना को कभी कम नहीं होने देतीं। उनकी यह लगन और मेहनत उन्हें भारतीय संगीत जगत की खास पहचान देती है।

  • पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट

    पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट


    नई दिल्ली।भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में अगर किसी संगीतकार को सबसे ज्यादा प्रयोगधर्मी और क्रिएटिव कहा जाता है तो वह हैं Rahul Dev Burman जिन्हें दुनिया प्यार से पंचम दा के नाम से जानती है। आरडी बर्मन को लोग यूं ही मैड जीनियस नहीं कहते थे। उनके संगीत में ऐसी अनोखी कल्पनाशीलता थी जिसे आज भी दोहराना आसान नहीं है। पंचम दा जब भी किसी गाने की रिकॉर्डिंग करते थे तो सिर्फ पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर निर्भर नहीं रहते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों से भी ऐसी आवाजें निकाल लेते थे जो गाने में नई जान भर देती थीं।

    उनकी इसी क्रिएटिव सोच का एक दिलचस्प उदाहरण 1968 में आई फिल्म Padosan के सुपरहिट गाने Mere Samne Wali Khidki Mein में देखने को मिलता है। यह गाना उस दौर में जितना लोकप्रिय था उतना ही आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। अक्सर लोग इस गाने को गुनगुनाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने में एक खास साउंड किसी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट से नहीं बल्कि एक साधारण कंघी से निकाला गया था।

    दरअसल फिल्म में Sunil Dutt एक शरारती पड़ोसी की भूमिका निभाते हैं जो सामने वाली खिड़की में रहने वाली लड़की को अपने अंदाज में रिझाने की कोशिश करता है। गाने का माहौल भी हल्का फुल्का और शरारत से भरा हुआ है। जब इस गाने की रिकॉर्डिंग की तैयारी चल रही थी तब पंचम दा को लग रहा था कि गाने में कुछ ऐसा होना चाहिए जो उसकी मस्ती और शरारत को और ज्यादा उभार सके। स्टूडियो में उस समय बड़े बड़े संगीतकार मौजूद थे। वायलिन, गिटार और कई अन्य वाद्ययंत्र तैयार थे लेकिन पंचम दा को कुछ अलग चाहिए था।

    बताया जाता है कि काफी देर सोचने के बाद अचानक पंचम दा ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक साधारण प्लास्टिक की कंघी निकाल ली। इसके बाद उन्होंने उस कंघी को एक खुरदुरी सतह पर रगड़ना शुरू किया। जैसे ही उससे कर्र कर्र जैसी आवाज निकली पंचम दा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्हें लगा कि यही वह साउंड है जो गाने के शरारती मूड को और दिलचस्प बना सकता है।

    स्टूडियो में मौजूद लोग पहले तो यह देखकर हैरान रह गए कि एक मशहूर संगीतकार रिकॉर्डिंग के दौरान कंघी से आवाज निकालने की कोशिश कर रहा है। खासतौर पर गायक Kishore Kumar को यह दृश्य काफी मजेदार लगा। उन्होंने पंचम दा को देखकर मजाक किया और सिर पकड़ लिया। लेकिन जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना तैयार हुआ तो हर कोई उनकी प्रतिभा का कायल हो गया।

    गाने की शुरुआत और बैकग्राउंड में जो हल्की क्रिक क्रिक जैसी आवाज सुनाई देती है वह असल में उसी कंघी से पैदा की गई थी। यह छोटी सी ध्वनि गाने में एक अलग तरह की मस्ती और चुलबुलापन जोड़ देती है। यही वजह है कि आज भी यह गाना सुनते समय श्रोताओं को अलग आनंद मिलता है भले ही वे उस साउंड के पीछे की कहानी से अनजान हों।

    आरडी बर्मन की खासियत यही थी कि वे संगीत को सिर्फ सुर और ताल तक सीमित नहीं रखते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों को भी संगीत का हिस्सा बना देते थे। कभी पानी की छपाक, कभी कांच की बोतल की टनकार और कभी चम्मच और ग्लास की आवाजें उनके गानों में सुनाई देती थीं। उनकी यही प्रयोगधर्मिता उन्हें बाकी संगीतकारों से अलग बनाती है।

    आज जब लोग इस गाने को ध्यान से सुनते हैं और कंघी से निकली उस आवाज़ को पहचानने की कोशिश करते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि पंचम दा की क्रिएटिविटी कितनी अनोखी थी। यही कारण है कि दशकों बाद भी आरडी बर्मन का संगीत उतना ही ताजा और दिलचस्प लगता है जितना अपने दौर में था।

  • बिग बॉस 19 के फाइनलिस्ट अमाल मलिक ने शेयर किया अपने संघर्ष का अनसुना सच

    बिग बॉस 19 के फाइनलिस्ट अमाल मलिक ने शेयर किया अपने संघर्ष का अनसुना सच

    नई दिल्ली :म्यूजिक कंपोजर और बिग बॉस 19 के फाइनलिस्ट अमाल मलिक आज भले ही इंडस्ट्री का एक बड़ा नाम बन गए हों लेकिन उनके सफर की शुरुआत आसान नहीं थी बिग बॉस 19 में नजर आने के बाद अमाल लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं और उन्होंने अपनी निजी जिंदगी से जुड़े कई अनसुने किस्से साझा किए हाल ही में एक इंटरव्यू में अमाल ने बताया कि उनके सरनेम ने उन्हें इंडस्ट्री में संघर्ष के लिए मजबूर किया

    अमाल का जन्म एक मशहूर म्यूजिकल परिवार में हुआ लेकिन शुरुआती सालों में इंडस्ट्री ने उन्हें खुले दिल से स्वीकार नहीं किया उन्होंने बताया कि कई बार उन्हें केवल उनके सरनेम की वजह से काम से निकाल दिया गया लोग यह सोचते थे कि वह अपने परिवार के नाम का फायदा उठा सकते हैं या म्यूजिक बेच सकते हैं इस गलतफहमी की वजह से कई बार उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी और यह अनुभव उनके भाई अरमान मलिक के साथ भी साझा रहा

    अमाल ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि पंद्रह से पच्चीस साल की उम्र के बीच उन्होंने करीब दस साल तक लगातार मेहनत की इस दौर को आम लोग अक्सर अलग नजरिए से देखते हैं लेकिन उनके लिए यह समय सीखने और खुद को मजबूत बनाने वाला था शुरुआती चुनौतियों ने उन्हें मानसिक रूप से तैयार कियाउन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें कभी भी काम थाली में परोस कर नहीं मिला एक टीनएजर के तौर पर उन्होंने इंडस्ट्री में बने रहने के लिए असिस्टेंट के तौर पर काम किया पोस्ट प्रोडक्शन से जुड़े काम किए और कई बार हार्ड डिस्क ले जाने जैसी रनर की जिम्मेदारियां निभाईं इन जमीनी अनुभवों ने उन्हें अनुशासन सिखाया और काम के प्रति ईमानदार बनाया

    अमाल मलिक की यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो मानते हैं कि बड़े नाम या मशहूर परिवार से आने वालों को सब कुछ आसानी से मिल जाता है अमाल का संघर्ष यह साबित करता है कि इंडस्ट्री में पहचान आखिरकार मेहनत और लगन से ही बनती है उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सरनेम चाहे जितना भी बड़ा हो असली संघर्ष और सीख तो मेहनत में ही मिलती हैअमाल ने यह भी कहा कि शुरुआती कठिनाइयों ने उन्हें हर परिस्थिति में खुद पर भरोसा रखना सिखाया और आज उनकी मेहनत और समर्पण ही उन्हें बॉलीवुड म्यूजिक इंडस्ट्री में खास पहचान दिला रहा है उनके अनुभव नए कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकते हैं