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  • खीर वाला मासूम बच्चा अब बड़ा स्टार: ‘सूर्यवंशम’ के चाइल्ड आर्टिस्ट का 27 साल बाद बदला हुआ रूप

    खीर वाला मासूम बच्चा अब बड़ा स्टार: ‘सूर्यवंशम’ के चाइल्ड आर्टिस्ट का 27 साल बाद बदला हुआ रूप


    नई दिल्ली।भारतीय सिनेमा और टेलीविजन की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल ‘सूर्यवंशम’ आज भी दर्शकों के बीच उतनी ही लोकप्रिय है जितनी अपने शुरुआती दौर में थी। फिल्म में अमिताभ बच्चन का डबल रोल और पारिवारिक भावनाओं से भरी कहानी ने इसे एक कालजयी पहचान दी। लेकिन इस फिल्म का एक छोटा सा किरदार भी दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया था, जो था एक मासूम बच्चा, जिसने अपने दादा को खीर खिलाने वाला भावुक दृश्य निभाया था। यही छोटा किरदार आज एक बड़े और सफल कलाकार के रूप में सामने आया है, जिसे देखकर फैंस हैरान रह गए हैं।

    इस किरदार को निभाने वाले चाइल्ड आर्टिस्ट का नाम आनंद वर्धन है। उस समय वह बेहद कम उम्र के थे और उनकी मासूम मुस्कान और सहज अभिनय ने उस दृश्य को बेहद खास बना दिया था। खासकर खीर वाला सीन दर्शकों के दिलों में आज भी ताजा है, जिसे लोग बार-बार याद करते हैं। उनकी स्क्रीन पर मौजूदगी इतनी प्रभावशाली थी कि वह फिल्म के सबसे यादगार चेहरों में से एक बन गए थे।

    अब सालों बाद आनंद वर्धन पूरी तरह बदल चुके हैं। उनका रूप, व्यक्तित्व और अंदाज पहले से बिल्कुल अलग हो चुका है। हाल ही में सामने आई उनकी तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर काफी चर्चा बटोरी, जहां फैंस यह देखकर चौंक गए कि वही मासूम बच्चा अब एक लंबे-चौड़े और बेहद हैंडसम युवा अभिनेता में बदल चुका है। उनका यह बदलाव किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, जहां समय के साथ एक किरदार पूरी तरह नई पहचान हासिल कर लेता है।

    आनंद वर्धन ने अपने करियर की शुरुआत बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट की थी और उन्होंने कई फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाए। धीरे-धीरे उन्होंने साउथ फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी पहचान बनानी शुरू की और कई प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बने। बताया जाता है कि उन्होंने अपने करियर में 20 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है, जिससे उनकी अभिनय क्षमता और अनुभव दोनों मजबूत हुए।

    हालांकि, एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली थी। शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने कई वर्षों तक अभिनय से ब्रेक लिया और खुद को एक सामान्य जीवन में व्यस्त रखा। बाद में उन्होंने फिर से इंडस्ट्री में वापसी की कोशिश की और अब एक बार फिर एक्टिंग के क्षेत्र में सक्रिय होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    उनका पारिवारिक बैकग्राउंड भी कला से जुड़ा रहा है। उनके परिवार में संगीत और सिनेमा की परंपरा रही है, जिसने उनके भीतर भी कला के प्रति रुचि को जन्म दिया। कहा जाता है कि बचपन से ही उन्हें अभिनय की ओर आकर्षित करने में इस माहौल का बड़ा योगदान रहा।

    आज ‘सूर्यवंशम’ का वह छोटा सा चेहरा केवल एक याद भर नहीं है, बल्कि एक ऐसे कलाकार की कहानी बन चुका है जिसने समय के साथ खुद को बदला, सीखा और फिर से अपनी पहचान बनाने की कोशिश की। उनका यह सफर दर्शकों के लिए न केवल भावनात्मक है, बल्कि प्रेरणादायक भी है, क्योंकि यह दिखाता है कि बचपन की छोटी सी शुरुआत भी आगे चलकर एक लंबा और सफल करियर बन सकती है।

  • मिस्टर इंडिया की मासूम टीना, हुजान खोदाईजी अब 43 साल की और दो बेटियों की मां।

    मिस्टर इंडिया की मासूम टीना, हुजान खोदाईजी अब 43 साल की और दो बेटियों की मां।

    नई दिल्ली। बॉलीवुड की कल्ट फिल्म मिस्टर इंडिया में 6 साल की मासूम बच्ची ने टीना का किरदार निभाकर लोगों के दिलों में जगह बना ली थी। यह छोटी सी बच्ची हुजान खोदाईजी थीं, जिनकी भोली-भाली आँखें और मासूम चेहरे ने फिल्म में विशेष छाप छोड़ी। फिल्म 1987 में रिलीज़ हुई थी, और इसके 38 साल बाद अब हुजान का बदल चुका रूप फैंस के लिए चौंकाने वाला साबित हुआ। सोशल मीडिया पर उनकी हाल की तस्वीरें सामने आने के बाद फैंस को उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया।

    हुजान खोदाईजी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत इसी फिल्म से की थी और यह उनकी पहली और आखिरी फिल्म साबित हुई। जब मिस्टर इंडिया की शूटिंग हुई, तब हुजान केवल 6 साल की थीं। बाल कलाकारों में आमतौर पर बड़े होने के बाद भी फिल्मी करियर बनाने की कोशिश होती है, लेकिन हुजान ने सिर्फ एक फिल्म के बाद इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। अब वह 43 साल की हैं और दो बेटियों की मां हैं।

    हुजान ने अभिनय की दुनिया से दूरी बनाए रखी और ग्लैमर और चकाचौंध से दूर एक सादे जीवन को अपनाया। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि फिल्म की शूटिंग के बाद उन्हें लोगों का ध्यान आकर्षित करने से शर्मिंदगी होती थी। उन्होंने बताया कि फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद वह मद्रास चली गईं और अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जीने लगीं। इसके बाद उन्होंने कुछ विज्ञापन किए, लेकिन लाइमलाइट का ध्यान उन्हें कभी पसंद नहीं आया।

    आज के समय में हुजान खोदाईजी मार्केटिंग क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने एडवरटाइजिंग कंपनी में सफल करियर बनाया है और पेशेवर रूप से विज्ञापन एग्जीक्यूटिव के रूप में काम कर रही हैं। सोशल मीडिया पर उनका प्रोफाइल प्राइवेट है, जिससे यह साफ होता है कि वह अपने निजी जीवन को प्राथमिकता देती हैं और फिल्मी दुनिया में वापसी की इच्छा नहीं रखतीं।

  • शशि कपूर के हाथों मिला पहला अवॉर्ड और आर.के. स्टूडियो की वो रातें; अनिल कपूर ने खोल दिए करियर के सुनहरे राज

    शशि कपूर के हाथों मिला पहला अवॉर्ड और आर.के. स्टूडियो की वो रातें; अनिल कपूर ने खोल दिए करियर के सुनहरे राज


    नई दिल्ली :बॉलीवुड के ‘झक्कास’ अभिनेता अनिल कपूर आज भले ही वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हों, लेकिन उनके करियर की नींव बेहद सादगी और संघर्ष के साथ पड़ी थी। हाल ही में गेमिंग रियलिटी शो ‘व्हील ऑफ फॉर्च्यून’ में अक्षय कुमार के साथ बातचीत के दौरान अनिल कपूर ने अपने जीवन के उन पन्नों को पलटा, जो आज की पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। अभिनेता ने भावुक होते हुए बताया कि उनके पेशेवर सफर की शुरुआत साल 1976 में मुंबई के वर्ली स्थित दूरदर्शन स्टूडियो से हुई थी। उस समय एक छोटे से कार्यक्रम में परफॉर्म करने के बदले उन्हें पहली कमाई के रूप में मात्र 250 रुपये मिले थे। अनिल कपूर के लिए वह महज एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके हुनर पर लगी पहली मुहर थी, जिसने उन्हें भविष्य का सुपरस्टार बनने का आत्मविश्वास दिया।

    अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए अनिल कपूर ने एक दिलचस्प वाकया साझा किया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहली बार एक नाटक में हिस्सा लिया, तो वहां मुख्य अतिथि के रूप में दिग्गज अभिनेता शशि कपूर मौजूद थे। अनिल की प्रतिभा से प्रभावित होकर शशि कपूर ने उन्हें ‘बेस्ट एक्टर’ की ट्रॉफी से नवाजा। उस पल को याद करते हुए अभिनेता ने कहा कि महान कलाकार के हाथों मिले उस सम्मान ने ही उन्हें यकीन दिलाया कि वे अभिनय की दुनिया में लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकते हैं। हालांकि, अनिल आज भी अपने उस शुरुआती दौर की रिकॉर्डिंग तलाश रहे हैं, ताकि वे देख सकें कि पांच दशक पहले वे स्क्रीन पर कैसे दिखते और अभिनय करते थे, लेकिन अफसोस कि वह क्लिप अब तक नहीं मिल पाई है।

    बातचीत का सिलसिला जब उनके करियर के सबसे प्रतिष्ठित गाने ‘धक-धक करने लगा’ पर पहुँचा, तो अनिल कपूर ने कई राज खोले। फिल्म ‘बेटा’ के इस कालजयी गाने को लेकर उन्होंने विनम्रता से कहा कि यह गाना पूरी तरह से माधुरी दीक्षित का है और उन्होंने केवल उनका साथ निभाया था। अक्षय कुमार के टोकने पर कि यह गाना दोनों की मेहनत का फल है, अनिल ने बताया कि इसकी शूटिंग बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हुई थी। मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान के निर्देशन में आर.के. स्टूडियो में फिल्माए गए इस गाने की शूटिंग रातों में होती थी। उन दिनों अनिल और माधुरी दोनों ही दिन में दो-दो अलग फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे और थकान के बावजूद रात भर जागकर ‘धक-धक’ गाने को पूरा किया गया। आज भी इस गाने में जो ऊर्जा और ताजगी नजर आती है, उसके पीछे उन सितारों की रातों की नींद और समर्पण छिपा है

  • मल्टीप्लेक्स के शोर में भी बुलंद है इन सिनेमाघरों की गूंज: भारत के वो आइकोनिक सिंगल स्क्रीन थिएटर जो आज भी हैं शान की विरासत

    मल्टीप्लेक्स के शोर में भी बुलंद है इन सिनेमाघरों की गूंज: भारत के वो आइकोनिक सिंगल स्क्रीन थिएटर जो आज भी हैं शान की विरासत


    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा केवल तीन घंटे का मनोरंजन नहीं बल्कि एक गहरा भावनात्मक अनुभव रहा है। एक वह भी दौर था जब बड़े पर्दे पर अपने पसंदीदा नायक को देखने के लिए लोग किसी त्यौहार की तरह सज-धजकर सिनेमाघरों का रुख करते थे। उस जमाने में ‘सिंगल स्क्रीन थिएटर’ इस अनुभव की आत्मा हुआ करते थे। आज भले ही मल्टीप्लेक्स संस्कृति और चमचमाते मॉल्स ने हर शहर में अपनी पैठ बना ली है लेकिन सिनेमा की वह पुरानी और गौरवशाली विरासत आज भी कुछ ऐतिहासिक थिएटरों के रूप में जिंदा है। हाल ही में आमिर खान और जावेद अख्तर जैसे दिग्गजों ने देश में थिएटरों की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त की लेकिन इसके बावजूद भारत में कुछ ऐसेआइकोनिक थिएटर मौजूद हैं जो समय की धूल को पछाड़कर आज भी सीना ताने खड़े हैं।

    इस सूची में राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर काराज मंदिर सबसे ऊपर आता है। साल 1976 में निर्मित यह थिएटर अपनी वास्तुकला के कारण ‘एशिया का गौरव’ कहा जाता है। इसकी भव्यता किसी शाही महल जैसी है जहाँ बड़े-बड़े झूमर और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी आज भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। यहाँ फिल्म देखना महज एक शो नहीं बल्कि एक राजसी अनुभव की तरह है। वहीं मायानगरी मुंबई कामराठा मंदिर तो भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक अभिन्न अंग बन चुका है। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ DDLJ को पिछले तीन दशकों से लगातार चलाने के कारण इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। सस्ती टिकट और आम आदमी से जुड़ाव इसे आज भी मुंबई की जान बनाए हुए है।

    राजधानी दिल्ली की बात करें तो कनॉट प्लेस कारीगल सिनेमा इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 1932 में बना यह हॉल राज कपूर का पसंदीदा था जहाँ उनकी फिल्मों के भव्य प्रीमियर हुआ करते थे। यहाँ तक कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी यहाँ सिनेमा देखने आया करते थे। दिल्ली में ही स्थितडिलाइट सिनेमा अपने विंटेज लुक और मॉडर्न साउंड सिस्टम के मेल के लिए मशहूर है। इसी तरह मुंबई कालिबर्टी सिनेमा जो 1947 में भारत की आजादी के साल बनकर तैयार हुआ अपनी आर्ट-डेको शैली और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्मों के साथ जुड़ी अपनी यादों के लिए प्रसिद्ध है।

    कोलकाता कामेट्रो सिनेमा और बेंगलुरु काएवरेस्ट टॉकीज भी इसी कड़ी के मजबूत स्तंभ हैं। 1935 में बना मेट्रो सिनेमा अपनी भव्य सीढ़ियों और ब्रिटिश कालीन फर्नीचर के जरिए दर्शकों को बीते जमाने की याद दिलाता है। ये थिएटर केवल ईंट और पत्थर की इमारतें नहीं हैं बल्कि ये उस दौर के गवाह हैं जब सिनेमा देखना एक साझा सामाजिक उत्सव होता था। मल्टीप्लेक्स के दौर में भी इन सिंगल स्क्रीन्स का टिके रहना यह साबित करता है कि विरासत को आधुनिकता कभी पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।